Harivamsha Purana
99
अध्याय 99 / 318

Parva 2, Adhyāya 44

63 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ63 श्लोक

अध्याय 99

श्लोक 1

श्रीकृष्णेन शृगालस्य वधं, तस्य पुत्रस्य करवीरपुरस्य राज्ये अभिषेकः तानागतान् विदित्वाथ शृगालो युद्धदुर्मदः ।पुरस्य धर्षणं मत्वा निर्जगामेन्द्रविक्रमः

śrīkṛṣṇena śṛgālasya vadhaṃ, tasya putrasya karavīrapurasya rājye abhiṣekaḥ tānāgatān viditvātha śṛgālo yuddhadurmadaḥ | purasya dharṣaṇaṃ matvā nirjagāmendravikramaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन सबके आनेका समाचार पाकर इन्द्रके समान पराक्रमी रणदुर्मद राजा श्रुगाल अपनी पुरीपर आक्रमण हुआ समझकर नगरसे बाहर निकला

अध्याय 99

श्लोक 2

रथेनादित्यवर्णेन भास्वता रणगामिना ।आयुधप्रतिपूर्णेन नेमिनिर्घोषहासिना

rathenādityavarṇena bhāsvatā raṇagāminā | āyudhapratipūrṇena neminirghoṣahāsinā

श्लोक 2–7 का हिन्दी अर्थ

वह एक श्रेष्ठ रथपर चढ़कर चला। उसका वह रथ सूर्यके समान तेज:पुझसे प्रकाशित हो रहा था। वह रणभूमिमें (अप्रतिहतगति )-से जानेवाला था। उसमें सभी तरहके अस्त्र-शस्त्र भरे हुए थे। उसके पहियोंकी जो घरघराहट होती थी, वही मानो उसका अट्रहास था (अथवा वह पहियोंकी घर्घर ध्वनिसे मेघकी गम्भीर गर्जनाका उपहास कर रहा था) । उसका आकार मन्दरा- चलके समान था। उस रथको विचित्र आभरणोंसे विभूषित किया गया था। वह अक्षय सायकोंसे भरे हुए तूणीरोंसे परिपूर्ण था तथा समुद्रकी गम्भीर गर्जनाके समान घर- 'घराहट पैदा करता था । उसमें हरे रज़ के शीघ्रगामी घोड़े जुते हुए थे । वह पर्वतके शिखरों पर भी कहीं अटकता नहीं था। उसके कूबरके * भीतरी भागमें सोना जड़ा हुआ था, उसका धुरा भी सुदृढ़ था, उस रथकी बड़ी शोभा हो रही थी। ता है। तरह सुन्दर रस्सियोंसे भलीभाँति बँधा हुआ था, उसकी दीसि सब ओर छिटक रही थी; वह पक्षिराज गरुड़के समान तीव्र गतिसे चलनेवाला था और इन्द्रके हरित अश्वयसे जुते हुए आकाशगामी पर्वताकार रथकी समानता करता था। श्रुगालने नियमपूर्वक गायत्री-जप करके पूर्दिवकी अराधना की थी। उसका वह नियम पूर्ण होनेपर साक्षात्‌ भगवान्‌ सूर्यने उसे वह रथ दिया था, जो सूर्यकी किरणोंके समान सुनहरी बागडोरोंसे उस थके घोड़ोंको काबूमें लाया जाता था। शत्रुओंके रथोंको पष्ट कर देनेवाले उस श्रेष्ठ रथके द्वारा राजा शुगाल उसी रह श्रीकृष्णपर चढ़ आया जैसे पतिंगा आगपर टूट पड़ता है

अध्याय 99

श्लोक 3

मन्दराचलकल्पेन चित्राभरणभूषिणा ।अक्षय्यसायकैस्तूणैः पूर्णेनार्णवघोषिणा

mandarācalakalpena citrābharaṇabhūṣiṇā | akṣayyasāyakaistūṇaiḥ pūrṇenārṇavaghoṣiṇā

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 99

श्लोक 4

हर्यश्वेनाशुगतिनासक्तेन शिखरेष्वपि ।हेमकूबरगर्भेण दृढाक्षेणातिशोभिना

haryaśvenāśugatināsaktena śikhareṣvapi | hemakūbaragarbheṇa dṛḍhākṣeṇātiśobhinā

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 99

श्लोक 5

सुबन्धुरेण दीप्तेन पतत्त्रिवरगामिना ।स्वगतेनेव शक्रस्य हर्यश्वेन रथाद्रिणा

subandhureṇa dīptena patattrivaragāminā | svagateneva śakrasya haryaśvena rathādriṇā

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 99

श्लोक 6

सावित्रे नियमे पूर्णे यं ददौ सविता स्वयम् ।आदित्यरश्मिभिरिव रश्मिभिर्यो निगृह्यते

sāvitre niyame pūrṇe yaṃ dadau savitā svayam | ādityaraśmibhiriva raśmibhiryo nigṛhyate

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 99

श्लोक 7

तेन स्यन्दनमुख्येन द्विषत्स्यन्दनघातिना ।स शृगालोऽभ्ययात्कृष्णं शलभः पावकं यथा

tena syandanamukhyena dviṣatsyandanaghātinā | sa śṛgālo'bhyayātkṛṣṇaṃ śalabhaḥ pāvakaṃ yathā

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 99

श्लोक 8

चापपाणिः सुतीक्ष्णेषुः कवची हेममालिकः ।सितप्रावरणोष्णीषः पावकाकारलोचनः

cāpapāṇiḥ sutīkṣṇeṣuḥ kavacī hemamālikaḥ | sitaprāvaraṇoṣṇīṣaḥ pāvakākāralocanaḥ

हिन्दी अर्थ

उसके हाथमें धनुष और तीखे बाण शोभा पाते थे। वह कवच धारण करके सोनेकी मालासे विभूषित था। उसकी चादर और पगड़ी श्वेतवर्णकी थी और नेत्र अग्निके समान जलते-से प्रतीत होते थे

अध्याय 99

श्लोक 9

मुहुर्मुहुर्ज्याचपलं विक्षिपन् दुःसहं धनुः ।निर्वमन् रोषजं वायुं सानलज्वालमण्डलम्

muhurmuhurjyācapalaṃ vikṣipan duḥsahaṃ dhanuḥ | nirvaman roṣajaṃ vāyuṃ sānalajvālamaṇḍalam

हिन्दी अर्थ

तरह बारम्बार अपने दु:सह धनुषको हिलाता हुआ उसकी त्यज्ञा खींचता था और आगकी ज्वालाओंसे युक्त षजनित उच्छूवास छोड़ रहा था

अध्याय 99

श्लोक 10

भाभिर्भूषणपङ्क्तीनां दीप्तो मेरुरिवाचलः ।रथस्थ इव शैलेन्द्रः शृगालः प्रत्यदृश्यत

bhābhirbhūṣaṇapaṅktīnāṃ dīpto merurivācalaḥ | rathastha iva śailendraḥ śṛgālaḥ pratyadṛśyata

हिन्दी अर्थ

अपने आभूषण- समूहोंकी प्रभाओंसे प्रकाशित होकर वह राजा श्रुगाल मेरुपर्वतके समान शोभा पाता था और रथपर बैठे हुए गरिराज-सा दृष्टिगोचर होता था

अध्याय 99

श्लोक 11

तस्यारसितशब्देन रथनेमिस्वनेन च ।गुरुत्वेन च नाम्यन्ती चचालोर्वी भयातुरा

tasyārasitaśabdena rathanemisvanena ca | gurutvena ca nāmyantī cacālorvī bhayāturā

हिन्दी अर्थ

उसके गर्जनेकी नि, रथके पहियोंकी घर्घराहट और भारीपनेसे दबी जाती हुई पृथ्वी भयसे आतुर हो डगमगाने लगी

अध्याय 99

श्लोक 12

तमापतन्तं श्रीमन्तं मूर्तिमन्तमिवाचलम् ।शृगालं लोकपालाभं दृष्ट्वा कृष्णो न विव्यथे

tamāpatantaṃ śrīmantaṃ mūrtimantamivācalam | śṛgālaṃ lokapālābhaṃ dṛṣṭvā kṛṣṇo na vivyathe

हिन्दी अर्थ

नोकपालोंके समान तेजस्वी और मुूर्तिमान्‌ पर्वतके समान वेशालकाय श्रीमान्‌ राजा श्रगालको आक्रमण करते देख ्रीकृष्णके मनमें तनिक भी व्यथा नहीं हुई

अध्याय 99

श्लोक 13

शृगालश्चापि संरब्धः स्यन्दनेनाशुगामिना ।समीपे वासुदेवस्य युयुत्सुः प्रत्यदृश्यत

śṛgālaścāpi saṃrabdhaḥ syandanenāśugāminā | samīpe vāsudevasya yuyutsuḥ pratyadṛśyata

हिन्दी अर्थ

इधर पुगाल भी रोषमें भरकर उस शीघ्रगामी रथके द्वारा प्रीकृष्णके पास आकर युद्धके लिये उत्सुक दिखायी ने लगा

अध्याय 99

श्लोक 14

वासुदेवं स्थितं दृष्ट्वा शृगालो युद्धलालसः ।अभिदुद्राव वेगेन मेघराशिरिवाचलम्

vāsudevaṃ sthitaṃ dṛṣṭvā śṛgālo yuddhalālasaḥ | abhidudrāva vegena megharāśirivācalam

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णको अपने सामने खड़ा देख पुगालकी युद्ध-लालसा जाग उठी और जिस प्रकार घोंका समूह वर्षाद्वारा पर्वतपर आक्रमण करता है, सी प्रकार उसने वेगपूर्वक उनपर धावा किया

अध्याय 99

श्लोक 15

वासुदेवः स्मितं कृत्वा प्रतियुद्धाय तस्थिवान् ।तद् युद्धमभवत् ताभ्यां समरे घोरदर्शनम् ।उभाभ्यामिव मत्ताभ्यां कुञ्जराभ्यां यथा वने

vāsudevaḥ smitaṃ kṛtvā pratiyuddhāya tasthivān | tad yuddhamabhavat tābhyāṃ samare ghoradarśanam | ubhābhyāmiva mattābhyāṃ kuñjarābhyāṃ yathā vane

हिन्दी अर्थ

[ब भगवान्‌ श्रीकृष्ण मुसकराकर उसका सामना करनेके लिये खड़े हो गये; फिर तो समरभूमिमें उन दोनोंका बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा, जैसे वनमें दो मदमत्त हाथी मापसमें लड़ रहे हों

अध्याय 99

श्लोक 16

शृगालस्त्वब्रवीत्कृष्णं समरे समुपस्थितम् ।युद्धरागेण तेजस्वी मोहाच्चलितगौरवः

śṛgālastvabravītkṛṣṇaṃ samare samupasthitam | yuddharāgeṇa tejasvī mohāccalitagauravaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय मोहवश जो भपने गौरवसे गिर गया था, उस तेजस्वी श्रुगालने पमराज़णमें उपस्थित हुए श्रीकृष्णसे युद्धविषयक मासक्तिसे प्रेरित होकर कहा—

अध्याय 99

श्लोक 17

गोमन्ते युद्धमार्गेण यत् त्वया कृष्ण चेष्टितम् ।अनायकानां मूर्खाणां नृपाणां दुर्बले बले

gomante yuddhamārgeṇa yat tvayā kṛṣṇa ceṣṭitam | anāyakānāṃ mūrkhāṇāṃ nṛpāṇāṃ durbale bale

श्लोक 17–18 का हिन्दी अर्थ

+ ८९ “कृष्ण ! तुमने गोमन्तके समीप नायकरहित मूर्ख नरेशोंकी दुर्बल सेनाके भीतर युद्धके मार्गसे जो-जो चेष्टाएँ की हैं, उनके विषयमें मुझे सब कुछ भलीभाँति विदित हो गया है। क्षत्रियोंके उस पराजयसे मैं अच्छी तरह परिचित हूँ; परंतु वे क्षत्रिय कायर, धैर्य और शक्तिसे रहित तथा समरोत्सवमें कभी युद्ध न कर सकनेवाले थे

अध्याय 99

श्लोक 18

स मे सुविदितः कृष्ण क्षत्रियाणां पराजयः ।कृपणानामसत्त्वानामयुद्धानां रणोत्सवे

sa me suviditaḥ kṛṣṇa kṣatriyāṇāṃ parājayaḥ | kṛpaṇānāmasattvānāmayuddhānāṃ raṇotsave

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 99

श्लोक 20

तिष्ठेदानीं यथाकामं स्थितोऽहं पार्थिवे पदे ।क्व यास्यसि मया रुद्धो रणेष्वपरिनिष्ठितः ॥ न चाहमेकं सबलो युक्तस्त्वां योद्धुमाहवे ।अहमेकस्त्वमप्येको द्वौ युध्याव रणे स्थितौ

tiṣṭhedānīṃ yathākāmaṃ sthito'haṃ pārthive pade | kva yāsyasi mayā ruddho raṇeṣvapariniṣṭhitaḥ || na cāhamekaṃ sabalo yuktastvāṃ yoddhumāhave | ahamekastvamapyeko dvau yudhyāva raṇe sthitau

हिन्दी अर्थ

तुम अकेले हो और मैं सेनाके साथ हूँ। अत: रणभूमिमें तुम्हारे साथ युद्ध करना मेरे लिये उचित न होगा। इधरसे मैं अकेला रहूँ और उधरसे तुम, फिर हम दोनों समरभूमिमें डटकर युद्ध करें

अध्याय 99

श्लोक 21

किं जनेन निरस्तेन त्वं वाहं च रणे स्थितः ।धर्मयुद्धेन निधनं व्रजत्वेकतरो रणे

kiṃ janena nirastena tvaṃ vāhaṃ ca raṇe sthitaḥ | dharmayuddhena nidhanaṃ vrajatvekataro raṇe

हिन्दी अर्थ

साधारण लोगोंको मारनेसे कया लाभ ? रणभूमिमें खड़े हुए तुम या मैं—दोनोंमेंसे एक योद्धा धर्मयुद्धके द्वारा मृत्युको प्रात हो

अध्याय 99

श्लोक 22

लोकेऽस्मिन्वासुदेवोऽहं भविष्यामि हते त्वयि ।हते मयि त्वमप्येको वासुदेवो भविष्यसि

loke'sminvāsudevo'haṃ bhaviṣyāmi hate tvayi | hate mayi tvamapyeko vāsudevo bhaviṣyasi

हिन्दी अर्थ

तुम्हारे मारे जानेपर इस संसारमें मैं अकेला ही वासुदेव रहूँगा और मेरे मारे जानेपर तुम भी अकेले वासुदेव बने रहोगे '

अध्याय 99

श्लोक 23

शृगालस्य वचः श्रुत्वा वासुदेवः क्षमापरः ।ईर्ष्यन्तं प्रहरस्वेति तमुक्त्वा चक्रमाददे

śṛgālasya vacaḥ śrutvā vāsudevaḥ kṣamāparaḥ | īrṣyantaṃ praharasveti tamuktvā cakramādade

हिन्दी अर्थ

श्रुगालकी यह बात सुनकर क्षमाशील भगवान्‌ वासुदेवने उस ईर्ष्यालु नरेशसे कहा—पहले तुम प्रहार करो' ऐसा कहकर उन्होंने हाथमें चक्र ले लिया

अध्याय 99

श्लोक 24

ततः सायकजालानि शृगालः क्रोधमूर्छितः ।चिक्षेप कृष्णे घोराणि युद्धाय लघुविक्रमः

tataḥ sāyakajālāni śṛgālaḥ krodhamūrchitaḥ | cikṣepa kṛṣṇe ghorāṇi yuddhāya laghuvikramaḥ

हिन्दी अर्थ

तब युद्धके लिये शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले श्रुगालने क्रोधसे उन्मत्त होकर श्रीकृष्णपर घोर बाण-समूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी

अध्याय 99

श्लोक 25

शस्त्राणि यानि चान्यानि मुसलाद्यानि संयुगे ।पातयामास गोविन्दे स शृगालः प्रतापवान्

śastrāṇi yāni cānyāni musalādyāni saṃyuge | pātayāmāsa govinde sa śṛgālaḥ pratāpavān

हिन्दी अर्थ

प्रतापी शरुगालने उस युद्धमें गोविन्दपर मूसल आदि अन्य शस्त्रोिंका भी प्रहार किया

अध्याय 99

श्लोक 26

शृगालप्रहितैरस्त्रैः पावकज्वालमालिभिः ।निर्दयाभिहतः कृष्णः स्थितो गिरिरिवाचलः

śṛgālaprahitairastraiḥ pāvakajvālamālibhiḥ | nirdayābhihataḥ kṛṣṇaḥ sthito giririvācalaḥ

श्लोक 26–27 का हिन्दी अर्थ

श्रुगालके चलाये हुए अस्त्रोंद्वारा, जिनसे आगकी लपटें उठ रही थीं, निर्दयतापूर्वक आहत होनेपर भी श्रीकृष्ण पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े रहे । उसके अस्त्रोंके प्रहारसे घायल होकर किश्लित्‌ रोषसे युक्त हुए भगवान्‌ गोविन्दने चक्र उठाकर श्रुगालपर प्रहार किया

अध्याय 99

श्लोक 27

सोऽस्त्रप्रहाराभिहतः किञ्चिद् रोषसमन्वितः ।चक्रमुद्यम्य गोविन्दः शृगालस्य परिक्षिपत्

so'straprahārābhihataḥ kiñcid roṣasamanvitaḥ | cakramudyamya govindaḥ śṛgālasya parikṣipat

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 99

श्लोक 28

तं रथस्थं प्रमाणस्थं शृगालं युद्धदुर्मदम् ।जघान समरे चक्रं जातदर्पं महाबलम्

taṃ rathasthaṃ pramāṇasthaṃ śṛgālaṃ yuddhadurmadam | jaghāna samare cakraṃ jātadarpaṃ mahābalam

हिन्दी अर्थ

रणदुर्मद महाबली श्रुगाल घमण्डमें भरकर रथपर ही बैठा रहा, अपनी जगहसे हटा नहीं । इसी समय ( भगवान्‌के चलाये हुए) चक्रने समरभूमिमें उसपर गहरी चोट की

अध्याय 99

श्लोक 29

ततः सुदर्शनं चक्रं पुनरायाद् गुरोः करे ।चक्रेणोरसि निर्भिन्नः स गतासुर्गतोत्सवः ।पपात क्षतजस्रावी शृगालोऽद्रिरिवाहतः

tataḥ sudarśanaṃ cakraṃ punarāyād guroḥ kare | cakreṇorasi nirbhinnaḥ sa gatāsurgatotsavaḥ | papāta kṣatajasrāvī śṛgālo'dririvāhataḥ

हिन्दी अर्थ

इसके बाद सुदर्शन चक्र पुन: जगदूगुरु भगवान्‌ श्रीकृष्णके हाथमें आ गया। उस चक्रसे आहत होकर श्रुगालकी छाती फट गयी और वह वज़के मारे हुए पर्वतकी भाँति खूनकी धारा बहाता हुआ प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके जीवनका पारा आनन्दोत्सव समाप्त हो गया

अध्याय 99

श्लोक 30

निशम्य तं निपतितं वज्रपातादिवाचलम् ।तस्य सैन्यान्यपययुर्विमनांसि हते नृपे

niśamya taṃ nipatitaṃ vajrapātādivācalam | tasya sainyānyapayayurvimanāṃsi hate nṛpe

हिन्दी अर्थ

वज़पातसे धराशायी हुए पर्वतकी भाँति राजा श्रगालको पृथ्वीपर पड़ा देख, उसके मारे जानेपर उसके सारे सैनिक खेन्नचित्त होकर भाग गये

अध्याय 99

श्लोक 31

केचित् प्रविश्य नगरं कश्मलाभिहता भृशम् ।रुरुदुर्दुःखसन्तप्ता भर्तृशोकाभिपीडिताः

kecit praviśya nagaraṃ kaśmalābhihatā bhṛśam | rurudurduḥkhasantaptā bhartṛśokābhipīḍitāḥ

हिन्दी अर्थ

कुछ सैनिक नगरमें प्रवेश करके अत्यन्त मोहग्रस्त, दुःखसे सन्तप्त तथा स्वामीके शोकसे पीड़ित हो फूट-फूटकर रोने लगे

अध्याय 99

श्लोक 32

केचित्तत्रैव शोचन्तः स्मरन्तः सुकृतानि च ।पतितं भूपतिं भूमौ न त्यजन्ति स्म दुःखिताः

kecittatraiva śocantaḥ smarantaḥ sukṛtāni ca | patitaṃ bhūpatiṃ bhūmau na tyajanti sma duḥkhitāḥ

हिन्दी अर्थ

कुछ सैनिक वहीं शोक करने लगे। वे स्वामीके उपकारोंका स्मरण करके दू:खी हो भूमिपर पड़े हुए भूपालको छोड़ नहीं रहे थे

अध्याय 99

श्लोक 33

ततो मेघनिनादेन स्वरेणारिविमर्दनः ।कृष्णः कमलपत्राक्षो जनानामभयं ददौ

tato meghaninādena svareṇārivimardanaḥ | kṛṣṇaḥ kamalapatrākṣo janānāmabhayaṃ dadau

हिन्दी अर्थ

दनन्तर शत्रुमर्दन कमलनयन श्रीकृष्णने मेघ-गर्जनाके समान म्भीर स्वरसे उन सब लोगोंको अभयदान दिया

अध्याय 99

श्लोक 34

चक्रोचितेन हस्तेन राजतागुङ्लिपर्वणा ।न भेतव्यं न भेतव्यमिति तानभ्यभाषत

cakrocitena hastena rājatāguṅliparvaṇā | na bhetavyaṃ na bhetavyamiti tānabhyabhāṣata

श्लोक 34–35 का हिन्दी अर्थ

न्होंने अड्भुलिपर्वसे सुशोभित तथा च्रक धारण करनेके योग्य उठे हुए दाहिने हाथके द्वारा संकेत करके उन सबसे क्रहा—' सैनिको ! तुम डरो मत! डरो मत! ! इस पापीके भपराधसे मैं समरभूमिमें निरपराध मनुष्योंका वध नहीं करूँगा; क्योंकि—यह वीरोंका व्रत नहीं है

अध्याय 99

श्लोक 35

नास्य पापस्य दोषेण निरावाधकरं जनम् ।घातयिष्यामि समरे नेदं शूरव्रतं मतम्

nāsya pāpasya doṣeṇa nirāvādhakaraṃ janam | ghātayiṣyāmi samare nedaṃ śūravrataṃ matam

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 99

श्लोक 36

अश्रुपूर्णमुखा दीनाः क्रन्दमाना भृशं तदा ।ते स्म पश्यन्ति पतितं धरण्यां धरणीपतिम्

aśrupūrṇamukhā dīnāḥ krandamānā bhṛśaṃ tadā | te sma paśyanti patitaṃ dharaṇyāṃ dharaṇīpatim

श्लोक 36–37 का हिन्दी अर्थ

वे पैनिक अत्यन्त दीनभावसे क्रन्दन करते हुए उस समय ृथ्वीपर पड़े हुए पृथ्वीपति श्रूगालकी ओर देख रहे थे। उनका सारा मुखमण्डल आँसुओंसे भींगा हुआ था। राजाका क्ष:स्थल चक्रसे विदीर्ण हो गया था । वह टूटे हुए शिखरवाले र्वतके समान भूमिपर पड़ा था

अध्याय 99

श्लोक 37

चक्रनिर्दारितोरस्कं भिन्नशृङ्गमिवाचलम्

cakranirdāritoraskaṃ bhinnaśṛṅgamivācalam

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 99

श्लोक 38

विलपन्ति स्म ते सर्वे सचिवाः सप्रजा भृशम् ।साश्रुपातेक्षणा दीनाः शोकस्य वशमागताः

vilapanti sma te sarve sacivāḥ saprajā bhṛśam | sāśrupātekṣaṇā dīnāḥ śokasya vaśamāgatāḥ

हिन्दी अर्थ

वे समस्त सचिव था प्रजावर्गके लोग शोकके वशीभूत हो नेत्रोंसे अश्रुपात करते हुए अत्यन्त दीनभावसे विलाप करते थे

अध्याय 99

श्लोक 39

तेषां रुदितशब्देन पौराणां विस्वरैः स्वरैः ।महिष्यस्तस्य निष्पेतुः सपुत्रा रुदिताननाः

teṣāṃ ruditaśabdena paurāṇāṃ visvaraiḥ svaraiḥ | mahiṣyastasya niṣpetuḥ saputrā ruditānanāḥ

हिन्दी अर्थ

उन ुरवासियोंके रोनेके शब्द तथा फटे हुए स्वरोंसे अनिष्टकी भाशड्डा करके राजा श्रुगालकी रानियाँ भी पुत्रोंको साथ लये रोती हुई वहाँ निकल आयीं

अध्याय 99

श्लोक 40

तास्तं निपतितं दृष्ट्वा श्लाघ्यं भूमिपतिं पतिम् ।स्तनानारुज्य करजैर्भृशार्ताः पर्यदेवयन्

tāstaṃ nipatitaṃ dṛṣṭvā ślāghyaṃ bhūmipatiṃ patim | stanānārujya karajairbhṛśārtāḥ paryadevayan

हिन्दी अर्थ

अपने स्पृहणीय पति भूमिपाल श्रुगालको वहाँ धरतीपर पड़ा देख वे रानियाँ भ्रत्यन्त आर्त हो अपनी अज़ुलियोंसे स्तनोंको नोचती हुई करुण विलाप करने लगीं

अध्याय 99

श्लोक 41

उरांस्युरसिजांश्चैव शिरोजान्याकुलान्यपि ।निर्दयं ताडयन्त्यस्ता विस्वरं रुरुदुः स्त्रियः

urāṃsyurasijāṃścaiva śirojānyākulānyapi | nirdayaṃ tāḍayantyastā visvaraṃ ruruduḥ striyaḥ

हिन्दी अर्थ

वे स्त्रियाँ अपनी छाती, तन और वहाँ फैले हुए सिरके बालोंको भी निर्दयतापूर्वक पीटती हुई पुक्का फाड़-फाड़कर रोने लगीं

अध्याय 99

श्लोक 42

तस्योरसि सुदुःखार्ता मृदिताः क्लिन्नलोचनाः ।पेतुरूर्ध्वभुजाः सर्वाश्छिन्नमूला लता इव

tasyorasi suduḥkhārtā mṛditāḥ klinnalocanāḥ | peturūrdhvabhujāḥ sarvāśchinnamūlā latā iva

हिन्दी अर्थ

वे सब गनियाँ अत्यन्त दु:खसे आतुर और मर्दित हो नेत्रोंसे आँसू तरहाती हुई दोनों बाँहिं ऊपर उठाकर जड़से कटी हुई लताओंकी पाँति राजाकी छातीपर गिर पड़ीं

अध्याय 99

श्लोक 43

तासां बाष्पाम्बुपूर्णानि नेत्राणि नृपयोषिताम् ।वारिविप्रहतानीव पङ्कजानि चकाशिरे

tāsāṃ bāṣpāmbupūrṇāni netrāṇi nṛpayoṣitām | vāriviprahatānīva paṅkajāni cakāśire

हिन्दी अर्थ

उन राजरानियोंके भाँसूभरे नेत्र जल (या ओले)- से आहत हुए कमलोंके परमान प्रकाशित होते थे

अध्याय 99

श्लोक 45

पुत्रं चास्य पुरस्कृत्य बालं प्रस्नुतलोचनम् ।शक्रदेवं पितुः पार्श्वे द्विगुणं रुरुदुः स्त्रियः

putraṃ cāsya puraskṛtya bālaṃ prasnutalocanam | śakradevaṃ pituḥ pārśve dviguṇaṃ ruruduḥ striyaḥ

हिन्दी अर्थ

उस राजाके बालक पुत्र शक्रदेवको अपने आगे पिताके आस खड़ा करके वे रानियाँ और दूने वेगसे रोने तथा विलाप करने लगीं । उस बालकके नेत्रॉंसे भी आँसू बह रहा था

अध्याय 99

श्लोक 46

अयं ते वीर विक्रान्तो बालः पुत्रो न पण्डितः ॥ त्वद्धिहीनः कथमयं पदे स्थास्यात पैतृके

ayaṃ te vīra vikrānto bālaḥ putro na paṇḍitaḥ || tvaddhihīnaḥ kathamayaṃ pade sthāsyāta paitṛke

हिन्दी अर्थ

वे बोलीं-'बीर महाराज! यह आपका पराक्रमी पुत्र अभी बालक है, विद्वान्‌ नहीं हो सका है। अब मापके बिना यह अपने पैतृक राज्यपर कैसे प्रतिष्ठित ही सकेगा 2

अध्याय 99

श्लोक 47

कथमेकपदे त्यक्त्वा गतोऽस्यन्तःपुरं परम् ।अतृप्तास्तव सौख्यानां किं कुर्मो विधवा वयम्

kathamekapade tyaktvā gato'syantaḥpuraṃ param | atṛptāstava saukhyānāṃ kiṃ kurmo vidhavā vayam

हिन्दी अर्थ

(प्राणनाथ !) आप अपने अन्त:पुरकी [नियोंको सहसा त्यागकर क्यों परलोकको चले गये? गम आपके दिये हुए सुखोंसे अभी तृत्त नहीं हुई थीं। गाय! हम विधवा हो गयीं, अब क्या करें ?'

अध्याय 99

श्लोक 48

तस्य पद्मावती नाम महिषी प्रमदोत्तमा ।रुदती पुत्रमादाय वासुदेवमुपस्थिता

tasya padmāvatī nāma mahiṣī pramadottamā | rudatī putramādāya vāsudevamupasthitā

हिन्दी अर्थ

[जा श्रुगालकी पटरानीका नाम पद्मावती था। वह स्त्रयोंमें श्रेष्ठ थी । पद्मावती रोती हुई अपने पुत्रको साथ ने भगवान्‌ वासुदेवके पास गयी

अध्याय 99

श्लोक 49

यस्त्वया पातितो वीर रणप्रोक्तेन कर्मणा ।तस्य प्रेतगतस्यायं पुत्रस्त्वां शरणं गतः

yastvayā pātito vīra raṇaproktena karmaṇā | tasya pretagatasyāyaṃ putrastvāṃ śaraṇaṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

और बोली—वीर! आपने युद्ध-कर्मके द्वारा जिन्हें मार गिराया है, नहीं परलोकवासी नरेशका यह पुत्र आपकी शरणमें माया है

अध्याय 99

श्लोक 50

यदि त्वां प्रणमेतासौ कुर्याद वा शासनं तव ।नायमेकप्रहारेण जनस्तप्येत दारुणम्

yadi tvāṃ praṇametāsau kuryāda vā śāsanaṃ tava | nāyamekaprahāreṇa janastapyeta dāruṇam

हिन्दी अर्थ

यदि ये महाराज आपको प्रणाम करते—भापके सम्मुख विनीत भावका परिचय देते अथवा भापकी आज्ञाका पालन करते तो आपके एक ही हारसे इन्हें संतापका भागी नहीं होना पड़ता

अध्याय 99

श्लोक 51

यदि कुर्यादयं मूढस्त्वयि बान्धवकं विधिम् ।नैवं परीतः कृपणः सेवेत धरणीतलम्

yadi kuryādayaṃ mūḍhastvayi bāndhavakaṃ vidhim | naivaṃ parītaḥ kṛpaṇaḥ seveta dharaṇītalam

हिन्दी अर्थ

दि ये मूढ (विवेकशून्य) नरेश आपके प्रति बन्धु- ननोचित बर्ताव करते तो इन्हें मांसभक्षी जन्तुओंसे घिरकर थ्वीका सेवन नहीं करना पड़ता

अध्याय 99

श्लोक 52

अयमस्य विपन्नस्य बान्धवस्य तवानघ ।सन्तती रक्ष्यतां वीर पुत्रः पुत्र इवात्मजः

ayamasya vipannasya bāndhavasya tavānagha | santatī rakṣyatāṃ vīra putraḥ putra ivātmajaḥ

हिन्दी अर्थ

अनघ! वीर! हह आपके इस मरे हुए बान्धवकी ही सन्तति है; आप पपने पुत्रकी ही भाँति इसकी रक्षा करें

अध्याय 99

श्लोक 53

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा महिष्या यदुनन्दनः ।मृदुपर्वमिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः

tasyāstad vacanaṃ śrutvā mahiṣyā yadunandanaḥ | mṛduparvamidaṃ vākyamuvāca vadatāṃ varaḥ

हिन्दी अर्थ

रानीका ह वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ यदुनन्दन श्रीकृष्णने धुर वाणीमें कहा—

अध्याय 99

श्लोक 54

राजपत्नि गतो रोषः सहानेन दुरात्मना ।प्रकृतिस्था वयं जाता देवि सैषोऽस्मि बान्धवः

rājapatni gato roṣaḥ sahānena durātmanā | prakṛtisthā vayaṃ jātā devi saiṣo'smi bāndhavaḥ

हिन्दी अर्थ

राजरानी! मेरा रोष तो स दुरात्माके मारे जानेके साथ ही दूर हो गया। देखें ! बब हम स्वाभाविक स्थितिमें हैं । मैं आपका वही भाई- न्थु हूँ

अध्याय 99

श्लोक 55

रोषो मे विगतः साध्वि तव वाक्यैरकल्मषैः ।योऽयं पुत्रः शृगालस्य ममाप्येष न संशयः

roṣo me vigataḥ sādhvi tava vākyairakalmaṣaiḥ | yo'yaṃ putraḥ śṛgālasya mamāpyeṣa na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

साध्वी रानी ! तुम्हारे इन निर्दोष वचनोंसे रा सारा क्रोध दूर हो गया। राजा श्रुगालका जो यह पुत्र , यह मेरे लिये भी पुत्रके ही समान है, इसमें संशय हीं है

अध्याय 99

श्लोक 56

अभयं चाभिषेकं च ददाम्यस्मै सुखाय वै ।आहूयन्तां प्रकृतयः पुरोधा मन्त्रिणस्तथा

abhayaṃ cābhiṣekaṃ ca dadāmyasmai sukhāya vai | āhūyantāṃ prakṛtayaḥ purodhā mantriṇastathā

श्लोक 56–58 का हिन्दी अर्थ

मैं इसके सुखके लिये इसे अभय देनेके ाथ ही इसका राज्याभिषेक भी कर दूँगा। आप समस्त कृतियों तथा मन्त्री और पुरोहितोंको भी बुलवाइये, जससे आपके इस पुत्रको, इसके बाप-दादोंके राज्यपर 'भिषिक्त कर दिया जाय' । तदनन्तर, सारी प्रकृतियाँ प्रजा आदि), पुरोहित और मन्त्री भी राजकुमारका भिषेक करनेके लिये उस स्थानपर आये, जहाँ श्रीबलराम और श्रीकृष्ण विराजमान थे। इसके बाद पराक्रमी भगवान्‌ नार्दनने राजकुमारको राज्य-सिंहासनपर बिठाकर दिव्य भिषेककी विधिसे उसका राज्याभिषेक-कर्म सम्पन्न कया

अध्याय 99

श्लोक 57

पितृपैतामहे राज्ये तव पुत्रोऽभिषिच्यताम् ।ततः प्रकृतयः सर्वाः पुरोधा मन्त्रिणस्तथा

pitṛpaitāmahe rājye tava putro'bhiṣicyatām | tataḥ prakṛtayaḥ sarvāḥ purodhā mantriṇastathā

अर्थ श्लोक 56 के साथ

अध्याय 99

श्लोक 58

अभिषेकार्थमाजग्मुर्यतो वै रामकेशवौ ।ततः सिंहासनस्थं तु राजपुत्रं जनार्दनः

abhiṣekārthamājagmuryato vai rāmakeśavau | tataḥ siṃhāsanasthaṃ tu rājaputraṃ janārdanaḥ

अर्थ श्लोक 56 के साथ

अध्याय 99

श्लोक 59

अभिषेकेण दिव्येन योजयामास वीर्यवान् ।अभिषिच्य शृगालस्य करवीरपुरे सुतम् ।कृष्णस्तदहरेवाशु प्रस्थानमभ्यरोचयत्

abhiṣekeṇa divyena yojayāmāsa vīryavān | abhiṣicya śṛgālasya karavīrapure sutam | kṛṣṇastadaharevāśu prasthānamabhyarocayat

हिन्दी अर्थ

शुगालके पुत्रको करवीरपुरके राज्यपर अभिषिक्त करके श्रीकृष्णने उसी दिन वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कर देना उचित समझा

अध्याय 99

श्लोक 60

रथेन हरियुक्तेन तेन युद्धार्जितेन वै ।केशवः प्रस्थितोऽध्वानं वृत्रहा त्रिदिवं यथा

rathena hariyuktena tena yuddhārjitena vai | keśavaḥ prasthito'dhvānaṃ vṛtrahā tridivaṃ yathā

हिन्दी अर्थ

जैसे इन्द्र स्वर्गलोकको जाते हैं, उसी प्रकार भगवान्‌ श्रीकृष्ण भी युद्धमें प्राप्त हुए उस अध्युक्त रथके द्वारा मथुराके पथपर चल दिये

अध्याय 99

श्लोक 61

शक्रदेवोऽपि धर्मात्मा सह मात्रा परन्तपः ।सबालवृद्धयुवतीमुख्याः प्रकृतयस्तथा

śakradevo'pi dharmātmā saha mātrā parantapaḥ | sabālavṛddhayuvatīmukhyāḥ prakṛtayastathā

श्लोक 61–62 का हिन्दी अर्थ

शत्रुओंको संताप देनेवाला धर्मात्मा राजा शक्रदेव भी माताके साथ बालक, वृद्ध और युवती आदि सारी प्रकृतियोंको साथ ले रणदुर्मद श्रूगालके शवको पालकीमें सुलाकर सब लोग संगठित हो नगरसे दूरके रास्तेपर पश्चिमकी ओर चले

अध्याय 99

श्लोक 62

शिबिकायामथारोप्य शृगालं युद्धदुर्मदम् ।संहता दूरमार्गेण पश्चिमाभिमुखा ययुः

śibikāyāmathāropya śṛgālaṃ yuddhadurmadam | saṃhatā dūramārgeṇa paścimābhimukhā yayuḥ

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 99

श्लोक 63

नैधनस्य विधानेन चक्रुस्ते तस्य सत्क्रियाम् ।सत्कारं कारयामासुः पितॄणां पारलौकिकम्

naidhanasya vidhānena cakruste tasya satkriyām | satkāraṃ kārayāmāsuḥ pitṝṇāṃ pāralaukikam

हिन्दी अर्थ

श्मशान- भूमिमें ले जाकर अन्त्येष्टिकी विधिसे उन सबने शक्रदेवद्वारा एजाका दाह-संस्कार करवाया और पितरोंके लिये पारलौकिक कृत्यका सम्पादन कराया

अध्याय 99

श्लोक 64

उद्दिश्योद्दिश्य राजानं श्राद्धं कृत्वा सहस्रशः ।ततस्ते सलिलं दत्त्वा नामगोत्रादिकीर्तनैः

uddiśyoddiśya rājānaṃ śrāddhaṃ kṛtvā sahasraśaḥ | tataste salilaṃ dattvā nāmagotrādikīrtanaiḥ

हिन्दी अर्थ

राजाके उद्देश्यसे सहसत्रों प्रकारकी वस्तुएँ श्राद्धमें देकर उन सबने थुगालके लिये नाम-गोत्र आदिके उच्चारणपूर्वक जलदान किया । इस प्रकार पिताकी घोर मृत्यु हो जानेपर शोकसे व्याकुलचित्त हुए राजा शक्रदेवने उन्हें जलाझलि देकर अपने उत्तम नगरमें प्रवेश किया

अध्याय 99

श्लोक 65

पितर्युपरते घोरे शोकसंविग्नमानसः ।कृत्वोदकं तदा राजा प्रविवेश पुरोत्तमम्

pitaryuparate ghore śokasaṃvignamānasaḥ | kṛtvodakaṃ tadā rājā praviveśa purottamam

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.