श्रीमद्भगवद्गीता

Bhakti Yogaश्लोक 16/2080%

Bhagavad Gita 12.16

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जो आकाङ्क्षासे रहित, बाहर-भीतरसे पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथासे रहित और सभी आरम्भोंका अर्थात् नये-नये कर्मोंके आरम्भका सर्वथा त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He who is free from desires, who is pure, expert, indifferent, and free from agony, who has renounced every undertaking—he is dear to me.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

प्रिय भक्त के लक्षण अब और सूक्ष्म होते जाते हैं, जैसे कोई चित्रकार एक चित्र में धीरे-धीरे बारीक रेखाएँ भरता जाए। 'अनपेक्षः', जो किसी से अपेक्षा नहीं रखता, 'शुचिः', जो बाहर-भीतर से पवित्र है, 'दक्षः', जो कुशल है, 'उदासीनः', जो पक्षपात से रहित है, 'गतव्यथः', जिसकी व्यथा चली गई है, 'सर्वारम्भपरित्यागी', जो सब नए-नए आरम्भों का त्यागी है, 'यो मद्भक्तः स मे प्रियः', ऐसा जो मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है। 'अनपेक्षः', अपेक्षा से रहित, यह इस श्लोक का पहला और सबसे गहरा लक्षण है। हमारे अधिकांश दुःख अपेक्षाओं से उत्पन्न होते हैं: किसी से कुछ अपेक्षा की, वह पूरी नहीं हुई, और हम दुखी हो गए। जो भक्त अपेक्षाओं से मुक्त है, उसे कोई निराश नहीं कर सकता। वह दूसरों को देता है, उनसे माँगता नहीं। पर इसी श्लोक में 'दक्षः', कुशल, शब्द भी है, और यह बहुत महत्त्वपूर्ण है। भक्त का अर्थ अकर्मण्य या असावधान व्यक्ति नहीं। वह अपने हर कार्य में कुशल है, सावधान है, निपुण है। भक्ति और कर्मकुशलता एक साथ चलती हैं। और 'सर्वारम्भपरित्यागी', नए-नए आरम्भों का त्यागी, अर्थात् जो अपनी कामनाओं के लिए एक के बाद एक नए उपक्रम नहीं रचता, बल्कि जो कर्तव्य सामने है, उसे पूरा करता है। यह श्लोक आपको एक संतुलित जीवन का चित्र देता है: बाहर से कुशल और सक्रिय, भीतर से अपेक्षाओं से मुक्त और शान्त।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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