कठोपनिषद्

Vallī 4श्लोक 13/1587%

Katha Upanishad 4.13

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः ।एतद्वै तत्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

अंगुष्ठ-मात्र पुरुष — निर्धूम ज्योति जैसा — भूत-भविष्य का स्वामी। आज भी वही, कल भी वही। यही वह है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

The thumb-sized Person is like a smokeless flame — lord of past and future. He alone is today; he alone tomorrow. This indeed is That.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

धूम्र-रहित ज्योति: अँगूठे के परिमाण वाला वह पुरुष बिना धुएं की ज्योति (निर्मल प्रकाश) के समान अत्यंत तेजस्वी है। वह भूत और भविष्य का एकमात्र स्वामी है। वह आज भी वही है और कल भी वही रहेगा (सदा शाश्वत और अपरिवर्तनीय है)! यही वह परम तत्त्व है (एतद्वै तत्)!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यमराज उस आंतरिक ज्योति की शुद्धता और कालजयी स्वरूप का वर्णन करते हैं: 'अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः। ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः। एतद्वै तत्॥' — वह हृदयस्थ अंगुष्ठ-मात्र पुरुष किसी धुएं वाली लौ के समान नहीं है; वह 'अधूमकः ज्योतिः' — पूर्णतः धूम्र-रहित, अत्यंत निर्मल, निष्कंप और परम तेजस्वी प्रकाश-पुंज है! वह भूत और भविष्य का अधीश्वर है; 'स एवाद्य स उ श्वः' — वह जो आज इस क्षण तुम्हारे भीतर जाग रहा है, वही कल भी रहेगा, और वही अनंत काल तक रहेगा! यही वह अमर तत्त्व है। भौतिक अग्नि जब जलती है तो उसमें धुआं, राख और कालिख होती है, क्योंकि वह ईंधन पर निर्भर करती है। किन्तु तुम्हारी अंतरात्मा का प्रकाश किसी ईंधन पर निर्भर नहीं करता; इसलिए वह पूर्णतः निष्पाप, निर्लेप और धुएं से रहित है। आपका शरीर बचपन में कुछ और था, जवानी में कुछ और हुआ, और बुढ़ापे में कुछ और हो जाएगा; आपके विचार हर सेकंड बदलते हैं। किन्तु आपके भीतर का वह 'जानने वाला प्रकाश' आज भी ठीक वही है जो बचपन में था, और शरीर छूटने के बाद कल भी ठीक वही रहेगा। इस नित्य सातत्य को पहचानना ही अमरत्व है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **धूम्र-रहित प्रकाश की अनुभूति**: जब मन में नकारात्मक विचारों का धुआं उठे, तो उसके पार देखें — आपके भीतर का साक्षी प्रकाश सदा निष्पाप और निर्मल है। - **शाश्वत 'वर्तमान' में जीना**: समझें कि जो आत्मा 'आज' है वही 'कल' भी रहेगा; अतः भविष्य की काल्पनिक चिंताओं में वर्तमान को नष्ट न करें। - **अपरिवर्तनीय केंद्र में स्थिरता**: संसार के निरंतर बदलते हुए तूफानों के बीच अपने भीतर के इस अचल, निष्कंप प्रकाश-स्तंभ का सहारा लें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मेरी दृष्टि केवल मन के बदलते हुए विचारों और चिंताओं के धुएं पर टिकी है, अथवा मैं अपने भीतर जल रही उस नित्य, धूम्र-रहित आत्म-ज्योति के प्रति सजग हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

अपरिवर्तनीय साक्षी और नित्य सातत्य: समय के सतत प्रवाह में समस्त भौतिक वस्तुएं और यादें बदलती हैं, किन्तु चेतना का यह धूम्र-रहित प्रकाश (सदा वही रहने वाला साक्षी) कभी नहीं बदलता।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

  • Original text
  • Translation · from the source archive

No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.

Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

Found a mistake?

Interactive Verse Knowledge Graph · ज्ञान जाल

श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

Reviewed links only. A line here is a stored connection, not a guess from the neighboring verse.

Katha Upanishad 4.13Current VerseBhagavadBhagavad Gita Bh…BhagavadBhagavad Gita Bh…
🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 13.2

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत

Translation / Meaning (भावार्थ)

Know Me as the knower of the field (purusha) in all fields (prakriti). Understanding of the field and its knower is true knowledge.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

Listed beside Purusha in this library. The link does not say the passages teach the same thing.

आगे क्या · What next