Matsya Purana
153
अध्याय 153 / 176

Adhyaya 153

219 श्लोकभाग 2/4 · श्लोक 63–136

पूर्ण अध्याय पाठ74 श्लोक

अध्याय 153

श्लोक 63

जगाम पश्चाच्चरणैर् धरणीं भूधराकृतिः लाघवात्क्षिप्रमुत्थाय ततो ऽमरमहागजः

jagāma paścāccaraṇair dharaṇīṃ bhūdharākṛtiḥ lāghavātkṣipramutthāya tato 'maramahāgajaḥ

हिन्दी अर्थ

कुद्दालरज्जुवेत्राणां पीठकानां तथैव च। तुषाणां चैव दात्राणामङ्काराणां च संचयः तथा उसी: स्थलपर “एवं उसी दिशामें मन्त्रियों: और वैद्यका निवासस्थान एवं कोष्ठागार बनानेका: विधान है। : उसी स्थानके समीप गौओं तथा अश्वोके निवासकी

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अध्याय 153

श्लोक 64

रणादपससर्पाशु भीषितो निमिहस्तिना ततो वायुर्ववौ रूक्षो बहुशर्करपांसुलः

raṇādapasasarpāśu bhīṣito nimihastinā tato vāyurvavau rūkṣo bahuśarkarapāṃsulaḥ

हिन्दी अर्थ

व्यवस्था करनी चाहिए। अश्चोंकी पंक्ति उत्तराभिमुखी अथवा दक्षिणाभिमुखी हो सकती है, अन्य दिशाभिमुखी निन्दित मानी गयी है। जहाँ अश्व रखे जायँ वहाँ रातभर दीपक जलते रहना चाहिए। अश्वशालामें मुर्गा, बंदर, मर्कट तथा बछड्रेसहित गौ भी रखनेका विधान है। अश्वोंका कल्याण चाहनेवाला अश्वशालामें बकरिंयोंको भी रखे। गौ, हाथी और अश्वादि शालाओंमें उनके गोबर निकालनेकी व्यवस्था सूर्य अस्त हो जानेपर नहीं करनी

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श्लोक 65

संमुखो निमिमातङ्गो जवनाचलकम्पनः स्रुतरक्तो बभौ शैलो घनधातुह्रदो यथा

saṃmukho nimimātaṅgo javanācalakampanaḥ srutarakto babhau śailo ghanadhātuhrado yathā

हिन्दी अर्थ

चाहिए। राजा उन-उन स्थानोंमें यथायोग्य समझकर क्रमशः सभी सारथियोंको आवासस्थान प्रदान करे। इसी प्रकार सबसे बढ़कर योद्धाओं, शिल्पियों और कालमन्त्रके वेत्ताओंको दुर्गमें उत्तम निवास-स्थान दे। इसी प्रकार राजाको गौ-वैद्य, अश्व-वैद्य तथा गज-वैद्यको भी रखना चाहिए; क्योंकि दुर्गमें कभी रोगोंकी प्रबलता हो सकती है। दुर्गमें चारणों, संगीतज्ञों और ब्राह्मणोंके स्थानका विधान है इनके अतिरिक्त दुर्गमें निरर्थक बहुत-से व्यक्तियोंको नहीं रखना चाहिए। राजन्! दुर्गमें विविध प्रकारके शस्तरासत्रसे युक्त एवं हजारोंको मारनेमें समर्थ योद्धाओंको रखना चाहिए; क्योंकि उन्हींसे रक्षा होती है। राजाको

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श्लोक 66

धनेशो ऽपि गदां गुर्वीं तस्य दानवहस्तिनः चिक्षेप वेगाद्दैत्येन्द्रो निपपातास्य मूर्धनि

dhaneśo 'pi gadāṃ gurvīṃ tasya dānavahastinaḥ cikṣepa vegāddaityendro nipapātāsya mūrdhani

हिन्दी अर्थ

दुर्गमे गु्तद्वार भी बनवाना चाहिए। राजन्! दुर्गमें सभी प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंके संग्रहकी विशेष प्रशंसा की गयी है। नृपश्रेष्ठ राजन्! राजाको दुर्गमें धनुष, ढेलवाँस, तोमर, बाण, तलवार, कवच, लाठी, गुड (हाथीको फॅसानेका एक फंदा), हुड (चोरोंको फँसानेका खूँटा),

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श्लोक 67

गजो गदानिपातेन स तेन परिमूर्छितः दन्तैर्भित्त्वा धरां वेगात् पपाताचलसंनिभः

gajo gadānipātena sa tena parimūrchitaḥ dantairbhittvā dharāṃ vegāt papātācalasaṃnibhaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रास (भाला), शूल, शक्ति, फरसा, चक्र, चर्मके साथ कोयला-इन सबका संचय करना चाहिए। दुर्गमें सभी प्रकारके शिल्पीय पात्रोंका भी संचय रहना चाहिए। वह सभी प्रकारके वाद्यों तथा ओषधियोंका भी संचय करे।

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श्लोक 68

पतिते तु गजे तस्मिन् सिंहनादो महानभूत् सर्वतः सुरसैन्यानां गजबृंहितबृंहितैः

patite tu gaje tasmin siṃhanādo mahānabhūt sarvataḥ surasainyānāṃ gajabṛṃhitabṛṃhitaiḥ

हिन्दी अर्थ

'कलायमुद्रमाषाणां चणकानां तिलैः सह। तथा च सर्वसस्यानां पांसुगोमययोरपि राजा संचिनुयाद् दुर्गे यच्चान्यदपि किञ्चन

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श्लोक 69

ह्रेषारवेण चाश्वानां गुणास्फोटैश्च धन्विनाम् गजं तं निहतं दृष्ट्वा निमिं चापि पराङ्मुखम्

hreṣāraveṇa cāśvānāṃ guṇāsphoṭaiśca dhanvinām gajaṃ taṃ nihataṃ dṛṣṭvā nimiṃ cāpi parāṅmukham

हिन्दी अर्थ

कुम्भाश्चाशीविषैः कार्या व्यालसिंहादयस्तथा। मृगाश्च पक्षिणश्चैव रक्ष्यास्ते च परस्परम् कर्तव्यानि महाभाग यल्नेन पृथिवीक्षिता सुगुप्तानि पुरे कुर्याज्जनानां हितकाम्यया

English

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श्लोक 70

श्रुत्वा च सिंहनादं च सुराणामतिकोपनः जम्भो जज्वाल कोपेन पीताज्य इव पावकः

śrutvā ca siṃhanādaṃ ca surāṇāmatikopanaḥ jambho jajvāla kopena pītājya iva pāvakaḥ

हिन्दी अर्थ

जीवकर्षभकाकोलमामलक्याटरूषकान् । शालपर्णी पृश्चिपर्णी मुद्गपर्णी तथैव च वीरा श्वसन्ती वृष्या च बृहती कण्टकारिका

English

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श्लोक 71

स सुरान्कोपरक्ताक्षो धनुष्यारोप्य सायकम् तिष्ठतेत्यब्रवीत्तावत् सारथिं चाप्यचोदयत्

sa surānkoparaktākṣo dhanuṣyāropya sāyakam tiṣṭhatetyabravīttāvat sārathiṃ cāpyacodayat

हिन्दी अर्थ

शृङ्गी शृङ्गाटको द्रोणी वर्षाभूर्दर्भ रेणुका। मधुपर्णी विदार्ये द्वे महाक्षीरा महातपाः धन्वनः सहदेवाह्णा कटुकैरण्डकं विषः। पर्णी शताह्वा मृद्वीका फल्गुखर्जूरयष्टिका: शुक्रातिशुक्र काश्मर्यश्छत्रातिच्छत्रबीरणाः । इक्षुरिक्षुविकाराश्च फाणिताद्याश्च सत्तम

English

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श्लोक 72

वेगेन चलतस्तस्य तद्रथस्याभवद्द्युतिः यथादित्यसहस्रस्याभुदितस्योदयाचले

vegena calatastasya tadrathasyābhavaddyutiḥ yathādityasahasrasyābhuditasyodayācale

हिन्दी अर्थ

सिंही च सहदेवी च विश्रेदेवाश्वरोधकम्। मधुकं पुष्पहंसाख्या शतपुष्पा मधूलिका शतावरीमधूके च पिप्पलं तालमेव च। आत्मगुप्ता कट्फलाख्या दार्विका राजशीर्षको

English

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श्लोक 73

पताकिना रथेनाजौ किङ्किणीजालमालिना शशिशुभ्रातपत्रेण स तेन स्यन्दनेन तु

patākinā rathenājau kiṅkiṇījālamālinā śaśiśubhrātapatreṇa sa tena syandanena tu

हिन्दी अर्थ

कालशाकं पदमबीजं गोवल्ली मधुवल्लिका शीतपाकी कुलिङ्गाक्षी काकजिह्वोरुपुष्पिका। पर्वतत्रपुसौ चोभौ गुञ्जातकपुनर्नवे वहाँ प्रचुरमात्रामें घास-भूसा, ईधन, गुड, सभी प्रकारके तेल तथा गोरसका भी संचय हो। राजाको दुर्गमें वसा, मज्जा, हड्डियोंसहित स्नायु, गोचर्मसे बने नगाड़े, धान्य, तम्बू, जौ, गेहूँ, रल, सभी प्रकारके वस्त्र, लौह, कुलथी,

English

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अध्याय 153

श्लोक 74

घट्टयन्सुरसैन्यानां हृदयं समदृश्यत तम् आयान्तम् अभिप्रेक्ष्य धनुष्याहितसायकः

ghaṭṭayansurasainyānāṃ hṛdayaṃ samadṛśyata tam āyāntam abhiprekṣya dhanuṣyāhitasāyakaḥ

हिन्दी अर्थ

मूँग, उड़द, चना, तिल, सभी प्रकारके अन्न, धूल, गोबर, सन, भोजपत्र, जस्ता, लाह, पत्थर तोड्नेकी छेनी तथा अन्य भी जो कुछ पदार्थ हों, उनका संचय करना चाहिए। सर्पोके विषसे भरे घड़े, साँप, सिंह आदि हिंसक जन्तु, मृग तथा पक्षी रखे जाने चाहिए, किंतु वे एक-दूसरेसे सुरक्षित रहें। महाभाग! राजाको विरोधी जीवोंकी रक्षाके लिये यत्रपूर्वक पृथक्-पृथक् स्थान बनवाना चाहिए। राजाको प्रजाकी कल्याण-भावनासे

English

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श्लोक 75

शतक्रतुरदीनात्मा दृढमाधत्त कार्मुकम् बाणं च तैलधौताग्रम् अर्धचन्द्रमजिह्मगम्

śatakraturadīnātmā dṛḍhamādhatta kārmukam bāṇaṃ ca tailadhautāgram ardhacandramajihmagam

हिन्दी अर्थ

कही गयी अथवा न कही गयी सम्पूर्ण राजवस्तुओंको दुर्गमें गुप्तरूपसे संग्रहीत करना चाहिए ॥२७--४२॥ जीवक, ऋषभक, काकोल, इमली, आरटरूष, शालपर्णी, पृश्चिपर्णी, मुद्रपर्णी, माषपर्णी, दोनों प्रकारकी मेदा, दोनों प्रकारकी शारिवा, तीनों बलाएँ (एक ओषधि), वीरा, श्वसन्ती, वृष्या, बृहती, कण्टकारिका, शृङ्गी, शृङ्गाटकी, द्रोणी, वर्षाभू, कुश, रेणुका, मधुपर्णी, दोनों विदारी, महाक्षीरा, महातपा, धन्वन, सहदेवी, कटुक, रेड, विष, शतपर्णी, मृद्वीका, फल्गु, खजूर, यष्टिका, शुक्र, अतिशुक्र, काश्मरी, छत्र, अतिछत्र, वीरण, ईख और ईखसे होनेवाली अन्य वस्तुएँ, फाणित आदि, सिंही, सहदेवी, विश्वदेव, अश्वरोधक, महुआ, पुष्पहंसा,

English

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अध्याय 153

श्लोक 76

तेनास्य सशरं चापं रणे चिछेद वृत्रहा क्षिप्रं संत्यज्य तच्चापं जम्भो दानवनन्दनः

tenāsya saśaraṃ cāpaṃ raṇe cicheda vṛtrahā kṣipraṃ saṃtyajya taccāpaṃ jambho dānavanandanaḥ

हिन्दी अर्थ

शतपुष्पा, मधूलिका, शतावरी, महुआ, (दाख) पिप्पल, ताल, आत्मगुप्ता, कटफल, दार्विका, राजशीर्षकी, श्वेत सरसों, धनिया, ऋष्यप्रोक्ता, उत्कटा, कालशाक, पद्मबीज, गोवल्ली, मधुवल्लिका, शीतपाकी, कुलिंगाक्षी, काकजिह्ना, उरुपुष्पका, दोनों पर्वत और त्रपुष, गुंजातक, पुनर्नवा,

English

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अध्याय 153

श्लोक 77

अन्यत्कार्मुकमादाय वेगवद्भारसाधनम् शरांश्चाशीविषाकारांस् तैलधौतानजिह्मगान्

anyatkārmukamādāya vegavadbhārasādhanam śarāṃścāśīviṣākārāṃs tailadhautānajihmagān

हिन्दी अर्थ

कसेरुका तु काश्मीरी बिल्वशालूककेसरम्। तुषधान्यानि सर्वाणि शमी धान्यानि चैव हि राजा संचिनुयात् सर्व पुरे निरवशेषतः दाडिमाम्रातकौ चैव तिन्तिडीकाम्लवेतसम्। भव्यकर्कन्धुलकुचकरमर्दकरूषकम्

English

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अध्याय 153

श्लोक 78

शक्रं विव्याध दशभिर् जत्रुदेशे तु पत्त्रिभिः हृदये च त्रिभिश्चापि द्वाभ्यां च स्कन्धयोर् द्वयोः

śakraṃ vivyādha daśabhir jatrudeśe tu pattribhiḥ hṛdaye ca tribhiścāpi dvābhyāṃ ca skandhayor dvayoḥ

हिन्दी अर्थ

कोलकद्वयपर्णानि द्वयोराम्रातयोरपि जाम्बवं नवनीतं च सौवीरकरुषोदके। सुरासवं च मद्यानि मण्डतक्रदधीनि च

English

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अध्याय 153

श्लोक 79

शक्रो ऽपि दानवेन्द्राय बाणजालमपीदृशम् अप्राप्तान्दानवेन्द्रस्तु शराञ्छक्रभुजेरितान्

śakro 'pi dānavendrāya bāṇajālamapīdṛśam aprāptāndānavendrastu śarāñchakrabhujeritān

हिन्दी अर्थ

एवमादीनि चान्यानि राजा संचिनुयात् पुरे कुप्यसौवर्चलाविल्वं बालकेयं यवाहूकम् औव क्षारं कालभस्म विज्ञेयो लवणो गणः। एवमादीनि चान्यानि राजा संचिनुयात् पुरे

English

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अध्याय 153

श्लोक 80

चिछेद दशधाकाशे शरैरग्निशिखोपमैः ततस्तु शरजालेन देवेन्द्रो दानवेश्वरम्

cicheda daśadhākāśe śarairagniśikhopamaiḥ tatastu śarajālena devendro dānaveśvaram

हिन्दी अर्थ

कारवी कुञ्जिका याज्या सुमुखा कालमालिका फणिज्झकोऽथ लशुनं भूस्तृणं सुरसं तथा। कायस्था च वयःस्था च हरितालं मनःशिला

English

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अध्याय 153

श्लोक 81

आच्छादयत यत्नेन वर्षास्विव घनैर्नभः दैत्यो ऽपि बाणजालं तद् व्यधमत्सायकैः शितैः

ācchādayata yatnena varṣāsviva ghanairnabhaḥ daityo 'pi bāṇajālaṃ tad vyadhamatsāyakaiḥ śitaiḥ

हिन्दी अर्थ

जया एरण्डकाण्डीरं शल्लकी हञ्जिका तथा सर्वपित्तानि मूत्राणि प्रायो हरितकानि च। फलानि चैव हि तथा सूक्ष्मैला हिङ्गुपत्रिका

English

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अध्याय 153

श्लोक 82

यथा वायुर्घनाटोपं परिवार्य दिशो मुखे शक्रो ऽथ क्रोधसंरम्भान् न विशेषयते यदा

yathā vāyurghanāṭopaṃ parivārya diśo mukhe śakro 'tha krodhasaṃrambhān na viśeṣayate yadā

हिन्दी अर्थ

राजा संचिनुयाद् दुर्गे प्रयतेन नृपोत्तम कसेरुका, काश्मीरी, बिल्व, शालूक, केसर, सभी प्रकारकी भूसियाँ, शमी, अन्न, दुग्ध, शहद, मट्टा, तेल,

English

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अध्याय 153

श्लोक 83

दानवेन्द्रं तदा चक्रे गन्धर्वास्त्रं महाद्भुतम् तदुत्थतेजसा व्याप्तम् अभूद्गमनगोचरम्

dānavendraṃ tadā cakre gandharvāstraṃ mahādbhutam tadutthatejasā vyāptam abhūdgamanagocaram

हिन्दी अर्थ

सोम और बाणक-इन सबको तथा इसी प्रकार अन्य पदार्थोंको मधुर जानना चाहिए। राजा इन सबका पूर्णरूपसे दुर्गमें संग्रह करे बड्हर, करमर्द, करूषक, विजौरा, कण्डूर, मालती, राज-बन्धुक, दोनों कोलकों और अमड़ोंके पत्ते, पारावत,

English

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अध्याय 153

श्लोक 84

गन्धर्वनगरैश् चापि नानाप्राकारतोरणैः मुञ्चद्भिरद्भुताकारैर् अस्त्रवृष्टिं समन्ततः

gandharvanagaraiś cāpi nānāprākāratoraṇaiḥ muñcadbhiradbhutākārair astravṛṣṭiṃ samantataḥ

हिन्दी अर्थ

मद्य, माँड, मठ्ठा, दही एवं ऐसे सभी प्रकारके श्वेत पदार्थोंको खट्टा समझना चाहिए राजा इनका तथा ऐसे अन्यान्य पदार्थोंका अपने दुर्गमें संचय करे। सैन्धव, सौवर्चल, अबिल्व, बालकेय, यव, भौम, क्षार, कालभस्म- ये सभी लवणके भेदोपभेद हे! इन सबका तथा अन्य लवणोंका दुर्गमें संग्रह करे।

English

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अध्याय 153

श्लोक 85

अथास्त्रवृष्ट्या दैत्यानां हन्यमाना महाचमूः जम्भं शरणमागच्छद् अप्रमेयपराक्रमम्

athāstravṛṣṭyā daityānāṃ hanyamānā mahācamūḥ jambhaṃ śaraṇamāgacchad aprameyaparākramam

हिन्दी अर्थ

पीपर, पीपरका मूल, चव्य, शीता, सौंठ, कुबेरक, जवीर, कलमालिका, कणिज्ञक, लहसुन, पालाके आकारवाला जलीय तृण, हरड़, कायस्था, वय:स्था, हरताल, मैनसिल, गिलोय, रुदंती, रोहिष, केशर, जया, रेड़ी, नरकट, शल्लकी, भारंगी, सभी प्रकारके छोटी इलायची, तेजपात आदि कटु ओषधियाँ हैं। राजश्रेष्ठ! राजा दुर्गमें प्रयत्रपूर्वक इनका संग्रह करे।

English

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अध्याय 153

श्लोक 86

व्याकुलो ऽपि स्वयं दैत्यः सहस्राक्षास्त्रपीडितः स्मरन्साधुसमाचारं भीतत्राणपरो ऽभवत्

vyākulo 'pi svayaṃ daityaḥ sahasrākṣāstrapīḍitaḥ smaransādhusamācāraṃ bhītatrāṇaparo 'bhavat

हिन्दी अर्थ

दूर्वा पटोलकटुका दन्तीत्वक् पत्रकं वचा। किराततिक्तभूतुम्बी विषा चातिविषा तथा काकोदुम्बरिका दिव्यास्तथा चैव सुरोद्भवा

English

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अध्याय 153

श्लोक 87

अथास्त्रं मौसलं नाम मुमोच दितिनन्दनः ततो ऽयोमुसलैः सर्वम् अभवत्पूरितं जगत्

athāstraṃ mausalaṃ nāma mumoca ditinandanaḥ tato 'yomusalaiḥ sarvam abhavatpūritaṃ jagat

हिन्दी अर्थ

षड्ग्रन्था रोहिणी मांसी पर्पटश्चाथ दन्तिका। रसाञ्जनं भृङ्गराजं पतङ्गी परिपेलवम् दुःस्पर्शा गुरुणी कामा श्यामाकं गन्धनाकुली रूपपर्णी व्याघ्रनखं मञ्जिष्ठा चतुरङ्गला रम्भा चैवाङ्कुरास्फीता तालास्फीता हरेणुका। वेत्राग्रवेतसस्तुम्बी विषाणी लोध्चपुष्पिणी

English

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अध्याय 153

श्लोक 88

एकप्रहारकरणैर् अप्रधृष्यैः समन्ततः गन्धर्वनगरं तेषु गन्धर्वास्त्रविनिर्मितम्

ekaprahārakaraṇair apradhṛṣyaiḥ samantataḥ gandharvanagaraṃ teṣu gandharvāstravinirmitam

हिन्दी अर्थ

मालती करकृष्णाख्या वृश्चिका जीविता तथा। पर्णिका च गुडूची च स गणस्तिक्तसंज्ञकः एवमादीनि चान्यानि राजा संचिनुयात् पुरे। अभयामलके चोभे तथैव च बिभीतकम्

English

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अध्याय 153

श्लोक 89

गान्धर्वमस्त्रं संधाय सुरसैन्येषु चापरम् एकैकेन प्रहारेण गजानश्वान्महारथान्

gāndharvamastraṃ saṃdhāya surasainyeṣu cāparam ekaikena prahāreṇa gajānaśvānmahārathān

हिन्दी अर्थ

प्रियद्भुधातकीपुष्पं मोचाख्या चार्जुनासनाः। अनन्ता स्त्री तुवरिका श्योणाकं कटूफलं तथा समङ्कात्रिवृतामूलकार्पासगैरिकाञ्जनम् विद्रुमं समधूच्छिष्टं कुम्भिका कुमुदोत्पलम्। न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थकिंशुकाः शिंशपा शमी

English

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अध्याय 153

श्लोक 90

रथाश्वान्सो ऽहनत्क्षिप्रं शतशो ऽथ सहस्रशः ततः सुराधिपस्त्वाष्ट्रम् अस्त्रं च समुदीरयत्

rathāśvānso 'hanatkṣipraṃ śataśo 'tha sahasraśaḥ tataḥ surādhipastvāṣṭram astraṃ ca samudīrayat

हिन्दी अर्थ

प्रियालपीलुकासारिशिरीषाः पद्मकं तथा। बिल्वोऽग्रिमन्थः प्लक्षश्च श्यामाकं च बको धनम् राजादनं करीरं च धान्यकं प्रियकस्तथा। कङ्कोलाशोकबदराः कदम्बखदिरद्वयम्

English

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अध्याय 153

श्लोक 91

संध्यमाने ततस्त्वाष्ट्रे निश्चेरुः पावकार्चिषः ततो यन्त्रमयान् दिव्यान् आयुधान्दुष्प्रधर्षिणः

saṃdhyamāne tatastvāṣṭre niśceruḥ pāvakārciṣaḥ tato yantramayān divyān āyudhānduṣpradharṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रयतेन नृपश्रेष्ठ राजा संचिनुयात् पुरे। कीटाश्च मारणे योग्या व्यङ्गतायां तथैव च तगर, छितवन, खैर, काली गूलर, दिव्या, सुरोद्भवा, षड्ग्रन्थी, परिपेलव, दुःस्पर्शा, अगुरुद्वय, कामा, श्यामाक, गंधनाकुली, तुषपर्णी, व्याश्रनख, मंजीठ, चतुरंगुला, केला, अंकुरास्फीता, तालास्फीता, रेणुकबीज, बेतका अग्रभाग, बेत, तुम्बी, कैंकरासींगी, लोध्रपुष्पिणी, मालती, करकृष्णा, वृश्चिका,

English

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अध्याय 153

श्लोक 92

तैर्यन्त्रैरभवद्बद्धम् अन्तरिक्षे वितानकम् वितानकेन तेनाथ प्रशमं मौसले गते

tairyantrairabhavadbaddham antarikṣe vitānakam vitānakena tenātha praśamaṃ mausale gate

हिन्दी अर्थ

जीविता, पर्णिका तथा गुडुच-यह तिक्त ओषधियोंका समूह है। राजा इनका तथा इसी प्रकारके अन्य तिक्त पदार्थोका दुर्गमें संग्रह रखे हरे, बहेड़ा, आँवला, मालकागुन, धायके फूल, मोचरस, अर्जुन, असन, अनन्ता, कामिनी, तुबरिका,

English

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अध्याय 153

श्लोक 93

शैलास्त्रं मुमुचे जम्भो यन्त्रसंघातताडनम् व्यामप्रमाणैरुपलैस् ततो वर्षमवर्तत

śailāstraṃ mumuce jambho yantrasaṃghātatāḍanam vyāmapramāṇairupalais tato varṣamavartata

हिन्दी अर्थ

कासारि, शिरीष, पद्म, बेल, अरणी, पाकड, श्यामाक, बक, धन, राजादन, करीर, धनिया, प्रियक, कंकोल, अशोक, बेर, कदंब, दोनों प्रकारके खैर-इन वृक्षोंके पत्ते, सारभाग (सत्त्व), मूल तथा पुष्प काषाय माने गये हैं। राजश्रेष्ठ! राजाको ये काषाय ओषधियाँ दुर्गमें रखनी चाहिए। राजन्! मारने एवं घायल करनेवाले कोट-पतंग तथा वायु, धूम, जल तथा मार्गको दूषित करनेवाली ओषधियोंको, जिन्हें मैं आगे बतलाऊँगा, राजाको दुर्गमें रखनी चाहिए।

English

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अध्याय 153

श्लोक 94

त्वाष्ट्रस्य निर्मितान्याशु यन्त्राणि तदनन्तरम् तेनोपलनिपातेन गतानि तिलशस्ततः

tvāṣṭrasya nirmitānyāśu yantrāṇi tadanantaram tenopalanipātena gatāni tilaśastataḥ

हिन्दी अर्थ

विषाणां धारणं कार्य प्रयत्नेन महीभुजा। विचित्राश्चागदा धार्या विषस्य शमनास्तथा रक्षोभूतपिशाचश्नाः पापध्नाः पुष्टिवर्धनाः।

English

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अध्याय 153

श्लोक 95

यन्त्राणि तिलशः कृत्वा शैलास्त्रं परमूर्धसु निपपातातिवेगेना-दारयत्पृथिवीं ततः

yantrāṇi tilaśaḥ kṛtvā śailāstraṃ paramūrdhasu nipapātātivegenā-dārayatpṛthivīṃ tataḥ

हिन्दी अर्थ

कुभृत्यान् पापशीलांश्च न राजा वासयेत् पुरे वणिग्जनैश्चावृतमावसेत राजाको प्रयत्नपूर्वक सभी विषोंका संग्रह करना चाहिए तथा विष-प्रभावको शान्त करनेवाली. विचित्र ओषधियोंको भी धारण करना उचित है। राक्षस, भूत तथा पिशाचोंके प्रभावको नष्ट करनेवाले, पापनाशक,

English

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अध्याय 153

श्लोक 96

ततो वज्रास्त्रम् अकरोत् सहस्राक्षः पुरंदरः तदोपलमहावर्षं व्यशीर्यत समन्ततः

tato vajrāstram akarot sahasrākṣaḥ puraṃdaraḥ tadopalamahāvarṣaṃ vyaśīryata samantataḥ

हिन्दी अर्थ

पुष्टिकारक पदार्थो तथा कलाविज्ञ पुरुषोंको भी दुर्गमें प्रयत्नपूर्वक स्थापित करना चाहिए। राजाको चाहिए कि उस दुर्गमें डरकर भागे हुए, उन्मत्त, क्रुद्ध, अपमानित तथा पापी दुष्ट अनुचरोंको न ठहरने दे। सभी प्रकारके यन्त्र, अस्त्र तथा अट्टालिकाओंके समूहसे संयुक्त, सभी प्रकारके अन्न तथा ओषधियोंसे सुसम्पन्न और व्यवसायी जनोंसे परिपूर्ण दुर्गमें राजाको सहैव

English

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अध्याय 153

श्लोक 97

ततः प्रशान्ते शैलास्त्रे जम्भो भूधरसंनिभः ऐषीकमस्त्रमकरोद् अभीतो ऽतिपराक्रमः

tataḥ praśānte śailāstre jambho bhūdharasaṃnibhaḥ aiṣīkamastramakarod abhīto 'tiparākramaḥ

हिन्दी अर्थ

दुर्गे सुषुप्तं नृपतिः सहैव॥ ८७ सुखपूर्वक निवास करना चाहिए इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधमे दुर्गनिर्माणौषध्यादिसंचयकथनं नाम सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें राजाओंके लिये दुर्गनिर्माण और ओषधि आदिके संचयका वर्णन नामक दो सौ सतरहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

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अध्याय 153

श्लोक 98

ऐषीकेणागमन्नाशं वज्रास्त्रं शक्रवल्लभम् विजृम्भत्यथ चैषीके परमास्त्रे ऽतिदुर्धरे

aiṣīkeṇāgamannāśaṃ vajrāstraṃ śakravallabham vijṛmbhatyatha caiṣīke paramāstre 'tidurdhare

हिन्दी अर्थ

दुर्गमें संग्राह्य ओषधियोंका वर्णन अगदानि समाचक्ष्व तानि धर्मभृतां वर

English

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अध्याय 153

श्लोक 99

जज्वलुर्देवसैन्यानि सस्यन्दनगजानि तु दह्यमानेष्वनीकेषु तेजसा सुरसत्तमः

jajvalurdevasainyāni sasyandanagajāni tu dahyamāneṣvanīkeṣu tejasā surasattamaḥ

हिन्दी अर्थ

बिल्वाटकी यवक्षारं पाटला बाह्रिकोषणा। श्रीपर्णी शल्लकीयुक्तो निक्काथः प्रोक्षणं परम् लाक्षाप्रियङ्गुमञ्जष्ठा सममेला हरेणुका। यष्ट्याह्म मधुरा चैव बश्नृपित्तेन कल्पिता: मनुने पूछा-धार्मिकश्रेष्ठ! राजाको राक्षस, विष और रोगको दूरकर स्वस्थ करनेवाली जिन ओषधियोंका दुर्गमें संग्रह करना चाहिए, उनका वर्णन कौजिये

English

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अध्याय 153

श्लोक 100

आग्नेयमस्त्रमकरोद् बलवान्पाकशासनः तेनास्त्रेण तदस्त्रं च बभ्रंशे तदनन्तरम्

āgneyamastramakarod balavānpākaśāsanaḥ tenāstreṇa tadastraṃ ca babhraṃśe tadanantaram

हिन्दी अर्थ

मत्स्यभगवानूने कहा--बिल्वाटकी, जवाखार, पाटला, बाह्लिक, ऊषणा, श्रीपर्णी और शल्लकी-इन ओषधियोंका काढ़ा उत्तम प्रोक्षण है । विषग्रस्त प्राणीद्वारा उसका सेवन करनेसे वह तुरंत ही विषरहित हो जाता है। उसी प्रकार इनके द्वारा सेवन करनेसे यव, सैन्धव,

English

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अध्याय 153

श्लोक 101

तस्मिन्प्रतिहते चास्त्रे पावकास्त्रं व्यजृम्भत जज्वाल कायं जम्भस्य सरथं च ससारथिम्

tasminpratihate cāstre pāvakāstraṃ vyajṛmbhata jajvāla kāyaṃ jambhasya sarathaṃ ca sasārathim

हिन्दी अर्थ

छत्र, चामर और गृह आदि विषरहित हो जाते हैं। शेलु, कपित्थ, वृषशोषित तथा महादन्तशठ-इन ओषधियोंके काढ़ेका सेवन भी उसी प्रकार विषनाशक होता है। लाह, प्रियंगु, मंजीठ, समान भागमें इलायची, हरे, जेठीमधु और मधुरा-इन्हें नकुल-पित्तसे संयुक्त करके गायके सींगमें रखकर सात राततक पृथ्वीमें गाड़ दे। इसके बाद उसे सुवर्णजटित मणिकी अंगूठीमें रखकर हाथमें धारण कर

English

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अध्याय 153

श्लोक 102

ततः प्रतिहतः सो ऽथ दैत्येन्द्रः प्रतिभानवान् वारुणास्त्रं मुमोचाथ शमनं पावकार्चिषाम्

tataḥ pratihataḥ so 'tha daityendraḥ pratibhānavān vāruṇāstraṃ mumocātha śamanaṃ pāvakārciṣām

हिन्दी अर्थ

ले। उसका स्पर्श करनेसे विषयुक्त प्राणी तुरंत ही निर्विष मनोह्या शमीपत्रं तुम्बिका श्वेतसर्षपा:

English

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अध्याय 153

श्लोक 103

ततो जलधरैर्व्योम स्फुरद्विद्युल्लताकुलैः गम्भीरमुरजध्वानैर् आपूरितम् इवाम्बरम्

tato jaladharairvyoma sphuradvidyullatākulaiḥ gambhīramurajadhvānair āpūritam ivāmbaram

हिन्दी अर्थ

विषजित्परमं कार्य मणिरत्नं च पूर्ववत्। मूषिका जतुका चापि हस्ते बध्वा विषापहा हरेणुमांसी मञ्जिष्ठा रजनी मधुका मधु। अक्षत्वक् सुरसं लाक्षा श्वपितं पूर्ववद् भुवि वादित्राणि पताकाश्च पिष्टेरेतैः प्रलेपिताः। श्रुत्वा दृष्ट्रा समाघ्राय सद्यो भवति निर्विष:

English

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अध्याय 153

श्लोक 104

करीन्द्रकरतुल्याभिर् जलधाराभिर् अम्बरात् पतन्तीभिर्जगत्सर्वं क्षणेनापूरितं बभौ

karīndrakaratulyābhir jaladhārābhir ambarāt patantībhirjagatsarvaṃ kṣaṇenāpūritaṃ babhau

हिन्दी अर्थ

सूक्ष्मैला त्रिवृतापत्रं विडङ्कानीन्द्रवारुणी सुवेगा तस्करसुरौ कुसुमैरर्जुनस्य तु। धूपो वासगृहे हन्ति विषं स्थावरजङ्गमम्

English

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अध्याय 153

श्लोक 105

शान्तमाग्नेयमस्त्रं तत् प्रविलोक्य सुराधिपः वायव्यम् अस्त्रम् अकरोन् मेघसंघातनाशनम्

śāntamāgneyamastraṃ tat pravilokya surādhipaḥ vāyavyam astram akaron meghasaṃghātanāśanam

हिन्दी अर्थ

न तत्र कीटा न विषं दर्दुरा न सरीसृपाः। न कृत्या कर्मणां चापि धूपोऽयं यत्र दह्यते क्वाथः सर्वोदकार्येषु काकमाचीयुतो हितः। रोचनापत्रनेपालीकुङ्कमैस्तिलकान् वहन् गोमूत्रघृष्टो ह्यगदः सर्वकर्मकरः स्मृतः।

English

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अध्याय 153

श्लोक 106

वायव्यास्त्रबलेनाथ निर्धूते मेघमण्डले बभूव विमलं व्योम नीलोत्पलदलप्रभम्

vāyavyāstrabalenātha nirdhūte meghamaṇḍale babhūva vimalaṃ vyoma nīlotpaladalaprabham

हिन्दी अर्थ

वन्ध्या कर्कोटकी राजन् विष्णुक्रान्ता तथोत्कटा। शतमूली सितानन्दा बला मोचा पटोलिका हो जाता है। जटामांसी, शमीके पत्ते, तुम्बी, श्वेत सरसों, कपित्थ, कुष्ठ और मंजीठ-इन ओषधियोंको कुत्ते अथवा कपिला गौके पित्तके साथ भावना दे। यह सौम्याक्षिप्त नामक दूसरी विषनाशक ओषधि है। इसे भी

English

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अध्याय 153

श्लोक 107

वायुना चातिघोरेण कम्पितास्ते तु दानवाः न शेकुस्तत्र ते स्थातुं रणे ऽतिबलिनो ऽपि ये

vāyunā cātighoreṇa kampitāste tu dānavāḥ na śekustatra te sthātuṃ raṇe 'tibalino 'pi ye

हिन्दी अर्थ

पूर्ववत् मणि एवं रलनिर्मित अंगूठीमें रखकर धारण करना चाहिए। इसी प्रकार मूषिका और लाहको भी हाथमें बाँधनेसे विषका शमन होता है ॥१--१०॥ हरे, जटामांसी, मंजिष्ठा, हरिद्रा, महुआ, मधु, अक्षत्वक्, सुरसा और लाह--इन्हें भी पूर्ववत् कुत्तेके पित्तसे संयुक्त करके पृथ्वीमें गाड़ दे। फिर इनके लेपसे वाजों तथा पताकाओंपर लेप कर दे तो (विषाक्त प्राणी) उन्हें सुनकर, देखकर और सूँघकर तुरंत विषरहित हो जाता है तीनों कटु (आँवला, हरे, बहेरा), पाँचों नमक, मंजीठ, दोनों रजनी, छोटी इलायची, त्रिवृताका पत्ता, बिडंग, इन्द्रवारुणि, मधूक, वेतस तथा मधु-इन सबको

English

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अध्याय 153

श्लोक 108

तदा जम्भो ऽभवच्छैलो दशयोजनविस्तृतः मारुतप्रतिघातार्थं दानवानां भयापहः

tadā jambho 'bhavacchailo daśayojanavistṛtaḥ mārutapratighātārthaṃ dānavānāṃ bhayāpahaḥ

हिन्दी अर्थ

सींगमें स्थापित कर दे, फिर बहाँसे निकालकर गर्म जलमें मिला दे। इसके द्वारा विष-भक्षणसे उद्भूत पित्तदोष उत्पन्न करनेवाला ज्वर शान्त हो जाता है। श्वेत धूप, सरसों, एलबालुक, सुवेगा, तस्कर, सुर और अर्जुनके पुष्प-इन ओषधियोंका धूपवास करनेवाले घरमें स्थित स्थावर-जङ्गम सभी विषको नष्ट कर देता है। जहाँ वह धूप जलाया जाता है, वहाँ कीट, विष, मेढ़क, रेंगनेवाले सर्पादि जीव तथा कर्मोकी कृत्या-ये कोई भी नहीं रह

English

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अध्याय 153

श्लोक 109

मुक्तनानायुधोदग्रतेजो ऽभिज्वलितद्रुमः ततः प्रशमिते वायौ दैत्येन्द्रे पर्वताकृतौ

muktanānāyudhodagratejo 'bhijvalitadrumaḥ tataḥ praśamite vāyau daityendre parvatākṛtau

हिन्दी अर्थ

सकते। चन्दन, दुग्ध, पलाश-वृक्षकी छाल, मूर्वा, एलावालुक, सरसों, नाकुली, तण्डुलीयक एवं काकमाचीका काढ़ा सभी प्रकारके विषयुक्त जलमें कल्याणकारी होता है। रोचनापत्र, नेपाली, केसरतिलक-इन ओषधियोंको धारण करनेसे मनुष्यको विषका कष्ट नहीं होता, विषदोष नष्ट हो जाता है और वह इसके प्रभावसे रत्री, पुरुष और राजाका प्रिय हो जाता है हल्दी, मंजीठ, किणिही, पिप्पली और नीमके चूर्णका लेप करनेसे सभी प्रकारके विषसे पीड़ित शरीर विषरहिंत हो जाता है। शिरीष-वृक्षका फल, पत्ता, पुष्प, छाल और जड़-इन सबको गो-मूत्रमें घिसकर तैयार

English

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अध्याय 153

श्लोक 110

महाशनीं वज्रमयीं मुमोचाशु शतक्रतुः तयाशन्या पतितया दैत्यस्याचलरूपिणः

mahāśanīṃ vajramayīṃ mumocāśu śatakratuḥ tayāśanyā patitayā daityasyācalarūpiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

की गयी ओषधि सभी प्रकारके विषकर्ममें हितकारी कही गयी है। सर्वोत्कृष्ट शूरवीर राजन्! इसके उपरान्त सर्वश्रेष्ठ ओषधियोंका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। राजन्! वन्ध्या, कर्कोरकी, विष्णुक्रान्ता, उत्करा, शतमूली, सिता, आनन्दा, स्थले कमलिनी या च विशाली शङ्खमूलिका

English

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अध्याय 153

श्लोक 111

कन्दराणि व्यशीर्यन्त समन्तान्निर्झराणि तु ततः सा दानवेन्द्रस्य शैलमाया न्यवर्तत

kandarāṇi vyaśīryanta samantānnirjharāṇi tu tataḥ sā dānavendrasya śailamāyā nyavartata

हिन्दी अर्थ

चाण्डाली हस्तिमगधा गोऽजापर्णी करम्भिका। रक्ता चैव महारक्ता तथा बर्हिशिखा च या कौशातकी नक्तमालं प्रियालं च सुलोचनी। वारुणी वसुगन्धा च तथा वै गन्धनाकुली ईश्वरी शिवगन्धा च श्यामला वंशनालिका। जतुकाली महाश्वेता श्वेता च मधुयष्टिका

English

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अध्याय 153

श्लोक 112

निवृत्तशैलमायो ऽथ दानवेन्द्रो मदोत्कटः बभूव कुञ्जरो भीमो महाशैलसमाकृतिः

nivṛttaśailamāyo 'tha dānavendro madotkaṭaḥ babhūva kuñjaro bhīmo mahāśailasamākṛtiḥ

हिन्दी अर्थ

वज्रकः पारिभद्रश्च तथा वै सिन्धवारकाः। जीवानन्दा वसुच्छिद्रा नतनागरकण्टका नालं जाली च जाती च तथा च वटपत्रिका। कार्तस्वरं महानीला कुन्दुरुर्हसपादिका

English

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अध्याय 153

श्लोक 113

स ममर्द सुरानीकं दन्तैश्चाप्यहनत्सुरान् बभञ्ज पृष्ठतः कांश्चित् करेणावेष्ट्य दानवः

sa mamarda surānīkaṃ dantaiścāpyahanatsurān babhañja pṛṣṭhataḥ kāṃścit kareṇāveṣṭya dānavaḥ

हिन्दी अर्थ

मण्डूकपर्णी वाराही द्वे तथा तण्डुलीयके। सर्पाक्षी लवली ब्राह्मी विश्वरूपा सुखाकरा पत्रिका रोहिणी चैव रक्तमाला महौषधी काकोली क्षीरकाकोली पीलुपर्णी तथैव च

English

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अध्याय 153

श्लोक 114

ततः क्षपयतस्तस्य सुरसैन्यानि वृत्रहा अस्त्रं त्रैलोक्यदुर्धर्षं नारसिंहं मुमोच ह

tataḥ kṣapayatastasya surasainyāni vṛtrahā astraṃ trailokyadurdharṣaṃ nārasiṃhaṃ mumoca ha

हिन्दी अर्थ

केशिनी वृश्चिकाली च महानागा शतावरी। गरुडी च तथा वेगा जले कुमुदिनी तथा विशेषान्मरकतादीनि कीटपक्षं विशेषतः। जीवजाताश्च मणयः सर्वे धार्याः प्रयत्नतः

English

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अध्याय 153

श्लोक 115

ततः सिंहसहस्राणि निश्चेरुर्मन्त्रतेजसा कृष्णदंष्ट्राट्टहासानि क्रकचाभनखानि च

tataḥ siṃhasahasrāṇi niścerurmantratejasā kṛṣṇadaṃṣṭrāṭṭahāsāni krakacābhanakhāni ca

हिन्दी अर्थ

वसेत् तत्र गृहं सुशुभ्रं बला, मोचा, पटोलिका, सोमा, पिण्डा, निशा, दग्धरुहा, स्थलपद्म, विशाली, शंखमूलिका, चाण्डाली, हस्तिमगधा, गोपर्णी, अजापर्णी, करम्भिका, रक्ता, महारक्ता, बर्हिशिखा, कौशातकी, नक्तमाल, प्रियाल, सुलोचनी, वारुणी, वसुगन्धा, गन्धनाकुली, ईश्वरी, शिवगन्धा, श्यामला, वंशनालिका, जतुकाली, महाश्वेता, श्वेता, मधुयष्टिका, वञ्रक, पारिभद्र, सिन्दुवारक, जीवानन्दा, वसुच्छिद्रा, नतनागर, कण्टकारि, नाल, जाली, जाती, वटपत्रिका, सुवर्ण, महानीला,

English

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अध्याय 153

श्लोक 116

तैर्विपाटितगात्रो ऽसौ गजमायां व्यपोथयत् ततश्चाशीविषो घोरो ऽभवत्फणशताकुलः

tairvipāṭitagātro 'sau gajamāyāṃ vyapothayat tataścāśīviṣo ghoro 'bhavatphaṇaśatākulaḥ

हिन्दी अर्थ

कुन्दुरु, हंसपादिका, मण्डूकपर्णी, दोनों प्रकारको वाराही, विश्वरूपा, सुखाकरा, रुजापहा, वृद्धिकरी, शल्यदा, पत्रिका,

English

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अध्याय 153

श्लोक 117

विषनिःश्वासनिर्दग्धं सुरसैन्यं महारथः ततो ऽस्त्रं गारुडं चक्रे शक्रश्चारुभुजस्तदा

viṣaniḥśvāsanirdagdhaṃ surasainyaṃ mahārathaḥ tato 'straṃ gāruḍaṃ cakre śakraścārubhujastadā

हिन्दी अर्थ

काकोली, क्षीरकाकोली, पीलुपर्णी, केशिनी, वृश्चिकाली, महाभूमिलता, उन्मादिनी, सोमराजी, सभी प्रकारके रत्र-विशेषकर मरकत आदि बहुमूल्य रत्न, अनेक प्रकारकी कीटज मणियाँ, जीवोंसे उत्पन्न होनेवाली मणियाँ-इन सभीको प्रयत्नपूर्वक दुर्गमें संचित करे। इसी प्रकार राक्षस, विष, कृत्या, वैताल आदिको नाशक--विशेषकर मनुष्य, सर्प, गौ, गर्दभ, ऊँट, साँप,

English

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अध्याय 153

श्लोक 118

ततो गरुत्मतस्तस्मात् सहस्राणि विनिर्ययुः तैर्गरुत्मद्भिरासाद्य जम्भो भुजगरूपवान् कृतस्तु खण्डशो दैत्यः सास्य माया व्यनश्यत

tato garutmatastasmāt sahasrāṇi viniryayuḥ tairgarutmadbhirāsādya jambho bhujagarūpavān kṛtastu khaṇḍaśo daityaḥ sāsya māyā vyanaśyata

हिन्दी अर्थ

आदि जीवोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपयोगी वस्तुओंका भी राजा संचय करे। इस प्रकार इन सभी बहुमूल्य पदार्थाँसे युक्त रहनेपर वह सुरक्षित रहता है। तब राजा उनमें बने हुए अत्यन्त निर्मल, उपर्युक्त लक्षणोंसे सम्पन्न लक्षणसम्प्रयुक्तम्॥ ३८ तथा गुणयुक्त भवनमें निवास करे

English

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अध्याय 153

श्लोक 119

प्रनष्टायां तु मायायां ततो जम्भो महासुरः चकार रूपमतुलं चन्द्रादित्यपथानुगम् विवृत्तवदनो ग्रस्तुम् इयेष सुरपुंगवान्

pranaṣṭāyāṃ tu māyāyāṃ tato jambho mahāsuraḥ cakāra rūpamatulaṃ candrādityapathānugam vivṛttavadano grastum iyeṣa surapuṃgavān

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽगदाध्यायो नामाष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अगदाध्याय नामक दो सौ अठारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ कारयेद् वा महीभर्ता ब्रूहि तत्त्वानि तानि मे

English

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अध्याय 153

श्लोक 120

ततो ऽस्य विविशुर्वक्त्रं समहारथकुञ्जरा सुरसेनाविशद्भीमं पातालोत्तानतालुकम्

tato 'sya viviśurvaktraṃ samahārathakuñjarā surasenāviśadbhīmaṃ pātālottānatālukam

हिन्दी अर्थ

नान्योऽग्निर्ज्चलते तत्र नात्र कार्या विचारणा कार्पासास्थ्ना भुजङ्गस्य तेन निर्मोचनं भवेत्।

English

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अध्याय 153

श्लोक 121

सैन्येषु ग्रस्यमानेषु दानवेन बलीयसा शक्रो दैन्यं समापन्नः श्रान्तबाहुः सवाहनः

sainyeṣu grasyamāneṣu dānavena balīyasā śakro dainyaṃ samāpannaḥ śrāntabāhuḥ savāhanaḥ

हिन्दी अर्थ

सामुद्रसैन्धवयवा विद्युहग्धा च मृत्तिका। अन्तं वै प्राक् परीक्षेत वह्वौ चान्यतरेषु च वस्त्रं पुष्पमलङ्कारं भोजनाच्छादनं तथा। नापरीक्षितपूर्वं तु स्पृशेदपि महीपतिः

English

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अध्याय 153

श्लोक 122

कर्तव्यतां नाध्यगच्छत् प्रोवाचेदं जनार्दनम् किमनन्तरमत्रास्ति कर्तव्यस्यावशेषितम्

kartavyatāṃ nādhyagacchat provācedaṃ janārdanam kimanantaramatrāsti kartavyasyāvaśeṣitam

हिन्दी अर्थ

मनुने पूछा-भगवन्! राजाको राज्यको रक्षाके लिये जिन रहस्यपूर्ण साधनोंको दुर्गमें संगृहीत या प्रस्तुत करना चाहिए, उन तत्त्वोंका मुझसे वर्णन कोजिये मत्स्यभगवानूने कहा-राजन्! शिरीष, गूलर, शमी और बिजौरा नीबू-इनको घृतमें परिप्लुतकर पंद्रह दिनों बाद सेवन करे, प्राचीन लोग इसे ' क्षुद्योग' कहते हैं। कशेरुके मूल भाग तथा फल, ईखके मूल भाग और

English

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अध्याय 153

श्लोक 123

यदाश्रित्य घटामो ऽस्य दानवस्य युयुत्सवः ततो हरिरुवाचेदं वज्रायुधमुदारधीः

yadāśritya ghaṭāmo 'sya dānavasya yuyutsavaḥ tato hariruvācedaṃ vajrāyudhamudāradhīḥ

हिन्दी अर्थ

विषको दूब, दूध और घीके साथ सिद्ध करनेसे बना हुआ पदार्थ मण्ड कहलाता है। एक मास बाद इसका सेवन करना चाहिए इनके सेवनसे हथियारोंसे घायल हुआ मनुष्य मर नहीं सकता। वहाँ चितकबरे रंगवाले बाँसके टुकड़ेसे अग्नि उत्पन्न करे। राजन्! उस अग्निको जिस घरमें अपसव्य होकर तीन बार प्रदक्षिणा करे, वहाँ कोई अन्य अग्नि नहीं जल सकती-इसमें अन्यथा विचार करनेको आवश्यकता नहीं है। कपासके साथ सर्पकी हड्डी जलानेसे घरमेंसे सर्पोका निष्कासन होता है। घरमें निरन्तर इस वस्तुकी धूप करना साँपको निकालनेके लिये विशेष प्रसिद्ध है। राजन्! सामुद्री नमक, सेन्धा नमक और यवा--ये तीन प्रकारके लवण तथा विद्युत्से जली

English

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अध्याय 153

श्लोक 124

न सांप्रतं रणस्त्याज्यस् त्वया कातरभैरवः वर्धस्वाशु महामायां पुरंदर रिपुं प्रति

na sāṃprataṃ raṇastyājyas tvayā kātarabhairavaḥ vardhasvāśu mahāmāyāṃ puraṃdara ripuṃ prati

हिन्दी अर्थ

हुई मिट्टी-इन वस्तुओंसे जिस भवनकी लिपाई होती है, उसे अग्नि नहीं जला सकती। दुर्गमें दिनके समय विशेषकर जब वायुका प्रकोप हो, अग्निकी रक्षा करनी चाहिए । विषसे राजाकी रक्षा करनी चाहिए। उस विषयमें मैं युक्ति बतलाता हूँ, सुनिये। राजाको चाहिए कि दुर्गमें क्रीड़ाके लिये कुछ पशु तथा पक्षियोंको रखे। सर्वप्रथम उसे अग्निमें डालकर अथवा अन्य किन्हीं उपायोंसे अन्नको परीक्षा कर लेनी चाहिए। वस्त्र, पुष्प, आभरण,

English

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अध्याय 153

श्लोक 125

मयैष लक्षितो दैत्यो ऽधिष्ठितः प्राप्तपौरुषः मा शक्र मोहमागच्छ क्षिप्रमस्त्रं स्मर प्रभो

mayaiṣa lakṣito daityo 'dhiṣṭhitaḥ prāptapauruṣaḥ mā śakra mohamāgaccha kṣipramastraṃ smara prabho

हिन्दी अर्थ

भोजन तथा आच्छादन (वस्त्र)-को राजा पहले परीक्षा किये बिना स्पर्श भी न करे। विष देनेवाले मनुष्यने यदि विष दे दिया है तो उसकी परीक्षाके ये निम्नकथित लक्षण होते हैं-वह मलिनमुख, उद्देगपूर्वक देखनेवाला, खिसकती हुई चादरवाला, उदास, खम्भे और भीतकी आड्में प्रच्छादयति चात्मानं लज्जते त्वरते तथा॥ १२ अपनेको छिपानेकी चेष्टा करनेवाला, लज्जित तथा शीघ्रता

English

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अध्याय 153

श्लोक 126

ततः शक्रः प्रकुपितो दानवं प्रति देवराट् नारायणास्त्रं प्रयतो मुमोचासुरवक्षसि एतस्मिन्नन्तरे दैत्यो विवृतास्यो ऽग्रसत्क्षणात् त्रीणि लक्षाणि गन्धर्वीकिंनरोरगराक्षसान्

tataḥ śakraḥ prakupito dānavaṃ prati devarāṭ nārāyaṇāstraṃ prayato mumocāsuravakṣasi etasminnantare daityo vivṛtāsyo 'grasatkṣaṇāt trīṇi lakṣāṇi gandharvīkiṃnaroragarākṣasān

हिन्दी अर्थ

समीपैर्विक्षिपेद् वह्नौ तदन्नं त्वरयान्वितः । इन्द्रायुधसवर्ण तु रूक्षं स्फोटसमन्वितम् एकावर्त तु दुर्गन्धि भृशं चटचटायते। तद्धूमसेवनाज्जन्तोः शिरोरोगश्च जायते

English

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अध्याय 153

श्लोक 127

ततो नारायणास्त्रं तत् पपातासुरवक्षसि महास्त्रभिन्नहृदयः सुस्राव रुधिरं च सः

tato nārāyaṇāstraṃ tat papātāsuravakṣasi mahāstrabhinnahṛdayaḥ susrāva rudhiraṃ ca saḥ

हिन्दी अर्थ

सविषेऽन्ने निलीयन्ते न च पार्थिव मक्षिकाः। निलीनाश्च विपद्यान्ते संस्पृष्टे सविषे तथा विरज्यति चकोरस्य दृष्टिः पार्थिवसत्तम। विकृतिं च स्वरो याति कोकिलस्य तथा नृप विक्रोशति शुको राजन् सारिका वमते तत: । चामीकरोऽन्यतो याति मृत्युं कारण्डवस्तथा

English

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अध्याय 153

श्लोक 128

रणागारमिवोद्गारं तत्याजासुरनन्दनः तदस्त्रतेजसा तस्य रूपं दैत्यस्य नाशितम्

raṇāgāramivodgāraṃ tatyājāsuranandanaḥ tadastratejasā tasya rūpaṃ daityasya nāśitam

हिन्दी अर्थ

व्यापन्नरसगन्धं च चन्द्रिकाभिस्तथा युतम् कोकिलाभा च मद्यस्य तोयस्य च नृपोत्तम

English

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अध्याय 153

श्लोक 129

ततश्चान्तर्दधे दैत्यो वियत्यनुपलक्षितः गगनस्थः स दैत्येन्द्रः शस्त्रासनमतीन्द्रियम्

tataścāntardadhe daityo viyatyanupalakṣitaḥ gaganasthaḥ sa daityendraḥ śastrāsanamatīndriyam

हिन्दी अर्थ

धान्याम्लस्य तथा कृष्णा कपिला कोद्रवस्य च। मधुश्यामा च तक्रस्य नीला पीता तथैव च घृतस्योदकसंकाशा कपोताभा च मस्तुनः। करनेवाला होता है। राजन्! वह पृथ्वीपर रेखा खींचने लगता है, गर्दन हिलाने लगता है तथा मुखको मलकर सिर खुजलाने लगता है। राजन्! निश्चय ही वह विपरीत कार्योमें भी शीघ्रता करनेकी चेष्टा करता है। विषदाताके

English

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अध्याय 153

श्लोक 130

मुमोच सुरसैन्यानां संहारे कारणं परम् प्रासान्परश्वधांश्चक्रान् बाणान्वज्रान्समुद्गरान्

mumoca surasainyānāṃ saṃhāre kāraṇaṃ param prāsānparaśvadhāṃścakrān bāṇānvajrānsamudgarān

हिन्दी अर्थ

ऐसे ही लक्षण होते हैं । राजाको उसकी परीक्षा कर लेनी चाहिए। उसके द्वारा दिये गये अन्नको शीघ्रतापूर्वक समीपस्थ अग्निमें डाल देना चाहिए। विषैला अन्न अग्निमें पड़ते ही इन्द्रधनुष-जैसे रंगवाला हो जाता है तथा तुरंत ही सूख जाता है। उसमें स्फोट होने लगता है। वह एक ही ओरसे निकलता है, दुर्गन्धयुक्त होता है और अत्यन्त चटचटाने लगता है। उसके धुँएका सेवन करनेसे जीवके सिरमें रोग उत्पन्न हो जाता है ॥२--१६॥

English

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अध्याय 153

श्लोक 131

कुठारान्सह खड्गैश्च भिन्दिपालानयोगुडान् ववर्ष दानवो रौद्रो ह्य् अबन्ध्यानक्षयानपि

kuṭhārānsaha khaḍgaiśca bhindipālānayoguḍān vavarṣa dānavo raudro hy abandhyānakṣayānapi

हिन्दी अर्थ

राजन्! विषयुक्त अन्नके ऊपर मक्खियाँ नहीं बैठती, यदि बैठ गयीं तो विषसंयुक्त अन्नका स्पर्श होनेके कारण तुरंत ही मर जाती हैं। पार्थिवश्रेष्ठ! विषयुक्त अन्नको देखते ही चकोरकी दृष्टि विरक्त हो जाती है अर्थात् वह अपनी आँखें फेर लेता है, कोकिलका स्वर विकृत हो जाता है, हंसकी गति लड़खड़ाने लगती है, भौरे जोरसे गूँजने लगते हैं, क्रौंच (कुरर) मदमत्त हो जाता है और मुर्गा जोर-जोरसे बोलने लगता है। राजन्! शुक चें-चें करने लगता है, सारिका वमन करने लगती है, चामीकर भाग खड़ा होता है और कारण्डव मर जाता है। राजन्! वानर मूत्र-त्याग करने लगता है, जीवजीवक ग्लानियुक्त हो जाता है, नेवलेके रोएँ खड़े हो जाते हैं,

English

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अध्याय 153

श्लोक 132

तैरस्त्रैर्दानवैर्मुक्तैर् देवानीकेषु भीषणैः बाहुभिर्धरणिः पूर्णा शिरोभिश्च सकुण्डलैः

tairastrairdānavairmuktair devānīkeṣu bhīṣaṇaiḥ bāhubhirdharaṇiḥ pūrṇā śirobhiśca sakuṇḍalaiḥ

हिन्दी अर्थ

पृषत् मृग रोने लगता है। राजन्! विषको देखते ही मयूर हर्षित हो जाता है; क्योंकि वह चिरकालसे विषयुक्त अन्नका भोजन करनेवाला है। राजन्! वह विषयुक्त अन्न कहने योग्य नहीं रह जाता, पंद्रह दिनके बासी अन्नकी तरह दीख पड़ता है। उसका रस तथा गन्ध नष्ट हो जाती है तथा ऊपरसे वह चन्द्रिकाओंसे युक्त रहता है। नृपोत्तम! विषके मिलनेसे बना हुआ व्यञ्जन सूख जाता है, द्रव वस्तुओंमें बुल्ले उठने लगते हैं, लवणसहित पदार्थामें

English

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अध्याय 153

श्लोक 133

ऊरुभिर् गजहस्ताभैः करीन्द्रैर्वाचलोपमैः भग्नेषादण्डचक्राक्षै रथैः सारथिभिः सह

ūrubhir gajahastābhaiḥ karīndrairvācalopamaiḥ bhagneṣādaṇḍacakrākṣai rathaiḥ sārathibhiḥ saha

हिन्दी अर्थ

फेन उठने लगते हैं। अन्नोंसे बना हुआ विषैला भोजन ताम्रवर्णका, दूधवाला नीले रंगका, मदिरा तथा जलयुक्त कोकिलके समान काला, अम्ल अन्नवाला काला, कोदोका कपिल तथा मङ्टायुक्त भोजन मधुके समान श्यामल, नीला और पीला हो जाता है हरिता माक्षिकस्यापि तैलस्य च तथारुणा॥-२७ कबूतरकी तरह, मधुयुक्तका हरा और तेलमिश्रित विषका

English

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अध्याय 153

श्लोक 134

दुःसंचाराभवत्पृथ्वी मांसशोणितकर्दमा रुधिरौघह्रदावर्ता शवराशिशिलोच्चयैः

duḥsaṃcārābhavatpṛthvī māṃsaśoṇitakardamā rudhiraughahradāvartā śavarāśiśiloccayaiḥ

हिन्दी अर्थ

'फलानामप्यपक्कानां पाकः क्षिप्रं प्रजायते। लाल रंग हो जाता है। विषके संसर्गसे न पके हुए फल

English

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अध्याय 153

श्लोक 135

कबन्धनृत्यसंकुले स्रवद्वसास्रकर्दमे जगत्त्रयोपसंहृतौ समे समस्तदेहिनाम् शृगालगृध्रवायसाः परं प्रमोदमादधुः क्वचिद्विकृष्टलोचनः शवस्य रौति वायसः

kabandhanṛtyasaṃkule sravadvasāsrakardame jagattrayopasaṃhṛtau same samastadehinām śṛgālagṛdhravāyasāḥ paraṃ pramodamādadhuḥ kvacidvikṛṣṭalocanaḥ śavasya rauti vāyasaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकोपश्चैव पक्वानां माल्यानां म्लानता तथा लौहानां च मणीनां च मलपङ्कोपदिग्धता तस्माद् राजा सदा तिष्ठेन् मणिमन्त्रौषधागहैः । उक्तैः संरक्षितो राजा प्रमादपरिवर्जकः

English

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अध्याय 153

श्लोक 136

विकृष्टपीवरान्त्रकाः प्रयान्ति जम्बुकाः क्वचित् क्वचित्स्थितो ऽतिभीषणः श्वचञ्चुचर्वितो बकः मृतस्य मांसमाहरञ्छ्वजातयश्च संस्थिताः क्वचिद्वृको गजासृजं पपौ निलीयतान्त्रतः

vikṛṣṭapīvarāntrakāḥ prayānti jambukāḥ kvacit kvacitsthito 'tibhīṣaṇaḥ śvacañcucarvito bakaḥ mṛtasya māṃsamāharañchvajātayaśca saṃsthitāḥ kvacidvṛko gajāsṛjaṃ papau nilīyatāntrataḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वेण कार्या रविवंशचन्द्र शीघ्र ही पक जाते हैं और पका हुआ फल विकृत हो जाता है। पुष्प-मालाएँ मलिन हो जाती हैं। कठोर वस्तु कोमल तथा कोमल वस्तु कठोर हो जाती है। सूक्ष्म वस्तुओंका रूप नष्ट हो जाता है और रंग बदल जाता

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।