श्वेताश्वतरोपनिषद्

Adhyāya 2श्लोक 9/1753%

Shvetashvatara Upanishad 2.9

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

प्राणान् प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत ।दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान् मनो धारयेताप्रमत्तः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

प्राणों को यत्न से नियंत्रित करके, और श्वास को नासिका से धीरे-धीरे निकालते हुए — जैसे कोई दुष्ट अश्वों वाले रथ को संभालता है — विद्वान पुरुष को मन को अप्रमत्त होकर धारण करना चाहिए।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Having restrained the pranas by controlling the breath, the wise person should hold the mind without distraction — as a charioteer holds back unruly horses.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

प्राणायाम और मन-नियंत्रण का व्यावहारिक विज्ञान। साधक को चाहिए कि युक्त आहार-विहार करता हुआ प्राणों का नियमन करे, और जब श्वास मंद व शांत हो जाए, तब नासिका-छिद्रों से धीरे-धीरे रेचन करे। मन को साधने के लिए रथ और चंचल घोड़ों का रूपक दिया गया है — जैसे एक कुशल और सावधान सारथी उद्दंड घोड़ों से जुते रथ को अत्यंत सजगता से नियंत्रित करता है, वैसे ही बुद्धिमान मनुष्य को अपने चंचल और उपद्रवी मन को वश में रखना चाहिए।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक युग में मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसने बाह्य तकनीकी साधनों, रॉकेटों और कम्प्यूटरों को तो वश में कर लिया है, किंतु अपने ही मन रूपी यंत्र के आगे वह पूरी तरह विवश और असहाय है। मन के अनियंत्रित आवेग — अचानक उत्पन्न होने वाला क्रोध, व्याकुलता, वासना, अवसाद और व्यग्रता — व्यक्ति को उसी तरह गड्ढे में गिरा देते हैं जैसे दुष्ट घोड़े किसी अनाड़ी सारथी के रथ को खाई में धकेल देते हैं। श्वेताश्वतर उपनिषद् यहाँ मन को वश में करने की कुंजी 'प्राण' (श्वास) को बताता है। मन और श्वास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब मन अशांत होता है, तो श्वास तेज और अनियमित हो जाती है; और जब श्वास को धीमा व लंबा किया जाता है, तो मन के उग्र घोड़े तुरंत शांत होने लगते हैं। उपनिषद् कहता है — "विद्वान्मनो धारयेताप्रमत्तः" — अपने जीवन के रथ के एक सजग, सावधान और दक्ष सारथी बनिए।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **आपातकालीन श्वास विराम (Emergency Breath Pause)**: जब भी क्रोध, उत्तेजना या घबराहट का तीव्र वेग आए, तो प्रतिक्रिया देने से पूर्व 4 सेकंड श्वास लें और 6-8 सेकंड में धीरे-धीरे नासिका से छोड़ें। इस प्रकार के 5 चक्र आपके तंत्रिका-तंत्र को तुरंत शांत कर देंगे। - **सजग सारथी की दृष्टि**: अपने विचारों और मनोवेगों के साथ बहने के बजाय उन्हें एक तटस्थ दर्शक की भाँति देखिए। जैसे ही आप 'घोड़े' (आवेग) बनने के बजाय 'सारथी' (साक्षी) बनते हैं, आवेगों की शक्ति क्षीण हो जाती है। - **प्रातःकालीन प्राण-साधना**: प्रतिदिन प्रातः 10 मिनट अनुलोम-विलोम अथवा दीर्घ प्राणायाम का अभ्यास कीजिए। यह आपके पूरे दिन के मानसिक संतुलन की नींव तैयार करेगा।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आपका जीवन आपके विवेक रूपी सारथी द्वारा चलाया जा रहा है, अथवा मन के उद्दंड घोड़े आपको अपनी मनमर्जी से किसी भी दिशा में घसीट रहे हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

न्यूरो-रेस्पिरेटरी कपलिंग (Neuro-respiratory coupling) और वेगस तंत्रिका सक्रियण: जब श्वास को धीमा, गहरा और सममित किया जाता है (विशेषकर लंबा रेचन / Prolonged exhalation), तो फेफड़ों के स्ट्रेच रिसेप्टर्स वेगस तंत्रिका को संकेत भेजते हैं, जिससे मस्तिष्क के साइनोट्रायल नोड पर एसिटाइलकोलीन का स्राव होता है और हृदय गति धीमी होती है। यह प्रक्रिया अमिग्डाला (Amygdala) के अति-सक्रिय भय-परिपथ को शांत कर प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स की कार्यकारी कार्यप्रणाली को पुनर्स्थापित करती है। रथ और घोड़ों का रूपक आधुनिक न्युरोबायोलॉजी में 'लिम्बिक सिस्टम' (भावनात्मक आवेग रूपी घोड़े) और 'प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स' (सारथी रूपी विवेक) के अंतर्संबंध का सटीक निरूपण है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (Book Code 0073). Gita Press Gorakhpur (Official Publication)
Translation
Gita Press Editorial Board (Hindi)
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Collated with Dashopanishad Anandashram Series.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 6.34

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्

Translation / Meaning (भावार्थ)

The mind is restless, turbulent, obstinate, and very strong, O Krishna — to subdue it is more difficult than controlling the wind.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next