Matsya Purana
153
अध्याय 153 / 176

Adhyaya 153

219 श्लोकभाग 4/4 · श्लोक 207–219

पूर्ण अध्याय पाठ13 श्लोक

अध्याय 153

श्लोक 207

शक्तिं चिक्षेप दुर्धर्षां दानवेन्द्राय संयुगे नवा शिरीषमालेव सास्य वक्षस्यराजत

śaktiṃ cikṣepa durdharṣāṃ dānavendrāya saṃyuge navā śirīṣamāleva sāsya vakṣasyarājata

हिन्दी अर्थ

करता है तथा राजा ठीक-ठीक निर्णय करनेवाला होता है वहाँ प्रजाएँ कष्ट नहीं झेलतीं। यदि राज्यमें दण्डनीतिकी ब्राह्मण, स्त्री और विधवा-ये सभी मात्स्यन्यायके अनुसार आपसमें एक-दूसरेको खा जायँ। यदि राजा दण्डकी व्यवस्था न करे तो सभी देवता, हैत्य, सर्पगण, प्राणी तथा उत्क्रामयेयुर्मर्यादां यदि दण्डं न पातयेत्॥ १० पक्षी मर्यादाका उल्लङ्घन कर जायँगे

English

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अध्याय 153

श्लोक 208

ततः खड्गं समाकृष्य कोशाद् आकाशनिर्मलम् भासितासितदिग्भागं लोकपालो ऽपि निरृतिः

tataḥ khaḍgaṃ samākṛṣya kośād ākāśanirmalam bhāsitāsitadigbhāgaṃ lokapālo 'pi nirṛtiḥ

हिन्दी अर्थ

एष ब्रह्माभिशापेषु सर्वप्रहरणेषु च। यह दण्ड ब्राह्मणके शाप, सभीके अस्त्र-शस्त्र,

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श्लोक 209

चिक्षेप दानवेन्द्राय तस्य मूर्ध्नि पपात च पतितश्चागमत्खड्गः स शीघ्रं शतखण्डताम्

cikṣepa dānavendrāya tasya mūrdhni papāta ca patitaścāgamatkhaḍgaḥ sa śīghraṃ śatakhaṇḍatām

हिन्दी अर्थ

सर्वविक्रमकोपेषु व्यवसाये च तिष्ठति॥ ११ सभी प्रकारके पराक्रमपूर्वक क्रोधसे किये गये क्रिया- पूज्यन्ते दण्डिनो देवैर्न पूज्यन्ते त्वदण्डिनः। न ब्रह्माणं विधातारं न पूषार्यमणावपि

English

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श्लोक 210

जलेशस्तूग्रदुर्धर्षं विषपावकभैरवम् मुमोच पाशं दैत्यस्य भुजबन्धाभिलाषुकः

jaleśastūgradurdharṣaṃ viṣapāvakabhairavam mumoca pāśaṃ daityasya bhujabandhābhilāṣukaḥ

हिन्दी अर्थ

यजन्ते मानवाः केचित् प्रशान्ताः सर्वकर्मसु । रुद्रमग्निं च शक्रं च सूर्याचन्द्रमसौ तथा विष्णुं देवगणांश्चान्यान् दण्डिनः पूजयन्ति च।

English

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अध्याय 153

श्लोक 211

स दैत्यभुजमासाद्य सर्पः सद्यो व्यपद्यत स्फुटितक्रकचक्रूरदशनालिर् महाहनुः

sa daityabhujamāsādya sarpaḥ sadyo vyapadyata sphuṭitakrakacakrūradaśanālir mahāhanuḥ

हिन्दी अर्थ

दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्म विदुर्बुधाः । राजदण्डभयादेव पापाः पापं न कुर्वते यमदण्डभयादेके परस्परभयादपि। एवं सांसिद्द्धिके लोके सर्व दण्डे प्रतिष्ठितम्

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श्लोक 212

ततो ऽश्विनौ समरुतः ससाध्याः समहोरगाः यक्षराक्षसगन्धर्वा दिव्यनानास्त्रपाणयः

tato 'śvinau samarutaḥ sasādhyāḥ samahoragāḥ yakṣarākṣasagandharvā divyanānāstrapāṇayaḥ

हिन्दी अर्थ

भागो धृतः शूलधरस्य यज्ञे। कलाप और व्यवसायमें स्थित रहता है। दण्ड देनेवाले व्यक्ति देवताओंद्वारा पूज्य हैं, किंतु दण्ड न देनेवालोंकी पूजा कहीँ भी नहीं होती। ब्रह्मा, पूषा और अर्यमा सभी कायाँमें शान्त रहते हैं, इसलिये कोई भी मनुष्य उनकी

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श्लोक 213

जघ्नुर्दैत्येश्वरं सर्वे सम्भूय सुमहाबलाः न चास्त्राण्यस्य सजन्ति गात्रे वज्राचलोपमे

jaghnurdaityeśvaraṃ sarve sambhūya sumahābalāḥ na cāstrāṇyasya sajanti gātre vajrācalopame

हिन्दी अर्थ

पूजा नहीं करता। साथ ही दण्ड देनेवाले रुद्र, अग्नि, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, विष्णु एवं अन्य देवगणोंको सभी लोग पूजा करते हैं। दण्ड सभी प्रजाओंपर शासन करता है तथा दण्ड ही सबकी रक्षा करता है। दण्ड सभीके सो जानेपर भी जागता रहता है, अतएव बुद्धिमान् लोग दण्डको धर्म मानते हैं। कुछ पापी राजदण्डके भयसे, कुछ यमराजके दण्डके भयसे और कतिपय पारस्परिक भयसे भी पापकर्म नहीं करते। इस प्रकार इस प्राकृतिक जगत्में सभी कुछ दण्डपर ही प्रतिष्ठित है। यदि दण्ड न दिया जाय तो प्रजा घोर अंधकारमें डूब जाय। चूँकि दण्ड दमन करता है और दुर्मदोंको दण्ड भी देता है, इसलिये दमन करने तथा दण्ड देनेके कारण बुद्धिमान्

English

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श्लोक 214

ततो रथादवप्लुत्य तारको दानवाधिपः जघान कोटिशो देवान् करपार्ष्णिभिरेव च

tato rathādavaplutya tārako dānavādhipaḥ jaghāna koṭiśo devān karapārṣṇibhireva ca

हिन्दी अर्थ

लोग उसे दण्ड मानते हैं। दण्डके भयसे डरे हुए समस्त देवताओंने यज्ञमें शिवजीका भाग निश्चित किया है और भयके कारण ही स्वामी कार्तिकेयको शैशवावस्थामें ही सारी देवसेनाका सेनापतित्व और वरं शिशूनां च भयाद् बलस्थम्॥ १८ वरदान प्रदान किया गया है॥

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श्लोक 215

हतशेषाणि सैन्यानि देवानां विप्रदुद्रुवुः दिशो भीतानि संत्यज्य रणोपकरणानि तु

hataśeṣāṇi sainyāni devānāṃ vipradudruvuḥ diśo bhītāni saṃtyajya raṇopakaraṇāni tu

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मे दण्डप्रशंसा नाम पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें दण्डप्रशंसा नामक दो सौ पचीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ सामान्य राजनीतिका निरूपण

English

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श्लोक 216

लोकपालांस्ततो दैत्यो बबन्धेन्द्रमुखान्रणे सकेशवान्दृढैः पाशैः पशुमारः पशूनिव

lokapālāṃstato daityo babandhendramukhānraṇe sakeśavāndṛḍhaiḥ pāśaiḥ paśumāraḥ paśūniva

हिन्दी अर्थ

दण्डप्रणयनार्थाय राजा सृष्टः स्वयम्भुवा। देवभागानृपादाय मत्स्यभगवानूने कहा-राजन्! ब्रह्माने समस्त प्राणियोंकी रक्षाके निमित्त दण्डका प्रयोग करनेके लिये सर्वभूतादिगुप्तये॥ १ देवताओंके अंशोंको लेकर राजाकी सृष्टि की है। चूँकि तेजसे देदीप्यमान होनेके कारण कोई भी उसकी ओर

English

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श्लोक 217

स भूयो रथमास्थाय जगाम स्वकमालयम् सिद्धगन्धर्वसंघुष्टविपुलाचलमस्तकम्

sa bhūyo rathamāsthāya jagāma svakamālayam siddhagandharvasaṃghuṣṭavipulācalamastakam

हिन्दी अर्थ

ततो भवति लोकेषु राजा भास्करवत्प्रभुः॥ २ देख नहीं सकता, इसीलिये राजा लोकमें सूर्यके समान यदास्य दर्शने लोकः प्रसादमुपगच्छति। प्रभावशाली होता है। जिस समय इसे देखनेसे लोग नयनानन्दकारित्वात् तदा भवति चन्द्रमाः

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श्लोक 218

स्तूयमानो दितिसुतैर् अप्सरोभिर्विनोदितः त्रैलोक्यलक्ष्मीस्तद्देशे प्राविशत्स्वपुरं यथा

stūyamāno ditisutair apsarobhirvinoditaḥ trailokyalakṣmīstaddeśe prāviśatsvapuraṃ yathā

हिन्दी अर्थ

यथा यमः प्रियद्वेष्ये प्राप्ते काले प्रयच्छति। तथा पापान् निगृह्णीयाद् व्रतमेतद्धि वारुणम्॥

English

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अध्याय 153

श्लोक 219

निषसादासने पद्मरागरत्नविनिर्मिते ततः किंनरगन्धर्वनागनारीविनोदितैः क्षणं विनोद्यमानस्तु प्रचलन्मणिकुण्डलः

niṣasādāsane padmarāgaratnavinirmite tataḥ kiṃnaragandharvanāganārīvinoditaiḥ kṣaṇaṃ vinodyamānastu pracalanmaṇikuṇḍalaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्यात् पापकर्मसु । दुष्टसामन्तहिंस्त्रेषु राजाग्नेयव्रते स्थित: ॥ वार्षिकांश्चतुरो मासान् यथेन्द्रोऽप्यभिवर्षति। तथाभिवर्षेत् स्वं राज्यं काममिन्द्रव्रतं स्मृतम् तथा हरेत् करं राष्ट्रान्नित्यमर्कव्रतं हि तत्

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।