Ravana Samhita
11
अध्याय 11 / 19

Moksha Vichara — The Final Philosophical Synthesis

मोक्षविचार

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 11

श्लोक 1

बन्धो मोक्षश्च जीवस्य स्वस्वरूपाज्ञानतः ।ज्ञानाद्बन्धो विलीयेत मोक्षः स्वस्थस्य लक्षणम्

bandho mokṣaśca jīvasya svasvarūpājñānataḥ | jñānādbandho vilīyeta mokṣaḥ svasthasya lakṣaṇam

हिन्दी अर्थ

जीव का बन्ध और मोक्ष दोनों स्वस्वरूप के अज्ञान से हैं। ज्ञान से बन्ध विलीन होता है — मोक्ष स्वस्थ की पहचान है।

English

Bondage and liberation of the jiva both arise from ignorance of one's own true nature. Through knowledge, bondage dissolves — liberation is the mark of one who is established in the Self.

अध्याय 11

श्लोक 18

जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः ।केनापि देवेन हृदिस्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि

jānāmi dharmaṃ na ca me pravṛttiḥ jānāmyadharmaṃ na ca me nivṛttiḥ | kenāpi devena hṛdisthitena yathā niyukto'smi tathā karomi

हिन्दी अर्थ

मैं धर्म जानता हूँ, फिर भी उसमें प्रवृत्ति नहीं। अधर्म जानता हूँ, फिर भी निवृत्ति नहीं। हृदय में स्थित किसी देव द्वारा — जैसे नियुक्त हूँ वैसा करता हूँ।

English

I know dharma, yet I am not inclined toward it. I know adharma, yet I cannot turn away from it. By some deity dwelling in my heart — as I am impelled, so I act.

अध्याय 11

श्लोक 33

मोक्षो न जन्मान्तरसाध्यो न तपसा न योगेन ।स्वस्वरूपानुसन्धानात् सद्यो मुक्तिः प्रजायते

mokṣo na janmāntarasādhyo na tapasā na yogena | svasvarūpānusandhānāt sadyo muktiḥ prajāyate

हिन्दी अर्थ

मोक्ष न अनेक जन्मों से, न तप से, न योग से सिद्ध होता है। अपने स्वस्वरूप के अनुसन्धान से — तत्काल मुक्ति उत्पन्न होती है।

English

Liberation is not achieved through many births, not through austerity, not through yoga. From inquiry into one's own essential nature — liberation arises immediately.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/ · प्राप्त 3/6/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।