प्रश्नोपनिषद्

Praśna 6श्लोक 5/863%

Prashna Upanishad 6.5

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते ।एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति ।तदेष श्लोकः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जैसे बहती हुई नदियाँ समुद्र की ओर जाती हैं, समुद्र में मिलकर अपना नाम-रूप त्याग देती हैं, और केवल "समुद्र" कहलाती हैं — वैसे ही इस द्रष्टा की सोलह कलाएँ पुरुष की ओर जाती हैं, पुरुष में मिलकर अपना नाम-रूप त्याग देती हैं, और केवल "पुरुष" कहलाती हैं। वह अकल और अमर हो जाता है। इस विषय में यह श्लोक:

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

As these flowing rivers, bound for the ocean, on reaching the ocean disappear — their name and form broken — and are called simply "the ocean": even so the sixteen parts of this witness, bound for the Puruṣa, on reaching the Puruṣa disappear, their name and form broken, and are called simply "the Puruṣa." That one becomes partless and immortal. Hence this verse:

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

प्रश्नोपनिषद् का यह सर्वाधिक प्रसिद्ध और अमर रूपक है: 'स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते। एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति'। जिस प्रकार निरंतर बहने वाली नदियां समुद्र की ओर दौड़ती हैं और समुद्र में मिलते ही अपने व्यक्तिगत नाम और रूप (गंगा, यमुना आदि) को खोकर पूर्णतः विलीन हो जाती हैं और केवल 'समुद्र' कहलाती हैं; ठीक उसी प्रकार इस सर्वसाक्षी पुरुष की ये सोलह कलाएं (इंद्रियां, मन, प्राण, नाम, रूप) परम पुरुष को प्राप्त करके उसमें विलीन हो जाती हैं। उनके सारे नाम-रूप मिट जाते हैं और केवल एक अखंड 'पुरुष' शेष रह जाता है। तब वह पुरुष कला-रहित (अकल) और अमर हो जाता है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक समाज की सबसे बड़ी बीमारी है 'अहंकार का संकीर्ण कारागार' — मेरा नाम, मेरा पद, मेरी ब्रांड वैल्यू, मेरी सोशल मीडिया प्रोफाइल और मेरी विशिष्टता की व्याकुलता। मनुष्य दिन-रात अपने नाम और रूप के इस छोटे से दायरे को बचाने के लिए लड़ता रहता है और निरंतर असुरक्षा तथा भय में जीता है। नदियों का यह दृष्टांत हमें मुक्ति का सबसे सुंदर मार्ग दिखाता है। नदियां समुद्र में मिलकर मिटती नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं असीम समुद्र बन जाती हैं। जब आप अपनी क्षुद्र व्यक्तिगत अहंता को त्यागकर उस विराट जीवन-समुद्र में समर्पित हो जाते हैं, तो आपकी सारी संकीर्णताएं समाप्त हो जाती हैं और आप अमर हो जाते हैं।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **संकीर्ण अहंता का विसर्जन (Dissolving Narrow Ego Identities)**: जब भी पद, प्रतिष्ठा या 'मेरा नाम' का अहंकार सिर उठाए, तो नदियों की तरह स्मरण करें: 'मेरा यह छोटा सा रूप उस अनंत चेतना के समुद्र में विलीन होने के लिए ही बह रहा है'। - **समुद्र जैसी विशालता का वरण (Cultivating Oceanic Vastness)**: अपने मन को इतना विशाल और गहरा बनाएं कि उसमें संसार की छोटी-मोटी आलोचनाओं, लाभ-हानि और संघर्षों की नदियां बिना आपको विचलित किए शांत हो सकें। - **अमर साक्षी स्वरूप में विश्राम (Resting in the Deathless Witness)**: यह जानें कि मरने वाली केवल आपकी 16 कलाएं (नाम, रूप, विचार) हैं; आपका मूल स्वरूप वह अकल, अमर समुद्र है जो कभी नहीं मरता।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप अपनी छोटी सी पहचान की नदी को सूखाकर किनारे पर ही समाप्त हो जाने का भय पाल रहे हैं, या आपके भीतर उस विराट समुद्र (परम पुरुष) में मिलकर स्वयं अनंत हो जाने का साहस है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

एंट्रॉपी विलीनीकरण, गैर-द्वैत चेतना और सूचना का अवशोषण (Oceanic Dissolution, DMN Quenching & Unified Information State): न्यूरोसाइंस में जब गहन समाधि या अहं-विघटन (Ego Dissolution) घटित होता है, तो मस्तिष्क के Default Mode Network की वे सीमाएं पूरी तरह शांत हो जाती हैं जो 'स्व' और 'संसार' का कृत्रिम भेद बनाती हैं। जैसे नदियां समुद्र में मिलकर अपनी अलग पहचान खो देती हैं, वैसे ही मस्तिष्क के समस्त संवेदी और वैचारिक इनपुट्स एक अखंड, अविभाज्य चेतना के महासागर में लीन हो जाते हैं। यह चेतना की परम गैर-द्वैत (Non-Dual / Ocean of Being) अवस्था का अचूक विवरण है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
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Last updated
2026-10-24
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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Prashna Upanishad 6.5Current VerseBhagavadBhagavad Gita Bh…BhagavadBhagavad Gita Bh…
🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 13.2

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत

Translation / Meaning (भावार्थ)

Know Me as the knower of the field (purusha) in all fields (prakriti). Understanding of the field and its knower is true knowledge.

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