Harivamsha Purana
97
अध्याय 97 / 318

Parva 2, Adhyāya 42

87 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ87 श्लोक

अध्याय 97

श्लोक 1

जरासन्धस्य सेनायाः वर्णनम्, तस्य सैन्यं पर्वतोपरि आक्रमणाय आज्ञापनम्, शिशुपालस्य सम्मत्या गोमन्तके पर्वते अग्निदानम्, पर्वतस्य ज्वलनं एवं बलरामकृष्णयोः पर्वतात्कूर्दयित्वा राजानां सैन्येषु आगमनं जरासन्धस्ततः प्राप्तो नृपः सर्वमहीक्षिताम् ।नराधिपैर्बलयुतैरनुयातो महाद्युतिः

jarāsandhasya senāyāḥ varṇanam, tasya sainyaṃ parvatopari ākramaṇāya ājñāpanam, śiśupālasya sammatyā gomantake parvate agnidānam, parvatasya jvalanaṃ evaṃ balarāmakṛṣṇayoḥ parvatātkūrdayitvā rājānāṃ sainyeṣu āgamanaṃ jarāsandhastataḥ prāpto nṛpaḥ sarvamahīkṣitām | narādhipairbalayutairanuyāto mahādyutiḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर समस्त राजाओंका राजा महातेजस्वी जरासंध वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे अपनी-अपनी सेनाओंके साथ दूसरे भी बहुत-से नरेश थे

अध्याय 97

श्लोक 2

व्यायतोदग्रतुरगैर्विस्पष्टार्थसमाहितैः ।रथैः साङ्ग्रामिकैर्युक्तैरसङ्गगतिभिः क्वचित्

vyāyatodagraturagairvispaṣṭārthasamāhitaiḥ | rathaiḥ sāṅgrāmikairyuktairasaṅgagatibhiḥ kvacit

हिन्दी अर्थ

कहीं अस्त्र- शस्त्रके ज्ञाता पुरुषोंद्वारा भलीभाँति सिखाये गये विशाल एवं प्रचण्ड बलशाली अध्योंसे युक्त रथ युद्धोपयोगी सामग्रियोंसे सम्पन्न होकर आगे बढ़ रहे थे। उन रथोंकी गति कहीं भी अवस्द्ध नहीं होती थी

अध्याय 97

श्लोक 3

हेमकक्षैर्महाघण्टैर्वारणैर्वारिदोपमैः ।महामात्रोत्तमारूढैः कल्पितै रणगर्वितैः

hemakakṣairmahāghaṇṭairvāraṇairvāridopamaiḥ | mahāmātrottamārūḍhaiḥ kalpitai raṇagarvitaiḥ

हिन्दी अर्थ

कहीं बहुसंख्यक हाथी चल रहे थे, जिन्हें सोनेकी जंजीरोंसे कसा गया था। उनके दोनों पार्थमें बड़े-बड़े घंटे लटक रहे थे। वे सभी हाथी मेघोंकी घटाके समान जान पड़ते थे। उनके ऊपर अच्छे महावत बैठे थे तथा रणगर्वित कुशल योद्धाओंद्वारा उन्हें सुसज्जित किया गया था

अध्याय 97

श्लोक 4

स्वारूढैः सादिभिर्युक्तैः प्रेङ्खमाणैः प्रवल्गितैः ।वाजिभिर्वायुसङ्काशैः प्ल्रवद्भिरिव पत्रिभिः

svārūḍhaiḥ sādibhiryuktaiḥ preṅkhamāṇaiḥ pravalgitaiḥ | vājibhirvāyusaṅkāśaiḥ plravadbhiriva patribhiḥ

हिन्दी अर्थ

कहीं घुड़सवार योद्धा घोड़ोंपर अच्छी तरहसे सवार थे। उनके वे घोड़े वायुके समान वेगशाली थे और उछलते-कूदते हुए आगे बढ़ते समय आकाशमें उड़ते हुए पश्षियोंके समान प्रतीत होते थे

अध्याय 97

श्लोक 5

खङ्गचर्मबलोदग्रैः पत्तिभिर्बलिनां वरैः ।सहस्त्रसङ्ख्यैर्निर्मुक्तैरुत्पतद्भिरिवोरगैः

khaṅgacarmabalodagraiḥ pattibhirbalināṃ varaiḥ | sahastrasaṅkhyairnirmuktairutpatadbhirivoragaiḥ

हिन्दी अर्थ

बलवानोंमें श्रेष्ठ पैदल सैनिक भी ढाल और तलवार लिये प्रचण्डरूप धारण करके आगे बढ़ते थे। वे हजार-हजारकी टोलियोंमें एक साथ चलते और केंचुलसे छूटे हुए सर्पोंक समान उछलते थे

अध्याय 97

श्लोक 6

एवं चतुर्विधैः सैन्यैः प्रचलद्भिरिवाम्बुदैः ।नृपोऽभियातो बलवाञ्जरासन्धो धृतव्रतः

evaṃ caturvidhaiḥ sainyaiḥ pracaladbhirivāmbudaiḥ | nṛpo'bhiyāto balavāñjarāsandho dhṛtavrataḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार मँडराते हुए बादलोंके समान चतुरज्धिणी सेनाएँ साथ लेकर वीर-व्रतको धारण करनेवाला बलवान्‌ राजा जरासंध युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था

अध्याय 97

श्लोक 7

स रथैनेमिघोषैश्च गजैश्च मदसंयुतैः ।हेषद्भिश्चापि तुरगैः क्ष्वेडितोग्रैश्च पत्तिभिः

sa rathainemighoṣaiśca gajaiśca madasaṃyutaiḥ | heṣadbhiścāpi turagaiḥ kṣveḍitograiśca pattibhiḥ

श्लोक 7–8 का हिन्दी अर्थ

वह राजा पहियोंके घर्घर घोषसे युक्त रथों, (चिग्घाड़ते हुए) मतवाले हाथियों, हिनहिनाते हुए घोड़ों तथा गर्जते हुए पैदल सैनिकोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओं एवं समस्त पर्वतीय कन्दराओंको प्रतिध्वनित करता हुआ सेनाके साथ समुद्रके समान दिखायी देता था

अध्याय 97

श्लोक 8

सन्नादयन् दिशः सर्वाः सर्वाश्चापि गुहाशयान् ।स राजा सागराकारः ससैन्यः प्रत्यदृश्यत

sannādayan diśaḥ sarvāḥ sarvāścāpi guhāśayān | sa rājā sāgarākāraḥ sasainyaḥ pratyadṛśyata

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 9

तद्बलं पृथिवीशानां हृष्टयोधजनाकुलम् ।क्ष्वेडितास्फोटितरवं मेघसैन्यमिवाबभौ

tadbalaṃ pṛthivīśānāṃ hṛṣṭayodhajanākulam | kṣveḍitāsphoṭitaravaṃ meghasainyamivābabhau

हिन्दी अर्थ

भूमिपालोंकी वह सेना हृष्ट-पुष्ठ योद्धाओंसे परिपूर्ण थी। गर्जने और ताल ठॉंकनेकी गम्भीर ध्वनिसे गर्जती हुई मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होती थी

अध्याय 97

श्लोक 10

रथैः पवनसम्पातैर्गजैश्च जलदोपमैः ।तुरगैश्च सिताभ्राभैः पत्तिभिश्चापि दंशितैः

rathaiḥ pavanasampātairgajaiśca jaladopamaiḥ | turagaiśca sitābhrābhaiḥ pattibhiścāpi daṃśitaiḥ

श्लोक 10–11 का हिन्दी अर्थ

वायुके समान तीव्र गतिसे चलनेवाले रथों, काले मेघोंके समान प्रतीत होनेवाले हाथियों, श्वेत बादलोंके समान घोड़ों तथा कवच आदिसे सुसज्जित पैदल योद्धाओंसे मिश्रित हुई वह सेना सब ओरसे सुशोभित हो रही थी। मतवाले हाथियोंसे व्याप्त हुई वह विशाल वाहिनी वर्षा-कऋतुमें समुद्रके भीतर लक्षित होनेवाले मेघोंके समूहको शोभा धारण करती थी

अध्याय 97

श्लोक 11

व्यामिश्रं तद्बलं भाति मत्तद्विपसमाकुलम् ।घर्मान्ते सागरगतं यथाभ्रपटलं तथा

vyāmiśraṃ tadbalaṃ bhāti mattadvipasamākulam | gharmānte sāgaragataṃ yathābhrapaṭalaṃ tathā

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 12

सबलास्ते महीपाला जरासन्धपुरोगमाः ।परिवार्य गिरिं सर्वे निवेशायोपचक्रमुः

sabalāste mahīpālā jarāsandhapurogamāḥ | parivārya giriṃ sarve niveśāyopacakramuḥ

हिन्दी अर्थ

जरासंध आदि समस्त भूपाल अपनी सेनाके साथ उस पर्वतको चारों ओरसे घेरकर छावनी डालनेकी तैयारी करने लगे

अध्याय 97

श्लोक 13

बभौ तस्य निविष्टस्य बलश्रीः शिविरस्य वै ।शुक्ले पर्वणि पूर्णस्य यथा रूपं महोदधेः

babhau tasya niviṣṭasya balaśrīḥ śivirasya vai | śukle parvaṇi pūrṇasya yathā rūpaṃ mahodadheḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ डेरा डाले हुए जरासंधके सैनिकशिविरकी शोभा वैसी ही प्रतीत होती थी, जैसा कि शुक्लपश्चषकी पूर्णिमाको अपनी उत्ताल तरंगोंसे परिपूर्ण हुए महासागरका रूप देखनेमें आता है

अध्याय 97

श्लोक 14

वीतरात्रे ततः काले नृपास्ते कृतकौतुकाः ।आरोहणार्थं शैलस्य समेता युद्धलालसाः

vītarātre tataḥ kāle nṛpāste kṛtakautukāḥ | ārohaṇārthaṃ śailasya sametā yuddhalālasāḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर रात बीतनेपर सब राजा उठे और मज़लाचारसे सम्पन्न हो युद्धकी लालसासे गोमन्तपर्वतपर चढ़नेके लिये एकत्र होने लगे

अध्याय 97

श्लोक 15

समवायीकृताः सर्वे गिरिप्रस्थेषु ते नृपाः ।निविष्टा मन्त्रयामासुर्युद्धकालकुतूहलाः

samavāyīkṛtāḥ sarve giriprastheṣu te nṛpāḥ | niviṣṭā mantrayāmāsuryuddhakālakutūhalāḥ

हिन्दी अर्थ

पर्वतके शिखरोंपर एकत्र हो वे सभी राजा बैठे और युद्धके शुभ अवसरके लिये उत्सुक हो आपसमें मन्त्रणा करने लगे

अध्याय 97

श्लोक 16

एषां तु तुमुलः शब्दः शुश्रुवे पृथिवीक्षिताम् ।युगान्ते भिद्यमानानां सागराणां यथा स्वनः

eṣāṃ tu tumulaḥ śabdaḥ śuśruve pṛthivīkṣitām | yugānte bhidyamānānāṃ sāgarāṇāṃ yathā svanaḥ

हिन्दी अर्थ

सेनासहित इन नरेशोंकी तुमुल ध्वनि प्रलयकालमें मर्यादाको तोड़कर बहनेवाले समुद्रोंकी भयंकर गर्जनाके समान सुनायी देती थी

अध्याय 97

श्लोक 17

तेषां सकञ्चुकोष्णीषाः स्थविरा वेत्रपाणयः ।चेरुर्मा शब्द इत्येवं ब्रुवन्तो राजशासनात्

teṣāṃ sakañcukoṣṇīṣāḥ sthavirā vetrapāṇayaḥ | cerurmā śabda ityevaṃ bruvanto rājaśāsanāt

हिन्दी अर्थ

उन राजाओंके छड़ीदार बूढ़े सिपाही चोगा और पगड़ी धारण किये तथा हाथमें बेंत लिये राजाज्ञासे यह कहते हुए विचरने लगे कि सब लोग मौन रहें। कोई एक शब्द भी न बोले

अध्याय 97

श्लोक 18

तस्य रूपं बलस्यासीन्निःशब्दस्तिमितस्य वै ।लीनमीनभुजङ्गस्य निःशब्दस्य पयोदधेः

tasya rūpaṃ balasyāsīnniḥśabdastimitasya vai | līnamīnabhujaṅgasya niḥśabdasya payodadheḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय नीरव और निश्चल हुए उस सैन्यसमूहका रूप उस शब्दहीन प्रशान्त महासागरके समान प्रतीत होता था, जिसके मत्स्य और भुजज्ध जलके भीतर विलीन हो गये हों

अध्याय 97

श्लोक 19

तस्मिन् स्तिमितनिदशब्दे योगादिव महार्णवे ।जरासन्धो बृहद्वाक्यं बृहस्पतिरिवाददे

tasmin stimitanidaśabde yogādiva mahārṇave | jarāsandho bṛhadvākyaṃ bṛhaspatirivādade

हिन्दी अर्थ

वह सैन्यसागर मानो योगबलसे जब सहसा नीरव तथा निश्चल हो गया, तब बृहस्पतिके समान नीतिज्ञ जरासंधने यह महत्त्वपूर्ण बात कही—

अध्याय 97

श्लोक 20

शीघ्रं समभिवर्तन्तां बलानीह महीक्षिताम् ।सर्वतः पर्वतश्चायं बलौघैः परिवार्यताम्

śīghraṃ samabhivartantāṃ balānīha mahīkṣitām | sarvataḥ parvataścāyaṃ balaughaiḥ parivāryatām

हिन्दी अर्थ

राजाओंकी सेनाएँ शीघ्र ही आक्रमण करें और सब ओरसे सैनिकसमूह इस पर्वतको घेर लें

अध्याय 97

श्लोक 21

अश्मयन्त्राणि युज्यन्तां क्षेपणीयाश्च मुद्गराः ।ऊर्ध्वं चापि प्रवाह्यन्तां प्रासा वै तोमराणि च

aśmayantrāṇi yujyantāṃ kṣepaṇīyāśca mudgarāḥ | ūrdhvaṃ cāpi pravāhyantāṃ prāsā vai tomarāṇi ca

हिन्दी अर्थ

पत्थरोंके गोले बरसानेवाले यन्त्र लगा दिये जायेँ। क्षेपणीय (गोफना या ढेलवाँस) तथा मुदूगर सँभाल लिये जायँँ। प्राश और तोमर भी ऊपर कर लिये जायेँ

अध्याय 97

श्लोक 22

ऊर्ध्व प्रक्षेपणार्थाय दृढानि च लधूनि च ।शस्त्रपातविघातानि क्रियन्तामाशु शिल्पिभिः

ūrdhva prakṣepaṇārthāya dṛḍhāni ca ladhūni ca | śastrapātavighātāni kriyantāmāśu śilpibhiḥ

हिन्दी अर्थ

शत्रुओंके शस्त्रप्रहारको नष्ट करनेमें समर्थ सुदृढ़ और हलके गोलोंको ऊपर फेंकनेके लिये हमारे शिल्पी शीघ्र तैयार करें

अध्याय 97

श्लोक 23

शूराणां युद्ध्यमानानां प्रमत्तानां परस्परम् ।यथा नरपतिः प्राह तथा शीघ्रं विधीयताम्

śūrāṇāṃ yuddhyamānānāṃ pramattānāṃ parasparam | yathā narapatiḥ prāha tathā śīghraṃ vidhīyatām

हिन्दी अर्थ

परस्पर प्रमत्त होकर युद्ध करनेवाले शूरवीरोंके लिये जैसा राजा दमघोष कहें, शीघ्र वैसा ही प्रबन्ध किया जाय

अध्याय 97

श्लोक 24

दार्यतामेष टङ्कौघैः खनित्रैश्च नगोत्तमः ।नृपाश्च युद्धमार्गज्ञा विन्यस्यन्तामदूरतः

dāryatāmeṣa ṭaṅkaughaiḥ khanitraiśca nagottamaḥ | nṛpāśca yuddhamārgajñā vinyasyantāmadūrataḥ

हिन्दी अर्थ

उस उत्तम पर्वतको टंकसमूहों और खनित्रोंसे खोदकर विदीर्ण कर डाला जाय। युद्धकी प्रणालीके जानकार नरेशोंको इसके समीप ही यथास्थान खड़ा किया जाय

अध्याय 97

श्लोक 25

अद्यप्रभृति सैन्यैर्मे गिरिरोधः प्रवर्त्यताम् ।यावदेतौ पातयामो वसुदेवसुतावुभौ

adyaprabhṛti sainyairme girirodhaḥ pravartyatām | yāvadetau pātayāmo vasudevasutāvubhau

हिन्दी अर्थ

आजसे मेरे सैनिक इस पर्वतपर घेरा डाल दें और इसे तबतक चालू रखें, जबतक कि हम इन दोनों वसुदेवपुत्रोंको मार न डालें

अध्याय 97

श्लोक 26

अचलोऽयं शिलायोनिः क्रियतां निश्चलाण्डजः ।आकाशमपि बाणोर्घैर्निःसम्पातं विधीयताम्

acalo'yaṃ śilāyoniḥ kriyatāṃ niścalāṇḍajaḥ | ākāśamapi bāṇorghairniḥsampātaṃ vidhīyatām

हिन्दी अर्थ

शिलाओंसे ही उत्पन्न हुआ (अथवा शिलाओंका उत्पादक) यह पर्वत स्वयं तो अचल है ही, इसपर रहनेवाले पक्षियोंको भी सायकोंद्वारा अचल (हिलने-डुलने या उड़नेमें असमर्थ) कर दिया जाय। आकाशको भी बाणसमूहोंसे इस तरह रूँध दिया जाय कि उसमें पक्षी भी उड़ न सकें

अध्याय 97

श्लोक 27

मयानुशिष्टास्तिष्ठन्तु गिरिभूमिषु भूमिपाः ।तेषु तेष्ववकाशेषु शीघ्रमारुह्यतां गिरिः

mayānuśiṣṭāstiṣṭhantu giribhūmiṣu bhūmipāḥ | teṣu teṣvavakāśeṣu śīghramāruhyatāṃ giriḥ

हिन्दी अर्थ

मेरी आज्ञा मानकर समस्त भूपाल पर्वतीय स्थानोंमें खड़े रहें और जहाँ-जहाँ अवकाश मिल जाय, वहाँ-वहाँसे शीघ्र ही पर्वतपर चढ़ जायेँ

अध्याय 97

श्लोक 28

मद्रः कलिङ्गाधिपतिश्चेकितानश्च बाह्लिकः ।काश्मीरराजो गोनर्दः करूषाधिपतिस्तथा

madraḥ kaliṅgādhipatiścekitānaśca bāhlikaḥ | kāśmīrarājo gonardaḥ karūṣādhipatistathā

श्लोक 28–29 का हिन्दी अर्थ

बाहिक, काश्मीरराज गोनर्द, करूषराज दन्तवक्‍्त्र, किन्नरराज द्ुम तथा पर्वतीय प्रदेशके योद्धा—ये सब लोग इस पर्वतके पश्चिम भागपर शीघ्र ही चढ़ाई कर दें

अध्याय 97

श्लोक 29

द्रुमः किम्पुरुषश्चैव पर्वतीयाश्च मानवाः ।पर्वतस्यापरं पार्श्वं क्षिप्रमारोहयन्त्वमी

drumaḥ kimpuruṣaścaiva parvatīyāśca mānavāḥ | parvatasyāparaṃ pārśvaṃ kṣipramārohayantvamī

अर्थ श्लोक 28 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 30

पौरवो वेणुदारिश्च वैदर्भः सोमकस्तथा ।रुक्मी च भोजाधिपतिः सूर्याक्षश्चैव मालवः

pauravo veṇudāriśca vaidarbhaḥ somakastathā | rukmī ca bhojādhipatiḥ sūryākṣaścaiva mālavaḥ

श्लोक 30–33 का हिन्दी अर्थ

पूरुवंशीय वेणुदारि, विदर्भदेशीय सोमक, भोजोंके अधिपति रुक्मी, मालवाके राजा सू्यक्षि, पाज्ञालदेशके अधिपति राजा द्रुपद, अवन्तिके दोनों राजकुमार विन्द और अनुविन्द, पराक्रमी दन्तवक्‍्त्र, छागलि, पुरुमित्र, राजा विराट, कौशाम्बीनरेश मालव, शतधन्वा, विदूरथ, भूरिश्रवा, त्रिगर्त, बाण और पश्ननद—ये दुर्गयुद्धका वेग सह सकनेवाले नरेश शत्रुओंको कुचलते हुए इस पर्वतके उत्तरभागपर चढ़ाई करें, इनका गौरव व्रके तुल्य है

अध्याय 97

श्लोक 31

पाञ्चालाधिपतिश्चैव द्रुपदश्च नराधिपः ।विन्दानुविन्दावावन्त्यौ दन्तवक्त्रश्च वीर्यवान्

pāñcālādhipatiścaiva drupadaśca narādhipaḥ | vindānuvindāvāvantyau dantavaktraśca vīryavān

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 32

छागलिः पुरमित्रश्च विराटश्च महीपतिः ।कौशाम्ब्यो मालवश्चैव शतधन्वा विदूरथः

chāgaliḥ puramitraśca virāṭaśca mahīpatiḥ | kauśāmbyo mālavaścaiva śatadhanvā vidūrathaḥ

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 33

भूरिश्रवास्त्रिगर्तश्च बाणः पञ्चनदस्तथा ।उत्तरं पर्वतोद्देशमेते दुर्गसहा नृपाः ।आरोहन्तु विमर्दन्तो वज्रप्रतिमगौरवाः

bhūriśravāstrigartaśca bāṇaḥ pañcanadastathā | uttaraṃ parvatoddeśamete durgasahā nṛpāḥ | ārohantu vimardanto vajrapratimagauravāḥ

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 34

उलूकः कैतवेयश्च वीरश्चांशुमतः सुतः ।एकलव्यो दृढाश्वश्च क्षत्रधर्मा जयद्रथः

ulūkaḥ kaitaveyaśca vīraścāṃśumataḥ sutaḥ | ekalavyo dṛḍhāśvaśca kṣatradharmā jayadrathaḥ

श्लोक 34–36 का हिन्दी अर्थ

शकुनिपुत्र उलूक, अंशुमानके पुत्र वीर, एकलव्य, दृढ़ाध, क्षत्रधर्मा, जयद्रथ, उत्तमौजा, शाल्व, केरलराज कैशिक, विदिशाके राजा वामदेव और पराक्रमी सुकेतु—इन सबके अधीन इस पर्वतका पूर्वभाग सौंप दिया जाय। ये लोग जैसे वायु बादलॉको छिनन-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार शत्रुओंको विदीर्ण करते हुए उनपर धावा बोल दें

अध्याय 97

श्लोक 35

उत्तमौजास्तथा शाल्वः कैरलेयश्च कैशिकः ।वैदिशो वामदेवश्च सुकेतुश्चापि वीर्यवान्

uttamaujāstathā śālvaḥ kairaleyaśca kaiśikaḥ | vaidiśo vāmadevaśca suketuścāpi vīryavān

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 36

पूर्वपर्वतनिर्व्युहमेतेष्वायतमस्तु नः ।विदारयन्तो धावन्तो वाता इत बलाहकान्

pūrvaparvatanirvyuhameteṣvāyatamastu naḥ | vidārayanto dhāvanto vātā ita balāhakān

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 37

अहं च दरदश्चैव चेदिराजश्च वीर्यवान् ।दक्षिणं शैलनिचयं दारयिष्याम दंशिताः

ahaṃ ca daradaścaiva cedirājaśca vīryavān | dakṣiṇaṃ śailanicayaṃ dārayiṣyāma daṃśitāḥ

हिन्दी अर्थ

मैं, दरद तथा पराक्रमी चेद्रिज दमघोष कवच आदिसे सुसज्जित होकर इस पर्वतके दक्षिणभागको विदीर्ण कर डालेंगे

अध्याय 97

श्लोक 38

एवमेष गिरिः क्षिप्रं समन्ताद् वेष्टितो बलैः ।वज्रप्रपातप्रतिमं प्राप्नोतु तुमुलं भयम्

evameṣa giriḥ kṣipraṃ samantād veṣṭito balaiḥ | vajraprapātapratimaṃ prāpnotu tumulaṃ bhayam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार हमारी सेनाओंद्वारा चारों ओरसे घिरा हुआ यह पर्वत शीघ्र ही, मानो इसपर वज्रका आघात हो रहा हो, इस तरह घोर भय प्राप्त करे

अध्याय 97

श्लोक 39

गदिनो वै गदाभिश्च परिघैः परिघायुधाः ।अपरे विविधैः शस्त्रैर्दारयन्तु नगोत्तमम्

gadino vai gadābhiśca parighaiḥ parighāyudhāḥ | apare vividhaiḥ śastrairdārayantu nagottamam

हिन्दी अर्थ

गदाधारी वीर गदाओंसे, परिघ चलानेवाले परिघोंसे तथा अन्य वीर नाना प्रकारके दूसरे अस्त्र- शस्त्रोंसे इस श्रेष्ठ पर्वतके टुकड़े-टुकड़े कर डालें

अध्याय 97

श्लोक 40

एष भूमिधरोऽद्यैव विषमोच्चशिलान्वितः ।कार्यो भूमिसमः सर्वो भवद्भिर्वसुधाधिपैः

eṣa bhūmidharo'dyaiva viṣamoccaśilānvitaḥ | kāryo bhūmisamaḥ sarvo bhavadbhirvasudhādhipaiḥ

हिन्दी अर्थ

विषम एवं ऊँची शिलाओंसे युक्त इस भूधरको आप सभी भूपाल मिलकर आज ही भूमिके समान समतल कर डालें

अध्याय 97

श्लोक 41

जरासन्धवचः श्रुत्वा पार्थिवा राजशासनात् ।गोमन्तं वेष्टयामासुः सागराः पृथिवीमिव

jarāsandhavacaḥ śrutvā pārthivā rājaśāsanāt | gomantaṃ veṣṭayāmāsuḥ sāgarāḥ pṛthivīmiva

हिन्दी अर्थ

जरासंधकी बात सुनकर समस्त राजाओंने मगधराजकी आज्ञासे गोमन्तपर्वतको चारों ओरसे घेर लिया, ठीक उसी तरह जैसे समुद्र पृथ्वीको घेरे हुए है

अध्याय 97

श्लोक 42

उवाच राजा चेदीनां देवानां मघवानिव ।किं ते युद्धेन दुर्गेऽस्मिन् गोमन्ते च नगोत्तमे

uvāca rājā cedīnāṃ devānāṃ maghavāniva | kiṃ te yuddhena durge'smin gomante ca nagottame

हिन्दी अर्थ

उस समय देवताओंके राजा इन्द्रके समान चेदिवासियोंके अधिपति राजा दमघोषने जरासंधसे कहा-राजन्‌! यह पर्वतोंमें श्रेष्ठ गोमन्त दुर्गम पर्वत है। इसपर युद्ध करनेसे आपको क्या लाभ होगा

अध्याय 97

श्लोक 43

दुरारोहश्च शिखरे प्रांशुपादपकण्टके ।काष्ठैस्तृणैश्च बहुभिः परिवार्य समन्ततः

durārohaśca śikhare prāṃśupādapakaṇṭake | kāṣṭhaistṛṇaiśca bahubhiḥ parivārya samantataḥ

श्लोक 43–47 का हिन्दी अर्थ

इसके शिखरपर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष और काँटेर हैं; अतः: इसपर चढ़ना बहुत कठिन काम है। मेरी तो राय है, बहुत-से काठ और घास-फूस जुटाकर इस पर्वतको चारों ओरसे घेर दिया जाय और अभी इसमें आग लगा दी जाय। इसी कार्यमें शीघ्रता करनी चाहिये । दूसरे किसी प्रयत्रसे कुछ होने-जानेवाला नहीं है। क्योंकि क्षत्रिय लोग सुकुमार होते हैं । ये रणभूमिमें बाणोंद्वारा ही युद्ध कर सकते हैं। (पर्वतपर चढ़ना इनके लिये अत्यन्त कठिन है।) इस समय इन्हें दुर्गम पर्वतपर चढ़कर वहाँके पैदल योद्धाओंके साथ युद्ध करनेके कामपर नियुक्त किया गया है (जो इनके लिये दुष्कर है) । तात! केवल घेरा डालनेसे या ऊपर चढ़ जानेसे देवता भी इस पर्वतका मर्दन नहीं कर सकते। राजाओ! दुर्गयुद्धमें रोधयुद्ध (घेरा डालने)- के द्वारा जो लड़ाईका क्रम चालू किया जाता है, वह श्रेयस्कर होता है (क्योंकि दुर्गकी खाद्यसामग्री समाप्त होनेपर वहाँके निवासियोंका पतन अवश्यम्भावी है; परन्तु यहाँ पर्वतनिवासियोंके लिये खाने-पीनेकी सामग्री सदा सुलभ है) । अन्न, जल और लकड़ीकी कमी हो जाय तभी पर्वतवासी योद्धाओंको धराशायी किया जा सकता है। हमारी संख्या बहुत है और विपक्षियोंकी कम—ऐसा सोचना भी निपुण नीतिका परिचायक नहीं है

अध्याय 97

श्लोक 44

अद्यैव दीप्यतां क्षिप्रमलमन्येन कर्मणा ।क्षत्रियाः सुकुमारा हि रणे सायकयोधिनः

adyaiva dīpyatāṃ kṣipramalamanyena karmaṇā | kṣatriyāḥ sukumārā hi raṇe sāyakayodhinaḥ

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 45

नियुक्ताः पर्वते दुर्गे नियोक्तुं पादयोधिनः ।ननाम प्रतिबन्धेन न चावस्कन्दकर्मणा

niyuktāḥ parvate durge niyoktuṃ pādayodhinaḥ | nanāma pratibandhena na cāvaskandakarmaṇā

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 46

शक्य एष गिरिस्तात देवैरप्यवमर्दितुम् ।दुर्गयुद्धे क्रमः श्रेयान् रोधयुद्धेन पार्थिवाः

śakya eṣa giristāta devairapyavamarditum | durgayuddhe kramaḥ śreyān rodhayuddhena pārthivāḥ

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 47

भक्तोदकेन्धनैः क्षीणाः पात्यन्ते गिरिसंश्रिताः ।वयं बहव इत्येवं नाप्येष निपुणो नयः

bhaktodakendhanaiḥ kṣīṇāḥ pātyante girisaṃśritāḥ | vayaṃ bahava ityevaṃ nāpyeṣa nipuṇo nayaḥ

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 48

यादवौ नावमन्तव्यौ द्वावप्येतौ रणे स्थितौ ।अविज्ञातबलावेतौ श्रूयेते देवसम्मितौ

yādavau nāvamantavyau dvāvapyetau raṇe sthitau | avijñātabalāvetau śrūyete devasammitau

हिन्दी अर्थ

ये दोनों यदुवंशी भी युद्धके लिये तैयार खड़े हैं; अतः इनकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये । इनके पूरे-पूरे बलका ज्ञान किसीको नहीं है। ये दोनों देवताओंके समान तेजस्वी सुने जाते हैं

अध्याय 97

श्लोक 49

कर्मभिस्त्वमरौ विद्मो वालावतिबलान्वितौ ।दुष्कराणीह कर्माणि कृतवन्तौ यदूत्तमौ

karmabhistvamarau vidmo vālāvatibalānvitau | duṣkarāṇīha karmāṇi kṛtavantau yadūttamau

हिन्दी अर्थ

अपने कर्मोंसे तो ये अमर जान पढ़ते हैं; क्योंकि बाल्यावस्थामें ही ये अत्यन्त बलशाली हैं। यदुकुलके इन श्रेष्ठ पुरुषोंने इस जगतमें बड़े-बड़े दुष्कर कर्म किये हैं

अध्याय 97

श्लोक 50

शुष्ककाष्ठैस्तृणैर्वेष्ट्य सर्वतः पर्वतोत्तमम् ।अग्निना दीपयिष्यामो दह्येतां गतचेतनौ

śuṣkakāṣṭhaistṛṇairveṣṭya sarvataḥ parvatottamam | agninā dīpayiṣyāmo dahyetāṃ gatacetanau

हिन्दी अर्थ

अत: सूखे काठों और तिनकोंसे आवेष्टित करके इस उत्तम पर्वतमें हम सब ओरसे आग लगा देंगे। इससे अचेत होकर वे दोनों भस्म हो जायेँगे

अध्याय 97

श्लोक 51

यदि चेन्निष्क्रमिष्येते दह्यमानावितोऽन्तिके ।समेत्य पातयिष्यामस्त्यक्ष्यतो जीवितं ततः

yadi cenniṣkramiṣyete dahyamānāvito'ntike | sametya pātayiṣyāmastyakṣyato jīvitaṃ tataḥ

हिन्दी अर्थ

यदि आगसे जलते हुए वे दोनों हमारे पाससे निकलेंगे तो हम सब लोग मिलकर उन्हें मार गिरायँगे। इस तरह उन दोनोंको अपने जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा

अध्याय 97

श्लोक 52

वाक्यमेतत्तु रुरुचे सबलानां महीक्षिताम् ।यदुक्तं चेदिराजेन नृपाणां हितशंसिना

vākyametattu ruruce sabalānāṃ mahīkṣitām | yaduktaṃ cedirājena nṛpāṇāṃ hitaśaṃsinā

हिन्दी अर्थ

राजाओंके हितकी बात बतानेवाले चेदिराजने जो बात वहाँ कही, वह सेना- सहित समस्त राजाओंको अच्छी लगी

अध्याय 97

श्लोक 53

ततः काष्ठैस्तृणैर्वंशैः शुष्कशाखैश्च पादपैः ।उपादीप्यत शैलेन्द्रः सृर्यपादैरिवाम्बुदः

tataḥ kāṣṭhaistṛṇairvaṃśaiḥ śuṣkaśākhaiśca pādapaiḥ | upādīpyata śailendraḥ sṛryapādairivāmbudaḥ

हिन्दी अर्थ

शोउध्याय: + ४७७ तदनन्तर उन्होंने काठ-कबाड़, घास-फूस और सूखी डालवाले वृक्ष लाकर उनके द्वारा उस गिरिराज गोमन्तमें आग लगा दी। उस समय आगकी ज्वालाओंसे घिरा हुआ वह पर्वत सूर्यकी किरणोंसे आवृत मेघके समान प्रतीत होता था

अध्याय 97

श्लोक 54

ददुस्ते सर्वतस्तूर्णं पावकं तत्र पार्थिवाः ।यथोद्देशं यथावातं शैलस्य लघुविक्रमाः

daduste sarvatastūrṇaṃ pāvakaṃ tatra pārthivāḥ | yathoddeśaṃ yathāvātaṃ śailasya laghuvikramāḥ

हिन्दी अर्थ

इसके बाद शीघ्रतापूर्वक पैर बढ़ाते हुए राजाओंने जहाँ जैसा हवाका रुख था, उसके अनुसार तुरंत ही पर्वतके चारों ओर वह आग फैला दी

अध्याय 97

श्लोक 55

स वायुदीपितो वह्निरुत्पपात समन्ततः ।सधूमज्वालमालाभिर्भाभिः खमिव शोभयन्

sa vāyudīpito vahnirutpapāta samantataḥ | sadhūmajvālamālābhirbhābhiḥ khamiva śobhayan

हिन्दी अर्थ

वायुसे प्रज्वलित हुई आग वहाँ सब ओरसे ऊपरको उठने लगी और धूमयुक्त ज्वालामालाओंकी प्रभासे आकाशकी शोभा-सी बढ़ाने लगी

अध्याय 97

श्लोक 56

सोऽनलः पवनायस्तः काष्ठसञ्चयमूलवान् ।ददाह शैलं श्रीमन्तं गोमन्तं कान्तपादपम्

so'nalaḥ pavanāyastaḥ kāṣṭhasañcayamūlavān | dadāha śailaṃ śrīmantaṃ gomantaṃ kāntapādapam

हिन्दी अर्थ

सूखे काठोंके ढेर ही जिसकी जड़ थे, वह आग वायुके सहारेसे बढ़कर कमनीय वृक्षॉवाले शोभा-सम्पन्न गोमन्तपर्वतको चारों ओरसे दग्ध करने लगी

अध्याय 97

श्लोक 57

स दह्यमानः शैलेन्द्रो मुमोच विपुलाः शिलाः ।शतशः शतधा भूत्वा महोल्काकारदर्शनाः

sa dahyamānaḥ śailendro mumoca vipulāḥ śilāḥ | śataśaḥ śatadhā bhūtvā maholkākāradarśanāḥ

हिन्दी अर्थ

उस आगसे दग्ध होता हुआ गिरिराज गोमन्त बड़ी-बड़ी शिलाएँ छोड़ने लगा (अग्निके तापसे चटककर प्रस्तरखण्ड टूट-टूटकर गिरने लगे), वे सैकड़ों शिलाएँ सौ-सौ टूक होकर गिरते समय बड़ी-बड़ी उल्काओंके समान दिखायी देती थीं ॥ '

अध्याय 97

श्लोक 58

स चित्रभानुः शैलेन्द्रं भाभिर्भानुरिवाम्बुदम् ।आलिम्पतीव विधिवत् समन्तादर्चिरुद्धतः

sa citrabhānuḥ śailendraṃ bhābhirbhānurivāmbudam | ālimpatīva vidhivat samantādarciruddhataḥ

हिन्दी अर्थ

लपटोंसे ऊपरको उठती हुई वह आग उस पर्वतराजकों सब ओरसे प्रभाओंद्वारा विधिपूर्वक लीपती-सी प्रतीत होती थी, ठीक उसी तरह जैसे सूर्यदेव अपनी किरणोंद्वारा मेघोंको अनुलिप्त कर देते हैं

अध्याय 97

श्लोक 59

धातुभिः पच्यमानैश्च ज्वलद्भिश्चैव पादपैः ।उद्भ्रान्तश्वापदो रौति तुद्यमान इवाद्रिराट्

dhātubhiḥ pacyamānaiśca jvaladbhiścaiva pādapaiḥ | udbhrāntaśvāpado rauti tudyamāna ivādrirāṭ

हिन्दी अर्थ

पकती हुई धातुओं, जलते हुए वृक्षों तथा घबड़ाये हुए हिंसक जन्तुओंसे युक्त वह पर्वतराज ऐसा जान पड़ता था, मानो व्यथासे पीड़ित होकर रो रहा हो

अध्याय 97

श्लोक 60

प्रतप्तो दह्यमानस्तु स शैलः कृष्णवर्त्मना ।रीतीर्निर्वर्तयामास काञ्चनाञ्जनराजतीः

pratapto dahyamānastu sa śailaḥ kṛṣṇavartmanā | rītīrnirvartayāmāsa kāñcanāñjanarājatīḥ

हिन्दी अर्थ

आगसे दग्ध होकर तपा हुआ वह पर्वत सोने, चाँदी तथा काले रंगकी धातुओंके पिघले हुए रसोंकी धारा बहाने लगा

अध्याय 97

श्लोक 61

वह्निना चापि दीप्ताङ्गो गिरिर्नातिविराजते ।धूमान्धकारोर्ध्वतनुर्मज्जमान इवाम्बुदः

vahninā cāpi dīptāṅgo girirnātivirājate | dhūmāndhakārordhvatanurmajjamāna ivāmbudaḥ

हिन्दी अर्थ

यद्यपि अग्निसे उसका सारा अद्भ उद्घासित हो उठा था तो भी उसके ऊपरी भागमें धुएँका अन्धकार छा रहा था, इसलिये उस _ पर्वतकी अधिक शोभा नहीं हो रही थी। वह समुद्रमें डूबते हुए मेघके समान जान पड़ता था

अध्याय 97

श्लोक 62

विश्लिष्टोपलसङ्घातः कर्कशाङ्गारवर्षणः ।गिरिर्भात्यनलोद्गारैरुल्कावृष्टिरिवाम्बुदः

viśliṣṭopalasaṅghātaḥ karkaśāṅgāravarṣaṇaḥ | girirbhātyanalodgārairulkāvṛṣṭirivāmbudaḥ

हिन्दी अर्थ

उसके प्रस्तरसमूह अलग हो-होकर गिर रहे थे। उससे कड़े अज्ञारोंकी वर्षा हो रही थी। उस समय आग उगलनेके कारण वह पर्वत उल्काओंकी वर्षा करनेवाले मेघके समान प्रतीत होता था

अध्याय 97

श्लोक 63

प्रपातप्रस्रपोत्क्षिप्तो धूमसंवर्द्धितोदरः ।स गिरिर्भस्मतां यातो युगान्ताग्निहतोपमः

prapātaprasrapotkṣipto dhūmasaṃvarddhitodaraḥ | sa girirbhasmatāṃ yāto yugāntāgnihatopamaḥ

हिन्दी अर्थ

उसके झरनोंके स्रोत सूख गये, मध्यभागमें धुआँ फैल गया। उस अवस्थामें वह पर्वत प्रलयाग्निसे दग्ध होकर भस्म हुआ-सा जान पड़ता था

अध्याय 97

श्लोक 64

विह्वलास्तस्य पार्श्वेभ्यः सर्पा दग्धार्धदेहिनः ।श्वसन्तः पृथुमूर्धानो निश्चेरुरशिवेक्षणाः

vihvalāstasya pārśvebhyaḥ sarpā dagdhārdhadehinaḥ | śvasantaḥ pṛthumūrdhāno niśceruraśivekṣaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

उसके पार्शभागोंसे घबराये हुए सर्प निकलने लगे। उनके आधे शरीर जल गये थे। उनकी आँखोंसे क्रूरता टपक रही थी तथा वे अपने फैले हुए मस्तकों (फनों)-से फुड्लार मार रहे थे

अध्याय 97

श्लोक 65

उत्पत्योत्पत्य गगनात् पुनः पुनरवाङ्मुखाः ।रेसुश्चोद्वेजिताः सिंहाः शार्दूलाश्चानलाविलाः

utpatyotpatya gaganāt punaḥ punaravāṅmukhāḥ | resuścodvejitāḥ siṃhāḥ śārdūlāścānalāvilāḥ

हिन्दी अर्थ

आगसे झुलसे हुए सिंह और व्याघ्र भयसे उद्धिग्न हो बार-बार उछलकर आकाशसे नीचे मुँह किये गिरते और आर्तनाद करते थे

अध्याय 97

श्लोक 66

मुमुचुः पादपाश्चैव दाहनिर्यासजं जलम्

mumucuḥ pādapāścaiva dāhaniryāsajaṃ jalam

हिन्दी अर्थ

वहाँके वृक्ष दग्ध होनेके कारण अपने भीतरके रसको पानीके रूपमें बहाने लगे

अध्याय 97

श्लोक 67

वहत्यूर्ध्वगतिर्वातो भस्माङ्गारातिपिङ्गलः ।धूमच्छाया च गगने दर्पिताम्भोददर्शना

vahatyūrdhvagatirvāto bhasmāṅgārātipiṅgalaḥ | dhūmacchāyā ca gagane darpitāmbhodadarśanā

हिन्दी अर्थ

ऊपरको उठनेवाली वायु भस्म और अड्रारोंसे अत्यन्त पिंगलवर्णकी होकर बहने लगी और आकाशमें धूमकी छाया घुमड़कर घिरी हुई मेघोंकी घटाके समान दिखायी देने लगी

अध्याय 97

श्लोक 68

व्यज्यमानो महासानुर्विहगै- श्वापदैरपि ।गिरिर्वैकल्यमायाति प्रागल्भ्यात्कृष्णवर्त्मनः

vyajyamāno mahāsānurvihagai- śvāpadairapi | girirvaikalyamāyāti prāgalbhyātkṛṣṇavartmanaḥ

हिन्दी अर्थ

पक्षी और हिंसक जन्तु भी उसे छोड़कर भाग रहे थे। वह महान्‌ शिखरवाला पर्वत अधिक आग बढ़ जानेके कारण व्याकुल-सा हो उठा था

अध्याय 97

श्लोक 69

स मुमोच शिलाः शैलश्चलोदग्रशिलोच्चयः ।वज्रेण पुरुहूतस्य यथा स्याद् दारितस्तथा

sa mumoca śilāḥ śailaścalodagraśiloccayaḥ | vajreṇa puruhūtasya yathā syād dāritastathā

हिन्दी अर्थ

बड़ी-बड़ी चल्लल शिलाओंके ढेरसे युक्त वह पर्वत आगसे तपकर अपनी शिलाओंको इस प्रकार छोड़ रहा था, मानो इन्द्रके वज़से विदीर्ण होकर बिखरा जा रहा हो

अध्याय 97

श्लोक 70

आदीप्य तं तु शैलेन्द्रं क्षत्रिया व्यूहदंशिताः ।अर्धक्रोशमपक्रान्ताः पावकेनाभितापिताः

ādīpya taṃ tu śailendraṃ kṣatriyā vyūhadaṃśitāḥ | ardhakrośamapakrāntāḥ pāvakenābhitāpitāḥ

हिन्दी अर्थ

उस पर्वतराजमें आग लगाकर व्यूहके आकारमें सुसस्नित होकर खड़े हुए क्षत्रिय उस प्रचण्ड पावकसे सन्तप्त हो आधा कोस पीछे हट गये

अध्याय 97

श्लोक 71

दह्यमाने नगश्रेष्ठे सीदमानैर्महाद्रुमैः ।धूमभारैरनालक्ष्ये मूले शिथिलतां गते

dahyamāne nagaśreṣṭhe sīdamānairmahādrumaiḥ | dhūmabhārairanālakṣye mūle śithilatāṃ gate

श्लोक 71–72 का हिन्दी अर्थ

वह पर्वतोंमें श्रेष्ठ गोमन्त नष्ट होते हुए महान्‌ वृक्षोंके साथ जब इस प्रकार दग्ध होने लगा, धूमभारसे उसकी ओर देखना असम्भव हो गया और उसका मूलभाग शिथिल होने लगा, तब बलरामजीने केशी और मधुनामक दैत्योंका संहार करनेवाले साक्षात्‌ विष्णुस्वरूप कमलनयन श्रीकृष्णसे रोषपूर्वक कहा—

अध्याय 97

श्लोक 72

सरोषं हि तदा रामो वचनं केशिसूदनम् ।बभाषे पद्मपत्राक्षं स साक्षान्मधुसूदनम्

saroṣaṃ hi tadā rāmo vacanaṃ keśisūdanam | babhāṣe padmapatrākṣaṃ sa sākṣānmadhusūdanam

अर्थ श्लोक 71 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 73

दह्यतेऽयं गिरिस्तात ससानुशिखरद्रुमः ।आवयोः कृष्ण वैरेण बलिभिर्वसुधाधिपैः

dahyate'yaṃ giristāta sasānuśikharadrumaḥ | āvayoḥ kṛṣṇa vaireṇa balibhirvasudhādhipaiḥ

हिन्दी अर्थ

तात ! श्रीकृष्ण! हमलोगोंसे वैर हो जानेके कारण इन बलवान्‌ भूपतियोंद्वारा छोटे-बड़े शिखरों और वृक्षॉंसहित यह पर्वत जलाया जा रहा है

अध्याय 97

श्लोक 74

पश्य कृष्णानलौष्णानां सधूमानां समन्ततः ।वनानां विरसन्तीव नगाभ्याशे द्विपोत्तमाः

paśya kṛṣṇānalauṣṇānāṃ sadhūmānāṃ samantataḥ | vanānāṃ virasantīva nagābhyāśe dvipottamāḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण! देखो, चारों ओर आगसे तपे और धुएँसे भरे इन जंगलोंके वृक्षोंके निकट ये उत्तम हाथी करुण-क्रन्दन-सा कर रहे हैं

अध्याय 97

श्लोक 75

अयं यद्यावयोरर्थे गोमन्तस्तात दह्यते ।अयशस्यमिदं लोके कौलीनं च भविष्यति

ayaṃ yadyāvayorarthe gomantastāta dahyate | ayaśasyamidaṃ loke kaulīnaṃ ca bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

तात! यदि हम दोनोंके लिये गोमन्त जला दिया जायगा तो यह संसारमें हमारे लिये महान्‌ अपयश और कलड्की बात होगी

अध्याय 97

श्लोक 76

तदस्यानृण्यहेतोर्हि नगस्य नगसन्निभ ।क्षत्रियान्निहनिष्यामो दोर्भ्यामेव युधां वर

tadasyānṛṇyahetorhi nagasya nagasannibha | kṣatriyānnihaniṣyāmo dorbhyāmeva yudhāṃ vara

हिन्दी अर्थ

अत: योद्धाओंमें श्रेष्ठ तथा युद्धमें पर्वतके समान अविचल रहनेवाले श्रीकृष्ण ! इस गोमन्त- पर्वतसे उऋण होनेके लिये हमलोग अपनी भुजाओंसे ही इन क्षत्रियोंको मार डालेंगे

अध्याय 97

श्लोक 77

एते ते क्षत्रियाः सर्वे गिरिमादीप्य दंशिताः ।रथिनस्तात दृश्यन्ते यथादेशं युयुत्सवः

ete te kṣatriyāḥ sarve girimādīpya daṃśitāḥ | rathinastāta dṛśyante yathādeśaṃ yuyutsavaḥ

हिन्दी अर्थ

तात! ये सारे शत्रिय इस पर्वतको जलाकर कवच आदिसे सुसज्जित हो रथपर बैठकर यथास्थान युद्ध करनेके लिये उत्सुक दिखायी देते हैं

अध्याय 97

श्लोक 78

एवमुक्त्वा गिरेः शृङ्गान्मेरुशृङ्गादिवोडुराट् ।निपपात बलः श्रीमान् वनमालाधरो युवा

evamuktvā gireḥ śṛṅgānmeruśṛṅgādivoḍurāṭ | nipapāta balaḥ śrīmān vanamālādharo yuvā

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर मेरुपर्वतके शिखरसे नीचे उतरनेवाले चन्द्रमाके समान कान्तिमान्‌ वनमालाधारी पवयुवक बलराम गोमन्तपर्वतकी चोटीसे कूद पड़े

अध्याय 97

श्लोक 79

कादम्बरीमदक्षीबो नीलवासाः सिताननः ।स शारदेन्दुसङ्काशो वनमालाञ्चितोदरः

kādambarīmadakṣībo nīlavāsāḥ sitānanaḥ | sa śāradendusaṅkāśo vanamālāñcitodaraḥ

हिन्दी अर्थ

+ ४७९ उस समय वे कादम्बरी (सुधा या मधु) -के मदसे कुछ मत्त-से हो रहे थे। उनके शरीरपर नील वस्त्र शोभा पाता था। उनका मुख गौरवर्णका था। वे शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति उज्वल प्रभासे उद्धासित हो रहे थे। उनका उदरभाग वनमालासे अलंकृत था

अध्याय 97

श्लोक 80

कान्तैककुण्डलधरश्चारुमौलिरवाङमुखः ।निपपात नरेन्द्राणां मध्ये केशवपूर्वजः

kāntaikakuṇḍaladharaścārumauliravāṅamukhaḥ | nipapāta narendrāṇāṃ madhye keśavapūrvajaḥ

हिन्दी अर्थ

उन्होंने एक कानमें कमनीय कुण्डल धारण कर रखा था तथा उनके मस्तकपर मनोहर मुकुट शोभा दे रहा था। श्रीकृष्णके बड़े भाई बलराम नीचे मुँह किये राजाओंके बीचमें ही कूद पड़े

अध्याय 97

श्लोक 81

अवप्लुते ततो रामे कृष्णः कृष्णाम्बुदोपमः ।गोमन्तशिखराच्छ्रीमानाप्लुतोऽमितविक्रमः

avaplute tato rāme kṛṣṇaḥ kṛṣṇāmbudopamaḥ | gomantaśikharācchrīmānāpluto'mitavikramaḥ

हिन्दी अर्थ

बलरामजीके कूदनेके पश्चात्‌ काले मेघके समान श्याम कान्तिमान्‌ और अमित पराक्रमी श्रीमान्‌ कृष्ण भी गोमन्तशिखरसे कूद पड़े

अध्याय 97

श्लोक 82

ततस्तं पीडयामास पद्भ्यां गिरिवरं हरिः ।स पीडितो गिरिस्तेन निर्ममज्ज समन्ततः

tatastaṃ pīḍayāmāsa padbhyāṃ girivaraṃ hariḥ | sa pīḍito giristena nirmamajja samantataḥ

श्लोक 82–87 का हिन्दी अर्थ

कूदते समय श्रीहरिने उस श्रेष्ठ पर्वतको अपने दोनों पैरोंसे दबाया। उनके द्वारा दबाव पड़नेपर वह पर्वत चारों ओरसे जलमग्न-सा हो गया। उसका एक-एक पत्थर जलसे नहा उठा और मदकी बूँदे टपकानेवाले हाथीके समान जलका स्रोत बहाने लगा। उस जलसे वहाँकी सारी आग तत्काल बुझ गयी। मानो प्रलयकालमें मेघसमूहोंद्वारा बरसायी हुई वारिधाराओंसे अंशुमाली . सूर्य शान्त हो गये हों । उस समय पीताम्बरधारी घनश्याम- विग्रह कमलनयन श्रीकृष्ण सिंहके समान दहाड़ रहे थे। उनके मस्तकपर दिव्य किरीट शोभा पा रहा था और मुख बड़ा ही सौम्य दिखायी देता था। उनके वक्ष:स्थलपर श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित था। मुख बहुत ही सुन्दर था और अड्ञोंकी कान्ति देवराज इन्द्रके समान प्रकाशित हो रही थी। बलरामजीके बाद पराक्रमी श्रीकृष्ण भी वहीं (राजाओंके बीचमें ही ) कूद पड़े थे। उन दोनों भाइयोंके कूदनेसे उनके चरणोंका दबाव पाकर वह पर्वत जलके स्त्रोत बहाने लगा था, जो उस भयानक अग्निको बुझानेमें सहायक हुआ। पर्वतसे जलके स्रोत निकलते देखकर राजाओंके मनमें भय समा गया

अध्याय 97

श्लोक 83

जलाकुलोपलस्तत्र प्रस्रुतो द्विरदो यथा ।स तेन वारिणा वह्निस्तत्क्षणात् प्रशमं ययौ

jalākulopalastatra prasruto dvirado yathā | sa tena vāriṇā vahnistatkṣaṇāt praśamaṃ yayau

अर्थ श्लोक 82 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 84

कल्पान्ते वारिधाराभिर्मेघजालैरिवांशुमान् ।सिंहारसितनिर्घोषः पीतवासा घनाकृतिः

kalpānte vāridhārābhirmeghajālairivāṃśumān | siṃhārasitanirghoṣaḥ pītavāsā ghanākṛtiḥ

अर्थ श्लोक 82 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 85

किरीटमूर्द्धा सौम्यास्यः पुण्डरीकनिभेक्षणः ।श्रीवत्सवक्षाः सुमुखः सहस्राक्षसमद्युतिः

kirīṭamūrddhā saumyāsyaḥ puṇḍarīkanibhekṣaṇaḥ | śrīvatsavakṣāḥ sumukhaḥ sahasrākṣasamadyutiḥ

अर्थ श्लोक 82 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 86

रामादनन्तरं कृष्णः प्लुतो वै वीर्यवांस्ततः ।ताभ्यामेव प्लुताभ्यां च चरणैः पीडितो गिरिः

rāmādanantaraṃ kṛṣṇaḥ pluto vai vīryavāṃstataḥ | tābhyāmeva plutābhyāṃ ca caraṇaiḥ pīḍito giriḥ

अर्थ श्लोक 82 के साथ

अध्याय 97

श्लोक 87

मुमोच सलिलोत्पीडांस्तीव्रपावकशान्तये ।सलिलोत्पीडनं दृष्ट्वा पार्थिवा भयमाविशन्

mumoca salilotpīḍāṃstīvrapāvakaśāntaye | salilotpīḍanaṃ dṛṣṭvā pārthivā bhayamāviśan

अर्थ श्लोक 82 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.