अध्याय 7
श्लोक 108.1
शत्रुनाशनम्।१-२ भृगुः।अग्निः।१ बृहतीगर्भा त्रिष्टुप्, २ त्रिष्टुप्।यो न॑स्ता॒यद् दिप्स॑ति॒ यो न॑ आ॒विः स्वो वि॒द्वानर॑णो वा नो अग्ने ।प्र॒तीच्ये॒त्वर॑णी द॒त्वती॒ तान् मैषा॑मग्ने॒ वास्तु॑ भू॒न्मो अप॑त्यम्
śatrunāśanam| 1-2 bhṛguḥ| agniḥ| 1 bṛhatīgarbhā triṣṭup, 2 triṣṭup| yo nastāyad dipsati yo na āviḥ svo vidvānaraṇo vā no agne | pratīcyetvaraṇī datvatī tān maiṣāmagne vāstu bhūnmo apatyam
हिन्दी अर्थ
रोगजन्य पीड़ाको दुर करता है । समुद्रः अन्तरिक्षन।म (निधं० ६1३) तथा का०७। अनु० १०। सू० ११२ भरथर्वेवेद-माष्य ३. (स्तायत्) छप कर (नः) हमारी (दिप्सति) दम्भपूरवंक हिसा करना चाहता है, (यः) भौर जो (नः) हमारी (आ्राविः) प्रकटरूप मे दम्भपूवंक हिसा करना चाहता है , वह (स्वः नः) हमारा भ्रपनाहो (विद्रान्) जौ कि हमारे भेद को जानता हो, (वा) या अरणः) प्राति हो, पराया हो, काष्ठनिमित सांपाकृतिक-सांपनी भ्रस्वरविशेषदहै, जो शत्रु कोकाट कर, उनमें विष कासंचारकर देताहै। एसे अन्य भरस्त्रोंके लिये देखो (अथर्वं० ०।८ १-२०) । अरणः =अ-+-रण (शब्दे), जिसके साथ हमारा शाल्दिक व्यवहार नहीं ।
English
Bear butter to the Apsarases, O Agni, and to the Dice bear dust and sand and water. The Gods delight in both oblations, joying in sacrificial gifts apportioned duly. The Apsarases take pleasure in the banquet between the Sun and. the libation-holder.