Vayu Purana
103
अध्याय 103 / 232

Adhyaya 103

210 श्लोकभाग 4/4 · श्लोक 202–210

पूर्ण अध्याय पाठ9 श्लोक

अध्याय 103

श्लोक 202

जले त्रीणि सहस्राण्यनाशके षष्टिं भुञ्जते ।काका बकाः कपोताश्च ह्युलूकाः पशवस् तथा

jale trīṇi sahasrāṇyanāśake ṣaṣṭiṃ bhuñjate / kākā bakāḥ kapotāśca hyulūkāḥ paśavas tathā

हिन्दी अर्थ

उत्तमस्य तु ते पुत्रा: सत्यायां जज्ञिरे शुभा: ततः सत्याः स्मृता देवा उत्तमे चान्‍्तरे तदा ३३ ७ अभवन्यज्ञभाजस्ते तृतोये द्वापरान्तरे । ते तु सत्या: पुनर्देवाः संप्राप्ते तामसेउन्तरे शेप हर्षा ये तमसः पुत्रा जज्षिरे द्वादशव तु । हर॒यो नाम ते देवा वश्ञभाजस्तथाउमवन् ३३६ ततस्ते हरयो देवा: प्राप्ते चारिष्णवेडन्तरे । विकुण्ठायां ततस्ते वे चरिष्णोज॑ज्ञिरे सुराः ॥ वकुण्ठा नाम ते देवा: पन्च मस्यान्तरे सनो:

English

You take up forms according to your own will and you withdraw the same at your own will. Only matters accepted by us have been revealed by you in the Purapas, Itihasa (Mahabharata) and the (Brahma) Sutras in various ways. The imperishable Brahman is supreme, the cause (source)

अध्याय 103

श्लोक 203

संगमोदकसंस्पृष्टास् ते यान्ति परमां गतिम् ।वृक्षाश्च तत्पदं ज्ञात्वा यां गतिं यान्ति योगिनः

saṃgamodakasaṃspṛṣṭās te yānti paramāṃ gatim / vṛkṣāśca tatpadaṃ jñātvā yāṃ gatiṃ yānti yoginaḥ

हिन्दी अर्थ

अन्तहित हो गये ।२९-३०। तदनन्तर ईश्वर (ब्रह्मा) के अन्तहित होने पर देवगण निर्भर हो गये और अणिमा आदि से संयुक्त होकर योगबल का आश्रय ले योगाभ्यास में दत्तचित्त हुए। जिससे उन सबों के शरीर समुद्र के समान विद्ञाल बारह सरोवरों के रूप में परिणत हो गये जो जय नाम से विख्यात हुए ।३१-३२। तदनन्तर स्वायम्भुव नामक उस मन्वस्तर में वे देवगण अजिता के ग्रभ से रुचि के बारह पुत्रों के रूप में उत्पन्न हुए, जो

English

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अध्याय 103

श्लोक 204

एरण्डिका मया देवी दृष्टो मे मन्मथेश्वरः ।किं समर्थो यमो रुष्टो भद्रो भद्राणि पश्यति

eraṇḍikā mayā devī dṛṣṭo me manmatheśvaraḥ / kiṃ samartho yamo ruṣṭo bhadro bhadrāṇi paśyati

हिन्दी अर्थ

अजित गण के नाम से विख्यात हुये ३३। विधि मुनय (?) क्षेत्र, नन्‍द, अव्यय--प्राण, अपान, सुधामा, ऋतु, शक्ति, श्रूव भोर स्थिति से बारह अजित देवगण ब्रह्मा के मानस पुत्र रूप में स्मरण किये गये हैं ।३४। ये देवगण उस स्वायम्भव भन्वन्तर में यज्ञ में अन्यान्य देवताओं के साथ यज्ञ भाग के अधिकारी माने गये तदनन्तर स्वारोचिष मल्बन्तर में पुनः वे तुषिता के गर्भ से स्वारोविष मनु के पुत्र रूप में उत्पन्न हुए, उस समय वे तुषित और प्राण--इन दो नामों से विख्यात हुए, यज्ञ में इन्हें भाग पाने का अधिकार दिया गया । पुनः ओत्तम मन्वतर में वे शुभदायी देवगण सत्या के गभे से उत्तम मनु के पृत्र रूप में उत्पन्न हुए और उक्त मन्वन्तर में उसकी सत्य नाम से रूयाति हुई, तृतीय मन्वन्तर के द्वापर युग में वे देवगण यज्ञ भाग के अधिकारी हुए । वे सत्य नामक देवगण पुनः तामस नामक मन्वन्तर में तामस की हर्षा नामक पत्नी में हरि नाम से

English

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अध्याय 103

श्लोक 205

मृत्तिकां सङ्गमोद्भूतां ये च गुण्ठन्ति नित्यशः ।भ्रूणहत्यादिपापानि नश्यन्ते नात्र संशयः

mṛttikāṃ saṅgamodbhūtāṃ ye ca guṇṭhanti nityaśaḥ / bhrūṇahatyādipāpāni naśyante nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

उत्तन्न हुए और यज्ञ भाग के भोत्ता बने ।३५-३६। तदनन्तर चारिष्णव नामक मन्वन्तर में वे हरि नामक देवगण चरिष्णु मनु की विकुण्ठा नामक पत्नी में उत्पन्न हुये इस पाँचवें मन्वस्तर वे देवगण वैकुण्ठ नाम से विख्यात

English

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अध्याय 103

श्लोक 206

एरण्डीसङ्गमे मर्त्यो लुण्ठ्यमानो नराधिप ।सर्वपापैर्विनिर्मुक्तः पदं गच्छत्यनामयम्

eraṇḍīsaṅgame martyo luṇṭhyamāno narādhipa / sarvapāpairvinirmuktaḥ padaṃ gacchatyanāmayam

हिन्दी अर्थ

ततस्ते बे पुन्देवा बैकुण्ठाः प्राप्प चाक्षुषम् । साध्यायां द्वादश सुता जज्षिरे धसंसुनवः ४ १ य इमां सप्तसंभुति देवानां देवशासनात् । पठेद्यः श्रद्धया युक्तः प्रत्यवायं न गच्डति

English

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अध्याय 103

श्लोक 207

एरण्ड्याः सङ्गमं मर्त्याः कीर्तयन्त्याश्रमस्थिताः ।विमुक्तपापा जायन्ते सत्यं शङ्करभाषितम्

eraṇḍyāḥ saṅgamaṃ martyāḥ kīrtayantyāśramasthitāḥ / vimuktapāpā jāyante satyaṃ śaṅkarabhāṣitam

हिन्दी अर्थ

एवमुक्तस्तरा सुत उबाच ऋषिसत्तमान् । दितेः पुत्रद्यं ज्ञ कश्यपादिति नः श्रुतम् ४ €

English

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अध्याय 103

श्लोक 208

एरण्डीपादपाग्रैस्तु दृष्टैः पापं व्यपोहति

eraṇḍīpādapāgraistu dṛṣṭaiḥ pāpaṃ vyapohati

हिन्दी अर्थ

कश्यपस्या55ःमजो तो बे सर्वेभ्यः पूर्वजों स्पृतो । सौत्येडहन्यतिरात्रस्य कश्यपस्था55श्वमेघधिके हुये और यज्ञों में भाग के अधिकारी हुए । तदनन्तर चाक्ष॒ष मन्वन्तर में आकर वे वेकुण्ठ नामक देवगग साध्या के गभ से धर्म के बारह पुत्रों के रूप में उत्पन्न हुए। तदनन्तर चाक्षुष मन्वन्तर की समाप्ति होने पर जब वेवस्वत मनु की कार्यावधि प्रारम्भ हुई तो वे साध्य देवनण पहले त्रेता युन के प्रारम्भिक काल में अंश भाग से अदिति में मरीचि-पुत्र कश्यप के संथोग से उत्पन्त हुए ।४०-४३। और इस प्रकार इस वतंमान बैवस्व॒त

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अध्याय 103

श्लोक 209

तीर्थाख्यानमिदं पुण्यं ये पठिष्यन्ति मानवाः ।शृण्वन्ति चापरे भक्त्या मुक्तपापा भवन्ति ते

tīrthākhyānamidaṃ puṇyaṃ ye paṭhiṣyanti mānavāḥ / śṛṇvanti cāpare bhaktyā muktapāpā bhavanti te

हिन्दी अर्थ

मन्वन्तर में बारह आदित्यों के नाम से इसकी प्रसिद्धि हुई। स्वायंभूव मन्दन्तर में जय नाम से तिख्यात जो आदि देवगण थे वे ही चाक्षष मन्वन्तर में शापवण साध्य नाम से त्रिख्यात हुए और वे ही वंवस्वत मन्वस्तर में शाप वद्य आदित्य नाम से भी विख्यात हुए ब्रह्मा के शाप से होनेवाली देवताओं की इन सात उत्पत्तियों का वृत्तान्त जो श्रद्धापृवंक पढ़ता है. वह पाप से लिप्त नहीं होता । जय नामक देवगणों को इन सात उत्पत्तियों

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अध्याय 103

श्लोक 210

एतत्ते सर्वमाख्यातम् एरण्डीसङ्गमं नृप ।भूयश्चान्यत् प्रवक्ष्यामि सर्वपापक्षयंकरम्

etatte sarvamākhyātam eraṇḍīsaṅgamaṃ nṛpa / bhūyaścānyat pravakṣyāmi sarvapāpakṣayaṃkaram

हिन्दी अर्थ

को मैं कह चुका अब इसके बाद क्‍या सुनना चाहते हो ऋषियों ने कहा-- सूतजी ! अब हम लोग देत्य, दानव, गन्धवे, उरग (सर्प राक्षस, सप भूत, पिशाच पशु, पक्षी, एवं लता वृक्षादि की उत्तत्ति तथा विनाश का वृत्तान्त सुनना चाहते हैं, विस्तार पूर्वक बतलाइये ? ।४८। ऋषियों के ऐसा पूछने पर उन सर्वश्रेष्ठ ऋषियों से तुत ने कहा, ऋषिवृन्द ! कक्ष्यप के संयोग से दिति को दो पुत्र उत्पन्न हुए--ऐसा हमने सुना है । कश्यप के वे दोनों आत्मज उनके अन्‍्यान्य सन्‍तानों में

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।