नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्
nāyamātmā pravacanena labhyo na medhayā na bahunā śrutena | yamevaiṣa vṛṇute tena labhyastasyaiṣa ātmā vivṛṇute tanūṃ svām
अर्थMeaning
यह आत्मा न प्रवचन से, न मेधा से, न बहुत सुनने से प्राप्त होती है। यह जिसे वरण करती है, उसी को प्राप्त होती है; उसी के सामने यह आत्मा अपने स्वरूप को प्रकट करती है।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
This Self is not gained by discourse, nor by intellect, nor by much hearing. It is gained by the one whom it chooses; to him this Self reveals its own form.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
यह मंत्र कठोपनिषद के उस प्रसंग में आता है जहाँ यम नचिकेता को आत्मा का रहस्य समझा रहे हैं। इससे पहले आत्मा को सूक्ष्म और जानने में कठिन बताया गया है; इसके बाद के मंत्र में कहा गया है कि जो बुरे आचरण से नहीं हटा, जो शांत और एकाग्र नहीं है, वह इसे नहीं पा सकता। प्रवचन का अर्थ है उपदेश या व्याख्यान, मेधा का अर्थ है ग्रहण करने वाली बुद्धि, और श्रुत का अर्थ है बहुत सुना हुआ ज्ञान। मंत्र कहता है कि तीनों साधन अपने आप में पर्याप्त नहीं। वृणुते का कर्ता दो तरह से पढ़ा जाता है: आत्मा जिसे चुनती है, या वह साधक जो आत्मा को ही चुनता है। पहला पाठ कृपा की ओर, दूसरा साधक की एकनिष्ठ चाह की ओर ले जाता है, और दोनों परंपरा में मिलते हैं। यही मंत्र मुण्डक उपनिषद में भी आता है। इसे पढ़ाई-लिखाई का विरोध या पूर्वनिर्धारित भाग्य का सिद्धांत मान लेना भूल होगी, क्योंकि अगला ही मंत्र आचरण की शर्तें गिनाता है।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी
आधुनिक दर्शन में किसी चीज़ के बारे में जानने और उसे सीधे पहचानने के भेद की चर्चा होती है, जैसे किसी स्वाद का वर्णन पढ़ना और उसे चखना। मंत्र के इस दावे के साथ कि केवल बहुत सुनने-पढ़ने से आत्मा नहीं मिलती, यह एक दार्शनिक समानता भर है। मंत्र कोई ज्ञान-सिद्धांत प्रस्तुत नहीं करता और न यह कोई वैज्ञानिक कथन है। आत्मा के प्रकट होने का अर्थ यहाँ किसी मापी जा सकने वाली घटना से नहीं जोड़ा जा रहा।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
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- Sanskrit edition
- Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
- Translation
- Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
- Last updated
- 2026-10-23
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.
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