श्रीमद्भगवद्गीता

Bhakti Yogaश्लोक 19/2095%

Bhagavad Gita 12.19

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित्।अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जो शत्रु और मित्रमें तथा मान-अपमानमें सम है और शीतउष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दा-स्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकारसे भी (शरीरका निर्वाह होनेमें) संतुष्ट, रहनेके स्थान तथा शरीरमें ममता-आसक्तिसे रहित और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He who regards both blame and praise alike, who is silent and content with any lot, who has no home, who is firm of mind, and who is devoted to Me - such a man is dear to Me.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

प्रिय भक्त के लक्षणों का वर्णन यहाँ अपनी पूर्णता पर पहुँचता है। 'तुल्यनिन्दास्तुतिः', जो निन्दा और स्तुति को समान समझता है, 'मौनी', जो मननशील है, 'सन्तुष्टो येनकेनचित्', जो जिस-किसी प्रकार से भी सन्तुष्ट है, 'अनिकेतः', जो किसी स्थान में ममता नहीं रखता, 'स्थिरमतिः', जिसकी बुद्धि स्थिर है, 'भक्तिमान्मे प्रियो नरः', ऐसा भक्तिमान मनुष्य मुझे प्रिय है। 'तुल्यनिन्दास्तुतिः', निन्दा और स्तुति में समान, यह लक्षण बहुत कठिन है। प्रशंसा सुनकर मन फूल जाता है, निन्दा सुनकर टूट जाता है। पर जो जानता है कि दोनों ही दूसरों की दृष्टि हैं, उसकी अपनी सच्चाई नहीं, वह दोनों में स्थिर रहता है। जैसे एक पर्वत न तो वर्षा से बढ़ता है, न धूप से घटता है। 'अनिकेतः', घर से रहित, इस शब्द को ध्यान से समझना आवश्यक है। इसका अर्थ यह नहीं कि भक्त का कोई घर नहीं होता। गीता प्रेस के अनुसार इसका अर्थ है कि उसे अपने निवास-स्थान और शरीर में ममता-आसक्ति नहीं होती। वह घर में रहता है, पर घर उसमें नहीं रहता। और 'मौनी', मननशील, यह बताता है कि वह बहुत बोलता नहीं, बल्कि भीतर विचार करता है। 'सन्तुष्टो येनकेनचित्', जो भी मिले, उसी में सन्तुष्ट, यह भक्त की सबसे सुन्दर अवस्था है। यह श्लोक आपको सिखाता है कि अपने घर, अपने शरीर, अपनी प्रतिष्ठा को उतना ही महत्त्व दीजिए जितना उचित है। इनमें बँधिए मत।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

  • Original text
  • Translation · from the source archive
  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.

Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Community dataset — verify license terms at source repo before redistribution.
पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

Found a mistake?

आगे क्या · What next