Harivamsha Purana
98
अध्याय 98 / 318

Parva 2, Adhyāya 43

97 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ97 श्लोक

अध्याय 98

श्लोक 1

श्रीकृष्णबलरामाभ्यां जरासन्धेन तस्य सेनया सह युद्धं, राजा दरदस्य मृत्युः, जरासन्धस्य पराजितं भूत्वा पलायनं एवं चेदिराज दमघोषेण सह श्रीकृष्णबलरामाभ्यां करवीरपुरे गमनं तौ नगादाप्लुतौ दृष्ट्वा वसुदेवसुतावुभौ ।क्षुब्धं नरवरानीकं सर्वं सम्मूढवाहनम्

śrīkṛṣṇabalarāmābhyāṃ jarāsandhena tasya senayā saha yuddhaṃ, rājā daradasya mṛtyuḥ, jarāsandhasya parājitaṃ bhūtvā palāyanaṃ evaṃ cedirāja damaghoṣeṇa saha śrīkṛṣṇabalarāmābhyāṃ karavīrapure gamanaṃ tau nagādāplutau dṛṣṭvā vasudevasutāvubhau | kṣubdhaṃ naravarānīkaṃ sarvaṃ sammūḍhavāhanam

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वसुदेवके उन दोनों पुत्रोंको पर्वतसे कूदकर आया देख उन नरेशोंकी सारी सेनामें हलचल मच गयी। उसके वाहनोंपर मोह छा गया

अध्याय 98

श्लोक 2

बाहुप्रहरणौ तौ तु चेरतुस्तत्र यादवौ ।मकराविव संरब्धौ समुद्रक्षोभणावुभौ

bāhupraharaṇau tau tu ceratustatra yādavau | makarāviva saṃrabdhau samudrakṣobhaṇāvubhau

हिन्दी अर्थ

रोषमें भरे हुए वे दोनों यदुवंशी वीर अपनी भुजाओंसे ही आयुधका काम लेते हुए उस विशाल सेनामें विचरने लगे, जैसे दो महान्‌ मगर समुद्रको विश्वुब्ध करते हुए उसके भीतर घूम रहे हों

अध्याय 98

श्लोक 3

ताभ्यां मृधे प्रविष्टाभ्यां यादवाभ्यां मतिस्त्वभूत् ।आयुधानां पुराणानामादानकृतलक्षणा

tābhyāṃ mṛdhe praviṣṭābhyāṃ yādavābhyāṃ matistvabhūt | āyudhānāṃ purāṇānāmādānakṛtalakṣaṇā

हिन्दी अर्थ

समराड़णमें प्रविष्ट होनेपर उन दोनों यादवोंके मनमें अपने पुराने आयुधोंको ग्रहण करनेका विचार हुआ

अध्याय 98

श्लोक 4

ततोऽम्बरतलाद् भूयः पतन्ति स्म महात्मनोः ।मध्ये राजसहस्रस्य समरं प्रतिकाङ्क्षिणोः

tato'mbaratalād bhūyaḥ patanti sma mahātmanoḥ | madhye rājasahasrasya samaraṃ pratikāṅkṣiṇoḥ

श्लोक 4–6 का हिन्दी अर्थ

फिर तो सहस्रों राजाओंके बीचमें युद्धकी आकाड्क्षा रखने तथा समरमें शोभा पानेवाले उन दोनों महात्माओंके हाथमें आकाशसे वे ही अस्त्र-शस्त्र आ गये, जो मधथुराके युद्धमें उन दोनोंको प्राप्त हुए थे। उस युद्धसम्बन्धी विप्लवके समय वे ही प्रज्वलित अग्निके तुल्य तेजस्वी, दीसिमान्‌ तथा शत्रु ओंको चाट जानेवाले दिव्यास्त्र आकाशसे आ पड़े। जिन्हें वे यादव-वीर मथुरामें ही (आकाशभमें ) फेंककर चले गये थे, उन यदुवंशी वीरोंको पुन: उन दिव्यास्त्रोंकी प्राप्ति हो गयी

अध्याय 98

श्लोक 5

यानि वै माथुरे युद्धे प्राप्तान्याहवशोभिनोः ।तान्यम्बरात् पतन्ति स्म दिव्यान्याहवसम्प्लवे

yāni vai māthure yuddhe prāptānyāhavaśobhinoḥ | tānyambarāt patanti sma divyānyāhavasamplave

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 98

श्लोक 6

लेलिहानानि दीप्तानि दीप्ताग्निसदृशानि वै ।निक्षिप्य यानि तत्रैव तानि प्राप्तौ स्म यादवौ

lelihānāni dīptāni dīptāgnisadṛśāni vai | nikṣipya yāni tatraiva tāni prāptau sma yādavau

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 98

श्लोक 7

क्रव्यादैरनुयातानि मूर्तिमन्ति बृहन्ति च ।तृषितान्याहवे भोक्तुं नृपमांसानि सर्वशः

kravyādairanuyātāni mūrtimanti bṛhanti ca | tṛṣitānyāhave bhoktuṃ nṛpamāṃsāni sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

उन अस्त्रोंके पीछे मांसभक्षी भूत-प्रेत आदि भी आ रहे थे। वे विशाल अस्त्र मूर्तिमान्‌ होकर उस युद्धमें समस्त राजाओंके रक्त-मांसका उपभोग करनेके लिये मानो भूखे-प्यासे थे

अध्याय 98

श्लोक 8

दिव्यस्रग्दामधारीणि त्रासयन्ति च खेचरान् ।प्रभया भासमानानि दंशितानि दिशो दश

divyasragdāmadhārīṇi trāsayanti ca khecarān | prabhayā bhāsamānāni daṃśitāni diśo daśa

हिन्दी अर्थ

उन सबने दिव्य पुष्पोंकी मालाएँ धारण की थीं। वे अपनी प्रभासे प्रकाशित होकर दसों दिशाओंको सुशोभित करते थे और आकाशचारी प्राणियोंको भी भयभीत कर देते थे

अध्याय 98

श्लोक 9

हलं सांवर्तकं नाम सौनन्दं मुसलं तथा ।चक्रं सुदर्शनं नाम गदां कौमोदकीं तथा

halaṃ sāṃvartakaṃ nāma saunandaṃ musalaṃ tathā | cakraṃ sudarśanaṃ nāma gadāṃ kaumodakīṃ tathā

श्लोक 9–10 का हिन्दी अर्थ

सांवर्तक हल, सौनन्द मूसल, सुदर्शन चक्र और कौमोदकी गदा—भगवान्‌ विष्णुके ये चार तेजस्वी अस्त्र-शस्त्र उस महासमरमें उन दोनों यादव-वीरोंके लिये उतरे थे

अध्याय 98

श्लोक 10

चत्वार्येतानि तेजांसि विष्णुप्रहरणानि वै ।ताभ्यां समवतीर्णानि यादवाभ्यां महामृधे

catvāryetāni tejāṃsi viṣṇupraharaṇāni vai | tābhyāṃ samavatīrṇāni yādavābhyāṃ mahāmṛdhe

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 98

श्लोक 11

जग्राह प्रथमं रामो ललामप्रतिमं रणे ।सर्पन्तमिव सर्पेन्द्रं दिव्यमालाकुलं हलम्

jagrāha prathamaṃ rāmo lalāmapratimaṃ raṇe | sarpantamiva sarpendraṃ divyamālākulaṃ halam

हिन्दी अर्थ

पहले बलरामजीने रणभूमिमें सुन्दर आकृतिवाले सर्पराजके समान सर्पणशील तथा दिव्यमालाओंसे अलंकृत हलको अपने दायें हाथमें ग्रहण किया

अध्याय 98

श्लोक 12

सव्येन सात्वतां श्रेष्ठो जग्राह मुसलोत्तमम् ।सौनन्दं नाम बलवान् निरानन्दकरं द्विषाम्

savyena sātvatāṃ śreṣṭho jagrāha musalottamam | saunandaṃ nāma balavān nirānandakaraṃ dviṣām

हिन्दी अर्थ

फिर उन यदुकुलतिलक बलवान्‌ वीरने बायें हाथसे सौनन्द नामक उत्तम मूसलको ग्रहण किया, जो शत्रुओंको आनन्दशून्य कर देनेवाला था

अध्याय 98

श्लोक 13

दर्शनीयं च लोकेषु चक्रमादित्यवर्चसम् ।नाम्ना सुदर्शनं नाम प्रीतो जग्राह केशवः

darśanīyaṃ ca lokeṣu cakramādityavarcasam | nāmnā sudarśanaṃ nāma prīto jagrāha keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्णने सम्पूर्ण लोकोंमें दर्शनीय तथा सूर्यके समान तेजस्वी सुदर्शन नामक चक्रको ्ड़ी प्रसन्नताके साथ ग्रहण किया

अध्याय 98

श्लोक 14

दर्शनीयं च लोकेषु धनुर्जलदनिःस्वनम् ॥ नाम्ना शार्ङ्गमिति ख्यातं प्रीतो जग्राह वीर्यवान्

darśanīyaṃ ca lokeṣu dhanurjaladaniḥsvanam || nāmnā śārṅgamiti khyātaṃ prīto jagrāha vīryavān

हिन्दी अर्थ

फिर समस्त नोकोंमें दर्शनीय तथा मेघोंकी गर्जनाके समान टंकारध्वनि करनेवाले शा नामसे विख्यात धनुषको भी उन बलवान्‌ श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक अपने हाथमें ले लिया

अध्याय 98

श्लोक 15

देवैर्निगदितार्थस्य गदा तस्यापरे करे ।निषक्ता कुमुदाक्षस्य नाम्ना कौमोदकीति सा

devairnigaditārthasya gadā tasyāpare kare | niṣaktā kumudākṣasya nāmnā kaumodakīti sā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर देवताओंने जिनसे अपना प्रयोजन निवेदन किया था तथा जिनके नेत्र विकसित कुमुद-कुसुमके पमान शोभायमान हैं, उन भगवान्‌ श्रीकृष्णके दूसरे हाथमें कौमोदकी नामक गदा आ गयी

English

Vaishampāyana said:—O descendant of Bharata, hearing attentively the words of Nārada the great Asura Andhaka felt a desire for going to the mount Mandara (1). Having gathered other Asuras (around him) the highly energetic and powerful Andhaka, elated with the pride of his strength, arrived at the mount Mandara. It was covered with huge clouds, great herbs and virtuous Siddhas. There lived the great Rishis and it abounded in many elephants, sandal, Aguru and various other trees. It was rendered charming with the songs of the Kinnaras and it danced as if with the blossoming trees blown by the wind. It was filled with the sweet notes of the birds and swans moving about beautifully. It was adorned with the highly powerful buffaloes, the destroyers of the demons and lions white as the rays of the moon. It was filled with hundreds of deer. Arriving there he said to that best of mountains existing there in his own form. (2–8). "You know that by virtue of my father's boon I am not to be slain by any. The three worlds, consisting of mobile and immobile creation, are under me. O mountain, out of fear, none is able to fight with me. O great hill, I have heard that on your table-land there is a forest of Pārijāta trees, the jewels of them, adorned with flowers conferring all desired-for objects. My mind is filled with curiosity-tell me speedily where that forest is on your table-land. O mountain, if angry you will not be able to do any thing against me: on the other hand if I oppress and trouble you, I do not see any one who will be able to protect you." Thus addressed the mount Mandara disappeared therefrom (9-12).

अध्याय 98

श्लोक 16

तौ सप्रहरणौ वीरौ साक्षाद्विष्णुतनूपमौ ।समरे रामगोविन्दौ रिपूंस्तान् प्रत्ययुद्ध्यताम्

tau sapraharaṇau vīrau sākṣādviṣṇutanūpamau | samare rāmagovindau ripūṃstān pratyayuddhyatām

हिन्दी अर्थ

साक्षात्‌ विष्णुके-से विग्रहवाले वे दोनों वीर बलराम और श्रीकृष्ण जब अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो गये, तब समरभूमिमें उन शत्रुओंके साथ युद्ध करने लगे

अध्याय 98

श्लोक 17

आयुधप्रग्रहौ वीरौ तावन्योन्यमयावुभौ ।पूर्वजानुजसंज्ञौ तु रामगोविन्दलक्षणौ

āyudhapragrahau vīrau tāvanyonyamayāvubhau | pūrvajānujasaṃjñau tu rāmagovindalakṣaṇau

हिन्दी अर्थ

अस्त्र ग्रहण करके समराज्णमें खड़े हुए वे दोनों अग्रज और अनुज वीर बलराम तथा श्रीकृष्ण अन्योन्यमय (एक-दूसरेपर आश्रित अथवा एक-दूसरेके स्वरूप) थे

अध्याय 98

श्लोक 18

समरेऽप्रतिरूपौ तौ विष्णुरेको द्विधा कृतः ।द्विषत्सु प्रतिकुर्वाणौ पराक्रान्तौ यथेश्वरौ

samare'pratirūpau tau viṣṇureko dvidhā kṛtaḥ | dviṣatsu pratikurvāṇau parākrāntau yatheśvarau

हिन्दी अर्थ

रणभूमिमें उनकी तुलना करनेवाला दूसरा कोई नहीं था। वे दोनों एक ही विष्णुके दो स्वरूप थे तथा शत्रुओंका प्रतीकार करते हुए सर्वसमर्थ ईश्वरकी भाँति पराक्रम प्रकट कर हे थे

अध्याय 98

श्लोक 19

हलमुद्यम्य रामस्तु सर्पेन्द्रमिव कोपनम् ।चचार समरे वीरो द्विषतामन्तकोपमः

halamudyamya rāmastu sarpendramiva kopanam | cacāra samare vīro dviṣatāmantakopamaḥ

हिन्दी अर्थ

वीर बलराम क्रोधमें भरे हुए सर्पराजके तुल्य सांवर्तक हलको हाथमें उठाकर समरमें शत्रुओंके लिये कालरूप होकर विचरने लगे

अध्याय 98

श्लोक 20

विकर्षन् रथवृन्दानि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।चकार रोषं सफलं नागेषु च हयेषु च

vikarṣan rathavṛndāni kṣatriyāṇāṃ mahātmanām | cakāra roṣaṃ saphalaṃ nāgeṣu ca hayeṣu ca

श्लोक 20–21 का हिन्दी अर्थ

वे महामनस्वी क्षत्रियोंके रथसमूहोंको पीछे ढकेलते हुए हाथियों और घोड़ोंपर अपना रोष सफल करने लगे। समरमें परम सुन्दर प्रतीत होनेवाले बलराम हलसे हाथियोंको ऊपर उछाल देते और मूसल फेंककर उन्हें मार डालते थे। इस प्रकार उन पर्वतोपम हाथियोंको उन्होंने मार डाला

अध्याय 98

श्लोक 21

कुञ्जराँल्लाङ्गलोत्क्षिप्तान् मुसलाक्षेपताडितान् ।रामोऽभिरामः समरे निर्ममन्थ यथाचलान्

kuñjarā~llāṅgalotkṣiptān musalākṣepatāḍitān | rāmo'bhirāmaḥ samare nirmamantha yathācalān

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 98

श्लोक 22

ते वध्यमाना रामेण समरे क्षत्रियर्षभाः ।जरासन्धान्तिकं भीता विरथाः प्रतिजग्मिरे

te vadhyamānā rāmeṇa samare kṣatriyarṣabhāḥ | jarāsandhāntikaṃ bhītā virathāḥ pratijagmire

हिन्दी अर्थ

समराड़णमें बलरामजीके द्वारा मारे जाते हुए वे क्षत्रियशिरोमणि योद्धा रथहीन हो भयके मारे जरासंधके पास भाग गये

अध्याय 98

श्लोक 23

तानुवाच जरासन्धः क्षत्रधर्मे व्यवस्थितः ।धिगेतां क्षत्रवृत्तिं वः समरे कातरात्मनाम्

tānuvāca jarāsandhaḥ kṣatradharme vyavasthitaḥ | dhigetāṃ kṣatravṛttiṃ vaḥ samare kātarātmanām

हिन्दी अर्थ

तब क्षत्रियधर्ममें स्थित रहनेवाले जरासंधने उनसे कहा-'समरभूमिमें आकर पनमें कायरता लानेवाले तुमलोगोंकी इस क्षत्रियवृत्तिको धिक्कार है

अध्याय 98

श्लोक 24

पराक्रान्तस्य समरे विरथस्य पलायतः ।भ्रूणहत्यामिवासह्यां प्रवदन्ति मनीषिणः

parākrāntasya samare virathasya palāyataḥ | bhrūṇahatyāmivāsahyāṃ pravadanti manīṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

मनीषी पुरुष समरमें पराक्रम प्रकट करके रथहीन होकर भागनेवाले योद्धाकी इस कायरताको भ्रूणहत्याके समान असह्य बताते हैं

अध्याय 98

श्लोक 25

पत्तिनो भुवि चैकस्य गोपस्याल्पबलीयसः ।भीताः किं विनिवर्तध्वं धिगेतां क्षत्रवृत्तिताम्

pattino bhuvi caikasya gopasyālpabalīyasaḥ | bhītāḥ kiṃ vinivartadhvaṃ dhigetāṃ kṣatravṛttitām

हिन्दी अर्थ

यह ग्वाला अत्यन्त बलहीन है, पैदल है और पृथ्वीपर अकेला खड़ा है। भला, इससे भयभीत होकर तुमलोग क्यों भाग रहे हो? तुम्हारी इस क्षत्रियवृत्तिको घिक्कार है

अध्याय 98

श्लोक 26

क्षिप्रं समभिवर्तन्तां मम वाक्येन नोदिताः ।यावदेतौ रणे गोपौ प्रेषयामि यमक्षयम्

kṣipraṃ samabhivartantāṃ mama vākyena noditāḥ | yāvadetau raṇe gopau preṣayāmi yamakṣayam

हिन्दी अर्थ

मेरी आज्ञासे प्रेरित होकर तुम सब लोग शीघ्र ही शत्रुओंपर आक्रमण करो । तबतक मैं रणभूमिमें इन दोनों वालोंको मारकर यमलोक भेज देता हूँ

अध्याय 98

श्लोक 27

ततस्ते क्षत्रियाः सर्वे जरासन्धेन नोदिताः ।क्षिपन्तः शरजालानि हृष्टा योद्धुमुपस्थिताः

tataste kṣatriyāḥ sarve jarāsandhena noditāḥ | kṣipantaḥ śarajālāni hṛṣṭā yoddhumupasthitāḥ

श्लोक 27–28 का हिन्दी अर्थ

तब जरासंधसे प्रेरित होकर वे समस्त क्षत्रिय बाण समूहों की वर्षा करते हुए बड़े हर्षके साथ युद्धके लिये डट गये। त्रे सोनेके आभूषणोंसे विभूषित अश्चों, चन्द्रमाके समान क्रान्तिमान्‌ रथों और महावतोंद्वारा हाँके गये एवं मेघोंके प्रमान काले रंगवाले हाथियोंद्वारा रणभूमिमें आगे बढ़ने नगे

अध्याय 98

श्लोक 28

ते हयैः काञ्चनापीडै रथैश्चेन्दुसमप्रभैः ।नागैश्चाम्भोदसङ्काशैर्महामात्रप्रणोदितैः

te hayaiḥ kāñcanāpīḍai rathaiścendusamaprabhaiḥ | nāgaiścāmbhodasaṅkāśairmahāmātrapraṇoditaiḥ

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 98

श्लोक 29

सतनुत्राणनिस्त्रिंशाः सायुधाभरणाम्बराः ।स्वारोपितधनुष्मन्तः सतूणीराः ससायकाः

satanutrāṇanistriṃśāḥ sāyudhābharaṇāmbarāḥ | svāropitadhanuṣmantaḥ satūṇīrāḥ sasāyakāḥ

हिन्दी अर्थ

उनके शरीरोंमें कवच और हाथोंमें खड्ग थे । वे आयुध, आभूषण तथा वस्त्रोंसे सुसज्जित थे । उन्होंने भनुषोंको भली भाँति चढ़ा रखा था। वे बाणों और तरकसों से सम्पन्न थे

अध्याय 98

श्लोक 30

सच्छत्रोत्सेधिनः सर्वे चारुचामरवीजिताः ।रणावनिगता रेजुः स्यन्दनस्था महीक्षितः

sacchatrotsedhinaḥ sarve cārucāmaravījitāḥ | raṇāvanigatā rejuḥ syandanasthā mahīkṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

जो राजा रणभूमिमें रथोंपर बैठे हुए थे, उनके सिरपर ऊँचे छत्र तने थे तथा मनोहर चामरोंद्वारा डनके लिये हवा की जा रही थी। इस तरह वे सभी बड़ी शोभा पाते थे

अध्याय 98

श्लोक 31

तौ युद्धरङ्गापतितौ विधावन्तौ महाभुजौ ।वसुदेवसुतौ वीरौ युयुत्सू प्रत्यदृश्यताम्

tau yuddharaṅgāpatitau vidhāvantau mahābhujau | vasudevasutau vīrau yuyutsū pratyadṛśyatām

हिन्दी अर्थ

युद्धकी रंगभूमिमें उतर कर पब ओर धावा करनेवाले वे महाबाहु वीर वसुदेवपुत्र पुद्धके लिये उत्सुक दिखायी देते थे

अध्याय 98

श्लोक 32

तद् युद्धमभवत्तत्र तयोस्तेषां तु संयुगम् ।सायकोत्सर्गबहुलं गदानिर्घातदारुणम्

tad yuddhamabhavattatra tayosteṣāṃ tu saṃyugam | sāyakotsargabahulaṃ gadānirghātadāruṇam

हिन्दी अर्थ

वहाँ रणभूमिमें गन दोनों भाइयों तथा उन राजाओंमें भारी युद्ध होने नगा। उसमें बहुत-से बाणोंकी वर्षा की जा रही थी। ददाओंके आघातसे उस युद्धकी भयड्रता और बढ़ यी थी

अध्याय 98

श्लोक 33

ततः शरसहस्राणि प्रतीच्छन्तौ रणेषिणौ ।तस्थतुर्योधमुख्यौ तावभिवृष्टौ यथाचलौ

tataḥ śarasahasrāṇi pratīcchantau raṇeṣiṇau | tasthaturyodhamukhyau tāvabhivṛṣṭau yathācalau

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर सहस्रों बाणोंकी बौछार ग्रहण करते हुए वे दोनों युद्धाभिलाषी महायोद्धा वर्षाका आघात पहन करनेवाले दो पर्वतोंके समान वहाँ अविचलभावसे त्रड़े रहे

अध्याय 98

श्लोक 34

गदाभिश्चैव गुर्वीभिः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः ।अर्द्यमानौ महेष्वासौ यादवौ न चकम्पतुः

gadābhiścaiva gurvībhiḥ kṣepaṇīyaiśca mudgaraiḥ | ardyamānau maheṣvāsau yādavau na cakampatuḥ

हिन्दी अर्थ

शत्रुओंकी भारी गदाओं, गोफनों या लवाँसों तथा मुदूगरोंकी मारसे पीड़ित होते हुए भी वे नों महाधनुर्धर यादव वीर कम्पित नहीं हुए

अध्याय 98

श्लोक 35

ततः कृष्णोऽम्बुदाकारः शङ्खचक्रगदाधरः व्यवर्धत महातेजा वातयुक्त इवानलः

tataḥ kṛṣṇo'mbudākāraḥ śaṅkhacakragadādharaḥ vyavardhata mahātejā vātayukta ivānalaḥ

हिन्दी अर्थ

त्पश्चात्‌ श्ध, चक्र और गदा धारण करनेवाले घनश्याम- त्रग्रह महातेजस्वी श्रीकृष्ण वायुसे प्रेरित होकर प्रज्वलित ई अग्निके समान बढ़ने लगे

अध्याय 98

श्लोक 36

स चक्रेणार्कतुल्येन दीप्यमानेन तेजसा ।चिच्छेद समरे वीरो नृगजाश्वमहारथान्

sa cakreṇārkatulyena dīpyamānena tejasā | ciccheda samare vīro nṛgajāśvamahārathān

हिन्दी अर्थ

समराज्ञणमें उन और मधुसूदनने तेजसे उद्दी्त होनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी पक्के द्वारा मनुष्यों, हाथियों, घोड़ों तथा बड़े-बड़े रथोंके वी टुकड़े-टुकड़े कर डाले

अध्याय 98

श्लोक 37

गदानिपातविहता लाङ्गलेन च कर्षिताः ।न शेकुस्ते रणे स्थातुं पार्थिवा नष्टचेतसः

gadānipātavihatā lāṅgalena ca karṣitāḥ | na śekuste raṇe sthātuṃ pārthivā naṣṭacetasaḥ

हिन्दी अर्थ

गदाके आघातसे रे गये तथा हलसे खींचकर नष्ट किये गये राजा लोग पपनी चेतना खोकर रणभूमिमें खड़े न रह सके

अध्याय 98

श्लोक 38

चक्रक्षुरनिकृत्तानि विचित्राणि महीक्षिताम् ।रथयूथानि भग्नानि न शेकुश्चलितुं रणे

cakrakṣuranikṛttāni vicitrāṇi mahīkṣitām | rathayūthāni bhagnāni na śekuścalituṃ raṇe

हिन्दी अर्थ

क्रके छुरोंसे टुकड़े-टुकड़े किये गये राजाओंके विचित्र थसमूह भग्न होकर युद्धभूमिमें आगे न बढ़ सके

अध्याय 98

श्लोक 39

मुसलाक्षेपभग्नाश्च कुञ्जराः षष्टिहायनाः ।घना इव घनापाये भग्नदन्ता विचुक्रुशुः

musalākṣepabhagnāśca kuñjarāḥ ṣaṣṭihāyanāḥ | ghanā iva ghanāpāye bhagnadantā vicukruśuḥ

हिन्दी अर्थ

[सलोंकी मारसे घायल हुए साठ वर्षोंकी अवस्थावाले थी दाँत टूट जानेके कारण शरद्‌-त्ह्तुके जलहीन बादलोंकि मान असमर्थ हो आर्तभावसे चीत्कार कर रहे थे

अध्याय 98

श्लोक 40

चक्रानलज्वालहताः सादिनः सपदातयः ।पेतुः परासवस्तत्र यथा वज्रहतास्तथा

cakrānalajvālahatāḥ sādinaḥ sapadātayaḥ | petuḥ parāsavastatra yathā vajrahatāstathā

हिन्दी अर्थ

डे सुदर्शन चक्रसे प्रकट हुई आगकी ज्वालासे झुलसकर कितने ही घुड़सवार और पैदल योद्धा धरतीपर पड़े थे। उनके प्राण-पखेरू उड़ गये थे तथा वे वज्रके आघातसे मरे हुएके तुल्य प्रतीत होते थे

अध्याय 98

श्लोक 41

चक्रलाङ्गलनिर्दग्धं तत्सैन्यं विदलीकृतम् ।युगान्तोपहतप्रख्यं सर्वं पतितमाबभौ

cakralāṅgalanirdagdhaṃ tatsainyaṃ vidalīkṛtam | yugāntopahataprakhyaṃ sarvaṃ patitamābabhau

हिन्दी अर्थ

चक्र और हलसे दग्ध होकर विदीर्ण की गयी वह सारी सेना इस तरह धरतीपर पड़ी थी मानो प्रलयकालमें सबका एक साथ संहार हो गया हो

अध्याय 98

श्लोक 42

आक्रीडभूमिं दिव्यानामायुधानां वपुष्मताम् ।वैष्णवानां नृपास्ते तु द्रष्टुमप्यबलीयसः

ākrīḍabhūmiṃ divyānāmāyudhānāṃ vapuṣmatām | vaiṣṇavānāṃ nṛpāste tu draṣṭumapyabalīyasaḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ मूर्तिमान्‌ होकर प्रकट हुए उन वैष्णव दिव्यास्त्रोंकी क्रीडा-भूमिरूप युद्धस्थलकी ओर देखनेमें भी वे राजालोग असमर्थ हो गये थे

अध्याय 98

श्लोक 43

केचिद्रथा सम्मृदिताः केचिन्निहतपार्थिवाः ।भग्नैकचक्रास्त्वपरे विकीर्णा धरणीतले

kecidrathā sammṛditāḥ kecinnihatapārthivāḥ | bhagnaikacakrāstvapare vikīrṇā dharaṇītale

हिन्दी अर्थ

कितने ही रथ रौंद डाले गये। कितनोंके राजा मार डाले गये और कितने ही एक-एक पहिया नष्ट हो जानेके कारण भूतलपर बिखरे पड़े थे

अध्याय 98

श्लोक 44

तस्मिन् विशसने घोरे चक्रलाङ्गलसम्प्लवे ।दारुणानि प्रवृत्तानि रक्षांस्यौत्पातिकानि च

tasmin viśasane ghore cakralāṅgalasamplave | dāruṇāni pravṛttāni rakṣāṃsyautpātikāni ca

हिन्दी अर्थ

चक्र और हलद्वारा जहाँ विप्लव मच गया था, उस घोर संग्राममें राक्षसोंद्वारा उपस्थित की गयी भयंकर उत्पातसूचक घटनाएँ घटित होने लगीं

अध्याय 98

श्लोक 45

आर्तानां कूजमानानां पाटितानां च वेणुवत् ।अन्तो न शक्यतेऽन्वेष्टुं नृनागरथवाजिनाम्

ārtānāṃ kūjamānānāṃ pāṭitānāṃ ca veṇuvat | anto na śakyate'nveṣṭuṃ nṛnāgarathavājinām

हिन्दी अर्थ

जो आर्तभावसे चीख रहे थे तथा जो बाँसकी तरह चीर डाले गये थे, ऐसे मनुष्यों, हाथियों, रथारोहियों और घोड़ोंकी अन्तिम संख्या कितनी है, इसका पता लगाना असम्भव हो गया था

अध्याय 98

श्लोक 46

सा पातितनरेन्द्राणां रुधिराऽऽर्द्रा रणक्षितिः ।योषेव चन्दनार्द्राङ्गी भैरवा प्रतिभाति वै

sā pātitanarendrāṇāṃ rudhirā''rdrā raṇakṣitiḥ | yoṣeva candanārdrāṅgī bhairavā pratibhāti vai

हिन्दी अर्थ

धरतीपर पड़े हुए राजाओंके रुधिरसे भीगी हुई वह रणभूमि लाल चन्दनसे आर अज्ञवाली नारीके समान भयंकर प्रतीत होती थी

अध्याय 98

श्लोक 47

नरकेशास्थिमज्जान्त्रैः शातितानां च दन्तिनाम् ।रुधिरौघप्लवस्तत्र च्छादयामास मेदिनीम्

narakeśāsthimajjāntraiḥ śātitānāṃ ca dantinām | rudhiraughaplavastatra cchādayāmāsa medinīm

हिन्दी अर्थ

मनुष्योंके केशों, हड्डियों, मज्ञाओं तथा आँतोंसे मिला हुआ कटे हाथियोंके रक्तका प्रवाह वहाँकी भूमिको आच्छादित करता जा रहा था

अध्याय 98

श्लोक 48

तस्मिन् महाभीषणके नरवाहनसङ्क्षये ।शिवानामशिवैः शब्दैर्नादिते घोरदर्शने

tasmin mahābhīṣaṇake naravāhanasaṅkṣaye | śivānāmaśivaiḥ śabdairnādite ghoradarśane

हिन्दी अर्थ

वह रणभूमि बड़ी भयानक प्रतीत होती थी । वहाँ मनुष्यों और उनके वाहनोंका संहार हो रहा था। गीदड़ियोंके अमज़लसूचक शब्द वहाँ सदा गूँजते रहते थे। वह देखनेमें भी बड़ी भयंकर थी

अध्याय 98

श्लोक 49

आर्तस्तनितसन्नादे रुधिराम्बुह्रदाकुले ।अन्तकाक्रीडसदृशे नागदेहैः समावृते

ārtastanitasannāde rudhirāmbuhradākule | antakākrīḍasadṛśe nāgadehaiḥ samāvṛte

हिन्दी अर्थ

आर्त प्राणियों की चीख—पुकारका शब्द सब ओर फैला हुआ था। रक्तके कितने ही कुण्ड बन गये थे। हाथियोंकी लाशोंसे ढकी हुई वह युद्धस्थली कालकी क्रीडाभूमिके समान प्रतीत होती थी

अध्याय 98

श्लोक 50

अपास्तैर्बाहुभिर्योधैस्तुरगैश्च विदारितैः ।कङ्कैश्च बलगृध्रैश्च नादितैः प्रतिनादिते

apāstairbāhubhiryodhaisturagaiśca vidāritaiḥ | kaṅkaiśca balagṛdhraiśca nāditaiḥ pratinādite

हिन्दी अर्थ

कहीं योद्धाओंकी बहिं कटकर गिरी थीं । कहीं बहुत-से योद्धा ही मरे पड़े थे और कहीं विदीर्ण हुए घोड़ोंकी लाशें बिछी हुई थीं । बड़े-बड़े बगुलों, कौओं और गीधोंकी बोलियोंसे वह समराड्ण गूँज रहा था

अध्याय 98

श्लोक 51

निपाते पृथिवीशानां मृत्युसाधारणे रणे ।कृष्णः शत्रुवधं कर्तुं चचारान्तकदर्शनः

nipāte pṛthivīśānāṃ mṛtyusādhāraṇe raṇe | kṛṣṇaḥ śatruvadhaṃ kartuṃ cacārāntakadarśanaḥ

हिन्दी अर्थ

जहाँ बड़े-बड़े भूमिपाल धराशायी हो रहे थे और मृत्यु एक साधारण-सी बात हो गयी थी, उस रणभूमिमें कालके समान दिखायी देनेवाले श्रीकृष्ण शत्रु ओंका वध करनेके लिये विचर रहे थे

अध्याय 98

श्लोक 52

युगान्तार्कप्रभं चक्रं कालीं चैवायसीं गदाम् ।गृह्य सैन्यावनिगतो बभाषे केशवो नृपान्

yugāntārkaprabhaṃ cakraṃ kālīṃ caivāyasīṃ gadām | gṛhya sainyāvanigato babhāṣe keśavo nṛpān

हिन्दी अर्थ

प्रलयकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होनेवाले चक्र और लोहेकी बनी हुई काली गदाको हाथमें लेकर भगवान्‌ श्रीकृष्ण सेनाके मध्यकी भूमिमें खड़े हो राजाओंसे इस प्रकार बोले—

अध्याय 98

श्लोक 53

किन्न युद्धयत वै शूरा हस्त्यश्वरथसंयुताः ।किमिदं गम्यते शूराः कृतास्त्रा दृढनिश्चयाः ।अहं सपूर्वजः सङ्ख्ये पदातिः प्रमुखे स्थितः

kinna yuddhayata vai śūrā hastyaśvarathasaṃyutāḥ | kimidaṃ gamyate śūrāḥ kṛtāstrā dṛḍhaniścayāḥ | ahaṃ sapūrvajaḥ saṅkhye padātiḥ pramukhe sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

हाथी, घोड़े और रथोंसे युक्त श्रवीरो! अब युद्ध यों नहीं करते हो? अस्त्रोंके विद्वान्‌ तथा युद्धका दृढ़ नेश्चय रखनेवाले वीरो! क्यों इस प्रकार पलायन करते हो? मैं तो युद्धमें अपने बड़े भाईके साथ तुम्हारे सामने दल ही खड़ा हूँ

अध्याय 98

श्लोक 54

अदृष्टदोषेण रणे भवन्तो येन पालिताः ।स इदानीं जरासन्धः किमर्थं नाभिवर्तते

adṛṣṭadoṣeṇa raṇe bhavanto yena pālitāḥ | sa idānīṃ jarāsandhaḥ kimarthaṃ nābhivartate

हिन्दी अर्थ

युद्धमें जिसने दोष नहीं देखा दे तथा जिसके द्वारा तुम लोग पालित हुए हो, वह नरासंध अब हमारे सामने क्यों नहीं आ रहा है ?'

अध्याय 98

श्लोक 55

एवमुक्ते तु नृपतिर्दरदो नाम वीर्यवान् ।रामं हलाग्रोग्रभुजं प्रत्ययात् सैन्यमध्यगम्

evamukte tu nṛpatirdarado nāma vīryavān | rāmaṃ halāgrograbhujaṃ pratyayāt sainyamadhyagam

हिन्दी अर्थ

प्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पराक्रमी राजा दरद सेनाके पध्यमें खड़े हुए तथा हलके अग्रभागसे उग्र भुजावाले लरामके सामने आया

अध्याय 98

श्लोक 56

बभाषे स तु ताम्राक्षमुक्षाणमिव सेवनी ।एह्येहि राम युध्यस्व मया सार्द्धमरिन्दम

babhāṣe sa tu tāmrākṣamukṣāṇamiva sevanī | ehyehi rāma yudhyasva mayā sārddhamarindama

हिन्दी अर्थ

जैसे किसान बैलसे बात करता है, उसी प्रकार उसने लाल नेत्रोंबाले बलरामजीसे स प्रकार कहा—' शत्रुदमन राम! आओ, आओ । मेरे पाथ युद्ध करो '

अध्याय 98

श्लोक 57

तद् युद्धमभवत् ताभ्यां रामस्य दरदस्य च ।मृधे लोकवरिष्ठाभ्यां कुञ्जराभ्यामिवौजसा

tad yuddhamabhavat tābhyāṃ rāmasya daradasya ca | mṛdhe lokavariṣṭhābhyāṃ kuñjarābhyāmivaujasā

हिन्दी अर्थ

बलराम और दरद—दोनों जगत्‌के ्रेष्ठ वीर थे। युद्धस्थलमें उन दोनोंका बलपूर्वक संग्राम होने लगा, मानो दो हाथी आपसमें लड़ रहे हों

अध्याय 98

श्लोक 58

योजयित्वा ततः स्कन्धे रामो दरदमाहवे ।हलेन बलिनां श्रेष्ठो मुसलेनावपोथयत्

yojayitvā tataḥ skandhe rāmo daradamāhave | halena balināṃ śreṣṭho musalenāvapothayat

हिन्दी अर्थ

॑ब बलवानोंमें श्रेष्ठ बलरामने युद्धस्थलमें दरदके कंधेसे डल फँसाकर उसे मुसलसे मार डाला

अध्याय 98

श्लोक 59

स्वकायगतमूर्धा वै मुसलेनावपोथितः ।पपात दरदो भूमौ दारितार्द्व इवाचलः

svakāyagatamūrdhā vai musalenāvapothitaḥ | papāta darado bhūmau dāritārdva ivācalaḥ

हिन्दी अर्थ

मुसलसे परे गये दरदका मस्तक उसके शारीरमें ही घुस गया भर विदीर्ण हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा

अध्याय 98

श्लोक 60

रामेण निहते तस्मिन् दरदे राजसत्तमे ।जरासन्धस्य राज्ञस्तु रामेणासीत्समागमः

rāmeṇa nihate tasmin darade rājasattame | jarāsandhasya rājñastu rāmeṇāsītsamāgamaḥ

श्लोक 60–62 का हिन्दी अर्थ

[जाओंगें श्रेष्ठ दरदके बलरामद्वारा मारे जानेपर राजा नरासंधका उनके साथ अत्यन्त भयंकर एवं रोमाझ्जकारी पुद्ध होने लगा। मानो देवराज इन्द्रका वृत्रासुरके साथ ग्राम हो रहा हो । वे दोनों पराक्रमी वीर गदाएँ हाथमें नेकर पृथ्वीको कम्पित करते हुए एक-दूसरेकी ओर गौड़े । दो विशाल गदाएँ उठाये हुए वे दोनों महामनस्वी ोद्धा शिखरोंसे युक्त दो पर्वतोंके समान दिखायी देते मे

अध्याय 98

श्लोक 61

महेन्द्रस्येव वृत्रेण दारुणो लोमहर्षणः ।गदे गृहीत्वा विक्रान्तावन्योन्यमभिधावतः

mahendrasyeva vṛtreṇa dāruṇo lomaharṣaṇaḥ | gade gṛhītvā vikrāntāvanyonyamabhidhāvataḥ

अर्थ श्लोक 60 के साथ

अध्याय 98

श्लोक 62

कम्पयन्तौ भुवं वीरौ तावुद्यतमहागदौ ।ददृशाते महात्मानौ गिरी सशिखराविव

kampayantau bhuvaṃ vīrau tāvudyatamahāgadau | dadṛśāte mahātmānau girī saśikharāviva

अर्थ श्लोक 60 के साथ

अध्याय 98

श्लोक 63

व्युपारमन्त युद्धानि प्रेक्ष्य तौ पुरुषर्षभौ ।संरब्धाविव धावन्तौ गदायुद्धेषु विश्रुतौ

vyupāramanta yuddhāni prekṣya tau puruṣarṣabhau | saṃrabdhāviva dhāvantau gadāyuddheṣu viśrutau

हिन्दी अर्थ

उन दोनों पुरुषप्रवर वीरोंको युद्ध करते देख दूसरोंके युद्ध बंद हो गये। गदायुद्धोंमें विख्यात जरासंध और बलराम रोषावेशमें भरे हुए-से एक- रूसरेपर धावा करते थे

अध्याय 98

श्लोक 64

तावुभौ परमाचार्यौ लोके ख्यातौ महाबलौ ।मत्ताविव महानागावन्योन्यं समधावताम्

tāvubhau paramācāryau loke khyātau mahābalau | mattāviva mahānāgāvanyonyaṃ samadhāvatām

हिन्दी अर्थ

वे दोनों महाबली वीर पंसारमें गदायुद्धके उत्तम आचार्य कहे जाते थे। वे दो मदमत्त विशालकाय हाथियोंके समान परस्पर आक्रमण करते थे

अध्याय 98

श्लोक 65

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः ।यक्षाश्चाप्सरसश्चैव समाजग्मुः सहस्रशः

tato devāḥ sagandharvāḥ siddhāśca paramarṣayaḥ | yakṣāścāpsarasaścaiva samājagmuḥ sahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय देवता, गन्धर्व, सिद्ध, महर्षि, पक्ष तथा सहस्रों अप्सराएँ वह युद्ध देखनेके लिये आ यीं

अध्याय 98

श्लोक 66

तद्देवयक्षगन्धर्वमहर्षिभिरलङ्कृतम् ।शुशुभेऽभ्यधिकं राजन् नभो ज्योतिर्गणैरिव

taddevayakṣagandharvamaharṣibhiralaṅkṛtam | śuśubhe'bhyadhikaṃ rājan nabho jyotirgaṇairiva

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों और महर्षियोंसे भ्लंकृत हुआ वहाँका आकाश नक्षत्रोंसे आवृत हुआ- पा अधिक शोभा पाने लगा

अध्याय 98

श्लोक 67

अभिदुद्राव रामं तु जरासन्धो नराधिपः ।सव्यं मण्डलमाश्रित्य बलदेवस्तु दक्षिणम्

abhidudrāva rāmaṃ tu jarāsandho narādhipaḥ | savyaṃ maṇḍalamāśritya baladevastu dakṣiṇam

हिन्दी अर्थ

राजा जरासंध बायीं भरसे पैंतरा देकर बलरामजीपर टूट पड़ा और बलदेवजीने गहिनी ओरसे उसपर धावा किया

अध्याय 98

श्लोक 68

तावन्योन्यं प्रजह्राते गदायुद्धविशारदौ ।दन्ताभ्यामिव मातङ्गौ नादयन्तौ दिशो दश

tāvanyonyaṃ prajahrāte gadāyuddhaviśāradau | dantābhyāmiva mātaṅgau nādayantau diśo daśa

हिन्दी अर्थ

२६४ विद फ्ा 9४ 9] ए०/तपताा 47 2 रिया है गदायुद्धमें निपुण वे दोनों वीर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। जैसे दो मतवाले हाथी अपने दाँतोंसे परस्पर चोट करते हों, उसी प्रकार गदाओंसे आघात करते हुए वे दसों दिशाओंको निनादित करने लगे

अध्याय 98

श्लोक 69

गदानिपातो रामस्य शुश्रुवेऽशनिनिःस्वनः ।जरासन्धस्य च रणे पर्वतस्येव दीर्यतः

gadānipāto rāmasya śuśruve'śaniniḥsvanaḥ | jarāsandhasya ca raṇe parvatasyeva dīryataḥ

हिन्दी अर्थ

रणभूमिमें बलरामजीकी गदाके आधातका शब्द वज्रपातके समान सुनायी पड़ता था तथा जरासंधके गदाघातकी ध्वनि फटते हुए पहाड़के समान प्रतीत होती थी

अध्याय 98

श्लोक 70

न स्म कम्पयते रामं जरासन्धकरच्युता ।गदा गदाभृतां श्रेष्ठं विन्ध्यं गिरिमिवानिलः

na sma kampayate rāmaṃ jarāsandhakaracyutā | gadā gadābhṛtāṃ śreṣṭhaṃ vindhyaṃ girimivānilaḥ

हिन्दी अर्थ

जरासंधके हाथसे छूटी हुई गदा गदाधारियोंमें श्रेष्ठ बलरामजीको उसी प्रकार कम्पित नहीं कर पाती थी, जैसे वायु विन्थ्यगिरिको नहीं हिला सकती है

अध्याय 98

श्लोक 71

रामस्य तु गदावेगं राजा स मगधेश्वरः ।सेहे धैर्येण महता शिक्षया च व्यपोथयत्

rāmasya tu gadāvegaṃ rājā sa magadheśvaraḥ | sehe dhairyeṇa mahatā śikṣayā ca vyapothayat

हिन्दी अर्थ

बलरामजीकी गदाका वेग मगधराज जरासंध बड़े धैर्यसे सहन करता और शिक्षा-कौशलसे उसको विफल भी कर देता था

अध्याय 98

श्लोक 72

ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् सुस्वरा लोकसाक्षिणी ।न त्वया राम वध्योऽयमलं खेदेन मानद

tato'ntarikṣe vāgāsīt susvarā lokasākṣiṇī | na tvayā rāma vadhyo'yamalaṃ khedena mānada

श्लोक 72–73 का हिन्दी अर्थ

उस समय आकाशमें सब लोगोंके समक्ष सुस्पष्ट स्वरमें दैवी वाणी सुनायी दी-दूसरोंको मान देनेवाले बलराम! जरासंधका वध तुम्हारे हाथोंसे होनेवाला नहीं है, अत: खेद न करो। इसकी मृत्युका विधान मेरे द्वारा बना दिया गया है, अत: तुम इस युद्धसे विरत हो जाओ। थोड़े ही समयमें मगधराजको अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ेगा '

अध्याय 98

श्लोक 74

विहितोऽस्य मया मृत्युस्तस्मात्साधु व्युपारम ।अचिरेणैव कालेन प्राणांस्त्यक्ष्यति मागधः ॥ ७३॥।जरासन्धस्तु तच्छ्रुत्वा विमनाः समपद्यत ।न प्राहरत् ततस्तस्मै पुनरेव हलायुधः ।तौ व्युपारमतां युद्धाद्वृष्णयस्ते च पार्थिवाः

vihito'sya mayā mṛtyustasmātsādhu vyupārama | acireṇaiva kālena prāṇāṃstyakṣyati māgadhaḥ || 73||| jarāsandhastu tacchrutvā vimanāḥ samapadyata | na prāharat tatastasmai punareva halāyudhaḥ | tau vyupāramatāṃ yuddhādvṛṣṇayaste ca pārthivāḥ

श्लोक 74–75 का हिन्दी अर्थ

वह आकाशवाणी सुनकर जरासंधका मन उदास हो गया । तदनन्तर बलरामने उसपर पुन: प्रहार नहीं किया । वे दोनों वीर युद्धसे विरत हो गये। महाराज ! इसके पहले ये वृष्णिवंशी योद्धा और वे राजा लोग दीर्घकालतक एक-दूसरेपर प्रहार करते रहे। जब राजा जरासंध पराजित होकर पलायन करने लगा, तब उसकी सारी सेना खाली हो गयी। उसके विशाल रथ पीछेकी ओर लौट गये

अध्याय 98

श्लोक 75

दीर्घकालं महाराज निजघ्नुरितरेतरम् ।पराजिते त्वपक्रान्ते जरासन्धे महीपतौ ।विविक्तमभवत् सैन्यं परावृत्तमहारथम्

dīrghakālaṃ mahārāja nijaghnuritaretaram | parājite tvapakrānte jarāsandhe mahīpatau | viviktamabhavat sainyaṃ parāvṛttamahāratham

अर्थ श्लोक 74 के साथ

अध्याय 98

श्लोक 76

ते नृपाश्चोदितैर्नागैः स्यन्दनैस्तुरगैस्तथा ।दुद्रुवुर्भीतमनसो व्याघ्राघ्राता मृगा इव

te nṛpāścoditairnāgaiḥ syandanaisturagaistathā | dudruvurbhītamanaso vyāghrāghrātā mṛgā iva

हिन्दी अर्थ

वे राजा व्याघ्रके सूँघे हुए मृगोंके समान मन-ही-मन बहुत डरे हुए थे, अत: अपने हाथी, घोड़े और रथोंको हाँकते हुए रणभूमिसे भाग चले

अध्याय 98

श्लोक 77

तन्नरेन्द्रैः परित्यक्तं भग्नदर्पैर्महारथैः ।घोरं क्रव्यादबहुलं रौद्रमायोधनं बभौ

tannarendraiḥ parityaktaṃ bhagnadarpairmahārathaiḥ | ghoraṃ kravyādabahulaṃ raudramāyodhanaṃ babhau

हिन्दी अर्थ

जिनका घमंड चूर-चूर हो गया था, उन महारथी नरेशोंद्वारा परित्यक्त हुए उस घोर युद्धस्थलमें अधिकतर मांसभक्षी जीव-जन्तु ही रह गये थे। इससे वह बड़ा भयंकर प्रतीत होता था

अध्याय 98

श्लोक 78

द्रवत्सु रथमुख्येषु चेदिराजो महाद्युतिः ।स्मृत्वा यादवसम्बन्धं कृष्णमेवान्ववर्तत

dravatsu rathamukhyeṣu cedirājo mahādyutiḥ | smṛtvā yādavasambandhaṃ kṛṣṇamevānvavartata

हिन्दी अर्थ

जब मुख्य-मुख्य रथी भाग चले, तब महातेजस्वी चेदिराज दमघोषने यादवोंके साथ अपने सम्बन्धको स्मरण करके श्रीकृष्णका ही अनुसरण किया

अध्याय 98

श्लोक 79

वृतः कारूषसैन्येन चेदिसैन्येन चानघ ।सम्बन्धकामो गोविन्दमिदमाह स चेदिराट्

vṛtaḥ kārūṣasainyena cedisainyena cānagha | sambandhakāmo govindamidamāha sa cedirāṭ

हिन्दी अर्थ

निष्पाप जनमेजय! करूष और चेदिदेशकी सेनासे घिरे हुए चेदिराज श्रीकृष्णके साथ सम्बन्ध बढ़ानेकी इच्छासे उनसे इस प्रकार बोले—

अध्याय 98

श्लोक 80

अहं पितृष्वसुर्भर्ता तव यादवनन्दन ।सबलस्त्वामुपावृत्तस्त्वं हि मे दयितः प्रभो

ahaṃ pitṛṣvasurbhartā tava yādavanandana | sabalastvāmupāvṛttastvaṃ hi me dayitaḥ prabho

हिन्दी अर्थ

यादवनन्दन ! मैं तुम्हारी बूआका पति हूँ और सेनासहित तुम्हारे पास आया हूँ। प्रभो! तुम मेरे परम प्रिय हो

अध्याय 98

श्लोक 81

उक्तश्चैष मया राजा जरासन्धोऽल्पचेतनः ।कृष्णाद् विरम दुर्बुद्धे विग्रहाद् रणकर्मणि

uktaścaiṣa mayā rājā jarāsandho'lpacetanaḥ | kṛṣṇād virama durbuddhe vigrahād raṇakarmaṇi

हिन्दी अर्थ

मैंने इस मन्दबुद्धि राजा जरासंधसे कहा था कि अरे दुर्बुद्धे! तू इस विग्रहसे श्रीकृष्णके साथ युद्ध करनेसे विरत हो जा, किंतु इसने नहीं माना

अध्याय 98

श्लोक 82

तदेषोऽद्य मया त्यक्तो मम वाक्यस्य दूषकः ।भग्नो युद्धे जरासन्धस्त्वया द्रवति सानुगः

tadeṣo'dya mayā tyakto mama vākyasya dūṣakaḥ | bhagno yuddhe jarāsandhastvayā dravati sānugaḥ

हिन्दी अर्थ

इसने मेरे इस कथनकी निन्‍्दा की. थी, अतः: अब मैंने इसे त्याग दिया है। युद्धमें तुम्हारे द्वारा पराजित होकर यह जरासंध अपने साथियोंसहित भागा जा रहा है

अध्याय 98

श्लोक 83

निर्वैरो नैष संयाति स्वपुरं पृथिवीपतिः ।त्वय्येव भूयोऽप्यपरं दर्शयिष्यति किल्बिषम्

nirvairo naiṣa saṃyāti svapuraṃ pṛthivīpatiḥ | tvayyeva bhūyo'pyaparaṃ darśayiṣyati kilbiṣam

हिन्दी अर्थ

परंतु यह राजा वैरभाव छोड़कर अपने नगरको नहीं लौट रहा है; अत: यह फिर तुम्हारे प्रति ही दूसरे पापपूर्ण कृत्यका प्रदर्शन करेगा

अध्याय 98

श्लोक 84

तदिमां सन्त्यजाशु त्वं महीं हतनराकुलाम् ।क्रव्यादगणसङ्कीर्णां सेवितव्याममानुषैः

tadimāṃ santyajāśu tvaṃ mahīṃ hatanarākulām | kravyādagaṇasaṅkīrṇāṃ sevitavyāmamānuṣaiḥ

हिन्दी अर्थ

इसलिये अब तुम शीघ्र ही इस भूमिको त्याग दो। यह मुर्दे मनुष्योंसे भरी हुई है और यहाँ सब ओर हिंसक प्राणी छा गये हैं। अब यह स्थान मानवेतर (राक्षस आदि) प्राणियोंके ही सेवन करने योग्य है

अध्याय 98

श्लोक 85

करवीरपुरं कृष्ण गच्छामः सबलानुगाः ।शृगालं वासुदेवं वै द्रक्ष्यामस्तत्र पार्थिवम्

karavīrapuraṃ kṛṣṇa gacchāmaḥ sabalānugāḥ | śṛgālaṃ vāsudevaṃ vai drakṣyāmastatra pārthivam

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण ! अब हमलोग सैनिकों और सेवकोंसहित करवीरपुरमें चलें। वहाँ श्रुगालनामसे विख्यात राजा वासुदेव रहते हैं । उनसे हम मिलेंगे

अध्याय 98

श्लोक 86

इमौ रथवरोदग्रौ युवयोः कारितौ मया ।योजितौ शीघ्रतुरगैः स्वङ्गचक्राक्षकूबरौ

imau rathavarodagrau yuvayoḥ kāritau mayā | yojitau śīghraturagaiḥ svaṅgacakrākṣakūbarau

हिन्दी अर्थ

पे दो श्रेष्ठ रथ मैंने तुम दोनों भाइयोंके लिये तैयार कराये हैं । इनमें शीघ्रगामी घोड़े जुते हुए हैं । इनके सभी अज्ञ, पहिये, धुरे और कूबर आदि सुृदूढ़ हैं

अध्याय 98

श्लोक 87

शीघ्रमारुह भद्रं ते बलदेवसहायवान् ।त्वरामः करवीरस्थं द्रष्टुं तं वसुधाधिपम्

śīghramāruha bhadraṃ te baladevasahāyavān | tvarāmaḥ karavīrasthaṃ draṣṭuṃ taṃ vasudhādhipam

हिन्दी अर्थ

तुम्हारा भला हो। तुम बलदेवके साथ शीघ्र रथपर आरूढ़ हो जाओ । हमें करवीरपुरमें निवास करनेवाले राजा श्रुगालसे मलनेके लिये जल्दी लगी हुई है'

अध्याय 98

श्लोक 88

पितृष्वसृपतेर्वाक्यं श्रुत्वा चेदिपतेस्तदा ।वाक्यं हृष्टमनाः कृष्णो जगाद जगतो गुरुः

pitṛṣvasṛpatervākyaṃ śrutvā cedipatestadā | vākyaṃ hṛṣṭamanāḥ kṛṣṇo jagāda jagato guruḥ

हिन्दी अर्थ

ः वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस समय अपने फूफा चेदिराज दमघोषका यह वचन सुनकर जगदुरु श्रीकृष्णके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोले—

अध्याय 98

श्लोक 89

अहो युद्धाभिसन्तप्तौ देशकालोचितं त्वया ।बान्धवप्रतिरूपेण संसिक्तौ वचनाम्बुना

aho yuddhābhisantaptau deśakālocitaṃ tvayā | bāndhavapratirūpeṇa saṃsiktau vacanāmbunā

हिन्दी अर्थ

अहो! हमलोग युद्धसे संतप्त हो गये थे। आपने एक आत्मीय बन्धुकी भाँति आकर अपने देशकालोचित ्चनरूपी जलसे हमें नहला दिया है

अध्याय 98

श्लोक 90

देशकालविशिष्टस्य हितस्य मधुरस्य च ।वाक्यस्य दुर्लभा लोके वक्तारश्चेदिसत्तम

deśakālaviśiṣṭasya hitasya madhurasya ca | vākyasya durlabhā loke vaktāraścedisattama

हिन्दी अर्थ

चेदिराज! रस जगतमें देशकालके अनुरूप हितकर और मधुर चन बोलनेवाले लोग दुर्लभ हैं

अध्याय 98

श्लोक 91

चेदिनाथ सनाथौ स्वः संवृत्तौ तव दर्शनात् ।नावयोः किञ्चिदप्राप्यं ययोस्त्वं बन्धुरीदृशः

cedinātha sanāthau svaḥ saṃvṛttau tava darśanāt | nāvayoḥ kiñcidaprāpyaṃ yayostvaṃ bandhurīdṛśaḥ

हिन्दी अर्थ

चेदिनाथ ! आपके रर्शनसे हम दोनों सनाथ हो गये। जब हमारे आप-जैसे नन्धु यहाँ मौजूद हैं, तब यहाँ हमारे लिये कुछ भी भ्प्राप्य नहीं है

अध्याय 98

श्लोक 92

जरासन्धस्य निधनं ये चान्ये तत्समा नृपाः ।पर्याप्तौ त्वत्सनाथौ स्वः कर्तुं चेदिकुलोद्वह

jarāsandhasya nidhanaṃ ye cānye tatsamā nṛpāḥ | paryāptau tvatsanāthau svaḥ kartuṃ cedikulodvaha

हिन्दी अर्थ

चेदिकुलभूषण! हम दोनों आपसे परनाथ होकर जरासंध तथा उसके समान जो दूसरे राजा ं, उन सबको मौतके घाट उतार देनेमें समर्थ हैं

अध्याय 98

श्लोक 93

यदूनां प्रथमो बन्धुस्त्वं हि सर्वमहीक्षिताम् ।अतः प्रभृति सङ्ग्रामान् द्रक्ष्यसे चेदिसत्तम

yadūnāṃ prathamo bandhustvaṃ hi sarvamahīkṣitām | ataḥ prabhṛti saṅgrāmān drakṣyase cedisattama

हिन्दी अर्थ

त्रेदिप्रवर ! समस्त राजाओंमें आप ही यदुवंशियोंके थम बन्धु हैं। अबसे आपको बहुत-से संग्राम देखनेको पलेंगे

अध्याय 98

श्लोक 94

चाक्रं मौसलमित्येवं सङ्ग्रामं रणवृत्तयः ।कथयिष्यन्ति लोकेऽस्मिन्ये धरिष्यन्ति पार्थिवाः

cākraṃ mausalamityevaṃ saṅgrāmaṃ raṇavṛttayaḥ | kathayiṣyanti loke'sminye dhariṣyanti pārthivāḥ

हिन्दी अर्थ

युद्धसे जीवन-निर्वाह करनेवाले जो राजा स लोकमें जीवित रहेंगे, वे आजके इस चाक्र, मौसल ुद्धकी सदा चर्चा करेंगे

अध्याय 98

श्लोक 95

राज्ञां पराजयं युद्धे गोमन्तेऽचलसत्तमे ।श्रवणाद् धारणाद् वापि स्वर्गलोकं व्रजन्ति हि

rājñāṃ parājayaṃ yuddhe gomante'calasattame | śravaṇād dhāraṇād vāpi svargalokaṃ vrajanti hi

हिन्दी अर्थ

शो 5ध्याय: + 'ढं८७ पर्वतोंमें श्रेष्ठ गोमन्तके समीप युद्धमें हमारे द्वारा जो यह राजाओंकी पराजय हुई है, इसके सुनने अथवा स्मरण करनेसे भी मनुष्य स्वर्गलोकमें जायँगे

अध्याय 98

श्लोक 96

तद्गच्छाम महाराज करवीरं पुरोत्तमम् ।त्वयोद्दिष्टेन मार्गेण चेदिराज शिवाय वै

tadgacchāma mahārāja karavīraṃ purottamam | tvayoddiṣṭena mārgeṇa cedirāja śivāya vai

हिन्दी अर्थ

अतः: महाराज चेदिराज! अब हमलोग आपके बताये हुए मार्गसे अपने कल्याणके लिये उत्तम नगर करवीरपुरको चलें'

अध्याय 98

श्लोक 97

ते स्यन्दनगताः सर्वे पवनोत्पातिभिर्हयैः ।भेजिरे दीर्घमध्वानं मूर्तिमन्त इवाग्नयः

te syandanagatāḥ sarve pavanotpātibhirhayaiḥ | bhejire dīrghamadhvānaṃ mūrtimanta ivāgnayaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वे सब-के-सब तीन मूर्तिमान्‌ अग्नियोंके समान रथपर आरूढ़ हो हवाकी भाँति उड़नेवाले घोड़ोंद्वारा विशाल मार्गपर चल दिये

अध्याय 98

श्लोक 98

ते त्रिरात्रोषिताः प्राप्ताः करवीरं पुरोत्तमम् ।शिवाय च शिवे देशे निविष्टास्त्रिदशोपमाः

te trirātroṣitāḥ prāptāḥ karavīraṃ purottamam | śivāya ca śive deśe niviṣṭāstridaśopamāḥ

हिन्दी अर्थ

वे देवोपम वीर मार्गमें तीन रात निवास करके उत्तम करवीरपुरमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने अपने भलेके लिये एक सुखद स्थानमें डेरा डाला

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.