केनोपनिषद्

Khaṇḍa 3श्लोक 10/1283%

Kena Upanishad 3.10

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति ।तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकाऽऽदातुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

यक्ष ने उसके सामने एक तृण रखा — "इसे उठा ले जा।" वायु अपनी पूरी शक्ति से उस पर झपटा, परन्तु उसे हिला न सका। वह लौट आया — "मैं नहीं जान सका कि यह यक्ष क्या है।"

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

The yakṣa placed a blade of grass before him: "Take this away." He rushed at it with all his speed but could not move it. He returned: "I could not find out what this yakṣa is."

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

यक्ष ने उसके सामने एक तिनका रखा — "इसे उठा ले जा।" वायु अपनी पूरी शक्ति से उस पर झपटा, परन्तु उसे हिला न सका। वह लौट आया — "मैं नहीं जान सका कि यह यक्ष क्या है।" उधार ली गई शक्ति सशर्त होती है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
जब जीवन हमें बार-बार यह दिखाता है कि हमारे सबसे शक्तिशाली प्रयास भी विफल हो रहे हैं, तो यह कोई संयोग नहीं होता। यह वास्तविकता हमें एक गहरा सबक सिखा रही होती है। हम सोचते हैं कि हम पूरे समाज को बदल देंगे, लेकिन जब हम अपने घर के किसी छोटे से तनाव या अपने मन की एक तुच्छ आदत को भी नहीं बदल पाते, तो हमें अपनी वास्तविक औकात का अहसास होता है। यक्ष ने वायु के सामने भी वही सूखा तिनका रख दिया: "एतदादत्स्वेति" — इसे उड़ाकर दिखाओ! वायु अपने पूरे ब्रह्माण्डीय वेग और तूफान के साथ उस पर झपटा, परंतु वह उस तिनके को एक मिलीमीटर भी अपनी जगह से न हिला सका! वायु भी पराजित होकर लौट आया। यह दृश्य सिद्ध करता है कि परमात्मा की इच्छा और शक्ति के बिना संसार की सबसे बड़ी ताकत भी एक तिनके के सामने बेबस है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **विफलता को गुरु मानना (Failure as a Master)**: बार-बार की असफलता को अपमान समझने के बजाय उसे इस रूप में देखें कि जीवन आपको अपने वास्तविक आधार की खोज के लिए प्रेरित कर रहा है। - **अति-आत्मविश्वास का परिहार (Avoiding Overconfidence)**: किसी भी कार्य को "यह तो अत्यंत सरल है" मानकर अहंकार में न आएँ। तुच्छ समझी जाने वाली परिस्थिति भी आपके घमंड को धूल में मिला सकती है। - **अहंकार-त्याग ही समर्पण का द्वार (Surrender as the Gate to Truth)**: जब आपके सारे व्यक्तिगत प्रयास चुक जाएँ, तो हठधर्मिता छोड़कर उस परम सत्ता के प्रति समर्पित होना सीखें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“जब आपकी संपूर्ण शक्ति किसी साधारण परिस्थिति के सामने असहाय सिद्ध होती है, तो क्या आप टूट जाते हैं या अपने भीतर एक नया समर्पण खोजते हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

व्यवस्थित विफलता और शिक्षण (Spaced Repetition in Pedagogy): अग्नि के बाद वायु की समान विफलता इस सत्य को गहरा करती है कि बाह्य बल कभी भी आंतरिक आधार को पराजित नहीं कर सकता। दो समान अनुभवों से मन की झूठी मान्यताएं टूटती हैं।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Samaveda Talavakara Brahmana Section. SanskritDocuments / Muktabodha
Translation
Swami Gambhirananda & Gita Press
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Manuscript traditions uniformly preserve the 35-verse partition with zero disputed interpolations.

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