अध्याय 20
श्लोक 75.1
वि त्वा॑ ततस्रे मिथु॒ना अ॑व॒स्यवो॑ व्र॒जस्य॑ सा॒ता गव्य॑स्य निः॒सृजः॒ सक्ष॑न्त इन्द्र निः॒सृजः॑ ।यद् ग॒व्यन्त॒ द्वा जना॒ स्व॑१र्यन्ता॑ स॒मूह॑सि ।आ॒विष्करि॑क्र॒द् वृषणं सचा॒भुवं॒ वज्र॑मिन्द्र सचा॒भुव॑म्
vi tvā tatasre mithunā avasyavo vrajasya sātā gavyasya niḥsṛjaḥ sakṣanta indra niḥsṛjaḥ | yad gavyanta dvā janā sva1ryantā samūhasi | āviṣkarikrad vṛṣaṇaṃ sacābhuvaṃ vajramindra sacābhuvam
हिन्दी अर्थ
सब पर सुशासन कर रहा है, (भप्रतिष्कुतः) इस सम्बन्ध मँ उसका .कहीं से भी प्रतिरोध नहीं होता । "क = वंसगः--वननीयगतिः । कृष्टीः = मनुष्याः (निष०.२।३) (यः) जो (एकः) एक (चषंणीनाम्) सब मनुष्यों का, (वसूनाम्) सब वसुं का, तथां (पञ्च ) पांच या विस्तृत (क्षितीनाम्) पृथिविरयो यां ग्रहों का (इरज्यति) अधीदवर है, . (इन्द्रः) वंह पररमेदवर है । .
English
Busied with sacrifice, with spotted deer and spears, gleaming. upon your way with ornaments, yea, our friends,