केनोपनिषद्

Khaṇḍa 3श्लोक 11/1292%

Kena Upanishad 3.11

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोदधे

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

फिर उन्होंने इन्द्र से कहा — "हे मघवन्, पता लगा कि यह यक्ष क्या है।" "अच्छा," इन्द्र ने उत्तर दिया। वह पास पहुँचा — और यक्ष उसके सामने से अदृश्य हो गया।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Then they said to Indra: "Maghavan (mighty one), find out what this yakṣa is." "So be it," he replied. He approached — and the yakṣa vanished from him.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

फिर उन्होंने इन्द्र से कहा — "हे मघवन्, पता लगा कि यह यक्ष क्या है।" "अच्छा," इन्द्र ने उत्तर दिया। वह पास पहुँचा — और यक्ष उसके सामने से अदृश्य हो गया। देवों के राजा को प्रत्यक्ष टकराव से नहीं, अनुपस्थिति से सिखाया जाएगा।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
इन्द्र हमारी चेतना के उस हिस्से का प्रतीक है जो 'इंद्रियों का स्वामी' और 'बुद्धि का राजा' है। जब हमारी ऊर्जा (अग्नि) और प्राण (वायु) विफल हो जाते हैं, तब हमारा केंद्रीय अहंकार (इन्द्र) मैदान में उतरता है। वह सोचता है कि "मैं राजा हूँ, मैं इस रहस्य को अपनी मुट्ठी में कैद कर लूँगा।" परंतु सत्य किसी की मुट्ठी में बंद होने वाली वस्तु नहीं है। जैसे ही आप उसे पकड़ने के लिए झपटते हैं, वह तिरोहित हो जाता है। जैसे ही इन्द्र यक्ष की ओर दौड़ा, यक्ष उसके सामने से तुरंत अंतर्धान हो गया: "तस्मात्तिरोदधे"! यह कितना अलौकिक दृश्य है। यक्ष ने अग्नि और वायु से बात की, उन्हें तिनका देकर उनकी सीमा दिखाई; परंतु इन्द्र के सामने वह बात करने के लिए भी नहीं रुका। उसने इन्द्र को एक गहरे शून्य और विस्मय के साथ छोड़ दिया। जब सब कुछ गायब हो जाता है, तभी वास्तविक आत्म-खोज शुरू होती है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **आक्रामक पकड़ का त्याग (Releasing Aggressive Grasping)**: आध्यात्मिक सत्य या प्रेम को आक्रामक होकर हथियाया नहीं जा सकता। जब आप पकड़ने के लिए झपटते हैं, तो वह विलुप्त हो जाता है; जब आप शांत होकर प्रतीक्षा करते हैं, तो वह प्रकट होता है। - **शून्य और अनुपस्थिति में धैर्य (Patience in the Void)**: जब जीवन में दिव्यता, प्रेरणा या आनंद गायब प्रतीत हो, तो छटपटाने के बजाय उस शून्य के साथ मौन खड़े रहना सीखें। अनुपस्थिति अक्सर गहरी अंतर्दृष्टि का प्रतीक्षा-कक्ष होती है। - **इंद्रियों के राजा (मन) का समर्पण (Surrender of the Senses' King)**: अपनी इंद्रियों और बुद्धि के स्वामी होने के बावजूद स्वीकार करें कि परम सत्य आपकी बुद्धि की पकड़ से परे है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“जब जीवन में सन्नाटा और शून्यता छा जाती है, तो क्या आप व्याकुल होकर भागने लगते हैं, अथवा उस मौन उपस्थिति की प्रतीक्षा करने का धैर्य रखते हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

अनुपस्थिति का शिक्षण-शास्त्र (Pedagogy of Absence): जब कोई विषय प्रत्यक्ष नहीं मिलता, तो मन में गहरी जिज्ञासा और लालसा उत्पन्न होती है। संगीत में मौन और बातचीत में ठहराव की तरह, यक्ष का अदृश्य होना इन्द्र को अंतर्मुख करने की विधि है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Samaveda Talavakara Brahmana Section. SanskritDocuments / Muktabodha
Translation
Swami Gambhirananda & Gita Press
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Manuscript traditions uniformly preserve the 35-verse partition with zero disputed interpolations.

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