माण्डूक्योपनिषद्

Mandukya Upanishadश्लोक 10/1283%

Mandukya Upanishad 1.10

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षादुभयत्वाद्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

स्वप्न अवस्था का तैजस "उ" है — द्वितीय मात्रा। यह "उत्कर्ष" (उन्नति) और "उभयत्व" (दो के बीच होने) से जुड़ी है। जो इसे ऐसा जानता है, वह ज्ञान-सन्तति को बढ़ाता है, समान-बुद्धि होता है, और उसके कुल में कोई अब्रह्मवित् नहीं होता।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Taijasa, the dream state, is the letter U, the second mātrā — because of exaltation (utkarṣa) and being between (ubhayatva, of both A and M). He who knows this exalts the continuity of knowledge and is equal-minded; none in his lineage will be ignorant of Brahman.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

"उ" जीभ को "अ" से "म्" की ओर ऊपर उठाकर बोला जाता है — यह बीच में है और ऊपर उठाता है। स्वप्न जागृत (स्थूल) और सुषुप्ति (कारण) के बीच है। फल: ज्ञान की परिष्कृत और ऊर्ध्वगामी धारा, समभाव, और साधकों की वंश-परम्परा।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आज का सामाजिक और राजनीतिक विमर्श अत्यंत जहरीले 'ध्रुवीकरण' (polarization) और 'बाइनरी सोच' (us vs them) से ग्रस्त है। सोशल मीडिया एल्गोरिदम लोगों को दो चरम पालों में बांट रहे हैं — या तो आप पूरी तरह हमारे साथ हैं, या हमारे शत्रु हैं। लोग जटिल मुद्दों के सूक्ष्म पहलुओं, विरोधी दृष्टिकोणों और मध्यवर्ती सत्यों को समझने की बौद्धिक क्षमता खोते जा रहे हैं। जब समाज में दोनों सिरों को जोड़ने वाले विवेकशील सेतु का अभाव हो जाता है, तो परिवार, संगठन और राष्ट्र अंतहीन घृणा और टकराव की आग में जलने लगते हैं। माण्डूक्योपनिषद् ॐकार की दूसरी मात्रा 'उ' (उकार) को स्वप्नावस्था (तैजस) से जोड़ता है और इसके दो महान लक्षण बताता है: 'उत्कर्ष' (ऊपर उठाना) और 'उभयत्व' (दोनों के बीच का सेतु होना)। 'उ' ध्वनि 'अ' (जाग्रत) और 'म्' (सुषुप्ति) के मध्य स्थित है और दोनों को जोड़ते हुए चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाती है। उपनिषद् कहता है: "समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति" — जो उकार के इस मर्म को जानता है, वह समदर्शी बन जाता है और ज्ञान की अविच्छिन्न परंपरा स्थापित करता है। यह मन्त्र हमें सिखाता है कि महान चेतना वही है जो परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों के बीच सेतु बनाती है और विमर्श को तुच्छ स्तर से उठाकर उच्चतर धरातल पर ले जाती है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **उभयत्व — संवाद का सेतु बनना (Bridge-Building in Conflict)**: कार्यस्थल या परिवार में जब दो पक्ष आपस में टकरा रहे हों, तो किसी एक का अंधा पक्ष लेने के बजाय 'उकार' की भाँति मध्यस्थ बनकर दोनों को ऊपर उठाने वाला सर्वहितकारी समाधान निकालें। - **ज्ञान का उत्कर्ष (Elevating Thought Quality)**: सोशल मीडिया की उथली बहसों, गपशप और नफरत भरे कंटेंट से अपने मन को ऊपर उठाइए; अपनी सोच को गहरे स्वाध्याय, गंभीर दर्शन और जीवन-मूल्यों से समृद्ध कीजिए। - **संस्कारों का पीढ़ीगत उन्नयन (Nurturing Generational Wisdom)**: अपने आचरण, धैर्य और विवेक से अपने घर में ऐसा वातावरण तैयार कीजिए जिससे आने वाली पीढ़ी में भी आत्म-ज्ञान और उच्च संस्कारों की परंपरा विकसित हो सके।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप भी समाज के उथले ध्रुवीकरण और पक्षपात में बहकर संकीर्ण खेमों में बंट रहे हैं, अथवा आपके पास दोनों पक्षों को समझने और सत्य को ऊपर उठाने वाली 'उकार' की समदर्शी दृष्टि है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

स्वप्न को अब मस्तिष्क की 'बीच की अवस्था' के रूप में समझा जाता है — जो जागृत अनुभव को दीर्घकालीन स्मृति में समेकित करती है और असंबंधित विचारों के बीच सेतु बनाती है। REM निद्रा सृजनात्मक समस्या-समाधान और अमूर्त प्रतिरूप-पहचान को मापनीय रूप से बढ़ाती है। उपनिषद् का "उत्कर्ष" और "उभयत्व" का रूपक अनुभवजन्य रूप से सटीक है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Atharvaveda Shaunaka Shakha with Gaudapada Karika. Advaita Ashrama / SanskritDocuments
Translation
Swami Nikhilananda, Swami Chinmayananda
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Text is distinct from the 215 verses of Gaudapada’s Karika, which are cataloged as classical commentary.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next