श्रीमद्भगवद्गीता

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Bhagavad Gita 13.15

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

वे (परमात्मा) सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं; आसक्तिरहित हैं और सम्पूर्ण संसारका भरण-पोषण करनेवाले हैं; तथा गुणोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण गुणोंके भोक्ता हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Shining by the functions of the senses, yet devoid of the senses, detached yet supporting all, devoid of the Gunas yet experiencing the Gunas;

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

ज्ञेय तत्त्व का वर्णन अब विरोधाभासों की एक माला बन जाता है, और हर विरोधाभास बुद्धि को उसकी सीमा का अनुभव कराता है। 'सर्वेन्द्रियगुणाभासम्', वह सब इन्द्रियों के विषयों को प्रकाशित करनेवाला है, 'सर्वेन्द्रियविवर्जितम्', फिर भी सब इन्द्रियों से रहित है; 'असक्तं सर्वभृच्चैव', आसक्ति से रहित है, फिर भी सबका भरण-पोषण करता है; 'निर्गुणं गुणभोक्तृ च', गुणों से रहित है, फिर भी गुणों का भोक्ता है। इस श्लोक में तीन जोड़े हैं, और हर जोड़ा एक गहरा सत्य कहता है। पहला: उसकी कोई इन्द्रिय नहीं, फिर भी हर इन्द्रिय उसी के प्रकाश से काम करती है। जैसे बिजली स्वयं न देखती है, न सुनती है, पर उसके बिना न दीपक जलता है, न कोई यन्त्र चलता है। दूसरा: वह किसी से आसक्त नहीं, फिर भी सबको पालता है। यह भगवान के प्रेम का सबसे शुद्ध रूप है। संसार में हम जिनका पालन करते हैं, उनसे आसक्त हो जाते हैं, और फिर उनसे अपेक्षाएँ रखते हैं। पर वह सबका पालन करता है, बिना किसी अपेक्षा के, बिना किसी बन्धन के। जैसे धरती सब वृक्षों को पोषण देती है, पर किसी वृक्ष से कुछ माँगती नहीं। और तीसरा: वह स्वयं गुणों से परे है, फिर भी सब अनुभव उसी में होते हैं। यह श्लोक आपको निःस्वार्थ प्रेम का एक आदर्श देता है। जिनका आप पालन करते हैं, उनसे प्रेम कीजिए, उनकी सेवा कीजिए, पर उनसे बँधिए मत, और बदले में कुछ माँगिए मत।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-23
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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