अध्याय 8
श्लोक 3.1
शत्रुनाशनम्।१-२६ चातनः।अग्निः।त्रिष्टुप्, ७,१२,१४-१५,१७,२१ भुरिक्, २५ पञ्चपदा बृहतीगर्भा जगती २२-२३ अनुष्टुप्, २६ गायत्री।र॒क्षो॒हणं॑ वा॒जिन॒मा जि॑घर्मि मि॒त्रं प्रथि॑ष्ठ॒मुप॑ यामि॒ शर्म॑ ।शिशा॑नो अ॒ग्निः क्रतु॑भिः॒ समि॑द्धः॒ स नो॒ दिवा॒ स रि॒षः पा॑तु॒ नक्त॑म्
śatrunāśanam| 1-26 cātanaḥ| agniḥ| triṣṭup, 7,12,14-15,17,21 bhurik, 25 pañcapadā bṛhatīgarbhā jagatī 22-23 anuṣṭup, 26 gāyatrī| rakṣohaṇaṃ vājinamā jigharmi mitraṃ prathiṣṭhamupa yāmi śarma | śiśāno agniḥ kratubhiḥ samiddhaḥ sa no divā sa riṣaḥ pātu naktam
हिन्दी अर्थ
यातुधान को पकड़ कर उसे राजा के सामने उपस्थित करे । मन्त्र में शिष्ट के लिये उपस्थित की जाने योग्य समिधा वस्तु । समिधा है यज्ञिय समिधा, के यातुघान को पकडता है 1 पकड़ा गया यातुधान राजा के लिये नजराना' है । राजा ही इसे यथोचित दण्ड देता है । (प्रचेतः) पणेतया सचेत अर्थात् सावधान रहने वाले, (नृचक्षः) तथा वसुरूप भ्रधिकारियों के प्रति (प्रणय) सौप । (यातुघाना) यातना देने वाले (रक्नांसि) राक्षस (हिखम्) परसेना कौ हिसा करने वाले ओर (भ्रमि
English
deliver from calamity. Thy food, thy drink, whate’er they be corn grown by cultivation, milk,