श्रीरामचरितमानस

Aranya Kanda — The Forest Lifeश्लोक 10/3033%

Shri Ramcharitmanas 3.10

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

काहूँ बैठन कहा न ओही।राखि को सकइ राम कर द्रोही॥ मातु मृत्यु पितु समन समाना।सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

किसी ने जयंत को बैठने तक के लिए नहीं कहा। राम के द्रोही को कौन रख सकता है? जो परमात्मा से विमुख होता है, उसके लिए माता मृत्यु के समान, पिता यमराज के समान और अमृत भी विष बन जाता है। नारद जी की सलाह पर जब जयंत ने श्रीराम की शरण ली, तो दयालु प्रभु ने उसकी जान बख्श दी। यह शरणागति और क्षमा का महान संदेश है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
संसार तब तक आपके साथ खड़ा रहता है जब तक आप सफल और निर्दोष हैं। विपत्ति और भूल के समय संसार दुत्कार देता है। परंतु परमात्मा और सच्ची करुणा का द्वार पश्चाताप करने वाले के लिए सदा खुला रहता है। चाहे कितनी भी बड़ी भूल हो गई हो, यदि सच्चा पश्चाताप हो तो क्षमा और नई शुरुआत संभव है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **शरणागति का भाव (Unconditional Surrender)**: अपनी सभी चिंताओं और गलतियों को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर सच्चा पश्चाताप करें। - **क्षमाशीलता का अभ्यास (Practicing Forgiveness)**: जब कोई अपनी भूल स्वीकार कर आपके पास आए, तो श्रीराम की तरह उसे सुधार का अवसर दें। - **सच्चा मित्र पहचानें (Valuing True Guides)**: संकट के समय जो नारद जी की भांति आपको सत्य और कल्याण का मार्ग दिखाए, वही सच्चा हितेषी है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मेरे मन में किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति क्षमा का अभाव है जो अपनी भूल स्वीकार कर चुका है, या क्या मैं स्वयं अपनी भूल मानकर झुकने में झिझक रहा हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

रेस्टोरेटिव जस्टिस (पुनर्स्थापनात्मक न्याय) और 'पार्डन साइकोलॉजी' पर शोध बताते हैं कि जब कोई अपराधी पूरी विनम्रता से अपनी भूल स्वीकार कर समर्पण करता है, तो दंड के बजाय सुधार की प्रक्रिया शुरू होती है, जो व्यक्ति को मानसिक रूप से पुनर्जीवन प्रदान करती है और सामाजिक सद्भाव को पुनः स्थापित करती है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Illustrated Edition (Book Code 0080). Gita Press Gorakhpur (Official Publication)
Translation
Gita Press Editorial Board (Hindi)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Public Domain Awadhi text and Hindi translation
पाठ-भेद · Variant readings
Collated with Kashi Nagari Pracharini Sabha recension.

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आगे क्या · What next