अध्याय 20
श्लोक 67.1
सव॒नोति॒ हि सु॒न्वन् क्षयं॒ परी॑णसः सुन्वा॒नो हि ष्मा॒ यज॒त्यव॒ द्विषो॑ दे॒वाना॒मव॒ द्विषः॑ ।सु॒न्वा॒न इत् सि॑षासति स॒हस्रा॑ वा॒ज्यवृ॑तः ।सु॒न्वा॒नायेन्द्रो॑ ददात्या॒भुवं॑ र॒यिं द॑दात्या॒भुव॑म्
savanoti hi sunvan kṣayaṃ parīṇasaḥ sunvāno hi ṣmā yajatyava dviṣo devānāmava dviṣaḥ | sunvāna it siṣāsati sahasrā vājyavṛtaḥ | sunvānāyendro dadātyābhuvaṃ rayiṃ dadātyābhuvam
हिन्दी अर्थ
(ऊतये) आत्मरक्ना के लिये हम, (विद्यवि) प्रतिदिन, ( सुरूप- जौर आत्मसमर्पण की भ्राहुतियां देते है, (इव) जैसे कि (गोदुहे) गौ के दोहने के लिये, (सुदृषाम्) सुगमता से दोही जानेवाली, तथा उत्तम॑-दुरष देनेवाली गौ के प्रति, प्रतिदिन, (जहुमसि) हम उत्तम चारा.देते है । सुरूपकत्तुम्-- इसके दो अभिभ्राय हें । . एक तो यह कि परमैदवर १४४ भथरवेवेद-माष्य का० २० । सु०-५७
English
None may restrain thee; yet come hither to the draught: thou movest mighty in thy power. When he, the mighty, ne’er o’erthrown, stedfast, made ready for the fight.