श्वेताश्वतरोपनिषद्

Adhyāya 6श्लोक 20/2387%

Shvetashvatara Upanishad 6.20

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः ।तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जब मनुष्य आकाश को चमड़े की तरह लपेट लेंगे, तभी — ईश्वर को जाने बिना — दुख का अंत होगा।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

When humans roll up the sky like a piece of leather, then — without knowing God — suffering will come to an end.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

परम व्यंग्य और विडम्बना का एक श्लोक: आकाश को चमड़े की तरह लपेटना असम्भव है — और यही इसका मूल बिन्दु है। दिव्य आत्म-ज्ञान के बिना मानवीय दुःख को समाप्त करने का कोई संक्षिप्त मार्ग (Shortcut), कोई तकनीकी समाधान या कोई सामाजिक सुधार पर्याप्त नहीं हो सकता। बाहरी उपलब्धियाँ — चाहे वे कितनी भी भव्य क्यों न हों — कभी भी आन्तरिक साक्षात्कार का विकल्प नहीं बन सकतीं।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
21वीं सदी का मानव समाज इस भ्रम में आकंठ डूबा हुआ है कि तकनीक, आर्थिक विकास, वैज्ञानिक आविष्कार और भौतिक उपभोग एक दिन मनुष्य के सभी दुःखों और संतापों को हमेशा के लिए समाप्त कर देंगे। हम लगातार नए गैजेट्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), बायो-इंजीनियरिंग, अंतरिक्ष पर्यटन और विलासिता के साधन विकसित कर रहे हैं। किंतु कड़वी सच्चाई यह है कि भौतिक समृद्धि के शिखर पर बैठे समाजों में ही डिप्रेशन, आत्महत्या, अकेलापन, नशा और पारिवारिक बिखराव सबसे तेजी से बढ़ रहे हैं। बाहरी साधनों से आंतरिक शांति पाने का यह प्रयास पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। श्वेताश्वतर उपनिषद् इस भौतिकतावादी भ्रम पर एक गहरा और अकाट्य कटाक्ष करता है: "यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः। तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति" (जिस दिन मनुष्य आकाश को चमड़े या चटाई की तरह लपेटने में सफल हो जाएगा, ठीक उसी दिन परमात्मा को जाने बिना मनुष्य के दुःखों का अंत संभव होगा!)। ऋषि कहते हैं कि जैसे आकाश को लपेटना असंभव है, वैसे ही आत्म-ज्ञान के बिना, उस आंतरिक दिव्य सत्य को साक्षात किए बिना मानवीय दुःखों का निवारण होना असंभव है। बाहरी विज्ञान आपको भौतिक सुविधा और साधन दे सकता है, किंतु आंतरिक शांति, मुक्ति और परमानंद केवल अपनी वास्तविक आत्मा के साक्षात्कार से ही प्राप्त हो सकता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **सुविधा और शांति का स्पष्ट भेद (Distinguishing Comfort from Peace)**: भौतिक साधनों, धन और तकनीक का उपयोग अपनी जीवन-सुविधा के लिए अवश्य कीजिए, किंतु उनसे आंतरिक तृप्ति या स्थायी आनंद की अपेक्षा रखना बंद कीजिए। - **आंतरिक विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता (Prioritizing Inner Awakening)**: जिस प्रकार आप अपनी आजीविका, करियर और शरीर के लिए प्रतिदिन समय निकालते हैं, उसी प्रकार प्रतिदिन कम से कम 20-30 मिनट ध्यान, स्वाध्याय और आत्म-चिंतन के लिए अनिवार्य रूप से समर्पित कीजिए। - **उपभोग की मृगतृष्णा से मुक्ति (Freeing from Consumerism)**: जब भी यह लगे कि "यह नया फोन, यह गाड़ी या यह पद पाकर मैं पूरी तरह सुखी हो जाऊँगा", तो रुकिए और समझ जाइए कि यह आकाश को चमड़े की तरह लपेटने जैसा व्यर्थ भ्रम है; वास्तविक शांति आपके भीतर पहले से मौजूद है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप भी इस मृगमरीचिका के पीछे भाग रहे हैं कि बाहरी दुनिया में कोई नई वस्तु, उपलब्धि या तकनीकी चमत्कार आपके मन के खालीपन और दुःखों को हमेशा के लिए मिटा देगा?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

सकारात्मक मनोविज्ञान शोध (Seligman, 2011): अभूतपूर्व भौतिक प्रगति के बावजूद, समृद्ध समाजों में अवсад, चिन्ता, अकेलेपन और निरर्थकता की दरें लगातार बढ़ रही हैं। अर्थशास्त्र में 'ईस्टरलिन विरोधाभास' (Easterlin Paradox) दर्शाता है कि एक निश्चित आय सीमा के बाद, अधिक सम्पत्ति प्रसन्नता में वृद्धि नहीं करती। उपनिषद् का यह सन्देश कि बाहरी प्रगति आन्तरिक अनुभूति का स्थान नहीं ले सकती, आनुभविक रूप से सर्वथा समर्थित है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (Book Code 0073). Gita Press Gorakhpur (Official Publication)
Translation
Gita Press Editorial Board (Hindi)
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Collated with Dashopanishad Anandashram Series.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 4.38

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते

Translation / Meaning (भावार्थ)

There is nothing in this world as purifying as knowledge. One who is purified by knowledge attains perfection in due time.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next