ऐतरेयोपनिषद्

Adhyāya 3 — Prajñānaṃ Brahma (Consciousness is Brahman)श्लोक 3/475%

Aitareya Upanishad 5.3

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्च महाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत् किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरम् ।सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम् ।प्रज्ञानेत्रो लोकः ।प्रज्ञा प्रतिष्ठा ।प्रज्ञानं ब्रह्म

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

यही ब्रह्म, यही इन्द्र, यही प्रजापति, ये सब देव; ये पाँच महाभूत — पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, ज्योति; और ये छोटे मिश्रित बीज; अण्डज, जारुज, स्वेदज, उद्भिज्; अश्व, गाय, मनुष्य, हाथी; जो भी प्राण-धारी जङ्गम और पतत्री है, और जो स्थावर है — यह सब प्रज्ञान-नेत्र है, प्रज्ञान में प्रतिष्ठित है। प्रज्ञान ही लोक का नेत्र है। प्रज्ञा ही प्रतिष्ठा है। प्रज्ञान ही ब्रह्म है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

This is Brahman; this is Indra; this is Prajāpati; these are all the gods. These five great elements — earth, wind, space, water, light — these and the apparent minor mixtures, all seeds of various kinds: egg-born, womb-born, sweat-born, sprout-born; horses, cows, humans, elephants — whatever is breathing, whether moving on legs or wings, or stationary. All this is led by consciousness; all this is established in consciousness. Consciousness is the eye of the world. Consciousness is its foundation. Consciousness is Brahman.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

ऋग्वेद का सर्वोच्च महावाक्य — 'प्रज्ञानं ब्रह्म' (चेतना ही ब्रह्म है)। ऋषि ब्रह्मांड की समस्त अभिव्यक्तियों — ईश्वर, देवगण, पंचमहाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), समस्त जीव (अंडज, जरायुज, स्वेदज, उद्भिज्ज), पशु, पक्षी, मनुष्य और स्थावर-जंगम — का सिंहावलोकन करते हुए घोषित करते हैं कि यह सब प्रज्ञान-नेत्र (चेतना द्वारा ही दृष्ट व परिचालित) है और प्रज्ञान में ही प्रतिष्ठित है। प्रज्ञान ही इस जगत की प्रतिष्ठा है; प्रज्ञान ही ब्रह्म है। चेतना किसी भौतिक संरचना का उप-उत्पाद नहीं, बल्कि समूचे अस्तित्व का मूल अधिष्ठान है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक भौतिकवादी दृष्टिकोण ने मनुष्य को यह सिखाया कि यह ब्रह्मांड मूलतः मृत, अचेतन कणों और यांत्रिक भौतिक नियमों का एक संयोग मात्र है, और चेतना मस्तिष्क की कोशिकाओं का एक नगण्य उप-उत्पाद (Byproduct) है। इस संकीर्ण सोच ने आधुनिक मनुष्य को भीषण अस्तित्वगत अकेलेपन (Existential Alienation), अर्थहीनता और प्रकृति के क्रूर शोषण की ओर धकेला है। ऋग्वेद की ऐतरेय उपनिषद् का यह अमर महावाक्य — 'प्रज्ञानं ब्रह्म' (चेतना ही परम सत्य है) — इस सोच को आमूलचूल पलट देता है। ऋषि उद्घोषणा करते हैं कि देवता, पंचमहाभूत, सूक्ष्म कीट-पतंगे, पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति और मनुष्य — यह समस्त चराचर जगत प्रज्ञान द्वारा ही संचालित (प्रज्ञानेत्रं) है और प्रज्ञान में ही प्रतिष्ठित है। चेतना इस जगत का परिणाम नहीं, बल्कि इसका मूल स्रोत और आधार है। आप किसी मृत और अचेतन ब्रह्मांड में भटके हुए असहाय प्राणी नहीं हैं; आप साक्षात उस सर्वव्यापी चैतन्य सत्ता की ही जागृत अभिव्यक्ति हैं।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **अस्तित्वगत गरिमा की पुनःप्राप्ति (Cosmic Self-Worth):** जब भी संसार आपको तुच्छ, शक्तिहीन या व्यर्थ महसूस कराए, तो इस महावाक्य का स्मरण कीजिए: "प्रज्ञानं ब्रह्म — मैं उस अखंड चेतना का अंश हूँ जो संपूर्ण ब्रह्मांड को प्रकाशित कर रही है।" यह बोध आत्मग्लानि और अवसाद की जड़ों को काट देता है। - **सर्वभूत-मैत्री (Ecological Reverence):** जब आप समझ लेते हैं कि नदी, वृक्ष, पशु और अन्य मनुष्यों में भी वही एक प्रज्ञान स्पंदित हो रहा है, तो प्रकृति और अन्य प्राणियों के प्रति आपका दृष्टिकोण शोषण का नहीं, अपितु अगाध आदर और करुणा का बन जाता है। - **विचारों का साक्षी भाव (Cognitive Freedom):** मन में उठने वाली चिंताओं, भय और सुख-दुःख की लहरों को अपनी पहचान मत बनाइए। देखिए कि वे सभी तरंगें आपकी 'प्रज्ञा' (चेतना) के सम्मुख आ-जा रही हैं, जबकि आपकी प्रज्ञा सर्वदा अछूती, पवित्र और शांत है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप स्वयं को एक नश्वर शरीर और नगण्य मस्तिष्क मानकर चिंताओं में घिरे हैं, या उस अनंत, सर्वव्यापी चैतन्य (प्रज्ञान) के रूप में जाग रहे हैं जिसमें संपूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

क्वांटम भौतिकी के जनक मैक्स प्लैंक (Max Planck): "मैं चेतना को मूलभूत (Fundamental) मानता हूँ और पदार्थ को चेतना का परिणाम मानता हूँ।" आधुनिक विश्लेषणात्मक आदर्शवाद (Bernardo Kastrup) और डोनाल्ड हॉफमैन का 'कॉन्शियस रियलिज्म': पदार्थ और स्पेस-टाइम केवल एक इंटरफ़ेस हैं, जबकि मूलभूत यथार्थ चेतना (Conscious Agents) का अखंड नेटवर्क है। उपनिषद् का 'प्रज्ञानं ब्रह्म' इस आधुनिक वैज्ञानिक विमर्श का प्राचीनतम और सर्वाधिक पूर्ण प्रतिपादन है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Last updated
2026-10-23
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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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