Markandeya Purana
8
अध्याय 8 / 90

Adhyaya 8

270 श्लोकभाग 2/4 · श्लोक 84–158

पूर्ण अध्याय पाठ75 श्लोक

अध्याय 8

श्लोक 84

चण्डाल उवाच अहमर्थो त्वया शीघ्रं कथयस्वात्मवेतनम् ।स्तोकेन बहुना वापि येन वै लभ्यते भवान्

caṇḍāla uvāca ahamartho tvayā śīghraṃ kathayasvātmavetanam / stokena bahunā vāpi yena vai labhyate bhavān

हिन्दी अर्थ

आदि करना अत्यन्त भयड्कर है। यमराजके दूत हाथ और पैर बाँधकर पापी जीवको उसके भीतर डाल देते हैं और वह लोटता हुआ आगे बढ़ता है। मार्गमें कौवे, बगुले, बिच्छू, मच्छर और गिद्ध उसे जल्दी-जल्दी नोच खाते हैं। उसमें जलते समय वह व्याकुल हो-होकर छटपटाता है और बारंबार “अरे बाप! अरे मैया! हाय भैया! हा तात!” आदिकी रट लगाता

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 85

पक्षिण ऊचुः तं तादृशमथालक्ष्य क्रूरदृष्टिं सुनिष्ठुरम् ।वदन्तमतिदुः शीलं कस्त्वमित्याह पार्थिवः

pakṣiṇa ūcuḥ taṃ tādṛśamathālakṣya krūradṛṣṭiṃ suniṣṭhuram / vadantamatiduḥ śīlaṃ kastvamityāha pārthivaḥ

हिन्दी अर्थ

हुआ करुण क्रन्दन करता है, किन्तु उसे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती। इस प्रकार उसमें पड़े हुए जीव, जिन्होंने दूषित बुद्धिके कारण पाप किये हैं, दस करोड़ वर्ष बीतनेपर उससे छुटकारा पाते हैं। इसके सिवा तम नामक एक दूसरा नरक है, जहाँ स्वभावसे ही कड़ाकेकी सर्दी पड़ती है। उसका विस्तार भी महारौरवके ही बराबर है, किन्तु वह घोर अन्धकारसे

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 86

चण्डाल उवाच चण्डालो ऽहमिहाख्यातः प्रवीरेति पुरोत्तमे ।विख्यातो वध्यवधको मृतकम्बलहारकः

caṇḍāla uvāca caṇḍālo 'hamihākhyātaḥ pravīreti purottame / vikhyāto vadhyavadhako mṛtakambalahārakaḥ

हिन्दी अर्थ

आच्छादित रहता है। वहाँ पापी मनुष्य सर्दीसे कष्ट पाकर भयानक अन्धकारमें दौड़ते हैं और एक-दूसरेसे भिड़कर लिपटे रहते हैं। जाड़ेके कष्टसे काँपकर कटकटाते हुए उनके दाँत

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 87

हरिश्चन्द्र उवाच नाहं चण्डालदासत्वमिच्छेयं सुविगर्हितम् ।वरं सापाग्निना दग्धो न चण्डालवशं गतः

hariścandra uvāca nāhaṃ caṇḍāladāsatvamiccheyaṃ suvigarhitam / varaṃ sāpāgninā dagdho na caṇḍālavaśaṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

टूट जाते हैं। भूख-प्यास भी वहाँ बड़े जोरकी लगती है। इसी प्रकार अन्यान्य उपद्रव भी होते रहते हैं। ओलोंके साथ बहनेवाली भयड्कर वायु शरीरमें लगकर हड्डियोंको चूर्ण किये देती है और उनसे जो मज्जा तथा रक्त गिरता है, उसीको वे क्षुधातुर प्राणी खाते हैं। एक- दूसरेके शरीरसे सटकर वे परस्पर रक्त चाटा करते हैं। इस प्रकार जबतक पापोंका भोग

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 88

पक्षिण ऊचुः तस्यैवं वदतः प्राप्तो विश्वामित्रस्तपोनिधिः ।कोपामर्षविवृताक्षः प्राह चेदं नराधैपम्

pakṣiṇa ūcuḥ tasyaivaṃ vadataḥ prāpto viśvāmitrastaponidhiḥ / kopāmarṣavivṛtākṣaḥ prāha cedaṃ narādhaipam

हिन्दी अर्थ

समाप्त नहीं हो जाता, तबतक वहाँ भी मनुष्योंको अन्धकारमें महान् कष्ट भोगना पड़ता है।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 89

विश्वामित्र उवाच चण्डालो ऽयमनल्पं ते दातुं वित्तमुपस्थितः ।कस्मान्न दीयते मह्यमशेषा यज्ञदक्षिणा

viśvāmitra uvāca caṇḍālo 'yamanalpaṃ te dātuṃ vittamupasthitaḥ / kasmānna dīyate mahyamaśeṣā yajñadakṣiṇā

हिन्दी अर्थ

इससे भिन्न एक निकृन्तन नामक नरक है, जो सब नरकोंमें प्रधान है। उसमें कुम्हारकी चाकके समान बहुत-से चक्र निरन्तर घूमते रहते हैं। यमराजके दूत पापी जीवोंको उन चक्रोंपर चढ़ा देते और अपनी अँगुलियोंमें कालसूत्र लेकर उसीके द्वारा उनके पैरसे लेकर मस्तकतक प्रत्येक अड़ काटा करते हैं। फिर भी उन पापियोंके प्राण नहीं निकलते। उनके

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 90

हरिश्चन्द्र उवाच भगवन् ! सूर्यवंशोत्थमात्मानं वेद्मे कौशिक ।कथं चण्डालदासत्वं गमिष्ये वित्तकामुकः

hariścandra uvāca bhagavan ! sūryavaṃśotthamātmānaṃ vedme kauśika / kathaṃ caṇḍāladāsatvaṃ gamiṣye vittakāmukaḥ

हिन्दी अर्थ

शरीरके सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं, किन्तु फिर वे जुड़कर एक हो जाते हैं। इस प्रकार पापी जीव हजारों वर्षोतक वहाँ काटे जाते हैं। यह यातना उन्हें तबतक दी जाती है, जबतक कि उनके सारे पापोंका नाश नहीं हो जाता। अब अप्रतिष्ठ नामक नरकका वर्णन सुनिये, जिसमें पड़े हुए जीवोंको असहा दुःखका अनुभव करना पड़ता है। वहाँ भी वे ही कुलालचक्र होते

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 91

विश्वामित्र उवाच यदि चण्डालवित्तं त्वमात्मविक्रयजं मम ।न प्रदास्यसि कालेन शाप्स्यामि त्वामसंशयम्

viśvāmitra uvāca yadi caṇḍālavittaṃ tvamātmavikrayajaṃ mama / na pradāsyasi kālena śāpsyāmi tvāmasaṃśayam

हिन्दी अर्थ

हैं; साथ ही दूसरी ओर घटीयन्त्र भी बने होते हैं, जो पापी मनुष्योंको दुःख पहुँचानेके लिये बनाये गये हैं। वहाँ कुछ मनुष्य उन चक्रोंपर चढ़ाकर घुमाये जाते हैं। हजारों वर्षोतक उन्हें बीचमें विश्राम नहीं मिलता। इसी प्रकार दूसरे पापी घटीयन्त्रोंमें बाँध दिये जाते हैं, ठीक उसी तरह, जैसे रहटमें छोटे-छोटे घड़े बँधे होते हैं। वहाँ बँधे हुए मनुष्य उन यन्त्रोंके साथमें

English

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अध्याय 8

श्लोक 92

पक्षिण ऊचुः हरिश्चन्द्रस्ततो राजा चिन्तावस्थितजीवितः ।प्रसीदेति वदन् पादावृषेर्जग्राह विह्वलः

pakṣiṇa ūcuḥ hariścandrastato rājā cintāvasthitajīvitaḥ / prasīdeti vadan pādāvṛṣerjagrāha vihvalaḥ

हिन्दी अर्थ

जब घूमने लगते हैं, तो बारंबार रक्त वमन करते हैं। उनके मुखसे लार गिरती है और नेत्रोंसे अभश्रु झरते रहते हैं। उस समय उन्हें इतना दुःख होता है, जो जीवमात्रके लिये असहा है।

English

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अध्याय 8

श्लोक 93

दासो ऽस्म्यार्तो ऽस्मि भीतो ऽस्मि त्वद्भक्तश्च विशेषतः ।कुरु प्रसादं विप्रर्षे कष्टश्चण्डालसङ्करः

dāso 'smyārto 'smi bhīto 'smi tvadbhaktaśca viśeṣataḥ / kuru prasādaṃ viprarṣe kaṣṭaścaṇḍālasaṅkaraḥ

हिन्दी अर्थ

हा है। पा हारे ( मी ना

English

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अध्याय 8

श्लोक 94

भवेयं वित्तशेषेण सर्वकर्मकरो वशः ।तवैव मुनिशार्दूल ! प्रेष्यश्चित्तानुवर्तकः

bhaveyaṃ vittaśeṣeṇa sarvakarmakaro vaśaḥ / tavaiva muniśārdūla ! preṣyaścittānuvartakaḥ

हिन्दी अर्थ

अब असिपत्रवन नामक अन्य नरकका वर्णन सुनिये--जहाँ एक हजार योजनतककी भूमि प्रज्वलित अग्निसे आच्छादित रहती है तथा ऊपरसे सूर्यकी अत्यन्त भयड्कर एवं प्रचण्ड किरणें ताप देती हैं, जिनसे उस नरकमें निवास करनेवाले जीव सदा सन्तप्त होते रहते हैं। उसके बीचमें एक बहुत ही सुन्दर वन है, जिसके पत्ते चिकने जान पड़ते हैं; किन्तु

English

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अध्याय 8

श्लोक 95

विश्वामित्र उवाच यदि प्रेष्यो मम भवान् चण्डालाय ततो मया ।दासभावमनुप्राप्तो दत्तो वित्तार्बुदेन वै

viśvāmitra uvāca yadi preṣyo mama bhavān caṇḍālāya tato mayā / dāsabhāvamanuprāpto datto vittārbudena vai

हिन्दी अर्थ

वे सभी पत्ते तलवारकी तीखी धारके समान हैं। उस वनमें बड़े बलवान कुत्ते भूंकते रहते हैं, जो दस हजारकी संख्यामें सुशोभित होते हैं। उनके मुख और दाढ़ें बड़ी-बड़ी होती हैं। वे व्याप्रोंके समान भयानक प्रतीत होते हैं। वहाँकी भूमिपर जो आग बिछी होती है, उससे जब दोनों पैर जलने लगते हैं तब वहाँ गये हुए पापी जीव “हाय माता! हाय पिता!” आदि कहते

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 96

पक्षिण ऊचुः एकमुक्ते तदा तेन श्वपाको हृष्टमानसः ।विश्वामित्राय तद्द्रव्यं दत्त्वा बद्ध्वा नरेश्वरम्

pakṣiṇa ūcuḥ ekamukte tadā tena śvapāko hṛṣṭamānasaḥ / viśvāmitrāya taddravyaṃ dattvā baddhvā nareśvaram

हिन्दी अर्थ

हुए अत्यन्त दुःखित होकर कराहने लगते हैं। उस समय तीव्र पिपासाके कारण उन्हें बड़ी पीड़ा होती है, फिर अपने सामने शीतल छायासे युक्त असिपत्रवनको देखकर वे प्राणी विश्रामकी इच्छासे वहाँ जाते हैं। उनके वहाँ पहुँचनेपर बड़े जोरकी हवा चलती है, जिससे उनके ऊपर तलवारके समान तीखे पत्ते गिरने लगते हैं। उनसे आहत होकर वे पृथ्वीपर

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 97

दण्डप्रहारसम्भ्रान्तमतीव व्याकुलेन्द्रियम् ।इष्टबन्धुवियोगार्तमनयन्निजपत्तनम्

daṇḍaprahārasambhrāntamatīva vyākulendriyam / iṣṭabandhuviyogārtamanayannijapattanam

हिन्दी अर्थ

जलते हुए अँगारोंके ढेरमें गिर पड़ते हैं। वह आग अपनी लपटोंसे सर्वत्र व्याप्त हो सम्पूर्ण भूतलको चाटती हुई-सी जान पड़ती है। इसी समय अत्यन्त भयानक कुत्ते वहाँ तुरंत ही दौड़ते हुए आते हैं और रोते हुए पापियोंके सब अज्लोंको टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं। पिताजी! इस प्रकार मैंने आपसे यह असिपत्रवनका वर्णन किया है।

English

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अध्याय 8

श्लोक 98

हरिश्चन्द्रस्ततो राजा वसंश्चण्डालपत्तने ।प्रातर्मध्याह्नसमये सायञ्चैतदगायत

hariścandrastato rājā vasaṃścaṇḍālapattane / prātarmadhyāhnasamaye sāyañcaitadagāyata

हिन्दी अर्थ

अब इससे भी अत्यन्त भयडूकर तप्तकुम्भ नामक जो नरक है, उसका हाल सुनिये-- वहाँ चारों ओर आगकी लपटोंसे घिरे हुए बहुत-से लोहेके घड़े मौजूद हैं, जो खूब तपे होते हैं। उनमेंसे किन्हींमें तो प्रजलित अग्निकी आँचसे खौलता हुआ तेल भरा रहता है और किन्हींमें तपाये हुए लोहेका चूर्ण होता है। यमराजके दूत पापी मनुष्योंको उनका मुँह नीचे

English

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अध्याय 8

श्लोक 99

बाला दीनमुखी दृष्ट्वा बालं दीनमुखं पुरः ।मां स्मरत्यसुखाविष्टा मोचयिष्यति नौ नृपः

bālā dīnamukhī dṛṣṭvā bālaṃ dīnamukhaṃ puraḥ / māṃ smaratyasukhāviṣṭā mocayiṣyati nau nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

करके उन्हीं घड़ोंमें डाल देते हैं। वहाँ पड़ते ही उनके शरीर टूट-फूट जाते हैं। शरीरकी मज्जाका भाग गलकर पानी हो जाता है। कपाल और नेत्रोंकी हड्डियाँ चटककर फूटने लगती हैं। भयानक गृध्र उनके अज्ञोंको नोच-नोचकर टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं और फिर उन

English

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अध्याय 8

श्लोक 100

उपात्तवित्तो विप्राय दत्त्वा वित्तमतो ऽधिकम् ।न सा मां मृगशावाक्षी वेत्ति पापतरं कृतम्

upāttavitto viprāya dattvā vittamato 'dhikam / na sā māṃ mṛgaśāvākṣī vetti pāpataraṃ kṛtam

हिन्दी अर्थ

टुकड़ोंको उन्हीं घड़ोंमें डाल देते हैं। वहाँ वे सभी टुकड़े सीझकर तेलमें मिल जाते हैं। मस्तक, शरीर, स्नायु, मांस, त्वचा और हड्डियाँ--सभी गल जाती हैं। तदनन्तर यमराजके दूत करछुलसे उलट-पुलटकर खौलते हुए तेलमें उन पापियोंको अच्छी तरह मथते हैं। पिताजी! इस प्रकार यह तप्तकुम्भ नामक नरककी बात मैंने आपको विस्तारपूर्वक

English

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अध्याय 8

श्लोक 101

राज्यनाशः सुहृत्त्यागो भर्यातनयविक्रयः ।प्राप्ता चण्डालता चेयमहो दुः खपरम्परा

rājyanāśaḥ suhṛttyāgo bharyātanayavikrayaḥ / prāptā caṇḍālatā ceyamaho duḥ khaparamparā

हिन्दी अर्थ

जनक-यमदूत-संवाद, भिन्न-भिन्न पापोंसे विभिन्न नरकोंकी प्राप्तिका वर्णन

English

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अध्याय 8

श्लोक 102

एवं स निवसन् नित्यं सस्मार दयितं सुतम् ।आर्याञ्चात्मसमाविष्टां हृतसर्वस्व आतुरः

evaṃ sa nivasan nityaṃ sasmāra dayitaṃ sutam / āryāñcātmasamāviṣṭāṃ hṛtasarvasva āturaḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्र (सुमति) कहता है--पिताजी! इससे पहले सातवें जन्ममें मैं एक वैश्यके कुलमें उत्पन्न हुआ था। उस समय पौंसलेपर पानी पीनेको जाती हुई गौओंको मैंने वहाँ जानेसे रोक दिया था। उस पापकर्मके फलसे मुझे अत्यन्त भयड्ूकर नरकमें जाना पड़ा, जो आगकी लपटोंके कारण घोर दुःखदायी प्रतीत

English

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अध्याय 8

श्लोक 103

कस्यचित्त्वथ कालस्य मृतचेलापहारकः ।हरिश्चन्द्रो ऽभवद्राजा श्मशाने तद्वशानुगः

kasyacittvatha kālasya mṛtacelāpahārakaḥ / hariścandro 'bhavadrājā śmaśāne tadvaśānugaḥ

हिन्दी अर्थ

होता था। उसमें लोहेकी-सी चोंचवाले पक्षी भरे पड़े थे। वहाँ पापियोंके शरीरको कोल्हूमें पेरनेके कारण जो रक्तकी धारा बहती थी, उससे कीचड़ जम गयी थी और काटे जानेवाले दुष्कर्मियोंके नरकमें पड़नेसे सब ओर घोर हाहाकार मचा रहता था। उस नरकमें पड़े मुझे सौ वर्षसे कुछ अधिक समय बीत गया। मैं

English

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अध्याय 8

श्लोक 104

चण्डालेनानुशिष्टश्व मृतचेलापहारिणा ।शवागमनमन्विच्छन्निह तिष्ठ दिवानिशम्

caṇḍālenānuśiṣṭaśva mṛtacelāpahāriṇā / śavāgamanamanvicchanniha tiṣṭha divāniśam

हिन्दी अर्थ

महान् ताप और पीड़ासे सन्तप्त रहता था। प्यास और जलन बराबर बनी रहती

English

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अध्याय 8

श्लोक 105

इदं राज्ञे ऽपि देयञ्च षड्भागन्तु शवं प्रति ।त्रयस्तु मम भागाः स्युर्द्वो भागौ तव वेतनम्

idaṃ rājñe 'pi deyañca ṣaḍbhāgantu śavaṃ prati / trayastu mama bhāgāḥ syurdvo bhāgau tava vetanam

हिन्दी अर्थ

मैं तप्तबालुका और तप्तकुम्भ नामक नरकोंके बीच था। उस शीतल वायुके सम्पर्कसे उन नरकोंमें पड़े हुए सभी जीवोंकी यातना दूर हो गयी। मुझे भी उतना ही आनन्द हुआ, जितना स्वर्गमें रहनेवालोंको वहाँ प्राप्त होता है। यह क्या बात हो गयी?” यों सोचते हुए हम सभी जीवोंने आनन्दकी अधिकताके

English

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अध्याय 8

श्लोक 106

इति प्रतिसमादिष्टो जगाम शवमन्दिरम् ।दिशन्तु दक्षिणां यत्र वाराणस्यां स्थितं तदा

iti pratisamādiṣṭo jagāma śavamandiram / diśantu dakṣiṇāṃ yatra vārāṇasyāṃ sthitaṃ tadā

हिन्दी अर्थ

कारण एकटक नेत्रोंसे जब चारों ओर देखा, तब हमें बड़े ही उत्तम एक नररत्न दिखायी दिये। उनके साथ बिजलीके समान कान्तिमान् एक भयड्रकर यमदूत था, जो आगे होकर रास्ता दिखा रहा था और कहता था, “महाराज! इधरसे आइये' सैकड़ों यातनाओंसे व्याप्त नरकको देखकर उन पुरुषरत्नको बड़ी दया

English

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अध्याय 8

श्लोक 107

श्मशानं घोरसंनादं शिवाशतसमाकुलम् ।शवमौलिसमाकीर्णं दुर्गन्धं बहुधूमकम्

śmaśānaṃ ghorasaṃnādaṃ śivāśatasamākulam / śavamaulisamākīrṇaṃ durgandhaṃ bahudhūmakam

हिन्दी अर्थ

आयी। उन्होंने यमदूतसे कहा।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 108

पिशाच-भूत-वेताल-डाकिनी-यक्षसङ्कुलम् ।गृध्रगोमायुसङ्कीर्णं श्ववृन्दपरिवारितम्

piśāca-bhūta-vetāla-ḍākinī-yakṣasaṅkulam / gṛdhragomāyusaṅkīrṇaṃ śvavṛndaparivāritam

हिन्दी अर्थ

किया है, जिसके कारण अनेक प्रकारकी यातनाओंसे पूर्ण इस भयडूकर नरकमें मुझे आना पड़ा है? मेरा जन्म जनकवंशमें हुआ था! मैं विदेह देशमें विपश्चित् नामसे विख्यात राजा था और प्रजाजनोंका भलीभाँति पालन करता था। मैंने बहुत-से यज्ञ किये। धर्मके अनुसार पृथ्वीका पालन किया। कभी युद्धमें

English

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अध्याय 8

श्लोक 109

अस्थिसंघातसङ्कीर्णं महादुर्गन्धसंकुलम् ।नानामृतसुहृन्नाद-रौद्रकोलाहलायुतम्

asthisaṃghātasaṅkīrṇaṃ mahādurgandhasaṃkulam / nānāmṛtasuhṛnnāda-raudrakolāhalāyutam

हिन्दी अर्थ

पीठ नहीं दिखायी तथा अतिथिको कभी निराश नहीं लौटने दिया। पितरों,

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 110

हा पुत्र ! मित्र ! हा बन्धो ! भ्रातर्वत्स ! प्रियाद्य मे ।हा पते ! भगिनि ! मातर्हा मातुल ! पितामह

hā putra ! mitra ! hā bandho ! bhrātarvatsa ! priyādya me / hā pate ! bhagini ! mātarhā mātula ! pitāmaha

हिन्दी अर्थ

नहीं किया। परायी स्त्री और पराये धन आदिकी अभिलाषा मेरे मनमें कभी नहीं हुई। जैसे गौएँ पानी पीनेकी इच्छासे स्वयं ही पौंसलेपर चली जाती हैं, उसी प्रकार पर्वके समय पितर और पुण्यतिथि आनेपर देवता स्वयं ही अपना भाग लेनेको मनुष्यके पास आते हैं। जिस गृहस्थके घरसे वे लंबी साँस लेकर निराश

English

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अध्याय 8

श्लोक 111

मातामह ! पितः ! क्व गतो ऽस्येहि बान्धव ।इत्येवं वदतां यत्र ध्वनिः संश्रुयते महान्

mātāmaha ! pitaḥ ! kva gato 'syehi bāndhava / ityevaṃ vadatāṃ yatra dhvaniḥ saṃśruyate mahān

हिन्दी अर्थ

लौट जाते हैं, उसके इष्ट और पूर्त--दोनों प्रकारके धर्म नष्ट हो जाते हैं। पितरोंके दुःखपूर्ण उच्छवाससे सात जन्मोंका पुण्य नष्ट होता है और देवताओंका नि:श्वास तीन जन्मोंका पुण्य क्षीण कर देता है--इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है;

English

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अध्याय 8

श्लोक 112

ज्वलन्मांस-वसा-मेदच्छमच्छमितसंकुलम्

jvalanmāṃsa-vasā-medacchamacchamitasaṃkulam

हिन्दी अर्थ

इसलिये मैं देवकर्म और पितृकर्मके लिये सदा ही सावधान रहता था। ऐसी दशामें मुझे इस अत्यन्त दारुण नरकमें कैसे आना पड़ा?

English

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अध्याय 8

श्लोक 113

अर्धदग्धाः शवाः श्यामा विकसद्दन्तपङ्क्तयः ।हसन्तीवाग्निमध्यस्थाः कायस्येयं दशा त्विति

ardhadagdhāḥ śavāḥ śyāmā vikasaddantapaṅktayaḥ / hasantīvāgnimadhyasthāḥ kāyasyeyaṃ daśā tviti

हिन्दी अर्थ

उन महात्माके इस प्रकार पूछनेपर यमराजका दूत देखनेमें भयड्कर होनेपर भी हमलोगोंके सुनते-सुनते विनययुक्त वाणीमें बोला।

English

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अध्याय 8

श्लोक 114

अग्नेश्चटचटाशब्दो वयसामस्थिपङ्क्तिषु ।बान्धवाक्रान्दशब्दश्च पुक्कसेषु प्रहर्षजः

agneścaṭacaṭāśabdo vayasāmasthipaṅktiṣu / bāndhavākrāndaśabdaśca pukkaseṣu praharṣajaḥ

हिन्दी अर्थ

यमदूतने कहा--महाराज! आप जैसा कहते हैं, वह सब ठीक है। उसमें तनिक भी सन्देहके लिये स्थान नहीं है। किन्तु आपके द्वारा एक छोटा-सा पाप भी बन गया है। मैं उसे याद दिलाता हूँ। विदर्भराजकुमारी पीवरी, जो आपकी पत्नी थी, एक समय ऋतुमती हुई थी; किन्तु उस अवसरपर केकयराजकुमारी

English

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अध्याय 8

श्लोक 115

गायतां भूत-वेताल-पिशाचगणः रक्षसाम् ।श्रूयते सुमहान् घोरः कल्पान्त इव निः स्वनः

gāyatāṃ bhūta-vetāla-piśācagaṇaḥ rakṣasām / śrūyate sumahān ghoraḥ kalpānta iva niḥ svanaḥ

हिन्दी अर्थ

सुशोभनामें आसक्त होनेके कारण आपने उसके ऋतुकालको सफल नहीं बनाया। वह आपके समागमसुखसे वज्चित रह गयी। ऋतुकालका उल्लड्घन करनेके कारण ही आपको ऐसे भयड्कर नरकतक आना पड़ा है। जो धर्मात्मा पुरुष काममें आसक्त होकर स्त्रीके ऋतुकालका उललड्घन करता है, वह

English

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अध्याय 8

श्लोक 116

महामहिषकारीष-गोशकृद्राशिसङ्कुलम् ।तदुत्थभस्मकूटैश्च वृतं सास्थिभिरुन्नतैः

mahāmahiṣakārīṣa-gośakṛdrāśisaṅkulam / tadutthabhasmakūṭaiśca vṛtaṃ sāsthibhirunnataiḥ

हिन्दी अर्थ

पितरोंका ऋणी होनेसे पापको प्राप्त हो नरकमें पड़ता है। राजन! इतना ही

English

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अध्याय 8

श्लोक 117

नानोपहारस्त्रग्दीप-काकविक्षेपकालिकम् ।अनेकशब्दबहुलं श्मशानं नरकायते

nānopahārastragdīpa-kākavikṣepakālikam / anekaśabdabahulaṃ śmaśānaṃ narakāyate

हिन्दी अर्थ

आपका पाप है। इसके अतिरिक्त और कोई पाप नहीं है। इसलिये आइये, अब पुण्यलोकोंका उपभोग करनेके लिये चलिये।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 118

सवह्निगर्भैरशिवैः शिवारुतैर् निनादितं भीषणरावगह्वरम् ।भयं भयस्याप्युपसञ्जनैर्भृशं श्मशानमाक्रन्दविरावदारुणम्

savahnigarbhairaśivaiḥ śivārutair nināditaṃ bhīṣaṇarāvagahvaram / bhayaṃ bhayasyāpyupasañjanairbhṛśaṃ śmaśānamākrandavirāvadāruṇam

हिन्दी अर्थ

राजा बोले--देवदूत! तुम जहाँ मुझे ले चलोगे, वहाँ चलूँगा; किन्तु इस समय कुछ पूछ रहा हूँ, उसका तुम्हें ठीक-ठीक उत्तर देना चाहिए। ये वज्रके समान चोंचवाले कौए, जो इन पुरुषोंकी आँखें निकाल लेते हैं और फिर उन्हें नये नेत्र प्राप्त हो जाते हैं, इन लोगोंने कौन-सा निन्दित कर्म किया है? इस

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 119

स राजा तत्र सम्प्राप्तो दुः खितः शोचनोद्यतः ।हा भृत्या मन्त्रिणो विप्राः तद्राज्यं विधे गतम्

sa rājā tatra samprāpto duḥ khitaḥ śocanodyataḥ / hā bhṛtyā mantriṇo viprāḥ tadrājyaṃ vidhe gatam

हिन्दी अर्थ

बातको बताओ। मैं देखता हूँ, कौए इनकी जीभ उखाड़ लेते हैं, किन्तु फिर नयी जीभ उत्पन्न हो जाती है। इनके सिवा ये दूसरे लोग क्यों आरेसे चीरे जाते हैं और अत्यन्त दुःख भोगते हैं? कुछ लोग तपायी हुई बालुकामें भूने जाते हैं और कुछ लोग खौलते हुए तेलमें पड़कर पक रहे हैं। लोहेके समान चोंचवाले पक्षी जिन्हें

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 120

हा शैव्ये पुत्र हा बाल मां त्यक्त्वा मन्दभाग्यकम् ।विश्वामित्रस्य दोषेण गताः कुत्रापि ते मम

hā śaivye putra hā bāla māṃ tyaktvā mandabhāgyakam / viśvāmitrasya doṣeṇa gatāḥ kutrāpi te mama

हिन्दी अर्थ

नोच-नोचकर खींच रहे हैं, वे कैसे लोग हैं? ये बेचारे शरीरकी नस-नाड़ियोंके कटनेसे पीड़ित हो बड़े जोर-जोरसे चीखते और चिल्लाते हैं। लोहेकी चोंचकी आधघातसे इनके सारे अड़्ेंमें घाव हो गया है, जिससे इन्हें बड़ा कष्ट होता है। इन्होंने ऐसा कौन-सा अनिष्ट किया है, जिसके कारण ये रात-दिन सताये जा रहे

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 121

इत्येवं चिन्तयंस्तत्र चण्डालोक्तं पुनः पुनः ।मलिनो रूक्षसर्वाङ्गः केशवान् गन्धवान् ध्वजी

ityevaṃ cintayaṃstatra caṇḍāloktaṃ punaḥ punaḥ / malino rūkṣasarvāṅgaḥ keśavān gandhavān dhvajī

हिन्दी अर्थ

हैं? ये तथा और भी जो पापियोंकी यातनाएँ देखी जाती हैं, वे किन कर्मोके परिणाम हैं? ये सब बातें मुझे पूर्णरूपसे बतलाओ।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 122

लकुटी कालकल्पश्च धावंश्चापि ततस्ततः ।अस्मिन् शव इदं मूल्यं प्राप्तं प्राप्स्यामि चाप्युत

lakuṭī kālakalpaśca dhāvaṃścāpi tatastataḥ / asmin śava idaṃ mūlyaṃ prāptaṃ prāpsyāmi cāpyuta

हिन्दी अर्थ

यमदूतने कहा--राजन्! मनुष्यको पुण्य और पाप बारी-बारीसे भोगने पड़ते हैं। भोगनेसे ही पाप अथवा पुण्यका क्षय होता है। लाखों जन्मोंके सज्चित पुण्य और पाप मनुष्योंके लिये सुख-दुःखका अंकुर उत्पन्न करते हैं। जैसे बीज जलकी इच्छा रखते हैं, उसी प्रकार पुण्य और पाप देश-काल,

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 123

इदं मम इदं राज्ञे मुख्यचण्डालके त्विदम् ।इति धावन् दिशो राजा जीवन् योन्यन्तरं गतः

idaṃ mama idaṃ rājñe mukhyacaṇḍālake tvidam / iti dhāvan diśo rājā jīvan yonyantaraṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

अन्यान्य कर्म और कर्ताकी अपेक्षा करते हैं। जैसे राह चलते समय काँटेपर पैर पड़ जानेसे उसके चुभनेपर थोड़ा दुःख होता है, उसी प्रकार किसी भी देश- कालमें किया हुआ थोड़ा पाप थोड़े दुःखका कारण होता है; किन्तु वही पाप जब बहुत अधिक मात्रामें हो जाता है तब पैरमें शूल अथवा लोहेकी कील

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 124

जीर्णकर्पण्टसुग्रन्थि-कृतकन्थापरिग्रहः चिताभस्मरजोलिप्त-मुखबाहूदराङिघ्रकः

jīrṇakarpaṇṭasugranthi-kṛtakanthāparigrahaḥ citābhasmarajolipta-mukhabāhūdarāṅighrakaḥ

हिन्दी अर्थ

गड़नेके समान अधिक दुःख प्रदान करता है--सिरदर्द आदि दुस्सह रोगोंका कारण बनता है। जैसे अपथ्य भोजन और सर्दी-गर्मीका सेवन श्रम और ताप आदिका जनक होता है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न पाप भी फलकी प्राप्ति करानेमें एक-दूसरेकी अपेक्षा रखते हैं। ऐसे ही बड़े-बड़े पाप दीर्घकालतक रहनेवाले रोग

English

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अध्याय 8

श्लोक 125

नानामेदो-वसा-मज्जा लिप्तपाण्यङ्गुलिः श्वसन् ।नानाशवोदनकृता-हारतृप्तिपरायणः

nānāmedo-vasā-majjā liptapāṇyaṅguliḥ śvasan / nānāśavodanakṛtā-hāratṛptiparāyaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

और विकारोंके उत्पादक होते हैं। उन्हींसे शस्त्र और अग्निका भय प्राप्त होता है। वे ही असहा पीड़ा और बन्धन आदि फल प्रदान करते हैं। इस प्रकार जीव अनेक जन्मोंके सज्चित पुण्य और पापोंके फलस्वरूप सुख और दु:खोंको भोगता हुआ इस लोकमें स्थित रहता है।

English

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अध्याय 8

श्लोक 126

तदीयमाल्यसंश्लेषकृतमस्तकमण्डनः ।न रात्रौ न दिवा शेते हा हेति प्रवदन् मुहुः

tadīyamālyasaṃśleṣakṛtamastakamaṇḍanaḥ / na rātrau na divā śete hā heti pravadan muhuḥ

हिन्दी अर्थ

राजन! जैसे नरकोंमें पड़े हुए जीव अपने घोर महापापका फल भोगते हैं, उसी प्रकार ये स्वर्गलोकमें देवताओंके साथ रहकर गन्धर्व, सिद्ध और अप्सराओंके संगीत आदिका सुख उठाते हुए पुण्योंका उपभोग करते हैं। देवता, मनुष्य और पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेकर जीव अपने पुण्य-पापजनित

English

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अध्याय 8

श्लोक 127

एवं द्वादशमासास्तु नीताः शतसमोपमाः ।स कदाचिन्नृपश्रेष्ठः श्रान्तो बन्धुवियोगवान्

evaṃ dvādaśamāsāstu nītāḥ śatasamopamāḥ / sa kadācinnṛpaśreṣṭhaḥ śrānto bandhuviyogavān

हिन्दी अर्थ

सुख-दुःखरूप शुभाशुभ फलोंको भोगता है। राजन! आप जो यह पूछ रहे हैं कि किस-किस पापसे पापियोंको कौन-कौन-सी यातनाएँ मिलती हैं, वह सब मैं आपको बतला रहा हूँ। जो नीच मनुष्य कामना और लोभके वशीभूत हो दूषित दृष्टि एवं कलुषित चित्तसे परायी स्त्री और पराये धनपर आँखें गड़ाते हैं, उनकी

English

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अध्याय 8

श्लोक 128

निद्राभिभूतो रूक्षाङ्गो निश्चेष्टः सुप्त एव च ।तत्रापि शयनीये स दृष्टवानद्भुतं हमत्

nidrābhibhūto rūkṣāṅgo niśceṣṭaḥ supta eva ca / tatrāpi śayanīye sa dṛṣṭavānadbhutaṃ hamat

हिन्दी अर्थ

दोनों आँखोंको ये वज्रतुल्य चोंचवाले पक्षी निकाल लेते हैं और पुन:-पुनः इनके नये नेत्र उत्पन्न हो जाते हैं। इन पापी मनुष्योंने जितने निमेषतक पापपूर्ण दृष्टिपात किया है, उतने ही हजार वर्षोतक ये नेत्रकी पीड़ा भोगते हैं। जिन लोगोंने असत्-शास्त्रका उपदेश किया है तथा किसीको बुरी सलाह दी है,

English

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अध्याय 8

श्लोक 129

श्मशानाभ्यासयोगेन दैवस्य बलवत्तया ।अन्यदेहेन दत्त्वा तु गुरवे गुरुदक्षिणाम्

śmaśānābhyāsayogena daivasya balavattayā / anyadehena dattvā tu gurave gurudakṣiṇām

हिन्दी अर्थ

जिन्होंने शास्त्रका उलटा अर्थ लगाया है, मुँहसे झूठी बातें निकाली हैं तथा वेद,

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 130

तदा द्वादश वर्षाणि दुः खदानात्तु निष्कृतिः ।आत्मानं स ददर्शाथ पुक्कसीगर्भसम्भवम्

tadā dvādaśa varṣāṇi duḥ khadānāttu niṣkṛtiḥ / ātmānaṃ sa dadarśātha pukkasīgarbhasambhavam

हिन्दी अर्थ

चोंचवाले भयड्कर पक्षी उखाड़ते हैं और वह जिह्ठा नयी-नयी उत्पन्न होती रहती है। जितने निमेषतक उनके द्वारा जिह्लाजनित पाप हुआ होता है, उतने वर्षोतक उन्हें यह कष्ट भोगना पड़ता है। जो नराधम दो मित्रोंमें फ़ूट डालते हैं, पिता-पुत्रमें, स्वजनोंमें, यजमान और पुरोहितमें, माता और पुत्रमें, सजद्भी-

English

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अध्याय 8

श्लोक 131

तत्रस्थश्चाप्यसौ राजा सो ऽचिन्तयदिदं तदा ।इतो निष्क्रान्तमात्रो हि दानधर्मं करोम्यहम्

tatrasthaścāpyasau rājā so 'cintayadidaṃ tadā / ito niṣkrāntamātro hi dānadharmaṃ karomyaham

हिन्दी अर्थ

साथियोंमें तथा पति और पत्नीमें वैर डालते हैं, वे ही ये आरेसे चीरे जा रहे हैं। आप इनकी दुर्गति देखिये। जो दूसरोंको ताप देते, उनकी प्रसन्नतामें बाधा पहुँचाते, पंखे, हवादार स्थान, चन्दन और खसकी ट्ट्टी आदिका अपहरण करते हैं तथा निर्दोष व्यक्तियोंको भी प्राणान्तक कष्ट पहुँचाते हैं, वे ही ये अधम पापी

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 132

अनन्तरं स जातस्तु तदा पुक्कसबालकः ।श्मशानमृतसंस्कार-करणेषु सदोद्यतः

anantaraṃ sa jātastu tadā pukkasabālakaḥ / śmaśānamṛtasaṃskāra-karaṇeṣu sadodyataḥ

हिन्दी अर्थ

हैं जो तपायी हुई बालूमें पड़कर कष्ट भोगते हैं। जो ब्राह्मण किसी देवकार्य या पितृकार्यमें दूसरेके द्वारा निमन्त्रित होकर भी दूसरे किसीके यहाँ श्राद्धझ-भोजन कर लेता है, उसके यहाँ आनेपर ये पक्षी दो टुकड़े कर डालते हैं। जो अपनी अनुचित बातोंसे साधु पुरुषोंके मर्मपर आघात पहुँचाता है, उसको ये पक्षी

English

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अध्याय 8

श्लोक 133

प्राप्ते तु सप्तमे वर्षे श्मशाने ऽथ मृतो द्विजः ।आनीतो बन्धुभिर्दृष्टस्तेन तत्राधनो गुणी

prāpte tu saptame varṣe śmaśāne 'tha mṛto dvijaḥ / ānīto bandhubhirdṛṣṭastena tatrādhano guṇī

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त पीड़ा देते हैं। इन्हें ऐसा करनेसे कोई रोक नहीं सकता। जो झूठी बातें कहकर और विपरीत धारणा बनाकर किसीकी चुगली खाते हैं, उनकी जिह्नाके इस प्रकार तेज किये हुए छूरोंसे दो टुकड़े कर दिये जाते हैं।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 134

मूल्यार्थिना तु तेनापि परिभूतास्तु ब्राह्मणाः ।ऊचुस्ते ब्राह्मणास्तत्र विश्वामित्रस्य चेष्टितम्

mūlyārthinā tu tenāpi paribhūtāstu brāhmaṇāḥ / ūcuste brāhmaṇāstatra viśvāmitrasya ceṣṭitam

हिन्दी अर्थ

जिन्होंने उद्ण्डतावश माता, पिता तथा गुरुजनोंका अनादर किया है, वे ही ये पीब, विष्ठा और मूत्रसे भरे हुए गढ़ोंमें नीचे मुख करके डुबाये जा रहे हैं। जो लोग देवता, अतिथि, अन्यान्य प्राणी, भृत्यवर्ग, अभ्यागत, पितर, अग्नि तथा पक्षियोंको अन्नका भाग दिये बिना ही स्वयं भोजन कर लेते हैं, वे ही दुष्ट यहाँ

English

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अध्याय 8

श्लोक 135

पापिष्ठमशुभं कर्म कुरु त्वं पापकारक ।हरिश्चन्द्रः पुरा राजा विश्वामित्रेण पुक्कसः

pāpiṣṭhamaśubhaṃ karma kuru tvaṃ pāpakāraka / hariścandraḥ purā rājā viśvāmitreṇa pukkasaḥ

हिन्दी अर्थ

पीब और गोंद चाटकर रहते हैं। उनका शरीर तो पहाड़के समान विशाल होता है, किन्तु मुख सूईकी नोकके बराबर रहता है। देखिये, यही वे लोग हैं। जो लोग ब्राह्मण अथवा किसी अन्य वर्णके मनुष्यको एक पद्धक्तिमें बिठाकर भोजनमें भेद करते हैं, उन्हें यहाँ विष्ठा खाकर रहना पड़ता है। जो लोग एक समुदायमें

English

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अध्याय 8

श्लोक 136

कृतः पुण्यविनाशेन ब्राह्मणस्वापनाशनात् ।यदा न क्षमते तेषां तैः स शप्तो रुषा तदा

kṛtaḥ puṇyavināśena brāhmaṇasvāpanāśanāt / yadā na kṣamate teṣāṃ taiḥ sa śapto ruṣā tadā

हिन्दी अर्थ

साथ-साथ आये हुए अर्थार्थी मनुष्यको निर्धन जानकर छोड़ देते और अकेले अपना अन्न भोजन करते हैं, वे ही यहाँ थूक और खँँखार भोजन करते हैं। राजन! जिन लोगोंने जूठे हाथोंसे गौ, ब्राह्मण और अग्नियोंका स्पर्श किया है, उन्हींमेंसे ये लोग यहाँ मौजूद हैं, जो जलते हुए लोहेके खंभोंपर हाथ रखकर

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 137

गच्छ त्वं नरकं घोरमधुनैव नराधम ।इत्युक्तमात्रे वचने स्वप्नस्थः स नृपस्तदा

gaccha tvaṃ narakaṃ ghoramadhunaiva narādhama / ityuktamātre vacane svapnasthaḥ sa nṛpastadā

हिन्दी अर्थ

उन्हें चाट रहे हैं। जिन्होंने स्वेच्छापूर्वक जूठे मुँह होकर भी सूर्य-चन्द्रमा और तारोंपर दृष्टिपात किया है, उनकी आँखोंमें आग रखकर यमराजके दूत उसे धौंकते हैं। गौ, अग्नि, माता, ब्राह्मण, ज्येष्ठ भ्राता, पिता, बहिन, कुटु॒म्बकी स्त्री,

English

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अध्याय 8

श्लोक 138

अपश्यद्यमदूतान् वै पाशहस्तान् भयावहान् ।तैः संगृहीतमात्मानं नीयमानं तदा बलात्

apaśyadyamadūtān vai pāśahastān bhayāvahān / taiḥ saṃgṛhītamātmānaṃ nīyamānaṃ tadā balāt

हिन्दी अर्थ

गुरु तथा बड़े-बूढ़ोंका जो पैरोंसे स्पर्श करते हैं, उनके दोनों पैर यहाँ आगमें तपायी हुई लोहेकी बेड़ियोंसे जकड़ दिये जाते हैं और उन्हें अँगारोंके ढेरमें खड़ा कर दिया जाता है। उसमें उनके पैरसे लेकर घुटनेतकका भाग जलता रहता है। जो नराधम अपने कानोंसे गुरु, देवता, द्विज और वेदोंकी निन्दा सुनते हैं और

English

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अध्याय 8

श्लोक 139

पश्यति स्म भृशं खिन्नो हा मातः पितरद्य मे ।एवंवादी स नरके तैलद्रोण्यां निपातितः

paśyati sma bhṛśaṃ khinno hā mātaḥ pitaradya me / evaṃvādī sa narake tailadroṇyāṃ nipātitaḥ

हिन्दी अर्थ

उसे सुनकर प्रसन्न होते हैं, उन पापियोंके कानोंमें ये यमराजके दूत आगमें तपायी हुई लोहेकी कीलें ठोंक देते हैं। विलाप करनेपर भी उन्हें छुटकारा नहीं मिलता। जो लोग क्रोध और लोभके वशमें होकर पौंसले, देवमन्दिर, ब्राह्मणके घर तथा देवालयके सभाभवन तुड़वाकर नष्ट करा देते हैं, उनके यहाँ आनेपर ये

English

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अध्याय 8

श्लोक 140

क्रकचैः पाट्यमानस्तु क्षुरधाराभिरप्यधः ।अन्धे तमसि दुः खार्तः पूयशोणितभोजनः

krakacaiḥ pāṭyamānastu kṣuradhārābhirapyadhaḥ / andhe tamasi duḥ khārtaḥ pūyaśoṇitabhojanaḥ

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त कठोर स्वभाववाले यमदूत इन तीखे शस्त्रोंसे शरीरकी खाल उधेड़ लेते हैं। उनके चीखने-चिल्लानेपर भी ये दया नहीं करते। जो मनुष्य गौ, ब्राह्मण तथा सूर्युकी ओर मुँह करके मल-मूत्रका त्याग करते हैं, उनकी आँतोंको कौए गुदामार्गसे खींचते हैं। जो किसी एकको कन्या देकर फिर दूसरेके साथ उसका

English

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अध्याय 8

श्लोक 141

सप्तवर्षं मृतात्मानं पुक्कसत्वे ददर्श ह ।दिनं दिनन्तु नरके दह्यते पच्यते ऽन्यतः

saptavarṣaṃ mṛtātmānaṃ pukkasatve dadarśa ha / dinaṃ dinantu narake dahyate pacyate 'nyataḥ

हिन्दी अर्थ

विवाह कर देता है, उसके शरीरमें बहुत-से घाव करके उसे खारे पानीकी नदीमें बहा दिया जाता है। जो मनुष्य दुर्भिक्ष अथवा सड्कटकालमें अपने पुत्र, भृत्य, पत्नी आदि तथा बन्धुवर्गको अकिज्चन जानकर भी त्याग देता और केवल अपना पेट पालनेमें लग जाता है, वह भी जब इस लोकमें आता है तो

English

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अध्याय 8

श्लोक 142

खिद्यते क्षोभ्यते ऽन्यत्र मार्यते पाट्यते ऽन्यतः ।क्षार्यते दीप्यते ऽन्यत्र शीतवाताहतो ऽन्यतः

khidyate kṣobhyate 'nyatra māryate pāṭyate 'nyataḥ / kṣāryate dīpyate 'nyatra śītavātāhato 'nyataḥ

हिन्दी अर्थ

यमराजके दूत भूख लगनेपर उसके मुखमें उसके ही शरीरका मांस नोचकर डाल देते हैं और वही उसे खाना पड़ता है। जो अपनी शरणमें आये हुए तथा अपनी ही दी हुई वृत्तिसे जीविका चलानेवाले मनुष्योंको लोभवश त्याग देता है, वह भी यमदूतोंद्वारा इसी प्रकार कोल्हूमें पेरे जानेके कारण यन्त्रणा भोगता है।

English

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अध्याय 8

श्लोक 143

एवं दिनं वर्षशत-प्रमाणं नरके ऽभवत् ।तथा वर्षशतं तत्र श्रीवितं नरके भटैः

evaṃ dinaṃ varṣaśata-pramāṇaṃ narake 'bhavat / tathā varṣaśataṃ tatra śrīvitaṃ narake bhaṭaiḥ

हिन्दी अर्थ

जो मनुष्य अपने जीवनभरके किये हुए पुण्यको धनके लोभसे बेच डालते हैं, वे इन्हीं पापियोंकी तरह चक्कियोंमें पीसे जाते हैं। किसीकी धरोहर हड़प लेनेवाले लोगोंके सब अड़ रस्सियोंसे बाँध दिये जाते हैं और उन्हें दिन-रात कीड़े, बिच्छू तथा सर्प काटते-खाते रहते हैं। जो पापी दिनमें मैथुन करते और

English

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अध्याय 8

श्लोक 144

ततो निपातितो भूमौ विष्ठाशी श्वा व्यजायत ।वान्ताशी शीतदग्धश्च मासमात्रे मृतो ऽपि सः

tato nipātito bhūmau viṣṭhāśī śvā vyajāyata / vāntāśī śītadagdhaśca māsamātre mṛto 'pi saḥ

हिन्दी अर्थ

परायी स्त्रीको भोगते हैं, वे यहाँ भूखसे दुर्बल रहते हैं, प्यासकी पीड़ासे उनकी जीभ और तालू गिर जाते हैं और वे वेदनासे व्याकुल हो जाते हैं। यह देखिये, सामने लोहेके बड़े-बड़े काँटोंसे भरा हुआ सेमरका वृक्ष खड़ा है। इसपर चढ़ाये हुए पापियोंके सब अड़ विदीर्ण हो गये हैं और अधिक मात्रामें गिरते हुए खूनसे

English

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अध्याय 8

श्लोक 145

अथापश्यत् खरं देहं हस्तिनं वानरं पशुम् ।छागं विडालं कङ्कञ्च गामविं पक्षिणं कृमिम्

athāpaśyat kharaṃ dehaṃ hastinaṃ vānaraṃ paśum / chāgaṃ viḍālaṃ kaṅkañca gāmaviṃ pakṣiṇaṃ kṛmim

हिन्दी अर्थ

ये लथपथ हो रहे हैं। नरश्रेष्ठ) इधर दृष्टि डालिये, ये परायी स्त्रियोंका सतीत्व नष्ट करनेवाले लोग हैं। इन्हें यमराजके दूत घरियामें रखकर गला रहे हैं। जो उद्दण्ड मनुष्य गुरुको नीचे बिठाकर और स्वयं ऊँचे आसनपर बैठकर अध्ययन करता अथवा शिल्पकलाकी शिक्षा ग्रहण करता है, वह इसी प्रकार अपने मस्तकपर

English

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अध्याय 8

श्लोक 146

मत्स्यं कूर्मं वराहञ्च श्वाविधं कुक्कुटं शुकम् ।शारिकां स्थावरांश्चैव सर्पमन्यांश्व देहिनः

matsyaṃ kūrmaṃ varāhañca śvāvidhaṃ kukkuṭaṃ śukam / śārikāṃ sthāvarāṃścaiva sarpamanyāṃśva dehinaḥ

हिन्दी अर्थ

शिलाका भारी भार ढोता हुआ क्लेश पाता है। यमलोकके मार्गमें वह अत्यन्त पीड़ित एवं भूखसे दुर्बल रहता है और उसका मस्तक दिन-रात बोझ ढोनेकी पीड़ासे व्यथित होता रहता है। जिन्होंने जलमें मूत्र, थूक और विष्ठाका त्याग

English

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अध्याय 8

श्लोक 147

दिवसे दिवसे जन्म प्राणिनः प्राणिनस्तदा ।अपश्यद् दुः खसन्तप्तो दिनं वर्षशतं तथा

divase divase janma prāṇinaḥ prāṇinastadā / apaśyad duḥ khasantapto dinaṃ varṣaśataṃ tathā

हिन्दी अर्थ

किया है, वे ही लोग इस समय थूक, विष्ठा और मूत्रसे भरे हुए दुर्गन्धयुक्त नरकमें पड़े हैं। ये लोग जो भूखसे व्याकुल होनेपर एक-दूसरेका मांस खा रहे हैं, इन्होंने पूर्वकालमें अतिथियोंको भोजन दिये बिना ही भोजन किया है। जिन लोगोंने अग्निहोत्री होकर भी वेदों और वैदिक अग्नियोंका परित्याग किया है, वे

English

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अध्याय 8

श्लोक 148

एवं वर्षशतं पूर्णं गतं तत्र कुयोनिषु ।अपश्यच्च कदाचित् स राजा तत् स्वकुलोद्भवम्

evaṃ varṣaśataṃ pūrṇaṃ gataṃ tatra kuyoniṣu / apaśyacca kadācit sa rājā tat svakulodbhavam

हिन्दी अर्थ

ही ये पर्वतोंकी चोटीसे बारंबार नीचे गिराये जाते हैं। जो लोग दूसरी बार ब्याही जानेवाली स्त्रीके पति होकर जीवन बिता चुके हैं, वे ही इस समय यहाँ कीड़े हुए हैं, जिन्हें चींटियाँ खा रही हैं। पतितोंका दिया हुआ दान लेने, उनका यज्ञ कराने तथा प्रतिदिन उनकी सेवामें रहनेसे मनुष्य पत्थरके भीतर कीड़ा होकर सदा

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 149

तत्र स्थितस्य तस्यापि राज्यं द्यूतेन हारितम् ।भार्या हृता च पुत्रश्च स चैकाकी वनं गतः

tatra sthitasya tasyāpi rājyaṃ dyūtena hāritam / bhāryā hṛtā ca putraśca sa caikākī vanaṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

निवास करता है। जो कुटुम्बके लोगों, मित्रों तथा अतिथिके देखते-देखते अकेले ही मिठाई उड़ाता है, उसे यहाँ जलते हुए अँगारे चबाने पड़ते हैं। राजन! इस पापीने लोगोंकी पीठका मांस खाया है--पीठ-पीछे सबकी बुराई की है, इसीलिये भयड्कर भेड़िये प्रतिदिन इसका मांस खा रहे हैं।+

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 150

तत्रापश्यत स सिंहं वै व्यादितास्यं भयावहम् ।बिभक्षयिषुमायातं शरभेण समन्वितम्

tatrāpaśyata sa siṃhaṃ vai vyāditāsyaṃ bhayāvaham / bibhakṣayiṣumāyātaṃ śarabheṇa samanvitam

हिन्दी अर्थ

इस नीचने उपकार करनेवाले लोगोंके साथ कृतघ्नता की है; अतएव यह भूखसे व्याकुल तथा अंधा, बहरा और गूँगा होकर भटक रहा है। इस खोटी बुद्धिवाले कृतघ्नने अपने मित्रोंकी बुराई की है, इसीलिये यह तप्तकुम्भ नरकमें गिर रहा है। इसके बाद चक्कियोंमें पीसा जायगा, फिर तपायी हुई बालूमें भूना

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 151

पुनश्च भक्षितः सो ऽपि भार्यां शोचितुमुद्यतः ।हा शैव्ये ! क्व गतास्यद्य मामिहापास्य दुः खितम्

punaśca bhakṣitaḥ so 'pi bhāryāṃ śocitumudyataḥ / hā śaivye ! kva gatāsyadya māmihāpāsya duḥ khitam

हिन्दी अर्थ

जायगा। उसके बाद कोल्हूमें पेरा जायगा। तत्पश्चात् असिपत्रवनमें इसे यातना दी जायगी। फिर आरेसे यह चीरा जायगा। तदनन्तर कालसूत्रसे काटा जायगा। इसके बाद और भी बहुत-सी यातनाएँ इसे भोगनी पड़ेंगी। इसपर भी मित्रोंके साथ विश्वासघात करनेके पापसे इसका उद्धार कैसे होगा-यह मैं भी नहीं

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 152

अपश्यत् पुनरेवापि भार्यां स्वं सहपुत्रकाम् ।त्रायस्व त्वं हरिश्चन्द्र किं द्यूतेन तव प्रभो

apaśyat punarevāpi bhāryāṃ svaṃ sahaputrakām / trāyasva tvaṃ hariścandra kiṃ dyūtena tava prabho

हिन्दी अर्थ

जानता। जो ब्राह्मण एक-दूसरेसे मिलकर सदा श्राद्धान्न भोजन करनेमें ही आसक्त रहते हैं, उन्हें दुष्ट सर्पोके सर्वाड़्से निकला हुआ फेन पीना पड़ता है। सुवर्णकी चोरी करनेवाले, ब्रह्महत्यारे, शराबी तथा गुरुपत्नीगामी--ये चारों प्रकारके महापापी नीचे और ऊपर धधकती हुई आगके बीचमें झोंककर सब

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 153

पुत्रस्ते शोच्यतां प्राप्तो भर्यंया शैव्यया सह ।स नापश्यत् पुनरपि धावमानः पुनः पुनः

putraste śocyatāṃ prāpto bharyaṃyā śaivyayā saha / sa nāpaśyat punarapi dhāvamānaḥ punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

ओरसे जलाये जाते हैं। इस अवस्थामें उन्हें कई हजार वर्षोतक रहना पड़ता है। तदनन्तर वे मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होते तथा कोढ़ एवं यक्ष्मा आदि रोगोंसे युक्त रहते हैं। वे मरनेके बाद फिर नरकमें जाते हैं और पुनः उसी प्रकार नरकसे लौटनेपर रोगयुक्त जन्म धारण करते हैं। इस प्रकार कल्पके अन्ततक उनके

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 154

अथापश्यत् पुनरपि स्वर्गस्थः स नराधिपः ।नीयते मुक्तकेशी सा दीना विवसना बलात्

athāpaśyat punarapi svargasthaḥ sa narādhipaḥ / nīyate muktakeśī sā dīnā vivasanā balāt

हिन्दी अर्थ

आवागमनका यह चक्र चलता रहता है। गौकी हत्या करनेवाला मनुष्य तीन जन्मोंतक नीच-से-नीच नरकोंमें पड़ता है। अन्य सभी उपपातकोंका फल भी ऐसा ही निश्चय किया गया है। नरकसे निकले हुए पापी जीव जिन-जिन पातकोंके कारण जिन-जिन योनियोंमें जन्म लेते हैं, वह सब मैं बतला रहा हूँ;

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 155

हाहावाक्यं प्रमुञ्चन्ती त्रायस्वेत्यसकृत्स्वना ।अथापश्यत् पुनस्तत्र धर्मराजस्य शासनात्

hāhāvākyaṃ pramuñcantī trāyasvetyasakṛtsvanā / athāpaśyat punastatra dharmarājasya śāsanāt

हिन्दी अर्थ

आप ध्यान देकर सुनें।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 156

आक्रान्दन्त्यन्तरीक्षस्था आगच्छेह नराधिप ।विश्वामित्रेण विज्ञप्तो यमो राजंस्तवार्थतः

ākrāndantyantarīkṣasthā āgaccheha narādhipa / viśvāmitreṇa vijñapto yamo rājaṃstavārthataḥ

हिन्दी अर्थ

३. अपदिद्धास्तु यैवेंदा वह्ययश्नवाहिताग्निभि: । त इमे शैलशज्ग्रात् पात्यन्ते5ध: पुनः

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 157

इत्युक्त्वा सर्पपाशैस्तु नीयते बलवद्विभुः ।श्राद्धदेवेन कथितं विश्वामित्रस्य चेष्टितम्

ityuktvā sarpapāśaistu nīyate balavadvibhuḥ / śrāddhadevena kathitaṃ viśvāmitrasya ceṣṭitam

हिन्दी अर्थ

२. वृकैर्भयड्करै: पृष्ठ नित्यमस्योपभुज्यते । पृष्ठमांसं नृपैतेन यतो लोकस्य भक्षितम् ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय 8

श्लोक 158

तत्रापि तस्य विकृतिर्नाधर्मोत्था व्यवर्धत ।एताः सर्वा दशास्तस्य याः स्वप्ने सम्प्रदर्शिताः

tatrāpi tasya vikṛtirnādharmotthā vyavardhata / etāḥ sarvā daśāstasya yāḥ svapne sampradarśitāḥ

हिन्दी अर्थ

पापोंके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंकी प्राप्ति तथा विपश्चितके पुण्यदानसे पापियोंका उद्धार

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।