Markandeya Purana
8
अध्याय 8 / 90

Adhyaya 8

270 श्लोकभाग 4/4 · श्लोक 232–270

पूर्ण अध्याय पाठ39 श्लोक

अध्याय 8

श्लोक 232

आगत्य सर्वे प्रोचुस्ते भो भो राजन् ! शृणु प्रभो ।अयं पितामहः साक्षाद्धर्मश्च भगवान् स्वयम्

āgatya sarve procuste bho bho rājan ! śṛṇu prabho / ayaṃ pitāmahaḥ sākṣāddharmaśca bhagavān svayam

हिन्दी अर्थ

बराबर समय रातभरमें ही बीत गया। इससे देवताओंको बड़ा भय हुआ। वे सोचने लगे--स्वाध्याय, वषट्कार, स्वधा (श्राद्ध) तथा स्वाहा (यज्ञ)-से रहित होकर यह सारा जगत् नष्ट हुए बिना कैसे रह सकता है। दिन-रातकी व्यवस्था हुए बिना मास और ऋतुका भी लोप हो जायगा। उनके लोप होनेसे दक्षिणायन

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 233

साध्याश्च विश्वे मरुतो लोकपालाः सवाहनाः ।नागाः सिद्धाः सगन्धर्वा रुद्राश्चैव तथाश्विनौ

sādhyāśca viśve maruto lokapālāḥ savāhanāḥ / nāgāḥ siddhāḥ sagandharvā rudrāścaiva tathāśvinau

हिन्दी अर्थ

और उत्तरायणका भी ज्ञान नहीं होगा। अयनका ज्ञान हुए बिना वर्ष कैसे हो सकता है, और वर्षके बिना कालका ज्ञान होना असम्भव है। पतिव्रताके वचनसे सूर्यका उदय ही नहीं होता; उसके बिना स्नान, दान आदि क्रियाएँ बंद हो गयीं। अग्नि-होत्र और यज्ञका अभाव भी दृष्टिगोचर होने लगा है। होमके बिना

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 234

एते चान्ये च बहवो विश्वामित्रस्तथैव च ।विश्वत्रयेण यो मित्रं कर्तुं न शकितः पुरा

ete cānye ca bahavo viśvāmitrastathaiva ca / viśvatrayeṇa yo mitraṃ kartuṃ na śakitaḥ purā

हिन्दी अर्थ

हमलोगोंकी तृप्ति नहीं होती। जब मनुष्य यज्ञका यथोचित भाग देकर हमें तृप्त करते हैं, तब हम खेतीकी उपजके लिये वर्षा करके मनुष्योंपर अनुग्रह करते हैं। नया अन्न पैदा होनेपर मनुष्य फिर हमारे लिये यज्ञ करते हैं और हमलोग यज्ञादिद्वारा पूजित होनेपर उन्हें मनोवाज्छित भोग प्रदान करते हैं। हम नीचेकी

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 235

विश्वामित्रस्तु ते मैत्रीमिष्टञ्चाहर्तुमिच्छति ।आरुरोह ततः प्राप्तो धर्मः शक्रो ऽथ गाधिजः

viśvāmitrastu te maitrīmiṣṭañcāhartumicchati / āruroha tataḥ prāpto dharmaḥ śakro 'tha gādhijaḥ

हिन्दी अर्थ

ओर वर्षा करते हैं और मनुष्य ऊपरकी ओर। हम जलकी वर्षासे मनुष्योंको और मनुष्य हविष्यकी वर्षसे हमलोगोंको तृप्त करते हैं। जो दुरात्मा लोभवश हमारा यज्ञभाग स्वयं खा लेते हैं, उन अपकारी पापियोंके नाशके लिये हम जल, सूर्य, अग्नि, वायु तथा पृथ्वीको भी दूषित कर देते हैं। उन दूषित वस्तुओंका

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 236

धर्मि उवाच मा राजन् ! साहसं कार्षोर्धर्मो ऽहं त्वामुपागतः ।तितिक्षा-दम-सत्याद्यैः स्वगुणैः परितोषितः

dharmi uvāca mā rājan ! sāhasaṃ kārṣordharmo 'haṃ tvāmupāgataḥ / titikṣā-dama-satyādyaiḥ svaguṇaiḥ paritoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

उपभोग करनेसे उन कुकर्मियोंकी मृत्युके लिये भयडूकर महामारी आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। जो हमें तृप्त करके शेष अन्न अपने उपभोगमें लाते हैं, उन महात्माओंको हम पुण्यलोक प्रदान करते हैं। किन्तु इस समय प्रभातकाल हुए बिना इन मनुष्योंके लिये वह सब पुण्यकर्म असम्भव हो रहा है। अब दिनकी

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 237

इन्द्र उवाच हरिश्चन्द्र माहभाग ! प्राप्तः शक्रो ऽस्मिते ऽन्तिकम् ।त्वया सभार्यपुत्रेण जिता लोकाः सनातनाः

indra uvāca hariścandra māhabhāga ! prāptaḥ śakro 'smite 'ntikam / tvayā sabhāryaputreṇa jitā lokāḥ sanātanāḥ

हिन्दी अर्थ

सृष्टि कैसे हो?” इस प्रकार सब देवता आपसमें बात करने लगे। यज्ञोंके विनाशकी आशडूकासे वहाँ एकत्रित हुए देवताओंके वचन सुनकर प्रजापति ब्रह्माजीने कहा--'पतिव्रताके माहात्म्यसे इस समय सूर्यका उदय नहीं हो रहा है और सूर्योदय न होनेसे मनुष्यों तथा तुम देवताओंकी भी हानि है; अतः तुमलोग

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 238

आरोह त्रिदिवं राजन् ! भार्यापुत्रसमन्वितः ।सुदुष्प्राप्तं नरैरन्यैर्जितमात्मीयकर्मभिः

āroha tridivaṃ rājan ! bhāryāputrasamanvitaḥ / suduṣprāptaṃ narairanyairjitamātmīyakarmabhiḥ

हिन्दी अर्थ

महर्षि अत्रिकी पतिव्रता पत्नी तपस्विनी अनसूयाके पास जाओ और सूर्योदयकी कामनासे उन्हें प्रसन्न करो।'+

English

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अध्याय 8

श्लोक 239

पक्षिण ऊचुः ततो ऽमृतमयं वर्षमपमृत्युविनाशनम् ।इन्द्रः प्रासृजदाकाशाच्चितास्थानगतः प्रभुः

pakṣiṇa ūcuḥ tato 'mṛtamayaṃ varṣamapamṛtyuvināśanam / indraḥ prāsṛjadākāśāccitāsthānagataḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

तब देवताओंने जाकर अनसूयाजीको प्रसन्न किया। वे बोलीं--“तुम क्या चाहते हो, बतलाओ।' देवताओंने याचना की कि 'पूर्ववत् दिन होने लगे।'

English

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अध्याय 8

श्लोक 240

पुष्पवर्षञ्च सुमहद्देवदुन्दुभिनिस्वनम् ।ततस्ततो वर्तमाने समाजे देवसंकुले

puṣpavarṣañca sumahaddevadundubhinisvanam / tatastato vartamāne samāje devasaṃkule

हिन्दी अर्थ

अनसूयाने कहा--देवताओ! पतिव्रताका महत्त्व किसी प्रकार कम नहीं हो सकता; इसलिये मैं उस साध्वीको मनाकर दिनकी सृष्टि करूँगी। मुझे ऐसा उपाय करना है, जिससे फिर पहलेकी ही भाँति दिन-रातकी व्यवस्था चलती रहे और उस पतिव्रताके पतिका भी नाश न हो।+

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 241

समुत्तस्थौ ततः पुत्रो राज्ञस्तस्य महात्मनः ।सुकुमारतनुः सुस्थः प्रसन्नेन्द्रियमानसः

samuttasthau tataḥ putro rājñastasya mahātmanaḥ / sukumāratanuḥ susthaḥ prasannendriyamānasaḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्रने कहा--देवताओंसे यों कहकर अनसूया देवी उस ब्राह्मणीके घर गयीं और उसके कुशल पूछनेपर उन्होंने अपनी, अपने स्वामीकी तथा अपने धर्मकी

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 242

ततो राजा हरिश्चन्द्रः परिष्वज्य सुतं क्षणात् ।सभार्यः स श्रिया युक्तो दिव्यमाल्याम्बरान्वितः

tato rājā hariścandraḥ pariṣvajya sutaṃ kṣaṇāt / sabhāryaḥ sa śriyā yukto divyamālyāmbarānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

अनसूया बोलीं--कल्याणी! तुम अपने स्वामीके मुखका दर्शन करके प्रसन्न तो रहती हो न? पतिको सम्पूर्ण देवताओंसे बड़ा मानती हो न? पतिकी सेवासे ही मुझे महान् फलकी प्राप्ति हुई है तथा सम्पूर्ण कामनाओं एवं फलोंकी प्राप्तिके साथ ही मेरे सारे विघ्न भी दूर हो गये। साध्वी! मनुष्यको पाँच ऋण

English

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अध्याय 8

श्लोक 243

सुस्थः सम्पूर्णहृदयो मुदा परमया युतः ।बभूव तत्क्षणादिन्द्रो भूयश्चैनमभाषत

susthaḥ sampūrṇahṛdayo mudā paramayā yutaḥ / babhūva tatkṣaṇādindro bhūyaścainamabhāṣata

हिन्दी अर्थ

सदा ही चुकाने चाहिए। अपने वर्णधर्मके अनुसार धनका संग्रह करना

English

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अध्याय 8

श्लोक 244

सभार्यस्त्वं सपुत्रश्च प्राप्स्यसे सद्गतिं पराम् ।समारोह माहभाग निजानां कर्मणां फलैः

sabhāryastvaṃ saputraśca prāpsyase sadgatiṃ parām / samāroha māhabhāga nijānāṃ karmaṇāṃ phalaiḥ

हिन्दी अर्थ

आवश्यक है। उसके प्राप्त होनेपर शास्त्रविधिके अनुसार उसका सत्पात्रको दान करना चाहिए। सत्य, सरलता, तपस्या, दान और दयासे सदा युक्त रहना चाहिए। राग-द्वेषका परित्याग करके शास्त्रोक्त कर्मोका अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करना चाहिए। ऐसा करनेसे मनुष्य अपने वर्णके

English

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अध्याय 8

श्लोक 245

हरिश्चन्द्र उवाच देवराजाननुज्ञातः स्वामिना श्वपचेन वै ।अगत्वा निष्कृतिं तस्य नारोक्ष्ये ऽहं सुरालयम्

hariścandra uvāca devarājānanujñātaḥ svāminā śvapacena vai / agatvā niṣkṛtiṃ tasya nārokṣye 'haṃ surālayam

हिन्दी अर्थ

लिये विहित उत्तम लोकोंको प्राप्त होता है। पतिव्रते! इस प्रकार महान् क्लेश उठानेपर पुरुषोंको प्राजापत्य आदि लोकोंकी प्राप्ति होती है; परन्तु स्त्रियाँ केवल पतिकी सेवा करनेमात्रसे पुरुषोंके दुःख सहकर उपार्जित किये हुए पुण्यका आधा भाग प्राप्त कर लेती हैं। स्त्रियोंक लिये अलग यज्ञ, श्राद्ध या

English

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अध्याय 8

श्लोक 246

धर्म उवाच तवैनं भाविनं क्लेशमवगम्यात्ममायया ।आत्मा श्वपाकतां नीतो दर्शितं तच्च चापलम्

dharma uvāca tavainaṃ bhāvinaṃ kleśamavagamyātmamāyayā / ātmā śvapākatāṃ nīto darśitaṃ tacca cāpalam

हिन्दी अर्थ

उपवासका विधान नहीं है। वे पतिकी सेवामात्रसे ही उन अभीष्ट लोकोंको प्राप्त कर लेती हैं। अतः महाभागे! तुम्हें सदा पतिकी सेवामें अपना मन लगाना चाहिए; क्योंकि स्त्रीके लिये पति ही परम गति है। पति जो देवताओं, पितरों तथा अतिथियोंकी सत्कारपूर्वक पूजा करता है, उसके भी पुण्यका आधा भाग

English

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अध्याय 8

श्लोक 247

इन्द्र उवाच प्रार्थ्यते यत् परं स्थानं समस्तैर्मनुजैर्भुवि ।तदारोह हरिश्चन्द्र स्थानं पुण्यकृतां नृणाम्

indra uvāca prārthyate yat paraṃ sthānaṃ samastairmanujairbhuvi / tadāroha hariścandra sthānaṃ puṇyakṛtāṃ nṛṇām

हिन्दी अर्थ

स्त्री अनन्यचित्तसे पतिकी सेवा करनेमात्रसे प्राप्त कर लेती है।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 248

हरिश्चन्द्र उवाच देवाराज ! नमस्तुभ्यं वाक्यञ्चैतन्निबोध मे ।प्रसादसुमुखं यत् त्वां ब्रवीमि प्रश्रयान्वितः

hariścandra uvāca devārāja ! namastubhyaṃ vākyañcaitannibodha me / prasādasumukhaṃ yat tvāṃ bravīmi praśrayānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

अनसूयाजीका वचन सुनकर पतित्रता ब्राह्मणीने बड़े आदरके साथ उनका पूजन किया और इस प्रकार कहा--'स्वभावतः सबका कल्याण करनेवाली देवी! स्वयं आप यहाँ पधारकर पतिकी सेवामें मेरी पुनः श्रद्धा बढ़ा रही हैं। इससे मैं धन्य हो गयी। यह आपका मुझपर बहुत बड़ा अनुग्रह है। इसीसे

English

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अध्याय 8

श्लोक 249

मच्छोकमग्नमनसः कोशलानगरे जनाः ।तिष्ठन्ति तानपोह्याद्य कथं यास्याम्यहं दिवम्

macchokamagnamanasaḥ kośalānagare janāḥ / tiṣṭhanti tānapohyādya kathaṃ yāsyāmyahaṃ divam

हिन्दी अर्थ

पतिके समान दूसरी कोई गति नहीं है। पतिमें किया हुआ प्रेम इहलोक और परलोकमें भी उपकार करनेवाला होता है। यशस्विनि! पतिके प्रसादसे ही नारी इस लोक और परलोकमें भी सुख पाती है; क्योंकि पति ही नारीका देवता है। महाभागे! आज आप मेरे घरपर पधारी हैं। मुझसे अथवा मेरे इन पतिदेवसे

English

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अध्याय 8

श्लोक 250

ब्रह्महत्या गुरोर्घातो गोवधः स्त्रीवधस्तथा ।तुल्यमेभिर्महापापं भक्तत्यागे ऽप्युदाहृतम्

brahmahatyā gurorghāto govadhaḥ strīvadhastathā / tulyamebhirmahāpāpaṃ bhaktatyāge 'pyudāhṛtam

हिन्दी अर्थ

आपको जो भी कार्य हो, उसे बतानेकी कृपा करें।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 251

भजन्तं भक्तमत्याज्यमदुष्टं त्यजतः सुखम् ।नेह नामुत्र पश्यामि तस्माच्छक्र ! दिवं व्रज

bhajantaṃ bhaktamatyājyamaduṣṭaṃ tyajataḥ sukham / neha nāmutra paśyāmi tasmācchakra ! divaṃ vraja

हिन्दी अर्थ

एते देवा: सहेन्द्रेण मामुपागम्य दुःखिता: । त्वद्वाक्यापास्तसत्कर्मदिननक्तनिरूपणा: ।।

English

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अध्याय 8

श्लोक 252

यदि ते सहिताः स्वर्गं मया यान्ति सुरेश्वर ।ततो ऽहमपि यास्यामि नरकं वापि तैः सह

yadi te sahitāḥ svargaṃ mayā yānti sureśvara / tato 'hamapi yāsyāmi narakaṃ vāpi taiḥ saha

हिन्दी अर्थ

दिनाभावात् समस्तानामभावो यागकर्मणाम्

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 253

इन्द्र उवाच बहूनि पुण्यपापानि तेषां भिन्नानि वै पृथक् ।कथं सङ्घातभोग्यं त्वं भूयः स्वर्गमवाप्स्यसि

indra uvāca bahūni puṇyapāpāni teṣāṃ bhinnāni vai pṛthak / kathaṃ saṅghātabhogyaṃ tvaṃ bhūyaḥ svargamavāpsyasi

हिन्दी अर्थ

अद्नश्चैव समुच्छेदादुच्छेद: सर्वकर्मणाम् ।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 254

हरिश्चन्द्र उवाच शक्र भुङ्क्ते नृपो राज्यं प्रभावेण कुटुम्बिनाम् ।यजते च महायज्ञैः कर्म पौर्तं करोति च

hariścandra uvāca śakra bhuṅkte nṛpo rājyaṃ prabhāveṇa kuṭumbinām / yajate ca mahāyajñaiḥ karma paurtaṃ karoti ca

हिन्दी अर्थ

प्रसीद साध्वि लोकानां पूर्ववद्धर्तततां रवि: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 255

तच्च तेषां प्रभावेण मया सर्वमनुष्ठितम् ।उपकर्तॄन् न सन्त्यक्ष्ये तानहं स्वर्गलिप्सया

tacca teṣāṃ prabhāveṇa mayā sarvamanuṣṭhitam / upakartṝn na santyakṣye tānahaṃ svargalipsayā

हिन्दी अर्थ

अनसूया बोलीं--देवि! तुम्हारे वचनसे दिन-रातकी व्यवस्थाका लोप हो जानेके कारण शुभ कर्मोका अनुष्ठान बंद हो गया है; इसलिये ये इन्द्र आदि

English

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अध्याय 8

श्लोक 256

तस्माद्यन्मम देवेश किञ्चिदस्ति सुचेष्टितम् ।दत्तमिष्टमथो जप्तं सामान्यं तैस्तदस्तु नः

tasmādyanmama deveśa kiñcidasti suceṣṭitam / dattamiṣṭamatho japtaṃ sāmānyaṃ taistadastu naḥ

हिन्दी अर्थ

व्यवस्था पहलेकी तरह अखण्डरूपसे चलती रहे। मैं इसीके लिये तुम्हारे पास आयी हूँ। मेरी यह बात सुनो। दिन न होनेसे समस्त यज्ञकर्मोंका अभाव हो गया है और यज्ञोंके अभावसे देवताओंकी पुष्टि नहीं हो पाती है; अतः तपस्विनि! दिनके नाशसे समस्त शुभ कर्मोका नाश हो जायगा और उनके नाशसे वृष्टिमें

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 257

बहुकालोपभोग्यं हि फलं यन्मम कर्मणः ।तदस्तु दिनमप्येकं तैः समं त्वत्प्रसादतः

bahukālopabhogyaṃ hi phalaṃ yanmama karmaṇaḥ / tadastu dinamapyekaṃ taiḥ samaṃ tvatprasādataḥ

हिन्दी अर्थ

बाधा पड़नेके कारण इस संसारका ही उच्छेद हो जायगा। अतः यदि तुम इस जगत्को आपपत्तिसे बचाना चाहती हो तो सम्पूर्ण लोकोंपर दया करो, जिससे पहलेकी भाँति सूर्योदय हो।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 258

पक्षिण ऊचुः एवं भविष्यतीत्युक्त्वा शक्रस्त्रिभुवनेश्वरः ।प्रसन्नचेता धर्मश्च विश्वामित्रश्च गाधिजः

pakṣiṇa ūcuḥ evaṃ bhaviṣyatītyuktvā śakrastribhuvaneśvaraḥ / prasannacetā dharmaśca viśvāmitraśca gādhijaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणीने कहा--महाभागे! माण्डव्य ऋषिने अत्यन्त क्रोधमें भरकर मेरे स्वामी--मेरे ईश्वरको शाप दिया है कि सूर्योदय होते ही तेरी मृत्यु हो जायगी।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 259

विमानकोटिसम्बद्धं स्वर्गलोकान्महीतलम् ।गत्वायोध्याजनं प्राह दिवमारुह्यतामिति

vimānakoṭisambaddhaṃ svargalokānmahītalam / gatvāyodhyājanaṃ prāha divamāruhyatāmiti

हिन्दी अर्थ

करोमि पूर्ववद्देहं भर्तारें च नवं तव ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 260

तदिन्द्रस्य वचः श्रुत्वा प्रीत्या तस्य च भूपतेः ।आनीय रोहिताश्चञ्च विश्वामित्रो महातपाः

tadindrasya vacaḥ śrutvā prītyā tasya ca bhūpateḥ / ānīya rohitāścañca viśvāmitro mahātapāḥ

हिन्दी अर्थ

तुम्हारे पतिको पूर्ववत् शरीर एवं नयी स्वस्थ अवस्थाका कर दूँगी। सुन्दरी! मुझे पतिव्रता स्त्रियोंके माहात्म्यका सर्वथा आदर करना है, इसीलिये तुम्हें मनाती हूँ।

English

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अध्याय 8

श्लोक 261

अयोध्याख्ये पुरे रम्ये सो ऽभ्यसिञ्चन्नृपात्मजम् ।देवैश्च मुनिभिः सिद्धैरभिषिच्य नराधिपम्

ayodhyākhye pure ramye so 'bhyasiñcannṛpātmajam / devaiśca munibhiḥ siddhairabhiṣicya narādhipam

हिन्दी अर्थ

ततो विवस्वान् भगवान् फुल्लपदड्मारुणाकृति: ।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 262

राज्ञा सह तदा सर्वे हृष्टपुष्टसुहृज्जनाः ।सपुत्रभृत्यदारास्ते दिवमारुरुहुर्जनाः

rājñā saha tadā sarve hṛṣṭapuṣṭasuhṛjjanāḥ / saputrabhṛtyadārāste divamāruruhurjanāḥ

हिन्दी अर्थ

शैलराजानमुदयमारुरोहोरुमण्डल: ।।

English

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अध्याय 8

श्लोक 263

पदे पदे विमानात् ते विमानमगमन् नराः ।तदा सम्भूतहर्षो ऽसौ हरिश्चन्द्रश्च पार्थिवः

pade pade vimānāt te vimānamagaman narāḥ / tadā sambhūtaharṣo 'sau hariścandraśca pārthivaḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्र (सुमति) कहता है-ब्राह्मणीके “तथास्तु” कहकर स्वीकार करनेपर तपस्विनी अनसूयाने अर्घ्य हाथमें लेकर सूर्यदेवका आवाहन किया। उस समयतक दस दिनोंके बराबर रात बीत चुकी थी। तदनन्तर भगवान् सूर्य खिले हुए कमलके समान अरुण आकृति धारण किये अपने महान् मण्डलके साथ

English

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अध्याय 8

श्लोक 264

सम्प्राप्य भूतिमतुलां विमानैः स महीपतिः ।आसाञ्चक्रे पुराकारे वप्रप्राकारसंवृते

samprāpya bhūtimatulāṃ vimānaiḥ sa mahīpatiḥ / āsāñcakre purākāre vapraprākārasaṃvṛte

हिन्दी अर्थ

गिरिराज उदयाचलपर आखरूढ़ हुए। सूर्यदेवके प्रकट होते ही ब्राह्मणीका पति प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिरा; किन्तु उसकी पत्नीने गिरते समय उसे पकड़

English

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अध्याय 8

श्लोक 265

ततस्तस्यर्धिमालोक्य श्लोकं तत्रोशना जगौ ।दैत्याचार्यो महाभागः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित्

tatastasyardhimālokya ślokaṃ tatrośanā jagau / daityācāryo mahābhāgaḥ sarvaśāstrārthatattvavit

हिन्दी अर्थ

न विषादस्त्वया भद्रे कर्तव्य: पश्य मे बलम्

English

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अध्याय 8

श्लोक 266

शुक्र उवाच हरिश्चन्द्रसमो राजा न भूतो न भविष्यति ।यः शृणोति स्वदुः खार्तः स सुखं महदाप्नुयात्

śukra uvāca hariścandrasamo rājā na bhūto na bhaviṣyati / yaḥ śṛṇoti svaduḥ khārtaḥ sa sukhaṃ mahadāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

यथा भर्तसमं नान्यमहं पश्यामि हैवतम् ।

English

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अध्याय 8

श्लोक 267

स्वर्गार्थोप्राप्नुयात् स्वर्गं पुत्रार्थो पुत्रमाप्नुयात् ।भार्यार्थो प्राप्नुयाद्भार्यां राज्यार्थो राज्यमाप्नुयात्

svargārthoprāpnuyāt svargaṃ putrārtho putramāpnuyāt / bhāryārtho prāpnuyādbhāryāṃ rājyārtho rājyamāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

कर्मणा मनसा वाचा भर्तुराराधनं प्रति ।

English

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अध्याय 8

श्लोक 268

अहो तितिक्षामाहात्म्यमहो दानफलं महत् ।यदागतो हरिश्चन्द्रः पुरीञ्चेन्द्रत्वमाप्तवान्

aho titikṣāmāhātmyamaho dānaphalaṃ mahat / yadāgato hariścandraḥ purīñcendratvamāptavān

हिन्दी अर्थ

अनसूया बोलीं--भटद्रे! तुम विषाद न करना। पतिकी सेवासे जो तपोबल मुझे प्राप्त हुआ है, उसे तुम अभी देखो; विलम्बकी क्या आवश्यकता? मैंने जो रूप, शील, बुद्धि एवं मधुर भाषण आदि सदगुणोंमें अपने पतिके समान दूसरे किसी पुरुषको कभी नहीं देखा है, उस सत्यके प्रभावसे यह ब्राह्मण रोगसे मुक्त

English

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अध्याय 8

श्लोक 269

पक्षिण ऊचुः एतत् ते सर्वमाख्यातं हरिश्चन्द्रविचेष्टितम् ।अतः परं कथाशेषः श्रूयतां मुनिसत्तम

pakṣiṇa ūcuḥ etat te sarvamākhyātaṃ hariścandraviceṣṭitam / ataḥ paraṃ kathāśeṣaḥ śrūyatāṃ munisattama

हिन्दी अर्थ

हो फिरसे तरुण हो जाय और अपनी स्त्रीके साथ सौ वर्षोतक जीवित रहे। यदि मैं स्‍्वामीके समान और किसी देवताको नहीं समझती तो उस सत्यके प्रभावसे यह ब्राह्मण रोगमुक्त होकर पुनः जीवित हो जाय। यदि मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा मेरा सारा उद्योग प्रतिदिन स्वामीकी सेवाके ही लिये होता हो तो यह

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 270

विपाको राजसूयस्य पृथिवीक्षयकारणम् ।तद्विपाकनिमित्तञ्च युद्धमाडिबकं महत्

vipāko rājasūyasya pṛthivīkṣayakāraṇam / tadvipākanimittañca yuddhamāḍibakaṃ mahat

हिन्दी अर्थ

ततो5पतत् पुष्पवृष्टिदेववाद्यादिनि:स्वन: ।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।