कठोपनिषद्

Vallī 4श्लोक 14/1593%

Katha Upanishad 4.14

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जैसे ऊबड़-खाबड़ पर्वत पर वर्षा का जल पहाड़ों पर बह जाता है — वैसे ही जो धर्मों को पृथक्-पृथक् देखता है, उन्हीं के पीछे दौड़ता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

As rain fallen on a rugged mountain runs down its sides — even so, one who sees the dharmas (qualities) as separate runs after them.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

भेद-दृष्टि का विनाशकारी भटकाव: जिस प्रकार किसी ऊंचे पर्वत के शिखर पर बरसा हुआ वर्षा का जल चारों ओर ढलानों और खाइयों में बिखर कर नष्ट हो जाता है — ठीक उसी प्रकार, जो मनुष्य धर्मों (आत्म-तत्त्वों) को भिन्न-भिन्न और पृथक् देखता है, वह उन भेदों के पीछे ही दौड़ता हुआ अपना जीवन नष्ट कर लेता है!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यमराज एक अत्यंत विस्मयकारी प्राकृतिक रूपक के द्वारा भेद-दृष्टि के विनाशकारी परिणाम को समझाते हैं: 'यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति। एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति॥' — जैसे किसी ऊंचे और दुर्गम पर्वत के शिखर पर जब घनघोर वर्षा होती है, तो वह शुद्ध जल एक स्थान पर नहीं टिकता; वह पर्वत की ढलानों, पत्थरों और खाइयों में सैकड़ों धाराओं में बंटकर नीचे बह जाता है और अंततः कीचड़ में मिलकर नष्ट हो जाता है। ठीक उसी प्रकार, जो मनुष्य इस संसार में आत्मा की एकता को न देखकर नाना प्रकार के भेदों, बाह्य रूपों और संप्रदायों में उलझा रहता है, उसकी चेतना उन भेदों के पीछे दौड़ती हुई क्षत-विक्षत होकर नष्ट हो जाती है! यह श्लोक आज के विखंडित और दिशाहीन मानव-जीवन का सटीक दर्पण है। आज मनुष्य की ऊर्जा हजारों दिशाओं में बिखर रही है — कभी इस प्रलोभन के पीछे, कभी उस विवाद के पीछे, कभी इस विचारधारा के पीछे, तो कभी उस पहचान के पीछे। जैसे पर्वत से गिरा हुआ पानी नीचे गड्ढे में जाकर गंदा हो जाता है, वैसे ही जो व्यक्ति अपनी चेतना को सांसारिक भेदों और बहुलता में बिखेर देता है, वह मानसिक अवसाद, अशांति और आध्यात्मिक मृत्यु को प्राप्त होता है। जब तक आपकी चेतना एकत्रित होकर एकात्मता में नहीं ठहरती, तब तक जीवन में कोई शांति संभव नहीं है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **मानसिक ऊर्जा के बिखराव को रोकें**: अपनी ऊर्जा को सोशल मीडिया के व्यर्थ विवादों, भेदों और अंतहीन विकल्पों में बहने से बचाएं; एकाग्रता का अभ्यास करें। - **अनेकता में एकता का दर्शन**: बाह्य भिन्नताओं के बावजूद जीवन के मूल आध्यात्मिक सत्य को पहचानें; विभाजनकारी सोच से ऊपर उठें। - **ऊर्ध्वगामी चेतना**: पर्वत से नीचे बहते पानी की तरह अधोगामी न बनें; अपनी ऊर्जा को आत्म-ज्ञान और साधना के शिखर की ओर ऊर्ध्वगामी बनाएं।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मेरी मानसिक ऊर्जा पर्वत के शिखर से गिरी हुई वर्षा की भाँति सांसारिक भेदों और चिंताओं में बिखर कर नष्ट हो रही है, अथवा मैं अपनी चेतना को समेटकर एकात्मता की ओर ले जा रहा हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

संज्ञानात्मक विखंडन और एंट्रॉपी (Cognitive Fragmentation & Dispersion): जब मन एकता के मूल सिद्धांत को छोड़कर बाह्य बहुलता और भेदों में बिखर जाता है, तो उसकी मानसिक ऊर्जा क्षय होकर पतन की ओर जाती है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 3.35

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्

Translation / Meaning (भावार्थ)

Better is one's own dharma though imperfectly performed than the dharma of another well performed.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next