प्रश्नोपनिषद्

Praśna 2श्लोक 2.5/1338%

Prashna Upanishad 2.2.5

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः ।एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

यह (प्राण) ही अग्नि है, यह ही सूर्य, यह ही पर्जन्य (वर्षा), यह ही इन्द्र (मघवान्), यह ही वायु, यह ही पृथ्वी, यह ही रयि — और यही देव, सत्, असत्, और अमृत है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

This (Prāṇa) is the burning Agni. This is the Sun. This is the rain, this is Indra. This is Vāyu. This is Earth, this is Rayi, this is the deva — being and non-being and the immortal.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

प्राण की श्रेष्ठता का साक्षात अनुभव करके लज्जित और विस्मयचकित हुई इंद्रियां प्राण की स्तुति करने लगती हैं: 'एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुरेष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत्'। यह प्राण ही अग्नि बनकर तपता है; यही सूर्य बनकर तपता है; यही पर्जन्य (मेघ) बनकर बरसता है; यही इन्द्र (देवराज) है; यही वायु है; यही पृथ्वी, रयि और दिव्य प्रकाश है। जो कुछ भी सत् (व्यक्त संसार) है, असत् (अव्यक्त कारण) है, और जो अमृत (अविनाशी तत्व) है — वह सब साक्षात् प्राण ही है। यह प्राण का वैयक्तिक श्वास से उठकर सार्वभौमिक कॉस्मिक चेतना में रूपांतरण है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
हम अक्सर जीवन में आने वाले विभिन्न रूपों — प्रकृति, ऋतुएं, लोग और परिस्थितियां — को एक-दूसरे का शत्रु या प्रतिस्पर्धी मान लेते हैं। इंद्रियों की यह स्तुति हमें सिखाती है कि बाहर चमकता सूर्य, बरसता मेघ और आपके भीतर चलती श्वास एक ही परम जीवन-शक्ति के विविध रूप हैं। जब आप सृष्टि के प्रत्येक कण में उसी एक प्राण का दर्शन करते हैं, तो आपका प्रकृति के प्रति नजरिया पूरी तरह बदल जाता है — शोषण की जगह आदर और दोहन की जगह कृतज्ञता ले लेती है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **प्रकृति में एक ही ऊर्जा का दर्शन (Perceiving One Energy in Nature)**: धूप, हवा, वर्षा या हरियाली का अनुभव करते समय यह स्मरण करें कि यह वही प्राण है जो आपके भीतर भी धड़क रहा है; प्रकृति के साथ आत्मीयता अनुभव करें। - **संकीर्ण सीमाओं का अतिक्रमण (Transcending Rigid Categories)**: सुख और दुख, लाभ और हानि (सत् और असत्) को एक ही जीवन-प्रवाह के दो पहलू मानकर दोनों में समभाव बनाए रखें। - **श्वास के माध्यम से ब्रह्माण्ड से जुड़ाव (Connecting Through Breath)**: प्रत्येक सांस लेते समय यह भाव करें कि आप संपूर्ण ब्रह्माण्ड की जीवनी शक्ति को ग्रहण कर रहे हैं, और सांस छोड़ते समय अपना अहंकार समर्पित कर रहे हैं।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप प्रकृति और अन्य प्राणियों को अपने से अलग और पराया मानते हैं, या आप यह अनुभव कर पा रहे हैं कि सूर्य, मेघ, पृथ्वी और आपकी अपनी श्वास में एक ही अखंड प्राण स्पंदित हो रहा है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

ऊर्जा का सार्वभौमिक संरक्षण और गतिकी (Universal Conservation of Energy & First Law of Thermodynamics): भौतिकी का प्रथम नियम कहता है कि ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न नष्ट; वह केवल रूप बदलती है। ताप, प्रकाश, गति, रासायनिक ऊर्जा, विद्युत — ये सभी एक ही ऊर्जा के विभिन्न रूप हैं। उपनिषद् में इंद्रियों द्वारा प्राण की यह स्तुति कि 'तू ही अग्नि है, तू ही सूर्य है, तू ही वायु है' भौतिकी के ऊर्जा-संरक्षण सिद्धांत का भव्य आध्यात्मिक गान है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ऊर्जा का ही एक अखंड महासागर है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
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Translation
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Last updated
2026-10-24
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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Bhagavad Gita 2.22

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि

Translation / Meaning (भावार्थ)

As a person casts off worn-out garments and puts on new ones, so the embodied soul casts off worn-out bodies and enters new ones.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next