Atharva Veda
6
अध्याय 6 / 20

Kanda 6

काण्ड 6

453 श्लोकभाग 2/8 · श्लोक 22.1–40.3

पूर्ण अध्याय पाठ60 श्लोक

अध्याय 6

श्लोक 22.1

भैषज्यम्।१-३ शन्तातिः।१ आदित्यरश्मिः, २-३ मरुतः।त्रिष्टुप्, २ चतुष्पदा भुरिग्जगती।कृ॒ष्णं नि॒यानं॒ हर॑यः सुप॒र्णा अ॒पो वसा॑ना॒ दिव॒मुत् प॑तन्ति ।त आव॑वृत्र॒न्त्सद॑नादृ॒तस्यादिद् घृ॒तेन॑ पृथि॒वीं व्यूऽदुः

bhaiṣajyam| 1-3 śantātiḥ| 1 ādityaraśmiḥ, 2-3 marutaḥ| triṣṭup, 2 catuṣpadā bhurigjagatī| kṛṣṇaṃ niyānaṃ harayaḥ suparṇā apo vasānā divamut patanti | ta āvavṛtrantsadanādṛtasyādid ghṛtena pṛthivīṃ vyū'duḥ

हिन्दी अर्थ

अथववेद-भाष्य कां० ६1 अनु०३। सू २३ होती है । "पुनः" शब्द दारा सूचित होता है अक्षतयोनि 2 प्रत्यागता क्षतयोनि का पहिले विवाह हौ चका है। मन न यथावस्थित है, परन्तु पतिगृह दारा व्यथित हुई वह पितुगृहं व 4 । इसी प्रकार जाया भी पतिद्धारा “तुन्ना” होकर पवृ क इस द्वारा पिता तो व्यथित होगा दी, (तुन्दाना) । पति 0 घकेले जाने का वरणेन अथर्ववेद मं अन्यत्र भीहुभादहै। पथा नुततेव कर्तारं वन्ध्वच्छतु" ( १०।१।३) । वरेण्यकर तुरहमपो देवीरुप हये ॥१॥। कृकर ; प्रवाहित होती हुई, (तदपसः) वहं प्रवाहं ॥ हई (देवीः अपः) दिव्य नदियों के जलो को (अम्) ्रष्ट-यज्ञिय कर्मो वाला (उप) समाप (हवये) बुलाता हू ।

English

Gods! whatsoe’er the Dove came hither seeking, sent to us as the envoy of Destruction, For that let us sing hymns and make atonement, Well be it with our quadrupeds and bipeds! Auspicious be the Dove that hath been sent us, a harmless bird,

अध्याय 6

श्लोक 22.2

पय॑स्वतीः कृणुथा॒प ओष॑धीः शि॒वा यदेज॑था मरुतो रुक्मवक्षसः ।ऊर्जं॑ च॒ तत्र॑ सुम॒तिं च॑ पिन्वत॒ यत्रा॑ नरो मरुतः सि॒ञ्चथा॒ मधु॑

payasvatīḥ kṛṇuthāpa oṣadhīḥ śivā yadejathā maruto rukmavakṣasaḥ | ūrjaṃ ca tatra sumatiṃ ca pinvata yatrā naro marutaḥ siñcathā madhu

हिन्दी अर्थ

कम यासां ता आपः। करतुः = यज्ञिय कम, कृष्यादि । उपह्वये = कु (कर्मण्यः) कर्मो के साधक (भापः) जल (ओताः) कर्मोमें क भरोत ह, ये जल (इतः) यहां से (मुञ्चन्तु) ० शु करे, त्यागे, (्रणीतये) शीघ्र ले जानिके लिये । अर् (सद्यः (एतवे) ग॑ति के लिये (कृण्वन्तु) दन्टं करे। रा०६। अनु ३॥ सु° २४ अथवेवेद-भाष्य ४१ हम उसे प्रकृष्ट गति के साथ अपने स्थान तके जाय, ओर हमारी सहायता करोकि शीघ्रही जल हमे प्राप्त हो जाय । एतदे = इण् मतो, कौ है । “दीप्यते, सुषुम्णः सूयेररिमिः'" ।

English

O Gods, that seeks our dwelling! May Agni, Sage, be pleased with our oblation, and may the missile borne on wings avoid us. Let not the arrow that hath wings distract us. Beside the fire- place, on the hearth it settles.

अध्याय 6

श्लोक 22.3

उ॒द॒प्रुतो॑ म॒रुत॒स्तां इ॑यर्त वृ॒ष्टिर्या विश्वा॑ नि॒वत॑स्पृ॒णाति॑ ।एजा॑ति॒ ग्लहा॑ क॒न्येऽव तु॒न्नैरुं॑ तुन्दा॒ना पत्ये॑व जा॒या

udapruto marutastāṃ iyarta vṛṣṭiryā viśvā nivataspṛṇāti | ejāti glahā kanye'va tunnairuṃ tundānā patyeva jāyā

हिन्दी अर्थ

देवस्यं खवितुः सवे क्म ग्न्त मानुषाः । (सवितुः देवस्य प्रेरकं परमेष्वर-देव की (सवे) प्रेरणा में (मानुषाः) मनुष्य (कमं कृण्वन्तु) म कृषि कमं आदि कमं करे, तब (ओषधीः) जषधियां (अपः) जलो को प्राप्त कर (नः) हमारे लिये (षम्) शान्ति दायक ओर (शिवाः) कल्याणकारिणी (भवन्तु) होती है, या हों । मनुष्य जव परमेश्वर क प्रेरणानुसार कृषि कर्म आदि करते ह, तब वर्षा ठीक प्रकार से होती, ओर ओषधियां जल प्राप्त कर रसवती होतो, ओर हमारे लिये शम् आर शिवरूपा होती है । अपाँ ह मघं तद् देवीदद॑न् हृदुग्योत भेषजम् ॥१॥ (हिमवतः) हिम वाले परव॑तसे (प्र स्रवन्ति) प्रवाहित होती है, (संगमः) उन का संगम होता है, एसे (आपः) जल या जलवाली नदियां,

English

May it bring welfare to our men and cattle: here let the Dove, ye Gods, forbear to harm us. A charm to avert misfortune foreshown by the coming of a dove Drive forth the Dove, chase it with holy verses: rejoicing bring we hither food and cattle,

अध्याय 6

श्लोक 23.1

अपां भैषज्यम्।१-३ शन्तातिः।आपः।१ अनुष्टुप्, २ त्रिपदा गायत्री, ३ परोष्णिक्।स॒स्रुषी॒स्तद॒पसो॒ दिवा॒ नक्तं॑ च स॒स्रुषीः॑ ।वरे॑ण्यक्रतुर॒हम॒पो दे॒वीरुप॑ ह्वये

apāṃ bhaiṣajyam| 1-3 śantātiḥ| āpaḥ| 1 anuṣṭup, 2 tripadā gāyatrī, 3 paroṣṇik| sasruṣīstadapaso divā naktaṃ ca sasruṣīḥ | vareṇyakraturahamapo devīrupa hvaye

हिन्दी अर्थ

वाली होती है, उनमें बैठकर जलचिकित्सा द्वारा हृदयरोग शान्त होते ह। संगम सादर, हृषेपूवेक होता ही है । । (यत्) जिस रोग ने (मे) मेरी (अक्ष्योः) दोनों मांखों को (मादिदयोत) दाहं युक्त किया है (यत्) गौर जिसने (पायोः) दोनों एडो (भपदोर्च) की (आपः) जल (निष्करन्) निगंत कर देते ह, अङ्गो से निकाल दतर

English

Obliterating traces of misfortune. Most fleet may it fly forth and leave us vigour. These men have strengthened Agni’s might, these men have brought the kine to us. They have sung glory to the Gods. Who is the man that con- quers them?

अध्याय 6

श्लोक 23.2

ओता॒ आपः॑ कर्म॒ण्याऽमु॒ञ्चन्त्वि॒तः प्रणी॑तये ।स॒द्यः कृ॑ण्व॒न्त्वेत॑वे

otā āpaḥ karmaṇyā'muñcantvitaḥ praṇītaye | sadyaḥ kṛṇvantvetave

हिन्दी अर्थ

आपः द्वारा जल चिकित्सा का वणेन हुमा है का राजा है एेसी (याः सर्वाः) जो सब (नः) नदियां (स्थन) तुम हदो, अथरववेद-भाष्य॒का० ६1 बनु० ३ सू०२५. प्रदान करो, (वः) तुम्हारी (तेन) उस ओषध दारा ( भूनजामहै) हम सिन्धु का अभिप्राय है समुद्र, न कि सिन्ध नदौ । कविता मे जल- ॥ चिकित्सा द्वारा रोगनिवत्तंक; “आपः मौषध'' का कथन .है । भुनजामहै

English

Be reverence paid to him who, while exploring the path for many, first approached the river, Lord of this world of quadrupeds and bipeds; to him be rever- ence paid, to Death, to Yama! A charm to avert misfortune foreshown by the coming of a dove and an owl

अध्याय 6

श्लोक 23.3

दे॒वस्य॑ सवि॒तुः स॒वे कर्म॑ कृण्वन्तु॒ मानु॑षाः ।शं नो॑ भवन्त्व॒प ओष॑धीः शि॒वाः

devasya savituḥ save karma kṛṇvantu mānuṣāḥ | śaṃ no bhavantvapa oṣadhīḥ śivāḥ

हिन्दी अर्थ

भुज पालनाभ्यवहारयोः (रुधादिः) । तस्ताः सर्वा नदयन्तु वाका अपचितामिव ॥१॥ का०६। अनु०२। सू० २६ अथवेवेद-भाष्य ४६३ साथ लगी हई ह, (ताः सर्वाः) वे सव (इतः) इस प्रयोग से (नष्यन्तु) (वाकाः) वचन या कथन (इव) जैसे (नश्यन्तु) नष्ट हो जावे ह सत्य न होने के कारण स्थिरता प्राप्त नहीं करते यनः वे मविश्वसनीप होते हँ

English

On these men yonder fall the winged missile: the screeching of the Owl is ineffective, And that the Dove beside the fire hath settled. Thine envoys who came hither, O Destruction, sent or not sent by thee unto our dwelling,

अध्याय 6

श्लोक 24.1

अपां भैषज्यम्।१-३ शन्तातिः।आपः।अनुष्टुप्।हि॒मव॑तः॒ प्र स्र॑वन्ति॒ सिन्धौ॑ समह सङ्ग॒मः ।आपो॑ ह मह्यं॒ तद् दे॒वीर्दद॑न् हृद्द्योतभेष॒जम्

apāṃ bhaiṣajyam| 1-3 śantātiḥ| āpaḥ| anuṣṭup| himavataḥ pra sravanti sindhau samaha saṅgamaḥ | āpo ha mahyaṃ tad devīrdadan hṛddyotabheṣajam

हिन्दी अर्थ

सायण ने मन्या" का अथं गण्डमाला किया है। छोटी-छोटो ये प्रन्ियां परस्पर मिलकर गण्डमाला हो जाती ह । षृतस्ताः सर्वां नदयन्त वाका अंप्रचितांपिव ॥२॥ इतस्ताः सवं नश्यन्तु वाका अपचितामिव ।॥३॥ (वाका अपचितामिव) पूववत् 1 नश्यन्तु =नश = णश अदर्शने (दिवादिः), अदृष्ट हो जाय, सुखकर मेहा तु (नः) हमे (मृडयासि) सुखी कर (मा) मुक्षे (पाप्मन्) है

English

The Dove and Owl, effectless be their visit! Oft may it fly to us to save our heroes from slaughter, oft perch here to bring fair offspring, Turn thee and send thy voice afar: cry to the region far away;

अध्याय 6

श्लोक 24.2

यन्मे॑ अ॒क्ष्योरा॑दि॒द्योत॒ पार्ष्ण्योः॒ प्रप॑दोश्च॒ यत्।आप॒स्तत् सर्वं॒ निष्क॑रन् भि॒षजां॒ सुभि॑षक्तमाः

yanme akṣyorādidyota pārṣṇyoḥ prapadośca yat| āpastat sarvaṃ niṣkaran bhiṣajāṃ subhiṣaktamāḥ

हिन्दी अर्थ

पाप ¦ (भद्रस्य) कल्याणी ओर सुखी (लोके) समाज मे (अवि. तम्) कुटिल कर्मो से रहित करके (आधेहि) स्थापितं कर । मा, नः अस्मदो द्वयोश्च (अष्टा० १।२।५९) दवारा एकवचन के स्थान में बहुवचन । पाप जब वशीभ्रुत हो जाता है, तव व्यक्ति कुटिलकम नहीं करता मौर कल्याणी तथा सुखो सामाजिक जीवन व्यतीत करता है । (पाप्मन्) है पाप ! (यः) जोत (नः) हमे (न जहासि) न त्यागता, “वयम्” द्वारा यहं सूचित .कियादहैकि हम सत्पथ पर चलते हृए, केरने पर व्यक्ति पापको त्याग देता है ।

English

That I may see thee in the home of Yama reft of all thy power, that I may see thee impotent. A charm to promote the growth of hair Over a magic stone, beside Sarasvati, the Gods Ploughed in this barley that was blent with

अध्याय 6

श्लोक 24.3

सिन्धु॑पत्नीः॒ सिन्धु॑राज्ञीः॒ सर्वा॒ या न॒द्य॑१स्थन॑ ।द॒त्त न॒स्तस्य॑ भेष॒जं तेना॑ वो भुनजामहै

sindhupatnīḥ sindhurājñīḥ sarvā yā nadya1sthana | datta nastasya bheṣajaṃ tenā vo bhunajāmahai

हिन्दी अर्थ

नितराम् समवाय सम्बन्ध मे चिपटा रहै। (यम्) जिस पापी केसाथ हे पापत् नष्ट कर. उसका ही हनन कर। सथवेवेद-भाष्य का ६। बनु०३। रऽ २६ कण ६। अनु० ३ । सु० २७ अथषवेद-भाष्य ४५ का वहुत्व है, ओर अप्रिय का एकत्व । सामाजिक जीवन मे समाज, जिस पापी को समाज में रहने से आपत्तिजनक समक्षे उसे मृत्युदण्ड दे सकता ह । मानो पाप ही पापी का हनन कर रहा है ।

English

mead. Lord of the plough was Indra, strong with hundred powers: the ploughers were the Maruts they who give rich gifts.

अध्याय 6

श्लोक 25.1

मन्याविनाशनम् १-३ शुनःशेपः।मन्याविनाशनम्।अनुष्टुप्।पञ्च॑ च॒ याः प॑ञ्चा॒शच्च॑ सं॒यन्ति॒ मन्या॑ अ॒भि।इ॒तस्ताः सर्वा॑ नश्यन्तु वा॒का अ॑प॒चिता॑मिव

manyāvināśanam 1-3 śunaḥśepaḥ| manyāvināśanam| anuṣṭup| pañca ca yāḥ pañcāśacca saṃyanti manyā abhi| itastāḥ sarvā naśyantu vākā apacitāmiva

हिन्दी अर्थ

देव कपोतं हृषितो यदिच्छन दूतो निकत्या इद मांज॒गामं । (देवाः) है राष्ट के दिव्य अधिकारियो ! (इषितः) परराष्टर द्वारा हस हमारे राष्ट्र मे भाया है (तस्म) उस के लिये (अचमि) हम अचेना ' करते है, ओर (निष्कृतिम्) हर्जाना (कृणवाम) भेट करते है, ताकि (नः) (चतुष्पदे) चौपायौं के लिये (शम्) सुख-शान्ति हो । दूतः = दुदु जपतापे - शिवः कृषपोतं षितो नो अस्त्वनागा हैवाः शकुनो गृहं नैः ।

English

Thy joy in hair that falleth or is scattered, wherewith thou sub- jectest a man to laughter To other trees, far from thee will I drive it. Grow up, thou Samī, with a hundred branches.

अध्याय 6

श्लोक 25.2

स॒प्त च॒ याः स॑प्त॒तिश्च॑ सं॒यन्ति॒ ग्रैव्या॑ अ॒भि।इ॒तस्ताः सर्वा॑ नश्यन्तु वा॒का अ॑प॒चिता॑मिव

sapta ca yāḥ saptatiśca saṃyanti graivyā abhi| itastāḥ sarvā naśyantu vākā apacitāmiva

हिन्दी अर्थ

(देवाः) है राष्ट के दिव्य अधिकारियो ! (इषितः) परराष्ट् दारा प्रेषित (कपोतः) वायुयान (शकुनः) जो कि शक्तिशाली है, (नः गृहम्) ओर हमारे राष्टर-गृह के प्रति प्रेषित है, (शिवः) कल्याणकारी, (अनागाः) प्री तिपूवेक सेवन करे, ओर (हेतिः) मायुधरूप, (पक्षिणी) पक्षो के कृति । वाला अल्पकाय बायुयान (नः परिवृणक्तु) हमें छोड़ जाय । निर्धारित समयानुसारं कर प्रदान नहीं कर सका । उसे सचेत करने के लिये सशस्त्र वायुयान प्रेषित हमा है, भौर नियत कर लेकर वह् वापिस

English

Auspicious, bearing mighty leaves, holy one, nurtured by the rain, Even as a mother to her sons, be gracious, Samī to our hair. To Sūrya the Sun-God

अध्याय 6

श्लोक 25.3

नव॑ च॒ या न॑व॒तिश्च॑ सं॒यन्ति॒ स्कन्ध्या॑ अ॒भि।इ॒तस्ताः सर्वा॑ नश्यन्तु वा॒का अ॑प॒चिता॑मिव

nava ca yā navatiśca saṃyanti skandhyā abhi| itastāḥ sarvā naśyantu vākā apacitāmiva

हिन्दी अर्थ

स्वेच्छा पूवक हविः खूप में “कर” दिया जाया करे । यथा “विर्न: सजाताः" ' कहु कर राष्ट्यज्ञ कौ धा्िकता सूचित की है । "पक्षिणो-वायुयान, हेलो- कोप्टर'” सदृश अल्पक्राय है । उडते समय यह दो पंखों वाली पक्षिणी की आजति वाला दीखत। है । सायण ने कपोत द्वारा कब्रूतर पक्षी माना है, वायुयान (अस्मान्) हमे (न) नहीं (दभाति) ईहिसित करता है, (मष्ट) संश्राम भूमि में (पदम्) निज चरण को (न) नहीं (कृणुते) स्थापित करता

English

This spotted Bull hath come and sat before his mother in the east. Advancing to his father Heaven. p. a214 As expiration from his breath his radiance penetrates within.

अध्याय 6

श्लोक 26.1

पाप्मनाशनम्।१-३ ब्रह्म।पाप्मा।अनुष्टुप्।अव॑ मा पाप्मन्त्सृज व॒शी सन् मृ॑डयासि नः ।आ मा॑ भ॒द्रस्य॑ लो॒के पा॑प्मन् धे॒ह्यवि॑ह्रुतम्

pāpmanāśanam| 1-3 brahma| pāpmā| anuṣṭup| ava mā pāpmantsṛja vaśī san mṛḍayāsi naḥ | ā mā bhadrasya loke pāpman dhehyavihrutam

हिन्दी अर्थ

है । (नः) वह हमारी (गोभ्यः) गौभों के लिये (उत) तथा (पुरुषेभ्यः) पुरुषों के लिये (शिवः) कल्याणकारी (अस्तु) हो, (देवाः) है दिव्य मधि- कारियो ! (कपोतः) वा वरुयानं (दह्) यहां अर्थात् हमारे राष्ट में (नः) ह्मे (मा हिसीत्). न हिसित करे । अथ्वेवेद-माष्य का० ६। अनु० ३ । सू° २७ २।२०) । पक्षिणी =मल्पकाय वाला वापुयान, दो पक्षों को फलाए, उड़ते है जिसमे परराष्टू.का दूत है, जोकि दूत्यकर्म के लिये हमारे राष्टरमे भाया है, नकिहमारी हिसा के लिये। एसी भावना मन्त्र में प्रकट कीटहै। धापरुयान जब भूमि पर उतरते है तो निज स्थान.में उन्हैले जाने के लिये उन के पद अर्थात् चरण भी होते है । मधिकारियोंसे कहादहैकितुम इस प्रकार वायुयान के अधिकारियों के साथ वर्तव करो ताकिवे युद्धन करने का० ६ । भनु०३। सु० २८ अथर्ववेव-भाष्य ४७

English

The Bull shines out through all the sky. He rules supreme through thirty realms—One winged with song hath made him mount Throughout the days at break of morn.

अध्याय 6

श्लोक 26.2

यो नः॑ पाप्म॒न् न जहा॑सि॒ तमु॑ त्वा जहिमो व॒यम्।प॒थामनु॑ व्या॒वर्त॑ने॒ऽन्यं पा॒प्मानु॑ पद्यताम्

yo naḥ pāpman na jahāsi tamu tvā jahimo vayam| pathāmanu vyāvartane'nyaṃ pāpmānu padyatām

हिन्दी अर्थ

हे जलीय-यान के चलाने वालो (ऋचा) ऋक्-परोक्त विष्ि.दारा ट्षित होते हृए (गाम्, पररि = परितः) पृथिवी के सव ओर (नयामः) इस कपोत को हम ने जाते ह, (दुरिता =दुरितानि) दुष्परिणामी (पदानि) पदन्यासों को (संलोभयन्तः) संलुप्त करते हए । ताकि (पथिष्ठंः) पथ में प्राप्ति के लिये चला जाय । । =

English

A charm against fiends and goblins With butter, in his hall vhere fire is burning, perform that sacri- fice which quells the goblins.

अध्याय 6

श्लोक 26.3

अ॒न्यत्रा॒स्मन्न्युऽच्यतु सहस्रा॒क्षो अम॑र्त्यः ।यं द्वेषा॑म॒ तमृ॑च्छतु॒ यमु॑ द्वि॒ष्मस्तमिज्ज॑हि

anyatrāsmannyu'cyatu sahasrākṣo amartyaḥ | yaṃ dveṣāma tamṛcchatu yamu dviṣmastamijjahi

हिन्दी अर्थ

२७ में “पक्षिणी” द्वारा कपोत को अत्पकाय तथा वायुयान रूप कहा है । जाता है । जतः 'यह् जलीययान है ।.. कपोत =कं (जल) + पोतं (यान) । देवेष्वक्रत श्रवः क इमां आ दघषति ॥२॥ 1. (परिन्=परिवः)पृथिवी के सब ओर (अषेत) ले गये र्है,(दमे) ये जो, (गाम् परि परितः) पृथिवी के. सब आर कपोतः अलीद्य-यान को (अनेषत) जो (शरवः) निजः यण (अक्रत) ,फल्नाया . है, (मान्) इनं , (कः) , कौन (आदधषंति) पराभरत करेगा ।

English

Burn from afar against the demons Agni! Afflict not in thy fury us who praise thee. Let Rudra break your necks, O ye Pisāchas, and split your ribs asunder, Yātudhānas! Your herb of universal power with Yama hath allied itself.

अध्याय 6

श्लोक 27.1

अरिष्टक्षयणम्।१-३ भृगुः।यमः, निर्ऋतिः।जगती, २ त्रिष्टुप्।देवाः॑ क॒पोत॑ इषि॒तो यदि॒छन् दू॒तो निरृ॑त्या इ॒दमा॑ज॒गाम॑ ।तस्मा॑ अर्चाम कृ॒णवा॑म॒ निष्कृ॑तिं॒ शं नो अस्तु द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे

ariṣṭakṣayaṇam| 1-3 bhṛguḥ| yamaḥ, nirṛtiḥ| jagatī, 2 triṣṭup| devāḥ kapota iṣito yadichan dūto nirṛtyā idamājagāma | tasmā arcāma kṛṇavāma niṣkṛtiṃ śaṃ no astu dvipade śaṃ catuṣpade

हिन्दी अर्थ

अथरवेवेद-भाष्य का० ६ । अनु०३। सुऽ २० भौर जोवन को बढ़ातीहै। जो इस का प्रकार पृथिवी भरमे करते; निज . जालीय-यानों का पृथिवीके स्र ओर निभयहो कर यातायात करते; धर्षण कर सकता, न कोई उन पराभूत कर सकता । जिधृषा प्रागल्भ्ये पथ को (अनु) निरन्तर (पश्यशानः) दर्शारहा है। (यः) जो (अस्य

English

Here, Mitra-Varuna! may we dwell safely: with splendour drive the greedy demons backward, Let them not find a surety or a refuge, but torn away go down to Death together.

अध्याय 6

श्लोक 27.2

शि॒वः क॒पोत॒ इषि॒तो नो॑ अस्त्वना॒गा दे॑वाः शकु॒नो गृ॒हं नः॑ ।अ॒ग्निर्हि विप्रो॑ जु॒षतां॑ ह॒विर्नः॒ परि॑ हे॒तिः प॒क्षिणी॑ नो वृणक्तु

śivaḥ kapota iṣito no astvanāgā devāḥ śakuno gṛhaṃ naḥ | agnirhi vipro juṣatāṃ havirnaḥ pari hetiḥ pakṣiṇī no vṛṇaktu

हिन्दी अर्थ

द्विपदः) इस दोपाए मनुष्य का, (यः) जो (चतुष्पदः) चौपाए पशु का मृत्यु नामक के प्रति (नमः अस्तु) नमस्कार हो । धात्वथं जाना जाता है, वतिः का कोई अथं नहीं रहता । यथा उदरतः- का वर्णेन हुमा है, परमेश्वर तमोगुण से रहित है, अतः वह पप से हटा "तमोमागं को त्याग दो तो तुम पापपथ से व्यावृत्त हो जाभौगे । समग्र वेद

English

A prayer to Indra for riches He who controls this air and men who aid his strength, and wood, and heaven, the lofty seat which Indra loves.

अध्याय 6

श्लोक 27.3

हे॒तिः प॒क्षिणी॒ न द॑भात्य॒स्माना॒ष्ट्री प॒दं कृ॑णुते अग्नि॒धाने॑ ।शि॒वो गोभ्य॑ उ॒त पुरु॑षेभ्यो नो अस्तु॒ मा नो॑ देवा इ॒ह हिं॑सीत् क॒पोतः॑

hetiḥ pakṣiṇī na dabhātyasmānāṣṭrī padaṃ kṛṇute agnidhāne | śivo gobhya uta puruṣebhyo no astu mā no devā iha hiṃsīt kapotaḥ

हिन्दी अर्थ

है, इसलिथे वहं यमहै'वहहौ कर्मानुसार जन्ममृत्यु का प्रदाता है अतः वह मृत्यु है । यया -“स एव मुदु" सो ¢ मृतं सो 4 भ्वं स रक्षः" (अथवं० सथ पर चलने पर्, मौर उत्करे प्रति सदा नमस्कारं करने पर, कपोत , अर्थात् वायुयान तथा जलीययान सदा उपकारी होते है, कभौ युद्धकी मोर कां०६। अनु०३। सू० २९ मयवेवेद-भाष्य ४६ मून हेतिः पतत्रिगी न्येऽतु यदुेको वदंति मोघमेतत् । (पतत्रिणी) पंख वाली पक्षिणी के सदशं अल्पकाय (हेतिः) अस्प रूप हमारा वागरुयान; (अमून्) उन शक्रुभों की भोर (न्येतु) नितरां

English

The bold whose overpowering might the boldest never hath defied,— p. a215 As erst still, unassailable is Indra’s wrath, and fame, and force. May he bestow on us that wealth, far-spreading, bright with yellow hue.

अध्याय 6

श्लोक 28.1

अरिष्टक्षयणम्।१-३ भृगुः।यमः, निर्ऋतिः।१ त्रिष्टुप्, २ अनुष्टुप्, ३ जगती।ऋ॒चा क॒पोतं॑ नुदत प्र॒णोद॒मिषं॒ मद॑न्तः॒ परि॒ गां न॑यामः ।सं॒लो॒भय॑न्तो दुरि॒ता प॒दानि॑ हि॒त्वा न॒ ऊर्जं॒ प्र प॑दा॒त् पथि॑ष्ठः

ariṣṭakṣayaṇam| 1-3 bhṛguḥ| yamaḥ, nirṛtiḥ| 1 triṣṭup, 2 anuṣṭup, 3 jagatī| ṛcā kapotaṃ nudata praṇodamiṣaṃ madantaḥ pari gāṃ nayāmaḥ | saṃlobhayanto duritā padāni hitvā na ūrjaṃ pra padāt pathiṣṭhaḥ

हिन्दी अर्थ

कहता है कि (कपोतः) हमारा वायुयान (अग्नौ) युद्धाग्नि में (पदम्, कृणोति) पर पसतार रहा है यह् भी व्यथं है । उलूक का अभिप्राय उल्लू-पक्षी नही, अपितु वहु मनुष्यै जोकि व मकार का कथन करता ह । अज्ञानी ओर बेवकूफ को उल्ल् कहते भी (नि ते) है ङृच्छापत्ति ! (ते) तेरे (यौ) जोदो (दूतौ) उपतापी है, उन (कपोतोलूकाभ्याम्) वायुयान भौर उसके सञ्चालक के लिये अ-¬-पद गतौ = आने-जाने को स्थाननदहो।

English

Indra is mightiest Lord among the folk. To Agni for protection from enemies Send forth thy voice to Agni, to the manly hero of our homes,

अध्याय 6

श्लोक 28.2

परी॒मे॒३ग्निम॑र्षत॒ परी॒मे गाम॑नेषत ।दे॒वेष्व॑क्रत॒ श्रवः॒ क इ॒माँ आ द॑धर्षति

parīme3gnimarṣata parīme gāmaneṣata | deveṣvakrata śravaḥ ka imā~ ā dadharṣati

हिन्दी अर्थ

गए या स्वयमेव भेद लेने के लिए आए, वायुयान भौर उसके सञ्चालक को.निज रषष्टू मेः आश्रयनदेना चाहिए । वायुयान के सञ्चालक को १० अथववेवेद-भाष्य कां ६॥ अनु० ३। सू० ३० उल्लू कहा है । क्योंकि हमारी शिति को जाने विना वह् हमारे राष्ट में आया दहै) हमारी शक्ति का कथन (मन्त्र द) मेंहभा है । निं तिः = परासेव परां वद परांचीमतुं संवत॑प्र । हे परराष्ट के दूत (अवेरहत्याय) अवैर अर्थात् वैर के अभाव

English

So may he bear us past our foes. That Agni who with sharpened flame of fire consumes the Rākshasas,

अध्याय 6

श्लोक 28.3

यः प्र॑थ॒मः प्र॒वत॑मास॒साद॑ ब॒हुभ्यः॒ पन्था॑मनुपस्पशा॒नः ।यो॒३स्येशे॑ द्वि॒पदो॒ यश्चतु॑ष्पद॒स्तस्मै॑ य॒माय॒ नमो॑ अस्तु मृ॒त्यवे॑

yaḥ prathamaḥ pravatamāsasāda bahubhyaḥ panthāmanupaspaśānaḥ | yo3syeśe dvipado yaścatuṣpadastasmai yamāya namo astu mṛtyave

हिन्दी अर्थ

(आ पपत्यात्) उड़कर आया कर, ( ) तथा निज सुवीरता के परदशेन के लिये (इदम्) इस वायुयान पर (आससद्यात्) तु मा बटठाकर । (पराचीम्) पूवंकाल से आई (संवतम्) क हमारी संगति अर्थात् मेल फो लक्ष्य कर के (पराङ् एव) दूर-दूर के प्रदेशों मेँ (परावद) तू कहा कर । (यथा) जिससे कि (यमस्य) नियन्ता राजा के (गृहे) रष्टरूमेया अथं संगत है । आपपत्यात् = कपोत मल्पकाय वायुयान दारा शीघ्रा जाना । अरसम् शक्तिशाली परराष्ट् दूत का रस है शौयं । जव ५ राष्ट के दुत सेनापति को युद्ध न करना रहै तो मानो सेनापत्ति शौय से कां० ६1 अनु० २। सू० ३ ० अथर्ववेद-भाष्य ५१ (देवाः) प्राकृत दिग्य तत्त्वो ने (मधुना) माघुये अथवा मधुर-जल से हल जोतने वाला (आसीत्) था, (सुदानवः) उतम जल के दाता (मरुतः) मानसून वायुएं (कीनाश्षाः) किसान (आसन्) ये ।

English

So may he bear us past our foes. He who from distance far remote shineth across the tracts of land, May he transport us past our foes.

अध्याय 6

श्लोक 29.1

अरिष्टक्षयणम्।१-३ भृगुः।यमः, निर्ऋतिः।(बृहती) १-२ विराण्नाम गायत्री, ३ त्र्यवसाना सप्तपदा विराडष्टिः।अ॒मून् हे॒तिः प॑त॒त्रिणी॒ न्येऽतु॒ यदुलू॑को॒ वद॑ति मो॒घमे॒तत्।यद् वा॑ क॒पोत॑ प॒दम॒ग्नौ कृ॒णोति॑

ariṣṭakṣayaṇam| 1-3 bhṛguḥ| yamaḥ, nirṛtiḥ| (bṛhatī) 1-2 virāṇnāma gāyatrī, 3 tryavasānā saptapadā virāḍaṣṭiḥ| amūn hetiḥ patatriṇī nye'tu yadulūko vadati moghametat| yad vā kapota padamagnau kṛṇoti

हिन्दी अर्थ

सरस्वत्यामधि --जलवाली नदी के समीप कौ भूमि मे। सरस्वतो सामान्य नदी है जिसमेंकि प्रभूत जल है, सरस्वती = (जल) +-वती यह एतिहासिक सरस्वती नदी नहं । खाने मे यव मधुर रसवाला है अतः वह मधु मिश्रित है, मथवा सरस्वती के मघुर जल से मिधितहै, (मधु उदकनाम, निधं. १।१२) । सरस्वती के समीप की भूमि सु-उपजाञ है, चलाने वाला कहा है । न इसमें कूषादि द्वारा जल सीचा जाता है । वर्षा दाराही जल सींचा जाता है, अतः मानसून वायृएं ही कीनाश, मानुष किसान कहीं हँ । कीनाशाः =कीशानाः = किसान । सरस्वती नदी यवादि यस्ते मदोवफेशो वेकशो येनांमिहस्यं पुरुषं कृणोषि । मादकं स्वरूप है, (येन) जिस द्वारा (अवकेशः) जो मुण्डितं केशों वाला ओर (विकेशः) विकोणे केशों बाला है उस (पुरुषम्) पुरुष कोभीतू तेरे समीवपर्ती जो (अन्या वनानि) भौर संभोग याचक हँ उन को (वृक्षि)

English

He who beholds all creatures, who observes them with a careful eye, May he transport us past our foes. That brilliant Agni who was born beyond this region of the air,

अध्याय 6

श्लोक 29.2

यौ ते॑ दू॒तौ नि॑रृत इ॒दमे॒तोऽप्र॑हितौ॒ प्रहि॑तौ वा गृ॒हं नः॑ ।क॒पो॒तो॒लू॒काभ्या॒मप॑दं॒ तद॑स्तु

yau te dūtau nirṛta idameto'prahitau prahitau vā gṛhaṃ naḥ | kapotolūkābhyāmapadaṃ tadastu

हिन्दी अर्थ

(शतवल्शा) सैकड़ों शाखा वाली लता के सदृश (विरोह) विविध रूप ५२ अथरववेद-भाष्य कां० ६ गनु० ३ । सुर ३५ शमी द्वारा शान्त स्वभाव वाली गृहिणी काभी वणेन होता रै (अथव ६।११। १) । अवकेश है संन्यासी, भर विकणकेश है मुनि, सम्भवतः वानप्रस्थी । पूणंसंयमी न होने की अवस्थामे येभी एेन्दरियिक भोग के वशीभूत हो जाते है । एेसी अवस्था मे संभोग-याचकों का छेदन आवश्यक ही होता है 1 वनानि वनु याचने (तनादिः) । एसे लोग अवाञ्छनीय है कि “वलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कषति (मनु २।२१५) केशवधेन भी एक प्रकार का मद है जिसका सम्बन्ध शमीके साथ दहै), केशों को बढ़ा कर् य॒दि पुरुष अवकेश हौ जाता है, अर्थात् केशों को नीचे की ओर लटकाए रखतादहै, या विकेश लूपमे केशोंको विकीर्णखूपमें रखता हैःतो सर्वसाधारण की दृष्टि मेँ वह् उपहास-योग्य हो जाता हे। वेदिक दृष्टि में मण्डित केशो वाला मूख शोभा योग्य होता है । यथा --

English

May he transport us past our foes! To Agni Vaisvānara Forth from the distance far away Vaisvānara come to succour us! Agni approach our

अध्याय 6

श्लोक 29.3

अ॒वै॒र॒ह॒त्याये॒दमा प॑पत्यात् सुवी॒रता॑या इ॒दमा स॑सद्यात्।परा॑ङे॒व परा॑ वद॒ परा॑ची॒मनु॑ सं॒वत॑म्।यथा॑ य॒मस्य॑ त्वा गृ॒हेऽर॒सं प्र॑ति॒चाक॑शाना॒भूकं॑ प्रति॒चाक॑शान्

avairahatyāyedamā papatyāt suvīratāyā idamā sasadyāt| parāṅeva parā vada parācīmanu saṃvatam| yathā yamasya tvā gṛhe'rasaṃ praticākaśānābhūkaṃ praticākaśān

हिन्दी अर्थ

यत् क्षुरेण मचेयता सूतेजसा वप्ता वपसि केशरमथु । मन्त्र उपनयन-कमं सम्बन्धी है । बरहैत्पछाशे सुभगो वर्षद्ध ऋतावरि । मातेव पुत्रेभ्यो मृड केशेभ्यः शमि ॥२॥ (वृहत्यलाश्ञे) बडे या॒ वहत पत्तो घाली, (सुभगे) सौभाग्यकारिणी, (वर्षवद्धे) वर्षा वारा बढ़ने वाली, (ऋतावरि) यज्ञकमें वाली (शमि) हे शमी ! (केशेभ्यः) हमारे ऊेशो के लिये (मृड) सुखकारी हो, (इव) जंसे (माता पूब्रेभ्यः) पृषो के लिये सुखकारी होतो है।

English

eulogies! Vaisvānara with friendly thoughts hath come to this our sacrifice, Agni who saves from woe, to lauds.

अध्याय 6

श्लोक 30.1

पापशमनम्।१-३ उपरिबभ्रवः।शमी।जगती, २ त्रिष्टुप्, ३ चतुष्पाच्छंकुमत्यनुष्टुप्।दे॒वा इ॒मं मधु॑ना॒ संयु॑तं॒ यवं॒ सर॑स्वत्या॒मधि॑ म॒णाव॑चर्कृषुः ।इन्द्र॑ आसी॒त् सीर॑पतिः श॒तक्र॑तुः की॒नाशा॑ आसन् म॒रुतः॑ सु॒दान॑वः

pāpaśamanam| 1-3 uparibabhravaḥ| śamī| jagatī, 2 triṣṭup, 3 catuṣpācchaṃkumatyanuṣṭup| devā imaṃ madhunā saṃyutaṃ yavaṃ sarasvatyāmadhi maṇāvacarkṛṣuḥ | indra āsīt sīrapatiḥ śatakratuḥ kīnāśā āsan marutaḥ sudānavaḥ

हिन्दी अर्थ

कि षमी लताषटप है । केशों के लिये शमी का सुखकारी होने का केवल यह् (२) मे मवकेश भौर विकेश पुरुष को उपहास-योग्य कहा है । ऋत = यज्ञ ५।२।१०६; तथा “वनो र च", अष्टा ० ४।१।७ मन्व के ऋषि हैँ “उपरि । कां० ६। अनु० ३। सु ३१ अथवेवेद-भाष्य वश्रवः'' ऊपर अर्थात् ऊपर के लोकों मे स्थित भरण-पौषण करने वाले,

English

Vaisvānara hath formed the hymn and laud of the Angirases. To these may he bring glorious right. In praise of Agni Vaisvānara

अध्याय 6

श्लोक 30.2

यस्ते॒ मदो॑ऽवके॒शो वि॑के॒शो येना॑भि॒हस्यं॒ पुरु॑षं कृ॒णोषि॑ ।आ॒रात् त्वद॒न्या वना॑नि वृक्षि॒ त्वं श॑मि श॒तव॑ल्शा॒ वि रो॑ह

yaste mado'vakeśo vikeśo yenābhihasyaṃ puruṣaṃ kṛṇoṣi | ārāt tvadanyā vanāni vṛkṣi tvaṃ śami śatavalśā vi roha

हिन्दी अर्थ

(अयम्) यह (गौः) पृथिवीलोक, (पृश्निः) जो कि नाना वर्णीहै (सायण ऋ० १।२३।१०) , पृथिवीलोक नानाद्पों से रज्जित है अतः अन्तरिक् मे गति करतौ है, ओर वदती है, फेलती है । यथा “मातरिश्वा ७।७।२६) । पित्तरम् = पृथिवी लोक सूर्यं से पदा हुआ है अतः सूर्यं पुथिवी का प्रयोग है । इस द्वारा यह -दर्शाया है कि पूर्थिवीलोक जवसे पिता से पदा हुआ है तभीसे पिता की ओर वहु पाद बढ़ा रहारहै।

English

Holy Vaisvānara we seek, the Lord of light and endless life, the burning One who fadeth not. He hath directed all things; he sends forth the Seasons in his might, furthering sacrifice’s power.

अध्याय 6

श्लोक 30.3

बृह॑त्पलाशे॒ सुभ॑गे॒ वर्ष॑वृद्ध॒ ऋता॑वरि ।मा॒तेव॑ पु॒त्रेभ्यो॑ मृड॒ केशे॑भ्यः शमि

bṛhatpalāśe subhage varṣavṛddha ṛtāvari | māteva putrebhyo mṛḍa keśebhyaḥ śami

हिन्दी अर्थ

आदि को प्रकाशित कर रहा है, (मस्य) इस सूयं की (रोचना) दीप्ति १. अनिति गतिकर्मा (निषंर २।१४) । अर्थात् प्रकाश (अन्तः ) पृथिवीलोक के भीतर (चरति) विचरती है, हो जाने से पृथिवी आदि मेंसूयंके प्रकाणका प्रवेश होना प्राणक्छिया धामानि) स्थानों मे (विराजति) विराजमान रहती है, प्रदीप्त होती

English

Agni Kāma in other homes shines forth the sole imperial Lord of all that is and is to be. 78 A charm to divert Imprecation personified

अध्याय 6

श्लोक 31.1

गौः।१-३ उपरिबभ्रवः।गौः।गायत्री।आयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒दस॑दन्मा॒तरं॑ पु॒रः ।पि॒तरं॑ च प्र॒यन्त्स्वः

gauḥ| 1-3 uparibabhravaḥ| gauḥ| gāyatrī| āyaṃ gauḥ pṛśnirakramīdasadanmātaraṃ puraḥ | pitaraṃ ca prayantsvaḥ

हिन्दी अर्थ

का आश्रय है । (महः) दिन (बुभिः) युतिमान् सौर-रश्मियो द्वारा (अशि- धियत्) आश्रय पाता है । राजति = राज् दीप्तौ (भ्वादिः) । ३० धाम हैः ३० महतं । अहोरात्र में ३० महतं होते है । इक मुहूतं मे ४८ मिनिट, गतः ३० बहर्तो मे १४४० भागम होती है उसे एक “धाम कहा है । इस प्रकार ३० मुहूतं के ३० धाम होते है । वाक् है मनुष्यों तथा पश पक्षियों की ध्वनियां । ये पृथिवी , के ३० धामो की इष्टि से कहीं न कहीं सदा विराजमान रहती ही हैँ । इन का आश्रय चसूर्यं + सूर्यं भी ३० महतो की दुष्टि से ३० धामो में कहीं न

English

Hitherward, having yoked his steeds, came Imprecation, thousand-eyed, Seeking my curser, as a wolf the home of one who owneth sheep. Avoid us, Imprecation! as consuming fire avoids the lake.

अध्याय 6

श्लोक 31.2

अ॒न्तश्च॑रति रोच॒ना अ॒स्य प्रा॒णाद॑पान॒तः ।व्यऽख्यन्महि॒षः स्वः

antaścarati rocanā asya prāṇādapānataḥ | vya'khyanmahiṣaḥ svaḥ

हिन्दी अर्थ

कहीं चमकता ही रहता है । “महः के भी दो रूप है, अदृष्च कृष्णम्, अह- अथरववेद-भाष्य कां० ६। अनु° ३ सू० ३१ (अन्तः) जीवन के भीतर, (दावे) दावाग्नि के सदुश दर्ष्यां आदि ठैने वाले कुसंस्कारो का क्षय करने वाले मनरूपी हवि को (सु) उत्तम विधि (घतेन) निजशक्ति के अनुसार, (जुहुत ) परमेश्वराग्नि भे आहृति- राक्षसी भाव को दग्ध कर, (नः) हमारे (गृहाणाम्) शरीर गृह को (न) न (उपतीतपासि) तू उपतापकारी हो ।

English

Smite thou the man who curses us, as the sky’s lightning strikes the tree. Who curses us, himself uncursed, or, cursed, who curses us again, Him cast I as a sop to Death, as to a dog one throws a bone.

अध्याय 6

श्लोक 31.3

त्रिं॒शद् धामा॒ वि रा॑जति॒ वाक् प॑त॒ङ्गो अ॑शिश्रियत्।प्रति॒ वस्तो॒रह॒र्द्युभिः॑

triṃśad dhāmā vi rājati vāk pataṅgo aśiśriyat| prati vastorahardyubhiḥ

हिन्दी अर्थ

सायण ने दावाग्नि मे धुत सहित हवि की जहृति देने का कथन भौ वीयं को समाधिम कारण माना । यथा “श्वद्धावीर्यस्मृतिसमाधि- प्रज्ञापुवक इतरेषाम्” (योग० १।२०) । . हृविः से अभिप्रेत है मन राजस । भौर तामस मन कुसंस्कारों को पैदा करता, गौर सात्त्विक मन उन का क्षय करता है । इसलिये कहा है किं “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्ध- ५६ अथर्ववेद-भाष्य॒कां० ६1 अनु० ४। सू० ३२ यातना के निधानो ! (वः) तुम्हारी (पृष्टीः) पसलियो को (अपि) भी, भेषज (वः) तुमह (यमेन) मुत्थु के साथ (सम् अजीगमत्) पपत कर दे

English

A prayer for surpassing strength and energy What energy the lion hath, the tiger, adder, and burning fire,

अध्याय 6

श्लोक 32.1

यातुधानक्षयणम्।(१-३) १-२ चातनः, ३ अथर्वा।१ अग्निः, २ रुद्रः, ३ मित्रावरुणौ।त्रिष्टुप्, २ प्रस्तारपङ्क्तिः।अ॒न्त॒र्दा॒वे जु॑हुता॒ स्वे॒३तद् या॑तुधान॒क्षय॑णं घृ॒तेन॑ ।आ॒राद् रक्षां॑सि॒ प्रति॑ दह॒ त्वम॑ग्ने॒ न नो॑ गृ॒हाणा॒मुप॑ तीतपासि

yātudhānakṣayaṇam| (1-3) 1-2 cātanaḥ, 3 atharvā| 1 agniḥ, 2 rudraḥ, 3 mitrāvaruṇau| triṣṭup, 2 prastārapaṅktiḥ| antardāve juhutā sve3tad yātudhānakṣayaṇaṃ ghṛtena | ārād rakṣāṃsi prati daha tvamagne na no gṛhāṇāmupa tītapāsi

हिन्दी अर्थ

शरोरकेमासकोख। जानि वनि तवा यातना देने वाने काम, क्रोध, इर्ष्वा आदि दुर्मावों ओर दुष्कर्मा का विनाश कर देता है । परमेश्वर ही है, स ¦ जोष, जोकि इने विनाश में स्वेतोवीर्या है । यथा - ॥ मेषजमसि भेषजं गवेऽश्वाय पुरुषाय भेषजम् । पिशाचो ओर यातुधानो के शरोर नही, न उनकी प्रावापुं ओर पृष्टयां है, तथापि उन पुरुष मान कर उनके पौर प्रविधि अंगों का वर्णन कविता! य (सित्रावणो) हँ मित्र जोर वण ! (इह) इस जन्म म (नः) हमं (भयम्) मभय (अस्तु) हो, (अचिषा) तेज दारा (अक्रिणः) भक्षको को (प्रतोचः) पराङ्धुव करके (नुरतम्) तुम धकेलदो, निरस्त करदो। ये ¦

English

Brāhman, or Sūrya, And the blest Goddess who gave birth to Indra, come unto us conjoined with strength and vigour!

अध्याय 6

श्लोक 32.2

रु॒द्रो वो॑ ग्री॒वा अश॑रैत् पिशाचाः पृ॒ष्टीर्वोऽपि॑ शृणातु यातुधानाः ।वी॒रुद् वो॑ वि॒श्वतो॑वीर्या य॒मेन॒ सम॑जीगमत्

rudro vo grīvā aśarait piśācāḥ pṛṣṭīrvo'pi śṛṇātu yātudhānāḥ | vīrud vo viśvatovīryā yamena samajīgamat

हिन्दी अर्थ

एक-दूसरे को हनन करते हए (मृत्युम्, उवयन्तु) मुत्यु के समीप चते सवं स्नेही परमेश्वर भित्र है, मिदि स्नेहने (चुरादिः), ओर पापो से निवारण करते वाला वह् वध्णदहै। गुण-कर्मं भेदसे ही परमेश्वरकेदो कण ६। अनु० ४। सु° ३३ अथवेवेद-भाष्य १७ तीन ही देवता मानते है, यथा “तिस + “तिस्र एव देवता इति नैरुक्ताः” न 1 ५५. 1 अन्तरिक्ष ओर दयौः । वेदोक्त अन्य व न के । भिन्न-भिस्न स्वरूप वाते मानते ् । । व रौद्ररूप के कारण उसे रद्र कहा त्र वि

English

All energy of elephant and panther, all energy of gold, men, kine, and waters, p. a217 And the blest Goddess who gave birth to Indra come unto us conjoined with strength and

अध्याय 6

श्लोक 32.3

अभ॑यं मित्रावरुणावि॒हास्तु॑ नो॒ऽर्चिषा॒त्त्रिणो॑ नुदतं प्र॒तीचः॑ ।मा ज्ञा॒तारं॒ मा प्र॑ति॒ष्ठां वि॑दन्त मि॒थो वि॑घ्ना॒ना उप॑ यन्तु मृ॒त्युम्

abhayaṃ mitrāvaruṇāvihāstu no'rciṣāttriṇo nudataṃ pratīcaḥ | mā jñātāraṃ mā pratiṣṭhāṃ vidanta mitho vighnānā upa yantu mṛtyum

हिन्दी अर्थ

रूप होता हआ भी उनके प्रति मि ह ३, 4 क्यो ५ 7 ह पठ, के इस शट्ररू इष्कर्मी सत्पथगामी हो जाते है । मन्वरमे ? त म र मत्र भौर वरुण के ब अचिषा" मे एकवचन है, नहीं तो द्विवचन का न भदस ह ह । अधिक मत्री अर्थात् स्नेह भी (१-३) । जाटिकायनः । इद्धः । गायश्रो; २ अनुष्टुभ् । (जनाः) है प्रजाजनो ! (आयुजः) सवं म » (तुजे) ईर्ष्या भादि की £ के लिये, (स्वः) सुख स्वरूप (वनम्) याचनोय है, प्राथनीय है। +.

English

vigour. Might in car, axles, in the strong bull’s courage, in Varuna’s breath, in Vāta, in Parjanya, In Warrior, in the war-drum stretched for battle, in the man’s roar and in the horse’s mettle,

अध्याय 6

श्लोक 33.1

इन्द्रस्तवः।१-३ जाटिकायनः।इन्द्रः।गायत्री, २ अनुष्टुप्।यस्ये॒दमा रजो॒ युज॑स्तु॒जे जना॒ वनं॒ स्वः ।इन्द्र॑स्य॒ रन्त्यं॑ बृ॒हत्

indrastavaḥ| 1-3 jāṭikāyanaḥ| indraḥ| gāyatrī, 2 anuṣṭup| yasyedamā rajo yujastuje janā vanaṃ svaḥ | indrasya rantyaṃ bṛhat

हिन्दी अर्थ

बुद्ध पूर्वक होतो है, ओर उनमें क्रम विशेष आर 8 समन्वय ५८ अथववेद-भाष्य का० ६ । अनु० ४। सू० ३२ होता है 1 ईर्ष्या भादिके विनाश के लिये परमेश्वर के सुख स्वरूप फो याचना करनी चाहिए । तुजे= तुज हिसायाम् (भ्वादिः) ॥ नाधृष आ हैधृषते धृषाणो ध्रपितः शव॑ः । (धुषाणः) घरषण करने वाला (शवः) इन्द्र का बल (आ दधृषते) सथ का धषेण करता है, (धृषितः) धषण किया जाता हृजा भी (न आधृषे) धर्षित होने योग्य नहीं होता । ‹पुरा) पुराकालौ में (यथा) जैसे (व्यधिः)

English

May the blest Goddess who gave birth to Indra come unto us conjoined with strength and vigour.

अध्याय 6

श्लोक 33.2

नाधृ॑ष॒ आ द॑धृषते धृषा॒णो धृ॑षि॒तः शवः॑ ।पु॒रा यथा॑ व्य॒थिः श्रव॒ इन्द्र॑स्य॒ नाधृ॑षे॒ शवः॑

nādhṛṣa ā dadhṛṣate dhṛṣāṇo dhṛṣitaḥ śavaḥ | purā yathā vyathiḥ śrava indrasya nādhṛṣe śavaḥ

हिन्दी अर्थ

परमैश्वयंवान् परमेश्वर का (शवः) बल (आाधूषे न) अव भी धषित होने धारण भौर प्रलय में उस का वल ही मानते। वे अचेतन प्रकृति कोही उत्पादिका धारणकर््री मानते है-यह ही परमेश्वर भौर उसके बल का परमेश्वरङृत धर्षण का ही तो परिणाम ह । “श्रावः बलनाम (निंघं० २।६); तथा “भावति तिकर्मा (निघं० २।१२); तथा ‹ शव गतो” (भ्वादिः) इस सम्बन्ध मे निरुक्तकार ““शवतिेतिकर्मा कम्बोजेष्वेव भाष्यते ।

English

A priest’s prayer for power and glory Let sacrifice, like fame, thrive sped by Indra, inspired, well- ordered, with a thousand powers. To highest rank raise me who bring oblation, me who move forth to far-extended vision.

अध्याय 6

श्लोक 33.3

स नो॑ ददातु॒ तां र॒यिमु॒रुं पि॒शङ्ग॑संदृशम्।इन्द्रः॒ पति॑स्तु॒विष्ट॑मो॒ जने॒ष्वा

sa no dadātu tāṃ rayimuruṃ piśaṅgasaṃdṛśam| indraḥ patistuviṣṭamo janeṣvā

हिन्दी अर्थ

संस्कृत साहित्य के सम्बन्ध मे जानना चाहिए प्रदान करे । (जनेषु आ) सरवर फले जनो मं इन्द्र (तुविष्टमः) भति कां० ६ । अनु° ४। सू० ३४ अथववेद-माष्य ५६ न (५ कर, (सः) वह् परमेश्वर (द्विषः) देष भावनाओं के र नः अति पषेत्) हमें पार करे अथवा द्वेष भावनाओं से हमे परिपालित करे । ग भावों की, (तिग्मेन शोचिषा) तिम प्रकाश द्वारा (निजुवेति) नितरां हिसा करता है (सः) वह पूर्ववत् (मन्त्र १) । 1

English

We will pay sacrifice and serve with worship our glorious Indra, famous for his glories. Give thou us sway which Indra hath promoted, and in this boon of thine may we be famous.

अध्याय 6

श्लोक 34.1

शत्रुनाशनम्।१-५ चातनः।अग्निः।गायत्री।प्राग्नये॒ वाच॑मीरय वृष॒भाय॑ क्षिती॒नाम्।स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑

śatrunāśanam| 1-5 cātanaḥ| agniḥ| gāyatrī| prāgnaye vācamīraya vṛṣabhāya kṣitīnām| sa naḥ parṣadati dviṣaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकट र 4 निकृष्ट भावों का विनाश करता दहै। ५५ मे (0 प्रकाश वाली अभ्नि द्वारा रोगजनक कौटाणुञओं के विनाशको भी है । ज॒वंति वधकर्मा (निघं० २।१६) । ++ ६० मथवेवेद-भाष्य रकां० ६। अनु० ४। सूु० ३५ सव भुवनो को (अभि वि पश्यति) साक्षात् एक-एक करके देखता है, (च) ओर (सपश्यति) एक दृष्टि में सव को युगपत् देखता है । (सः) वह पूवे- है (सः) वह्, पू्वंवेत् (मन््र १) । सात्विक चित्त में प्रकट होता है, - यह् भाव भी सुचित होता है ।

English

Indra was glorious at his birth; Agni, Soma were born renowned. And glorious am I, the most illustrious of all that is. A prayer for peace and security

अध्याय 6

श्लोक 34.2

यो रक्षां॑सि नि॒जूर्व॑त्य॒ग्निस्ति॒ग्मेन॑ शो॒चिषा॑ ।स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑

yo rakṣāṃsi nijūrvatyagnistigmena śociṣā | sa naḥ parṣadati dviṣaḥ

हिन्दी अर्थ

(वैश्वानरः) सव नर-नारियों का हितकारी (अग्निः) जगदग्रणो परः मेश्वर, (नः ऊतये) हमारो रक्षा के लिये, (नः) हमारी (युष्टुतीः) उत्तम अर्थात् भक्तिभरी स्तुतिभों के (उप) समीप, (परावतः) दूर सेभो (आ ३. “तदेव शुक्रं तदृब्रह्य ता आपः स प्रजापतिः" (यजु ° ३२।१) । ¶ं० ९1 अनु० ४1 सू° ३५ अथववेवेद-भाष्य ९१ गत सूक्त ३४ के प्रकरणानुकूल आध्यात्मिक अथं किया है । परमे- एवर सवव्यापक है, परन्तु अदृष्ट होने से वह हम से दुर दहै, अतः परावत्

English

Here may we dwell, O Heaven and Earth, in safety. May Savitar and Soma send us safety. Our safety be the wide air: ours be safety through the oblation of the Seven Rishis. p. a218

अध्याय 6

श्लोक 34.3

यः पर॑स्याः परा॒वत॑स्ति॒रो धन्वा॑ति॒रोच॑ते ।स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑

yaḥ parasyāḥ parāvatastiro dhanvātirocate | sa naḥ parṣadati dviṣaḥ

हिन्दी अर्थ

गई है । अग्निरग्रणी भवति (निरुक्त ७।४।१४) । ( वैश्वानरः) सब नर-नारियों का हितकारी (अग्निः) जगदग्रणी पर- मेए्वर, (अंहसु) पापनाशक (उक्थेषु) स्तुति मन्त्रो तथा सामगानौं में म (उप) समीप (आ अगमत्) आ गया है । ४, ओर मन्व २ में “आ अगमत्” द्वारा वह हमारे उपासना यज्ञ में समीप आ गया है, पहिले वह् अदृष्ट था, अव दष्ट हौ गया है। अंहसु =आह- भ्तोति अंहः" ( निरक्त ४।४।२५) । जो पापी का हनन कर देता है, परन्तु वतमान मन्त मे “अंहः का अथं है “जो पाप का हनन कर देतादे)' "अंहः" का केवल अर्थं मन्त्र मे है “हनन करने वाला" । ( वैश्वानरः) सब नर-नारियोंका हितकारी परमेश्वर (अंगिरसाम्)

English

May the Four Quarters give this hamlet power: Savitar favour us and make us happy! May Indra make us free from foes and danger: may wrath of Kings be turned to other places.

अध्याय 6

श्लोक 34.4

यो विश्वा॒भि वि॒पश्य॑ति॒ भुव॑ना॒ सं च॒ पश्य॑ति ।स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑

yo viśvābhi vipaśyati bhuvanā saṃ ca paśyati | sa naḥ parṣadati dviṣaḥ

हिन्दी अर्थ

। सामगानों को (अक्लृपत्) समथित करता है। (एषु) ओर इन साम- ६२ मथवेवेद-भाष्य कां० ९॥ अनु° ४। सु° ३६ नरम्) सब नर-नारियों के हितकारी या विश्व के नेता परमेश्वर से (ईमहे), । हम सदा याचन। करते हु । प्रत्येक १ को (चाक्लपे) पदा किया, (वशौ) जो वशयिता (ऋतून्) ऋतुओं का (उत्सृजते) उत्करषे रूप मे सजन करता है, वहं (यज्ञस्य) हमारे , जीवन यज्ञ की (वयः) भायु को (उत्तिरन्) बढ़ातादहै। ॑ यदि जीवन यज्ञमयदहोतो भयु बढ़ जाती है । “पुष्षो वाव यज्ञः अभ्रिः परेषु धाम॑घु कामों मृतस्य भव्यस्य । सम्नाडेको वि राजति ॥३॥

English

Make thou us free from enemies both from below and from above. O Indra, give us perfect peace, peace from behind and from be- fore.

अध्याय 6

श्लोक 34.5

यो अ॒स्य पा॒रे रज॑सः शु॒क्रो अ॒ग्निरजा॑यत ।स नः॑ पर्ष॒दति॒ द्विषः॑

yo asya pāre rajasaḥ śukro agnirajāyata | sa naḥ parṣadati dviṣaḥ

हिन्दी अर्थ

दूर-दूर के (धामसु) स्थानो मे (विराजति) विराजमान है, (एकः) वहू फं०६। अनु० ४। सु० ३७ अथवेवेद-भाष्य । जड़ जगत् का भी काम्य है--यह कवि शली के अनुसार कहा है । यथा-- वाला परमेश्वर (शपथः) शाप बनकर, (रथम् युक्त्वा) मानो रथ जोत कर (उप प्रागात्) शापकर्ता के समीप शीघ्रतासे आ गया है, (मम) मेरे । (शप्तारम्) शाप देने वाले को (अनु इच्छन्) टूंडता हुभा; (इव) जैसे कि

English

A prayer for protection, long life, and various blessings For mind, for intellect, for thought, for purpose, for intelligence,. For sense, for hearing, and for sight, let us adore with sacrifice.

अध्याय 6

श्लोक 35.1

वैश्वानरः।१-३ कौशिकः।वैश्वानरः।गायत्री।वै॒श्वा॒न॒रो न॑ ऊ॒तय॒ आ प्र या॑तु परा॒वतः॑ ।अ॒ग्निर्नः॑ सुष्टु॒तीरुप॑

vaiśvānaraḥ| 1-3 kauśikaḥ| vaiśvānaraḥ| gāyatrī| vaiśvānaro na ūtaya ā pra yātu parāvataḥ | agnirnaḥ suṣṭutīrupa

हिन्दी अर्थ

(वृकः) भेडिया (अविमतः) भेड़ो वाले के (गृहम्) घर आ जाता है 1 का हनन करता है । जैसे कि भेडिया भेड का हनन कर देता है । इस निमित्त परमेश्वर स्वयं शपथ रूप हो जाता है ओर शापदाता कौ शपथ देकर उसका विनाश करता है, इसमे वह देर नहीं करता, भतः शीघ्र पहुंचने के लिये मानो वह॒ रथ परसवारहो शप्ताके हननाथं उसके (शपथ) है शपथरूपधारो परमेश्वर ! (नः) हमे, (परिवङ्धि) हम मे बसा हृभा भी तु, हमे परिवजित कर दे, त्याग दे, (इव) जंसे (अग्निः)

English

For expiration, vital air, and breath that amply nourishes, Let us with sacrifice adore Sarasvatī whose reach is wide.

अध्याय 6

श्लोक 35.2

वै॒श्वा॒न॒रो न आग॑मदि॒मं य॒ज्ञं स॒जूरुप॑ ।अ॒ग्निरु॒क्थेष्वंह॑सु

vaiśvānaro na āgamadimaṃ yajñaṃ sajūrupa | agniruktheṣvaṃhasu

हिन्दी अर्थ

दाता का (जहि) हनन कर (इव) जसे (दिवः) द्युलोक कौ (अशनिः) विचयुत् चुलोक का हनन न करती हुई (वृक्षम्) वृक्ष का ठेनन करती है। ६४ अथववेद-भाष्य कां० ६। अनु० ४। सु० ३८ । हद मे पानी होता है, उस पानीमे भी भग्नि विद्युत् ष्पे रहती: है, परन्तु पानो का दहन नहीं करतो, दिव् को अशनि दिवृमें रहती है परन्तु दिव् का हनन नहीं करती, इसो प्रकारहे परमेश्वर ! शपथ रूपमे हममे बसादहुमाभीतू हमारा हनन न कर (च) ओर (यः) जो प्रतिक्तियारूप में (शपतः) शप देते हुए (नः) हमें म फेक देता हू, (इव) जसे (क्षमम्) सूखी (पेष्टम्) पोटी को (अव) नीचे भूमि पर (शुने) कृत्तं के लिपे फंक दिया जाता है ।

English

Let not the Rishis, the divine, forsake us, our own, our very selves, our lives’ protectors. Do ye, immortal, still attend us mortals, and give us vital power to live the longer.

अध्याय 6

श्लोक 35.3

वै॒श्वा॒न॒रोऽङ्गि॑रसां॒ स्तोम॑मु॒क्थं च॑ चाक्लृपत्।ऐषु॑ द्यु॒म्नं स्वऽर्यमत्

vaiśvānaro'ṅgirasāṃ stomamukthaṃ ca cāklṛpat| aiṣu dyumnaṃ sva'ryamat

हिन्दी अर्थ

परमेश्वर का भक्त परमेश्वर को कहताहै कि हम शाप देने की दुषप्रवृत्ति से रहित है, परन्तु मानुष दुबलता के कारण शापदेने वाले को यदि हम प्रतिक्रिया रूपमे शापदेदेते ह, मौर इस हमारी प्रतिक्रियामें शाप देने वाला पुनः हमे शापदेताहैतो हम प्रतिक्रिया मे उसे पुनः शाप न देकर तेरे प्रति फक देते्है,त् ही मृत्युरूप हुमा उसे यथोचित दण्डदे। ह्रे या देवी स॒मगां जनान सान रतु वचैषठा संबिदाना॥१॥ सूयं मे (त्विषिः) दीप्तिदहै, तथा (या सुभगा) जो सौभाग्य वाली कू०६। अनु०४। सु० ३८ अथवेवेद-भाष्य द (जजानप्रकृट करती है (सा) वहु (वचसा) वर्च॑ष् के साथ (संविदाना) मेल को प्राप्त हुई नः) हमे (एतु) प्राप्त हो।

English

A charm to reconcile estranged friends I loose the anger from thy heart as ‘twere the bowstring from a bow,

अध्याय 6

श्लोक 36.1

वैश्वानरः।१-३ अथर्वा (स्वस्त्ययनकामः)।अग्निः।गायत्री।वऋ॒तावा॑नं वैश्वान॒रमृ॒तस्य॒ ज्योति॑ष॒स्पति॑म्।अज॑स्रं घ॒र्ममी॑महे

vaiśvānaraḥ| 1-3 atharvā (svastyayanakāmaḥ)| agniḥ| gāyatrī| vaṛtāvānaṃ vaiśvānaramṛtasya jyotiṣaspatim| ajasraṃ gharmamīmahe

हिन्दी अर्थ

या हस्तिनि द्वीपिनि या हिरण्ये खिषिरप्छ गोषु या पुरुषेषु । जां (हिरण्ये ) सुरण मे (अप्सु जल में, ( गोषु) गौओं मे, ( या) जा (पुरूपरेषु) पुरषो मे है (शेष पूर्ववत्) । हाथो मे बलोत्कषं, चीते मे आक्रमण, हिरण्य में रमणीयता, जल में इनदरं यादेवी सुमगां जनानसान् तु वचैसा सं विदाना ।॥२॥ (रथे) रथमें (मक्षु) रथोंकौ धूरियों मे, (ऋषभस्य) बैल कां (वाजे) चालमें, ०.4५ वाधुं मे, (पजेन्ये) मेव मे, (वकूणस्य) वण के (शुष्मे) बलमे जो दीप्ति है, सा एतु वह (नः) हमे प्राप्त हो) रमणीयता; अक्षेषु =घुरिथों मे आधारता; वृषभस्यच््वैल को चाल में

English

That we, one-minded now, may walk together as familiar friends. Together let us walk as friends: thy wrathful feeling I remove. Beneath a heavy stone we cast thy wrath away and bury it.

अध्याय 6

श्लोक 36.2

स विश्वा॑ प्रति॑ चाक्लृप ऋ॒तूंरुत् सृ॑जते व॒शी।य॒ज्ञस्य॒ वय॑ उत्ति॒रन्

sa viśvā prati cāklṛpa ṛtūṃrut sṛjate vaśī| yajñasya vaya uttiran

हिन्दी अर्थ

परमेश्वर ! परमेश्वर पाप काशोषगकर देताहैः विनाश कर देगाहै, ६६ अथर्वेवेद-भाष्य का० ६। अनु०४। सू° ३९ अनुराग वाला होता है तो वह् “राजन्य कहाता है । प्रजाओं मे अनुराग. । के कारण वहु प्रजाओं की अनुकूलता में राज्य करता है । अतः राजन्य मे दीप्ति है-प्रजाओं म अनुराग ओर प्रजाओों शौ अनुकलक्ता मं शासन करना । दुन्दुभि = ढोल जव बजता है तव लोगो का ध्यान उसकी गोर. भयका कारण होता है। अतः भय प्रदत्व उसकी दीप्ति दहि। अश्वकी चाल मे शान यह् अश्व की चालमें दीप्ति है। वाजे==वज ब्रज गतौ ।

English

I trample on thine anger thus, I tread it down with heel and toe: So dost thou yield thee to my will, to speak no more rebelliously.

अध्याय 6

श्लोक 36.3

अ॒ग्निः परे॑षु॒ धाम॑सु॒ कामो॑ भू॒तस्य॒ भव्य॑स्य ।स॒म्राडेको॒ वि रा॑जति

agniḥ pareṣu dhāmasu kāmo bhūtasya bhavyasya | samrāḍeko vi rājati

हिन्दी अर्थ

हआ है । मन्त्र मे पुरुषकी "मायु" मकौ दीप्तिका कथन हुमा है। ॥ होता है यह् उसकी दीप्ति दहै। ॥ (१-३) । अथर्वा (वचंस्कामः) । त्विषिः; बृहस्पतिः। १ लगती; २ का० ६ । अनु° ४। सू० ३६ अथववैवेद-भाष्य ६७ दारा भजित है वह (दीर्घाय चक्षसे) दोघे दुष्ट क लिए (अनु) निरन्तर

English

The same For stranger and for friend alike this Darbha-grass removeth wrath. Soother of Anger is it called because it calms the angry man.

अध्याय 6

श्लोक 37.1

शापनाशनम्।१-३ अथर्वा (स्वस्त्ययनकामः)।चन्द्रमाः।अनुष्टुप्।उप॒ प्रागा॑त् सहस्रा॒क्षो यु॒क्त्वा श॒पथो॒ रथ॑म्।श॒प्तार॑मन्वि॒छन् मम॒ वृक॑ इ॒वावि॑मतो गृ॒हम्

śāpanāśanam| 1-3 atharvā (svastyayanakāmaḥ)| candramāḥ| anuṣṭup| upa prāgāt sahasrākṣo yuktvā śapatho ratham| śaptāramanvichan mama vṛka ivāvimato gṛham

हिन्दी अर्थ

दृष्टि सेकरे,जोकि दीर्घंकालतक लागूहो सकं, इस से उसका यश नमस्कार करते हण (विधेम) हम उसको परिचर्या करे । (सः) वह् तुह राजां का अधिपति । संयुक्त माण्डलिक राजा नाना ह, इसलिये “नः, । स्याम, विघेम"” मे बहुवचन है । माण्डलिक राजा ओर सम्राट् जब का्थै- वश एक दूसरे के अभिमुख होते. है, तब मण्डलिक राजा, सम्राट् को नम- १. यक्ञियाग्नि में आहुत हविः वु्रषूप होकर, बढ़ कर, जसे अन्तरिक्न में

English

This Plant that hath abundant roots spreads to the place where waters meet. Soother of anger is the name Darbha-grass that springs from earth.

अध्याय 6

श्लोक 37.2

परि॑ णो वृङ्ग्धि शपथ ह्र॒दम॒ग्निरि॑वा॒ दह॑न्।श॒प्तार॒मत्र॑ नो जहि दि॒वो वृ॒क्षमि॑वा॒शनिः॑

pari ṇo vṛṅgdhi śapatha hradamagnirivā dahan| śaptāramatra no jahi divo vṛkṣamivāśaniḥ

हिन्दी अर्थ

प्रसृत हो जाती है, फल जाती है, वैसे हमारायश भी राज्य ओौर साम्राज्य में ६८ अथर्वेवेद-भाष्य का० ६। भनु० ४ सु° ४० पेना प्ररक, सेनःध्यक्ष, यथा -- बृहती सेना कए पति है वृहस्पतिः 8 जोकि सेनाके दक्षिण पाव मं अधिकारियों का पूजक, उनका संग करने वाला ओर् ष्ताथं आत्म समपंण कर देता है देव सेनाएं ह विजिगीषु सेनां “दिवु करोडाविजि-

English

We draw thine obstinacy forth, set in thy mouth and in thy jaw: So dost thou yield thee to my will. to speak no more rebelli- ously. A charm to remove disease

अध्याय 6

श्लोक 37.3

यो नः॒ शपा॒दश॑पतः॒ शप॑तो॒ यश्च॑ नः॒ शपा॑त्।शुने॑ पेष्ट्र॑मि॒वाव॑क्षामं॒ तं प्रत्य॑स्यामि मृ॒त्यवे॑

yo naḥ śapādaśapataḥ śapato yaśca naḥ śapāt| śune peṣṭramivāvakṣāmaṃ taṃ pratyasyāmi mṛtyave

हिन्दी अर्थ

गीष आदि (दिवादिः ४।१) । मरूतः है शत्रु को मारने में सिदधदस्व (१-३) ! अथय (१, २ अभयकामः, ३ प्वस्त्ययनकामः) + १,२ २. यजञ॒देदपूजाघंमतिकरणदानेषु (भ्वादिः) । खाकाफुथिवो है द्युलोक तथा पूथिवी (इह) यह् (अभयम्, अरतु) करे, (नः) हमारे लिये (सविता) सूरये अथय करे । (उर) विरतृत (बन्त-

English

Firm stood the heaven, firm stood the earth, firm stood this universal world. Firm stood the trees that sleep erect: let this thy malady be still.

अध्याय 6

श्लोक 38.1

वर्चस्यम्।१-४ अथर्वा (वर्चस्कामः)।त्विषिः।(बृहस्पतिः)।त्रिष्टुप्।सिं॒हे व्या॒घ्र उ॒त या पृदा॑कौ॒ त्विषि॑र॒ग्नौ ब्रा॑ह्म॒णे सूर्ये॒ या।इन्द्रं॒ या दे॒वी सु॒भगा॑ ज॒जान॒ सा न॒ ऐतु॒ वर्च॑सा संविदा॒ना

varcasyam| 1-4 atharvā (varcaskāmaḥ)| tviṣiḥ| (bṛhaspatiḥ)| triṣṭup| siṃhe vyāghra uta yā pṛdākau tviṣiragnau brāhmaṇe sūrye yā| indraṃ yā devī subhagā jajāna sā na aitu varcasā saṃvidānā

हिन्दी अर्थ

पराम दाता, राजाके ऋधिकोटि ॐ सप्त सचिव इस परामशे को रिव अभय नः) हमारे लिये (कृणोतु) करे, (राज्ञाम्) राजाओं का से भिन्नोंके (अभि) ग्रति (यातु) जाय) हनद्रौनमित्ं नेः पञचाद्नमित्रं १२२करधि 1३1) ७० अथवेवेद-भाष्य का०६। अनु०.४। सू० ४१

English

Of all thy hundred remedies, a thousand remedies combined. This is the surest cure for flux, most excellent to heal disease. Thou art the stream that Rudra pours, the closest kin of Amrita.

अध्याय 6

श्लोक 38.2

या ह॒स्तिनि॑ द्वी॒पिनि॒ या हिर॑ण्ये॒ त्विषि॑र॒प्सु गोषु॒ या पुरु॑षेषु ।इन्द्रं॒ या दे॒वी सु॒भगा॑ ज॒जान॒ सा न॒ ऐतु॒ वर्च॑सा संविदा॒ना

yā hastini dvīpini yā hiraṇye tviṣirapsu goṣu yā puruṣeṣu | indraṃ yā devī subhagā jajāna sā na aitu varcasā saṃvidānā

हिन्दी अर्थ

रहित कर, (पुरः) पूरवैदिश्रा से (अनमित्रम् ) शवुरहित कर । मन॑से चेतसे धिय आक्गतय उत चित्तये । मत्ये श्रताय चक्षसे विधेम हविषां वय् ॥१। (मनसे) मनन के लिये, (चेतसे) सम्यक्-ल्ञान के लिये, (धिये) ध्यान के लिये, (आकृतये) संकल्प के लिये, (चित्तये) स्मरण शक्ति के लिये, दारा (विवेम) यज्ञ केरे या इन सव्र को परिचर्या करं । अपानाय व्यानायं प्राणायु भूरिंधायसे ।

English

Thy name is called Vishānakā: thou sprangest from the Fathers’ root, removing illness caused by wind.

अध्याय 6

श्लोक 38.3

रथे॑ अ॒क्षेष्वृ॑ष॒भस्य॒ वाजे॒ वाते॑ प॒र्जन्ये॒ वरु॑णस्य॒ शुष्मे॑ ।इन्द्रं॒ या दे॒वी सु॒भगा॑ ज॒जान॒ सा न॒ ऐतु॒ वर्च॑सा संविदा॒ना

rathe akṣeṣvṛṣabhasya vāje vāte parjanye varuṇasya śuṣme | indraṃ yā devī subhagā jajāna sā na aitu varcasā saṃvidānā

हिन्दी अर्थ

अपानाय आदि मे तादथ्यं चतुर्थी है । प्राण का विशेषण है भरि- जय इन्द्रियों तथा मानसिक शक्तियो का धारक तथा पोषक है । भपानदहै का० ६ । अनु०४। सु० ४१ अथर्ववेद-भाष्य ७१ उपवेद तथा भाष्यों अआदिकेस्पोंमें वेदवाणी फली हुई है । व्यचस् (ये) जो (देन्याः) देवों सम्बन्धी (ऋषयः) ऋषिरहैँषे (नः) हमारा (हासिषुः मा) परित्यागन करर (ये) जो ऋषि कि (तनूपा) शरीरके रक्षक हँ (ये) जो (नः) हमारे (तन्वः) शरीर से (तनूजाः) शरीर मेही मरणशीलों को (अभि सचध्वम्) प्राप्त होमो, (नः) हमारे (जीवसे) जीवित होने केलिये (प्रतरम्) रेष्ठ तथा दीघं (आयुः) ञायु (धत्त)

English

A prayer for preservation from mental sin and evil promptings Sin of the Mind, avaunt! begone! Why sayest thou what none should say? Go hence away, I love thee not. Go to the forests and the trees.

अध्याय 6

श्लोक 38.4

रा॒ज॒न्येऽदुन्दु॒भावाय॑ताया॒मश्व॑स्य॒ वाजे॒ पुरु॑षस्य मा॒यौ।इन्द्रं॒ या दे॒वी सु॒भगा॑ ज॒जान॒ सा न॒ ऐतु॒ वर्च॑सा संविदा॒ना

rājanye'dundubhāvāyatāyāmaśvasya vāje puruṣasya māyau| indraṃ yā devī subhagā jajāna sā na aitu varcasā saṃvidānā

हिन्दी अर्थ

तथा (यजु० ३४।५५) । ये ऋषि अमत्यं हँ, शरीर की मृत्यु हो जाने पर भीयेकारण शरीरम आत्मा के साथ पुनर्जन्ममें भी जतेर्ह। इन का इन बाह्य देवो के कारण सात्. ऋषियों की स्थिति शरीर मे होती है । (प्रपदेन) पर के अगले भाग द्वारा (अभि तिष्ठामि) मँ कुचल देतोहू, को (अद) उतार दि जादे वेर पत्ते धि हृदः) चेरे हृद्य से (मन्पूम्) छो को कद तनोरि)उत्र देती हृ, पृयङ् कर देती ह (था) ताकि (संभनसौ भूत्वा हम दोनो एक चित्त हौोङर स्कायौ, द) दो (यया) जिससे किं (अवशः) अपने आप को वशमें न रखता हृतु (न वादिषः) कुछ न कह सके, ओर (मम चित्तम्) मेरे चित्त के (उप

English

My heart is in our homes and cows. Whatever wrong we have committed, sleeping or waking, by ill-wish, dislike, or slander,

अध्याय 6

श्लोक 39.1

वर्चस्यम्।१-३ अथर्वा (वर्चस्कामः)।(बृहस्पतिः), २ इन्द्रः, ३ इन्द्रः, अग्निः, सोमः,।१ जगती, २ त्रिष्टुप्, ३ अनुष्टुप्।यशो॑ ह॒विर्व॑र्धता॒मिन्द्र॑जूतं स॒हस्र॑वीर्यं॒ सुभृ॑तं॒ सह॑स्कृतम्।प्र॒सर्स्रा॑ण॒मनु॑ दी॒र्घाय॒ चक्ष॑से ह॒विष्म॑न्तं मा वर्धय ज्ये॒ष्ठता॑तये

varcasyam| 1-3 atharvā (varcaskāmaḥ)| (bṛhaspatiḥ), 2 indraḥ, 3 indraḥ, agniḥ, somaḥ,| 1 jagatī, 2 triṣṭup, 3 anuṣṭup| yaśo havirvardhatāmindrajūtaṃ sahasravīryaṃ subhṛtaṃ sahaskṛtam| prasarsrāṇamanu dīrghāya cakṣase haviṣmantaṃ mā vardhaya jyeṣṭhatātaye

हिन्दी अर्थ

अभितिष्ठामि, जैसे किसो बस्तु परपैरों द्वारा स्थित होकर उसे कुचल दिय्रा जाता दहै, उसी तरह तेरे मन्यु कोर्मे कुचल देती हूं । वादिषः । लिये (च) ओर (अरणाय) विदेशी के लिए (विमन्धुकः) मन्यु का विगत करने वाला है । ( विमन्थुकस्य ) विगतमन्यु वाले के आपाततः हए (मन्योः) के साथ हमारा वोलचाल नहीं अर्थात् विदेशी । दभः -द विदारणे (कयादिः), घास-विश्चेष जो कि अनावृत पैर को, या ने पर गङ्खको कतिचिदेव पदानि गत्वा (शाकुन्तल नाटक) । यह् कुश-घास टै, जिसका उपर का भाग कटार होताहैः तेज होता है। इसीलिये कुणाग्रबुदधि शब्द का प्रयोग विषयशोध्रगाही के लिये होता दहै। कुश-घास कारस (सापो इव दो सिशरो के सदु (रचाव) टम दोनो मल् जोय, इपलिये (ते) दरे मन्पुम्) सन्धुको (अव ट्नामि)। उतार देती

English

All these offences, which deserve displeasure, may Agni take from us and keep them distant. Indra and Brāhmanaspati! whatever foolish deed we plan, May provident Angirasa preserve us from the sin and woe.

अध्याय 6

श्लोक 39.2

अच्छा॑ न॒ इन्द्रं॑ य॒शसं॒ यशो॑भिर्यश॒स्विनं॑ नमसा॒ना वि॑धेम ।स नो॑ रास्व रा॒ष्ट्रमिन्द्र॑जूतं॒ तस्य॑ ते रा॒तौ य॒शसः॑ स्याम

acchā na indraṃ yaśasaṃ yaśobhiryaśasvinaṃ namasānā vidhema | sa no rāsva rāṣṭramindrajūtaṃ tasya te rātau yaśasaḥ syāma

हिन्दी अर्थ

है, जे फ पत्र के चोचे किरी वस्तु क्ले फक दिया कातरा है (मः) बो पत्थर कि (गरः) भारीहै) उफास्पामसि मैं वहुवचन है ! पत्नी के साथ मिल कर अन्य 9 ० ६। जनु०५। मु० ४२ अयववेद-भाष्य ७३ ७४ अयववेद-भाष्य कां० ६। अनु० ५। ० ५४ (अयम्) यह (यः) जो (वभः) दर्भं (भूरिमूलः) नाना जडोंवाला । स्थित होता है, भौर (पृथिव्याः)पृथिवी से (उत्थितः) उपर की ओर स्थित टोता है, उठता है, वहु (मन्युशमन उच्यते) «मन्युशमन कहा जाता है ।

English

A charm against evil dreams Thou, neither quick nor dead, O Sleep, art fraught with Amrit of the Gods.

अध्याय 6

श्लोक 39.3

य॒शा इन्द्रो॑ य॒शा अ॒ग्निर्य॒शाः सोमो॑ अजायत ।य॒शा विश्व॑स्य भू॒तस्या॒हम॑स्मि य॒शस्त॑मः

yaśā indro yaśā agniryaśāḥ somo ajāyata | yaśā viśvasya bhūtasyāhamasmi yaśastamaḥ

हिन्दी अर्थ

करोधमयी वाणी को (विनयामसि) हुम विनययुक्त अर्थात् विनीत करते है बोलते समय आवाज मुखे बोली जाती है भौर निचली हनु साथ साथ हिलती दहै । अतः वोलने का सम्बन्ध दानां के साथ है, मख के साथ तथा हनु के साथ । शरणिम् = हिसायाम् (कथादिः) । के वशमें हुमा तु (न वादिषः) चित्तम्) मेरे चित्त के (उप)

English

Thy name is Araru: thy sire is Yama; Varunāni bare thee. We know thy birth, O Sleep, thou art son of the sisters of the Gods; the minister of Yama thou, thou art Antaka, thou art

अध्याय 6

श्लोक 40.1

अभयम्।१-३ अथर्वा।१ द्यावापृथिवी, सोमः, सविता, अन्तरिक्षं, सप्तऋषयः, २ सविता इन्द्रः, ३ इन्द्रः।१-२ जगती, ३ अनुष्टुप्।अभ॑यं द्यावापृथिवी इ॒हास्तु॒ नोऽभ॑यं॒ सोमः॑ सवि॒ता नः॑ कृणोतु ।अभ॑यं नोऽस्तू॒र्व॑१न्तरि॑क्षं सप्तऋषी॒णां च॑ ह॒विषाभ॑यं नो अस्तु

abhayam| 1-3 atharvā| 1 dyāvāpṛthivī, somaḥ, savitā, antarikṣaṃ, saptaṛṣayaḥ, 2 savitā indraḥ, 3 indraḥ| 1-2 jagatī, 3 anuṣṭup| abhayaṃ dyāvāpṛthivī ihāstu no'bhayaṃ somaḥ savitā naḥ kṛṇotu | abhayaṃ no'stūrva1ntarikṣaṃ saptaṛṣīṇāṃ ca haviṣābhayaṃ no astu

हिन्दी अर्थ

कां० ६ । अनु० ५ । सू० ४८४ अथरवंवरेद-भाष्य ७१५ सायण ने रुधिर-स्राव रोग कहा है । मनर मे “अस्थात् द्वारा “मति- रुधिर भी हृदयसे नाद्यो में लवण करते केलिये है, यह ही उसको नियत स्थिति है, इस स्थिति में हौ उसकी स्थिति चाहिए, खाव के लिये । च) ओर (सहस्रम्) हजार ओषधं (संगतानि) एकत्रित कौ है" उनमें से (आसखावभेषजम्) आस्राव कौ भौषधर जो (ते) तेरे ( रोगनाशनम्) भाग रूप म बसा हुमा है, शेष भाग में अन्य तत्तव ह । अथवा वसिष्ठः

English

Death. So well we know thee who thou art. Sleep, guard us from the evil dream.

अध्याय 6

श्लोक 40.2

अ॒स्मै ग्रामा॑य प्र॒दिश॒श्चत॑स्र॒ ऊर्जं॑ सुभू॒तं स्व॒स्ति स॑वि॒ता नः॑ कृणोतु ।अ॒श॒त्र्विन्द्रो॒ अभ॑यं नः कृणोत्व॒न्यत्र॒ राज्ञा॑म॒भि या॑तु म॒न्युः

asmai grāmāya pradiśaścatasra ūrjaṃ subhūtaṃ svasti savitā naḥ kṛṇotu | aśatrvindro abhayaṃ naḥ kṛṇotvanyatra rājñāmabhi yātu manyuḥ

हिन्दी अर्थ

वासयितृतमः (सायण) शरीर मे जीवात्मा को वसाने कां यह् सर्वाति- प्राय साधनदहै। शरीरम उदकमात्राके कम हो जाने पर मृ्युको सम्भावना हो जातो है । उदकमात्रा के कम हो जने को षहप्त- (नाभिः) बन्धक है, स्थापकरहै। (व्रिषाणका") रोग को शरीर से विभक्त करने वाली गोषधि (नाम वै) नाम वाली निश्चय से (असि) तु है,(पित्- (वातीकृतनाशनी) प्रकूगित वातसे किये गये रोगका नाश करने वाली णह् बन्धने (दिवादिः) । विषाणका = विशेषेण रोगनिवतेनस्य संभक्वी

English

As men discharge a debt, as they pay up an eighth and half-an- eighth, So the whole evil dream do we pay and assign unto our foe.

अध्याय 6

श्लोक 40.3

अ॒न॒मि॒त्रं नो॑ अध॒राद॑नमि॒त्रं न॑ उत्त॒रात्।इन्द्रा॑नमि॒त्रं नः॑ प॒श्चाद॑नमि॒त्रं पु॒रस्कृ॑धि

anamitraṃ no adharādanamitraṃ na uttarāt| indrānamitraṃ naḥ paścādanamitraṃ puraskṛdhi

हिन्दी अर्थ

(सायण) । जल ओषधि है, ओषधि पद स्त्रोलिद्खीरहै। अतः मन््रमें स््रीलिद्धी प्रयोगहृए है जो कि जलकाही कथनकरते हँ । वैदिक साहित्य में “पितरः” का प्रयोग ऋतुजों के लिये भी हुभा दहै । है, उस मे भौमतत्तव मिले नहीं होते । इसलिये वहु जल चिकित्सा के लिये पृथिवी की एक विश्षिष्ट गति के कारण जिसे कि “?166688101 ° 6वणा- 1025" कहते ह । समय-समय पर भिघ्न-भिस्न ऋतुजों से संवत्सर-काल २. जिस ऋतु से संवत्सर या वषंकाप्रारम्म हमा, वह् रतु मूलरूप है ।

English

To accompany the three daily libations Dear to all men, all-prosperer, all-creating, may Agni, guard us• at the morn’s libation.

स्रोत: bhavykhatri/DharmicData · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।