अध्याय 4
श्लोक 30.1
राष्ट्रदेवी ।१- ८ अथर्वा।सर्वरूपा सर्वात्मिका सर्वदेवमयी वाक्।त्रिष्टुप्, ६ जगती।अ॒हं रु॒द्रेभि॒र्वसु॑भिश्चराम्य॒हमा॑दि॒त्यैरु॒त वि॒श्वदे॑वैः ।अ॒हं मि॒त्रावरु॑णो॒भा बि॑भर्म्य॒हमि॑न्द्रा॒ग्नी अ॒हम॒श्विनो॒भा
rāṣṭradevī | 1- 8 atharvā| sarvarūpā sarvātmikā sarvadevamayī vāk| triṣṭup, 6 jagatī| ahaṃ rudrebhirvasubhiścarāmyahamādityairuta viśvadevaiḥ | ahaṃ mitrāvaruṇobhā bibharmyahamindrāgnī ahamaśvinobhā
हिन्दी अर्थ
क्रोध ! (क्त्वो सह) निज कमं के साथ, (नः) हमारा (मेदी) स्नेह करने- वाला (एधि) तरु हो जा, (पुरुहृत) है बहुत सैनिकों द्वारा आहृत ! (महा- धनस्य ) जिसमे महाधन कौ उपलब्धि होती है उस संग्राम के (संसृजि) सजंन मे, अर्थात् उसकी उपस्थिति हो जाने पर । सायक सायः अन्तकारी कर्म॑, “षो” अन्तकमंणि (दिवादिः ) क मन्व ६, (समाकृतम्) तथा उसके राष्ट मे पूवेतः एकत्रित किया धन, (उभयम्) यह द्विविध धन, (वरुणः च मन्युः) वरुण राजा जोर बोधयुक्त प्रदान कर दे; (पराजितासः, शत्रवः) पराजित हुए शत्रू ( हृदयेषु) हदयो मे (भिथः) भयो को (दधानाः) धारण करते हूए (अप ) संग्रामभूमि से अपगत होकर (निलयन्ताम्) निलीन हो जाए, छप जाए । त युद्ध में प्राप्त धन प्रजाजनों में बाट देना चाहिए, या राजकोष में जमा करना चाहिए । वरुणः = प्रजा द्वारा वरा हुजा, चुना हृ, रष्टरका
English
I load with wealth the zealous sacrificer who pours the juice and offers his oblation. On the world’s summit I bring forth the Father: my home is in the waters, in the ocean.