प्रश्नोपनिषद्

Praśna 6श्लोक 1/813%

Prashna Upanishad 6.1

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ ।भगवन् हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं वेद यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति ।समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति तस्मान्नार्हाम्यनृतं वक्तुं स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज ।तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

फिर सुकेशा भारद्वाज ने पूछा — "हे भगवन्! कोसल का राजकुमार हिरण्यनाभ मेरे पास आकर पूछा — 'भारद्वाज, क्या आप सोलह कलाओं वाले पुरुष को जानते हैं?' मैंने उस कुमार से कहा — 'मैं उसे नहीं जानता। यदि जानता तो क्यों न बताता? जो असत्य बोलता है, वह मूल सहित सूख जाता है; इसलिए मुझे असत्य नहीं बोलना है।' वह चुपचाप रथ पर चढ़कर चला गया। अब मैं आपसे पूछता हूँ — वह पुरुष कहाँ है?"

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Then Sukeśā Bhāradvāja asked: "Sir, Prince Hiraṇyanābha of Kosala came to me and asked: 'Bhāradvāja, do you know the Person of sixteen parts?' I told the boy: 'I do not know him. If I had known, why would I not tell you? He who speaks untruth withers from his root; therefore I must not speak untruth.' He silently mounted his chariot and went away. I now ask you: where is that Person?"

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

षष्ठ प्रश्न में सुकेशा भारद्वाज महर्षि पिप्पलाद से एक अत्यंत मार्मिक और सत्यनिष्ठा की परीक्षा वाला प्रश्न पूछते हैं: 'भगवन् कौशल्यो राजपुत्रो हिरण्यनाभ उपेत्य मां प्रश्नमपृच्छत। षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थेति। तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं वेद यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति। समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति तस्मान्नार्हाम्यनृतं वक्तुम्। स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज। तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति'। कोसल के राजकुमार हिरण्यनाभ ने मुझसे पूछा था: 'हे भारद्वाज, क्या तुम सोलह कलाओं (अंगों) वाले पुरुष को जानते हो?' मैंने उस राजकुमार से कहा: 'मैं इसे नहीं जानता; यदि मैं जानता तो तुम्हें क्यों न बताता? जो व्यक्ति असत्य बोलता है, वह अपनी जड़ों सहित सूख जाता है, इसलिए मैं झूठ नहीं बोल सकता'। वह राजकुमार मौन होकर रथ पर बैठकर चला गया। अब मैं आपसे पूछता हूँ: वह सोलह कलाओं वाला पुरुष कहाँ है?

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
सोशल मीडिया और कॉर्पोरेट जगत में 'फेक इट टिल यू मेक इट' (जब तक सफल न हो जाओ, तब तक झूठा दिखावा करो) की संस्कृति बहुत लोकप्रिय है। लोग अज्ञानी होते हुए भी ज्ञानी होने का ढोंग करते हैं और अपनी अज्ञानता को स्वीकार करने से डरते हैं। सुकेशा का आचरण आधुनिक मनुष्य के लिए सत्यनिष्ठा का सर्वोच्च आदर्श है। जब आप किसी विषय को नहीं जानते, तो साफ-साफ कह देना कि 'मैं नहीं जानता' कमजोरी नहीं, बल्कि गहन आत्म-बल और चरित्र की पराकाष्ठा है। असत्य आपके व्यक्तित्व की जड़ों को सुखा देता है, जबकि सत्यवादिता आपको अभय और अजेय बनाती है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **अज्ञान को स्वीकारने का साहस (Courage to Admit Ignorance)**: जब किसी बात की जानकारी न हो, तो झूठी शान दिखाने या गलत उत्तर देने के बजाय ईमानदारी से कहें: 'मुझे इसका ज्ञान नहीं है'। - **जड़ों सहित सूखने से बचना (Protecting Your Moral Roots)**: किसी भी तात्कालिक लाभ, प्रतिष्ठा या प्रशंसा के लिए असत्य का सहारा न लें; यह याद रखें कि झूठ आपके चरित्र की जड़ों को खोखला कर देता है। - **गहन प्रश्नों की खोज जारी रखना (Relentless Pursuit of Truth)**: अपनी अज्ञानता को स्वीकार करने के बाद वहीं रुक न जाएं; सुकेशा की तरह किसी योग्य गुरु या प्रामाणिक स्रोत से उस ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयास करें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप भी समाज में अपनी झूठी प्रतिष्ठा बचाने के लिए उन बातों के ज्ञाता होने का ढोंग करते हैं जिन्हें आप नहीं जानते, और क्या आपके भीतर सुकेशा जैसी निष्कपट सत्यनिष्ठा है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

सत्यनिष्ठा, न्यूरोबायोलॉजिकल क्षरण और बौद्धिक प्रामाणिकता (Epistemic Integrity, Allostatic Toll of Deception & Radical Honesty): न्यूरोसाइंस और पॉलीग्राफ अध्ययन यह प्रमाणित करते हैं कि असत्य बोलने या झूठा विशेषज्ञ बनने का ढोंग करने से मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स पर अत्यधिक संज्ञानात्मक भार (Cognitive Load) और कोर्टिसोल का तनाव बढ़ता है। 'समूलो वा एष परिशुष्यति' (वह जड़ों सहित सूख जाता है) — असत्य व्यक्ति के न्यूरो-एंडोक्राइन संतुलन और आत्म-सम्मान की जड़ों को पूरी तरह सुखा देता है। सुकेशा की यह सत्यनिष्ठा विज्ञान और अध्यात्म दोनों की अनिवार्य पूर्व-शर्त (Epistemic Foundation) है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

  • Original text
  • Translation · from the source archive

No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.

Sanskrit edition
Imported text; printed edition not recorded. Open Sanskrit text archives (see the source link)
Translation
Not recorded. Some Hindi and English text is AI-assisted and is flagged where it appears.
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.

Found a mistake?

Interactive Verse Knowledge Graph · ज्ञान जाल

श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

Reviewed links only. A line here is a stored connection, not a guess from the neighboring verse.

Prashna Upanishad 6.1Current VerseBhagavadBhagavad Gita Bh…BhagavadBhagavad Gita Bh…
🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 3.35

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्

Translation / Meaning (भावार्थ)

Better is one's own dharma though imperfectly performed than the dharma of another well performed.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

Listed beside Dharma in this library. The link does not say the passages teach the same thing.

आगे क्या · What next