श्रीमद्भगवद्गीता

Bhakti Yogaश्लोक 14/2070%

Bhagavad Gita 12.14

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

सब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट,योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला, मेरेमें अर्पित मन-बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He who is content, who meditates ever, is self-restrained, and is firm in his convictions, and has his mind and reason dedicated to Me—he is dear to Me.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

प्रिय भक्त के लक्षणों का पहला भाग यहाँ पूरा होता है, और अन्त में भगवान का वह वचन आता है जो इन सब श्लोकों का स्वर बन जाता है। 'सन्तुष्टः सततं योगी', जो निरन्तर सन्तुष्ट है, योगी है, 'यतात्मा दृढनिश्चयः', संयत चित्तवाला और दृढ़ निश्चयवाला है, 'मय्यर्पितमनोबुद्धिः', जिसने मन और बुद्धि मुझे अर्पित कर दी है, 'यो मद्भक्तः स मे प्रियः', ऐसा जो मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है। 'स मे प्रियः', वह मुझे प्रिय है, ये तीन शब्द इस पूरे प्रकरण की आत्मा हैं। सोचिए, जिस भगवान का विराट रूप अभी अर्जुन ने देखा, जो सारे ब्रह्माण्ड को एक अंश में धारण करते हैं, वे कहते हैं कि अमुक व्यक्ति मुझे प्रिय है। यह कितना आत्मीय वचन है! भगवान केवल भक्त के प्रिय नहीं; भक्त भी भगवान का प्रिय है। प्रेम दोनों ओर से बहता है। इस श्लोक में 'सन्तुष्टः सततम्', निरन्तर सन्तुष्ट, एक बहुत सुन्दर लक्षण है। सन्तोष का अर्थ आलस्य या महत्त्वाकांक्षा का अभाव नहीं। इसका अर्थ है कि जो भी मिला, उसमें भगवान की कृपा देखना, और जो नहीं मिला, उसकी शिकायत न करना। जैसे एक बालक माता के हाथ से जो भी पाता है, उसी में प्रसन्न रहता है। और 'दृढनिश्चयः', दृढ़ निश्चयवाला, यह बताता है कि यह सन्तोष दुर्बलता नहीं, एक अटल आन्तरिक शक्ति है। यह श्लोक आपको भगवान का प्रिय बनने का मार्ग दिखाता है। उन लक्षणों में से कोई एक चुनिए और उसे आज के दिन जीने का प्रयत्न कीजिए।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
भगवान श्रीकृष्ण के प्रिय भक्त का यह लक्षण भावनात्मक स्वतंत्रता का सबसे उज्ज्वल मानक है: "सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥" जो निरंतर संतुष्ट रहता है, संयमी है, जिसका संकल्प दृढ़ है, और जिसका मन तथा बुद्धि मुझमें समर्पित हैं—ऐसा भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है। आधुनिक सकारात्मक मनोविज्ञान (Positive Psychology) में 'आंतरिक संतोष' (Trait Contentment) को मानसिक स्वास्थ्य का सर्वोच्च शिखर माना जाता है। अधिकांश लोग 'सशर्त संतोष' में जीते हैं—"यदि यह हो जाएगा, तो मैं खुश होऊंगा"। श्रीकृष्ण जिस संतोष की बात करते हैं, वह 'सततं' (निरंतर और अकारण) है। यह संतोष किसी आलस्य या अकर्मण्यता का नाम नहीं है; यह बाह्य परिस्थितियों (लाभ-हानि, मान-अपमान) से अप्रभावित रहने वाली आंतरिक परिपूर्णता है। जब आपका मन किसी बाहरी घटना पर निर्भर रहना बंद कर देता है, तो आपके भीतर एक अटूट 'दृढ़ निश्चय' जन्म लेता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति जो अपने मन और बुद्धि को सत्य में समर्पित कर चुका है, वही उनका सबसे प्रिय है। सच्चा भक्त वह नहीं है जो दिन भर मांगता रहता है, बल्कि वह है जो ईश्वर के दिए हुए जीवन से इतना संतुष्ट है कि उसका हृदय केवल कृतज्ञता से भरा रहता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **अकारण संतोष का अभ्यास (Unconditional Contentment)**: दिन में कम से कम एक बार कहें—"इस क्षण मुझे जो मिला है, वह मेरे लिए पर्याप्त है"; अभावों पर रोने के बजाय उपलब्धियों पर संतोष करें। - **दृढ़ संकल्प का निर्माण (Unyielding Inner Resolve)**: अपने नैतिक और आध्यात्मिक नियमों पर अडिग रहें; बाह्य प्रलोभन या दूसरों की राय के कारण अपने उच्च संकल्प से विचलित न हों। - **बुद्धि का उच्चतर समर्पण (Surrendering Mind to Higher Purpose)**: अपने निर्णयों और विचारों को संकीर्ण स्वार्थ से मुक्त करके किसी महान उद्देश्य या लोक-कल्याण के प्रति समर्पित कर दें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आपकी खुशी और संतोष केवल बाहरी परिस्थितियों और दूसरों के व्यवहार के गुलाम हैं, अथवा आप अपने अंतरतम में स्थित उस सतत और अकारण संतोष का अनुभव कर सकते हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

सुखात्मक अनुकूलन (Hedonic Treadmill) का शमन और संज्ञानात्मक स्थिरता (Cognitive Tenacity): मनुष्य का मन नई-नई कामनाओं के पीछे भागकर कभी संतुष्ट नहीं होता (Hedonic Adaptation)। 'सततं संतुष्टः' की स्थिति आंतरिक डोपामाइन स्राव को बाहरी उत्तेजनाओं से मुक्त कर देती है। 'दृढनिश्चय' मस्तिष्क के एंटीरियर मिड-सिंगुलेट कॉर्टेक्स (aMCC) की शक्ति को दर्शाता है, जिसे तंत्रिका-वैज्ञानिक इच्छाशक्ति और मानसिक दृढ़ता का मुख्य चालक मानते हैं।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Bhagavad Gita 12.14Current VerseChandogyChandogya Upanis…TaittiriTaittiriya Upani…
🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Chandogya Upanishad 3.14.1

Chandogya Upanishad (छान्दोग्योपनिषद्)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

सर्वं खल्विदं ब्रह्म

Translation / Meaning (भावार्थ)

All this is verily Brahman. Everything emerges from, is sustained by, and dissolves into Brahman.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next