तैत्तिरीयोपनिषद्

Bhṛgu Vallīश्लोक 7/1070%

Taittiriya Upanishad 3.7

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अन्नं न निन्द्यात् ।तद्व्रतम् ।प्राणो वा अन्नम् ।शरीरमन्नादम् ।प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् ।शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः ।तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् ।स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति ।अन्नवानन्नादो भवति ।महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन ।महान् कीर्त्या ॥ १ ॥ ॥ इति अनुवाकः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

"अन्न की निन्दा मत कर" — यह व्रत है। प्राण ही अन्न है; शरीर अन्न-भोक्ता। प्राण में शरीर प्रतिष्ठित, शरीर में प्राण प्रतिष्ठित — इस प्रकार अन्न अन्न में प्रतिष्ठित है। जो इसे ऐसा जानता है — प्रतिष्ठित होता है; अन्नवान्, अन्न-भोक्ता, प्रजा-पशु-ब्रह्म-वर्चस्-कीर्ति से महान् होता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Do not despise food — that is the vow. Prāṇa is food; the body is the eater of food. The body rests in prāṇa; prāṇa rests in the body. Thus food rests in food. He who knows this is established; becomes possessor and eater of food, great by progeny, cattle, brahma-radiance, fame.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

तीन खाद्य-व्रतों में प्रथम। अन्न की निन्दा मत कर। अन्न और भोक्ता परस्पर निर्भर हैं — प्राण अन्न है, शरीर खाता है; शरीर अन्न है (कभी), प्राण खाता है। इस चक्र का सम्मान किया जाता है, तिरस्कार नहीं।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक समाज में भोजन के प्रति दृष्टिकोण अत्यंत विकृत हो चुका है। एक तरफ अत्यधिक संपन्नता में लोग भोजन की बुराई करते हैं, अपनी थाली में आधा खाना छोड़कर फेंक देते हैं, और दूसरी तरफ दुनिया में करोड़ों लोग भुखमरी के शिकार हैं। तैत्तिरीयोपनिषद् का यह प्रथम खाद्य-व्रत एक सख्त आध्यात्मिक और नैतिक निर्देश देता है: 'अन्नं न निन्द्यात्। तद् व्रतम्।'—अन्न की कभी निंदा मत करो, यह तुम्हारा पावन व्रत होना चाहिए। भोजन केवल कैलोरी नहीं है; भोजन वह ब्रह्मांडीय कृपा है जो किसी की कड़ी मेहनत, सूर्य के प्रकाश, वर्षा और पृथ्वी के आशीर्वाद से आपके सामने आई है। जब हम भोजन की निंदा करते हैं या असंतोष के साथ खाते हैं, तो हम वास्तव में जीवन को बनाए रखने वाली उस परम शक्ति का अपमान करते हैं। आधुनिक पोषण विज्ञान भी यह दर्शाता है कि असंतोष, घृणा और शिकायत के साथ खाया गया भोजन शरीर में पाचन विकृतियां और विषाक्तता उत्पन्न करता है, जबकि कृतज्ञता से ग्रहण किया गया साधारण भोजन भी अमृत बन जाता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **भोजन की शिकायत पर पूर्ण विराम (Zero Criticism at the Table)**: सामने जो भी सात्विक भोजन परोसा जाए, उसके स्वाद या रंग-रूप की मीन-मेख निकालने के बजाय उसे ईश्वर का प्रसाद मानकर आदर से स्वीकार करें। - **भोजन की बर्बादी का निषेध (Conscious Plate Portioning)**: अपनी थाली में उतना ही भोजन लें जितना आप खा सकें; एक दाना भी फेंकना उस अन्न और उसे उगाने वाले के प्रति अन्याय है। - **कृतज्ञता से ग्रहण करना (Eating with Reverence)**: भोजन करते समय मन में यह भाव रखें कि यह अन्न मेरे शरीर को पोषण और ऊर्जा देने वाला मित्र है, इसकी पवित्रता का सम्मान करना मेरा कर्तव्य है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं अपनी थाली में आए भोजन की शिकायत करने और उसे बर्बाद करने का असंवेदनशील आचरण कर रहा हूं, या मैं अन्न को जीवनदायिनी शक्ति मानकर पूर्ण कृतज्ञता से ग्रहण करता हूं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

पोषण-परस्परता — प्रत्येक खाने वाला खाया जाता है। जैव-मण्डल एकल नेस्टेड-आहार प्रणाली है। उपनिषद् की स्वीकृति संरचनात्मक है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (Book Code 0071). Gita Press Gorakhpur (Official Publication)
Translation
Gita Press Editorial Board (Hindi)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain. Digitized by sanskritdocuments.org.
पाठ-भेद · Variant readings
Collated with Anandashram Sanskrit Series No. 12.

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