समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः
samaḥ śhatrau cha mitre cha tathā mānāpamānayoḥ śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ
alike
to a foe
and
to a friend
as well as
in honor and dishonor
in cold and heat
in joy and sorrow
equipoised
free from all unfavorable association
अर्थMeaning
जो शत्रु और मित्रमें तथा मान-अपमानमें सम है और शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दास्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकारसे भी (शरीरका निर्वाह होनेमें) संतुष्ट, रहनेके स्थान तथा शरीरमें ममता-आसक्तिसे रहित और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
He who is the same to foe and friend, honor and dishonor, who is alike to both cold and heat, pleasure and pain, and who is free from all attachments;
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
प्रिय भक्त के लक्षणों का यह अन्तिम चित्र अगले श्लोक में पूरा होता है, और इसमें जीवन के सब द्वन्द्वों के प्रति समता का भाव है। 'समः शत्रौ च मित्रे च', जो शत्रु और मित्र में सम है, 'तथा मानापमानयोः', तथा मान और अपमान में; 'शीतोष्णसुखदुःखेषु समः', शीत-उष्ण और सुख-दुःख में सम है, 'सङ्गविवर्जितः', और आसक्ति से रहित है। इस श्लोक में जीवन के तीन बड़े द्वन्द्व हैं। पहला, सम्बन्धों का: शत्रु और मित्र। दूसरा, प्रतिष्ठा का: मान और अपमान। तीसरा, परिस्थितियों का: शीत-उष्ण, सुख-दुःख। गीता प्रेस 'शीत-उष्ण' को अनुकूलता और प्रतिकूलता का प्रतीक मानती है। इन तीनों में जो सम रहता है, वह संसार की किसी भी लहर से विचलित नहीं होता। 'समः शत्रौ च मित्रे च', शत्रु और मित्र में समता, यह सबसे कठिन लक्षण है। इसका अर्थ यह नहीं कि भक्त शत्रु को मित्र मान ले या उसके अन्याय को स्वीकार कर ले। इसका अर्थ है कि उसके हृदय में शत्रु के प्रति भी घृणा नहीं, और मित्र के प्रति भी पक्षपातपूर्ण मोह नहीं। वह दोनों में उसी भगवान को देखता है। जैसे सूर्य शत्रु और मित्र, दोनों के आँगन में समान रूप से प्रकाश डालता है। यह श्लोक आपको एक ऊँचा आदर्श देता है। इसे एक दिन में पाने की आशा मत कीजिए, पर दिशा अवश्य बनाइए। जब कोई आपका अपमान करे, तो एक क्षण रुककर स्मरण कीजिए: 'मानापमानयोः समः'।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
“क्या आपकी मानसिक शांति दूसरों के द्वारा दिए गए मान और अपमान के झूले में झूलती रहती है, अथवा आप इन द्वंद्वों के पार अपने शांत आत्म-स्वरूप में स्थित हैं?”
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी
भावनात्मक तंत्रिका-विज्ञान दर्शाता है कि भावनात्मक समता एक प्रशिक्षित कौशल है: दीर्घकालिक साधकों में तनावकारकों के प्रति एमिग्डाला की प्रतिक्रिया मापने योग्य रूप से कम होती है — इसे "affective resilience" कहते हैं। मस्तिष्क अभ्यास से शाब्दिक रूप से स्वयं को पुनर्गठित कर लेता है।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
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- Translation · from the source archive
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-24
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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