Harivamsha Purana
96
अध्याय 96 / 318

Parva 2, Adhyāya 41

62 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ62 श्लोक

अध्याय 96

श्लोक 1

बलरामस्य समीपे वारुणी, कान्ति एवं श्री संज्ञकानां देवाङ्गनानां आगमनम्, गरुडेन श्रीकृष्णं वैष्णवमुकुटस्य प्राप्तिः, श्रीकृष्णस्य बलरामेण सह वार्तालापं एवं जरासन्धस्य सेनायाः निरीक्षणं कृत्वा स्वयमुद्भूतानां मानसिकोद्गाराणां प्रकटनं जामदग्न्ये गते रामे तौ यादवकुलोद्वहौ ।गोमन्तशिखरे रम्ये चेरतुः कामरूपिणौ

balarāmasya samīpe vāruṇī, kānti evaṃ śrī saṃjñakānāṃ devāṅganānāṃ āgamanam, garuḍena śrīkṛṣṇaṃ vaiṣṇavamukuṭasya prāptiḥ, śrīkṛṣṇasya balarāmeṇa saha vārtālāpaṃ evaṃ jarāsandhasya senāyāḥ nirīkṣaṇaṃ kṛtvā svayamudbhūtānāṃ mānasikodgārāṇāṃ prakaṭanaṃ jāmadagnye gate rāme tau yādavakulodvahau | gomantaśikhare ramye ceratuḥ kāmarūpiṇau

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! परशुरामजीके चले जानेपर यादवकुलका भार वहन करनेवाले वे श्रीकृष्ण और बलराम इच्छानुसार रूप धारण करके गोमन्तपर्वतके रमणीय शिखरपर विचरने लगे

अध्याय 96

श्लोक 2

वनमालाकुलोरस्कौ नीलपीताम्बरावुभौ ।नीलश्वेतवपुष्मन्तौ गगनस्थाविवाम्बुदौ

vanamālākuloraskau nīlapītāmbarāvubhau | nīlaśvetavapuṣmantau gaganasthāvivāmbudau

हिन्दी अर्थ

उन दोनोंके वक्ष:स्थलोंमें वनमाला शोभा पा रही थी। दोनों क्रमश: नीले-पीले वस्त्र धारण करके अपने गौर-श्याम शरीरसे आकाशमें स्थित हुए दो मेघोंके समान शोभा पा रहे थे

अध्याय 96

श्लोक 3

तौ शैलधातुदिग्धाङ्गौ युवानौ शिखरे स्थितौ ।चेरतुस्तत्र कान्तेषु वनेषु रतिलालसौ

tau śailadhātudigdhāṅgau yuvānau śikhare sthitau | ceratustatra kānteṣu vaneṣu ratilālasau

हिन्दी अर्थ

पर्वतीय धातुओंसे अपने अड्डोंका श्रृद्धार करके उस पर्वतके शिखरपर खड़े हुए दोनों नवयुवक वीर क्रीड़ाकी लालसा लिये कमनीय वनोंमें विचरण करने लगे

अध्याय 96

श्लोक 4

उदयन्तं निरीक्षन्तौ शशिनं ज्योतिषां वरम् ।उदयास्तमने चैव ग्रहाणां धरणीधरे

udayantaṃ nirīkṣantau śaśinaṃ jyotiṣāṃ varam | udayāstamane caiva grahāṇāṃ dharaṇīdhare

हिन्दी अर्थ

वे उस पर्वतपर ज्योतिर्मय नक्षत्रोंमें श्रेष्ठ चन्द्रमाके उदयकी शोभा देखते और ग्रहोंके उदय-अस्त देखा करते थे

अध्याय 96

श्लोक 5

अथ सङ्कर्षणः श्रीमान् विना कृष्णेन वीर्यवान् ।चचार तस्य शिखरे नगस्य नगसन्निभः

atha saṅkarṣaṇaḥ śrīmān vinā kṛṣṇena vīryavān | cacāra tasya śikhare nagasya nagasannibhaḥ

हिन्दी अर्थ

एक दिन परम पराक्रमी श्रीमान्‌ संकर्षण श्रीकृष्णके बिना ही उस पर्वतके शिखरपर विचर रहे थे। वे स्वयं भी पर्वतके समान प्रतीत होते थे

अध्याय 96

श्लोक 6

प्रफुल्लस्य कदम्बस्य सुच्छाये निषसाद ह ।वायुना मन्दगन्धेन वीज्यमानः सुखेन वै

praphullasya kadambasya succhāye niṣasāda ha | vāyunā mandagandhena vījyamānaḥ sukhena vai

हिन्दी अर्थ

घूमते-घूमते एक खिले हुए कदम्बकी मनोहर छायामें बैठ गये। उस समय कदम्बकी मधुर मन्द गन्धसे वासित वायु उन्हें सुखपूर्वक व्यजन डुलाने लगी

अध्याय 96

श्लोक 7

तस्य तेनानिलौघेन सेव्यमानस्य तत्र वै ।मद्यसंस्पर्जो गन्धः संस्पृशन् घ्राणमागतः

tasya tenānilaughena sevyamānasya tatra vai | madyasaṃsparjo gandhaḥ saṃspṛśan ghrāṇamāgataḥ

हिन्दी अर्थ

वह मन्द-मन्द वायु बहकर जब बलरामजीकी सेवा कर रही थी, उस समय उनकी ब्राणेन्द्रियमें मधुका स्पर्श करके आये हुए सुगन्धित समीरने प्रवेश किया

अध्याय 96

श्लोक 8

तृष्णा चैनं विवेशाशु वारुणीप्रभवा तदा ।शुशोष च मुखं तस्य मत्तस्येवापरेऽहनि

tṛṣṇā cainaṃ viveśāśu vāruṇīprabhavā tadā | śuśoṣa ca mukhaṃ tasya mattasyevāpare'hani

हिन्दी अर्थ

उस समय उनके भीतर वारुणी (मधु या अमृत) -की तृष्णाका आवेश हुआ। फिर तो दूसरे दिन मतवाले पुरुषकी भाँति उनका मुँह सूखने लगा

अध्याय 96

श्लोक 9

स्मारितः स पुरावृत्तममृतप्राशनं विभुः ।तृषितो मदिरान्वेषी ततस्तं तरुमैक्षत

smāritaḥ sa purāvṛttamamṛtaprāśanaṃ vibhuḥ | tṛṣito madirānveṣī tatastaṃ tarumaikṣata

हिन्दी अर्थ

उन्हें पूर्वकालमें किये गये अमृतपानका स्मरण हो आया। वे तृषित होकर उस अमृतकी खोज करने लगे। तब उन्होंने उस वृक्षकी ओर देखा

अध्याय 96

श्लोक 10

तस्य प्रावृषि फुल्लस्य यदम्भो जलजोज्झितम् ।तत्कोटरस्थं मदिरा सञ्जायत मनोहरा

tasya prāvṛṣi phullasya yadambho jalajojjhitam | tatkoṭarasthaṃ madirā sañjāyata manoharā

हिन्दी अर्थ

वर्षाकालमें उस खिले हुए कदम्बपर जो मेघोंका बरसाया हुआ जल गिरा था, वह उसके कोटरमें मनोहर सुधाके रूपमें प्रकट हो गया

अध्याय 96

श्लोक 11

तां तु तृष्णाभिभूतात्मा पिबन्नार्त इवासकृत् ।मोहाच्च चलिताकारः समजायत स प्रभुः

tāṃ tu tṛṣṇābhibhūtātmā pibannārta ivāsakṛt | mohācca calitākāraḥ samajāyata sa prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

बलरामजीका हृदय प्याससे घबरा उठा था। वे पिपासापीडित पुरुषकी भाँति उस अमृतको बार-बार पीने लगे। उसको अधिक पी लेनेके कारण उनपर मोह (नशा-) सा छा गया, जिससे उन प्रभावशालीका शरीर कुछ लड़खड़ाने-सा लगा

अध्याय 96

श्लोक 12

तस्य मत्तस्य वदनं किञ्चिच्चलितलोचनम् ।घूर्णिताकारमभवच्छरत्कालेन्दुसप्रभम्

tasya mattasya vadanaṃ kiñciccalitalocanam | ghūrṇitākāramabhavaccharatkālendusaprabham

हिन्दी अर्थ

मधुसे मत्त हुए बलरामका मुख कुछ झूमता-सा प्रतीत हुआ, नेत्र किंचितू चल्नल हो उठे। उस मुखकी प्रभा शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित होने लगी

अध्याय 96

श्लोक 13

कदम्बकोटरे जाता नाम्ना कादम्बरीति सा ।रूपिणी वारुणी तत्र देवानाममृतारणी

kadambakoṭare jātā nāmnā kādambarīti sā | rūpiṇī vāruṇī tatra devānāmamṛtāraṇī

हिन्दी अर्थ

वह मधुमयी सुधा कदम्बके कोटरमें उत्पन्न हुई थी, इसलिये कादम्बरी नामसे विख्यात हुई। वहाँ पूर्तिमती वारुणी प्रकट हुई थी, जो देवताओंके लिये अमृत पैदा करनेवाली है

अध्याय 96

श्लोक 14

कादम्बरीमदकलं विदित्वा कृष्णपूर्वजम् ।तिस्रस्त्रिदशनार्यस्तमुपतस्थुः प्रियंवदाः

kādambarīmadakalaṃ viditvā kṛṣṇapūrvajam | tisrastridaśanāryastamupatasthuḥ priyaṃvadāḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णके बड़े भाईको कादम्बरी (मधु या अमृत) -के नशेसे स्पष्ट बात बोलनेमें असमर्थ जान तीन प्रियवादिनी देवाज़नाएँ उनकी सेवामें उपस्थित हुईं

अध्याय 96

श्लोक 15

मदिरा रूपिणी भूत्वा कान्तिश्च शशिनः प्रिया ।श्रीश्च देवी वरिष्ठा स्त्री स्वयमेवाम्बुजध्वजा

madirā rūpiṇī bhūtvā kāntiśca śaśinaḥ priyā | śrīśca devī variṣṭhā strī svayamevāmbujadhvajā

श्लोक 15–16 का हिन्दी अर्थ

एक तो मादक मधु या अमृतकी अधिष्ठात्री देवी (जिन्हें वारुणी कहते हैं) मूर्तिमती होकर प्रकट हुईं। दूसरी चन्द्रमाकी प्रिय कान्ति (की अधि्ठात्री देवी ) थीं और तीसरी श्री देवी थीं, जो सर्वश्रेष्ठ स्त्री मानी जाती हैं, उनके ध्वजमें कमलका चिह्न है, वे देवी स्वयं ही हाथ जोड़े हुए रोहिणीनन्दन बलरामकी सेवामें उपस्थित हुई थीं। वारुणीके साथ उन्होंने मदविह्नल बलरामजीसे इस प्रकार कहा—

अध्याय 96

श्लोक 16

साञ्जलिप्रग्रहा देवी रौहिणेयमुपस्थिता ।वारुण्या सहितं वाक्यमुवाच मदविक्लवम्

sāñjalipragrahā devī rauhiṇeyamupasthitā | vāruṇyā sahitaṃ vākyamuvāca madaviklavam

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 96

श्लोक 17

बलं जयस्व दैत्यानां बलदेव दिवीश्वर ।अहं ते दयिता कान्ता वारुणी समुपस्थिता

balaṃ jayasva daityānāṃ baladeva divīśvara | ahaṃ te dayitā kāntā vāruṇī samupasthitā

हिन्दी अर्थ

पहले वारुणी बोली देवलोकेश्वर बलदेव ! आप दैत्योंकी सेनापर विजय प्राप्त करें । मैं आपकी प्राणवल्लभा वारुणी सेवामें उपस्थित हुई हूँ

अध्याय 96

श्लोक 18

त्वामेवान्तर्हितं श्रुत्वा शाश्वतं वडवामुखे ।क्षीणपुण्येव वसुधां पर्येमि विमलानन

tvāmevāntarhitaṃ śrutvā śāśvataṃ vaḍavāmukhe | kṣīṇapuṇyeva vasudhāṃ paryemi vimalānana

हिन्दी अर्थ

निर्मल मुखवाले देव! मैं आपको बड़वानलके प्रमीप पातालमें शेषरूपसे नित्य विराजमान जानती थी, केंतु इस समय भूतलमें अवतार लेनेके कारण वहाँसे अदृश्य हो गये हैं, ऐसा सुनकर मैं पुण्यहीना नारी-सी आपकी खोजमें सारी पृथ्वीपर भटक रही थी

अध्याय 96

श्लोक 19

पुष्पचक्रानुलिप्तेषु केसरेषूषितं मया ।अतिमुक्तेषु चाक्षोभ्य पुष्पस्तबकवत्सु च

puṣpacakrānulipteṣu kesareṣūṣitaṃ mayā | atimukteṣu cākṣobhya puṣpastabakavatsu ca

हिन्दी अर्थ

अजेय वीर ! मैंने पुष्पसमूहों से अनुलिस हुए केसरों में निवास किया है, फूलोंके गुच्छोंसे सुशोभित वासन्ती लताओंमें वास किया है

अध्याय 96

श्लोक 20

अहं कदम्बमालीना मेघकाले मुखप्रिया ।तृषितं मार्गमाणा त्वां स्वेन रूपेण छादिता

ahaṃ kadambamālīnā meghakāle mukhapriyā | tṛṣitaṃ mārgamāṇā tvāṃ svena rūpeṇa chāditā

हिन्दी अर्थ

मेरे लिये प्यासे हुए आपकी खोज करती हुई मैं अपने रूपको छिपाकर वर्षाकालमें कदम्ब वृक्षके भीतर लुक-छिपकर रहती आयी हूँ। मुझे आपके मुखका निवास ही विशेष प्रिय है

अध्याय 96

श्लोक 21

सास्मि पूर्णेन योगेन यथैवामृतमन्थने ।समीपं प्रेषिता पित्रा वरुणेन तवानघ

sāsmi pūrṇena yogena yathaivāmṛtamanthane | samīpaṃ preṣitā pitrā varuṇena tavānagha

श्लोक 21–22 का हिन्दी अर्थ

निष्पाप बलराम! जैसे पूर्वकालमें अमृत- मन्थनके समय पूर्णयोगसे युक्त होनेपर मेरे पिता वरुणने मुझे आपके समीप भेजा था, जैसे समुद्रमें और पातालमें मैं आपके पास रही हूँ, उसी प्रकार इस समय भी आपकी सेवामें उपस्थित हुई हूँ. और चाहती हूँ कि आपके द्वारा मेरा उपभोग हो; क्योंकि मेरे हदयने आपहीको अपना स्वामी माना है

अध्याय 96

श्लोक 22

सा यथैवार्णवगता तथैव वडवामुखे ।त्वयोपभोक्तुमिच्छामि सम्मतस्त्वं हि मे गुरुः

sā yathaivārṇavagatā tathaiva vaḍavāmukhe | tvayopabhoktumicchāmi sammatastvaṃ hi me guruḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 96

श्लोक 23

न त्वानन्तं परित्यक्ष्ये भर्त्सितापि त्वयानघ ।नाहं त्वया विना लोकानुत्सहे देव सेवितुम्

na tvānantaṃ parityakṣye bhartsitāpi tvayānagha | nāhaṃ tvayā vinā lokānutsahe deva sevitum

श्लोक 23–24 का हिन्दी अर्थ

अनघ ! आप मुझे डाँट बतायें तो भी मैं आप अनन्तका परित्याग नहीं करूँगी । देव! मैं समुद्रमें रहनेवालीके योग्य नीले रंगकी रेशमी साड़ी पहनकर आदिपदय तथा पद्मचिह्नित दिव्य कर्णभूषण धारण कर आपकी सेवामें आयी हूँ। आपके बिना मैं दूसरे किन्हीं लोकोंका सेवन करना नहीं चाहती

अध्याय 96

श्लोक 24

आदिपद्मं च पद्माङ्कं दिव्यं श्रवणभूषणम् ।कौशेयानि च नीलानि समुद्रार्हाणि बिभ्रती

ādipadmaṃ ca padmāṅkaṃ divyaṃ śravaṇabhūṣaṇam | kauśeyāni ca nīlāni samudrārhāṇi bibhratī

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 96

श्लोक 25

मदिरानन्तरं कान्तिः सङ्कर्षणमुपस्थिता ।मदेनागलितश्रोणी किञ्चिदाघूणितेक्षणा

madirānantaraṃ kāntiḥ saṅkarṣaṇamupasthitā | madenāgalitaśroṇī kiñcidāghūṇitekṣaṇā

श्लोक 25–26 का हिन्दी अर्थ

वारुणीके बाद कान्तिदेवी संकर्षणकी सेवामें उपस्थित हुई । उसका करटिप्रदेश मदसे कुछ कम्पित हो रहा था। आँखें भी कुछ भूम रही थीं। उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा-'जय हो बलरामजीकी ।' फिर प्रेमसे मुसकराती हुई वह प्रयोजनयुक्त त्चन बोली—

अध्याय 96

श्लोक 26

प्रोवाच प्रणयात् कान्तिर्बद्धाञ्जलिपुटा सती ।जयपूर्वेण योगेन सस्मितं वाक्यमर्थवत्

provāca praṇayāt kāntirbaddhāñjalipuṭā satī | jayapūrveṇa yogena sasmitaṃ vākyamarthavat

अर्थ श्लोक 25 के साथ

अध्याय 96

श्लोक 27

अहं चन्द्रादपि गुरुं सहस्रशिरसं प्रभुम् ।स्वैर्गुणैरनुरक्ता त्वां यथैव मदिरा तथा

ahaṃ candrādapi guruṃ sahasraśirasaṃ prabhum | svairguṇairanuraktā tvāṃ yathaiva madirā tathā

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! आपके सहसों मस्तक हैं। आप जगत्‌के स्वामी हैं। मेरी दृष्टिमें आपका गौरव चन्द्रमासे भी अधिक है। मैं भी वारुणीकी भाँति आपके निजी गुणोंसे आकृष्ट हो आपमें अनुरक्त हो गयी हूँ (इसीलिये आपकी सेवामें उपस्थित हूँ। आप मुझे अज्ञीकार करें) '

अध्याय 96

श्लोक 28

श्रीश्च पद्मालया देवी निधेया वैष्णवोरसि ।रौहिणेयोरसि शुभा मालेवामलतां गता

śrīśca padmālayā devī nidheyā vaiṣṇavorasi | rauhiṇeyorasi śubhā mālevāmalatāṃ gatā

श्लोक 28–29 का हिन्दी अर्थ

जो भगवान्‌ विष्णुके वक्ष:स्थलमें नित्य निवास करनेयोग्य हैं, वे कमलवनमें वास करनेवाली देवी श्री* (शोभा) रोहिणीनन्दन बलरामके वक्ष:स्थलमें पुन्दर मालाकी भाँति प्रतिष्ठित हो निर्मल भावको प्राप्त हुईं । उनका मुख कमलके समान सुशोभित था, उनके हाथमें भी कमल-पुष्प शोभा दे रहा था; वस्त्राभूषणों से पुसच्जित हुई वे मूर्तिमती शोभा देवी बलरामके वक्षमें स्थित हो एक निर्मल माला हाथमें लेकर संकर्षणसे बोलीं—

अध्याय 96

श्लोक 29

सा मालाममलां गृह्य बलस्योरसि दंशिता ।पद्मास्या पद्महस्ता वै सङ्कर्षणमथाब्रवीत्

sā mālāmamalāṃ gṛhya balasyorasi daṃśitā | padmāsyā padmahastā vai saṅkarṣaṇamathābravīt

अर्थ श्लोक 28 के साथ

अध्याय 96

श्लोक 30

राम रामाभिरामस्त्वं वारुण्या समलङ्कृतः ।कान्त्या मया च देवेश सङ्गतश्चन्द्रमा यथा

rāma rāmābhirāmastvaṃ vāruṇyā samalaṅkṛtaḥ | kāntyā mayā ca deveśa saṅgataścandramā yathā

हिन्दी अर्थ

देवेश्वर राम! बलराम! आप बड़े ही अभिराम (सुन्दर) हैं । वारुणी (सुधा) -से, चन्द्रमाकी - पी कान्तिसे तथा मुझसे (कमलालयाकी-सी शोभासे) पम्पन्न होकर चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहे हैं '

अध्याय 96

श्लोक 31

इयं च सा मया मौलिः प्रोद्धता वरुणालयात् ।मूर्ध्नि शीर्षसहस्रस्य या ते भानुरिवाबभौ

iyaṃ ca sā mayā mauliḥ proddhatā varuṇālayāt | mūrdhni śīrṣasahasrasya yā te bhānurivābabhau

हिन्दी अर्थ

वती लक्ष्मी तो भगवान्‌ विष्णुकी अनन्यानुरागिणी पतित्रता पत्नी मधिष्ठात्री देवियों का ही उल्लेख किया है-ऐसा समझना चाहिये। जो सूर्यके समान उद्धासित होता था, वह मुकुट समुद्रसे निकालकर मैं यहाँ ले आयी हूँ। यही है वह मुकुट

अध्याय 96

श्लोक 32

जातरूपमयं चैकं कुण्डलं वज्रभूषितम् ।आदिपद्मं च पद्माक्षं दिव्यश्रवणभूषणम्

jātarūpamayaṃ caikaṃ kuṇḍalaṃ vajrabhūṣitam | ādipadmaṃ ca padmākṣaṃ divyaśravaṇabhūṣaṇam

हिन्दी अर्थ

इसके सिवा वज्रमणि (हीरे )-से विभूषित एक सुवर्णमय कुण्डल भी लेती आयी हूँ, जो आपके एक कानका दिव्य भूषण है। यह आदिपद्य और पद्माक्ष कहलाता है

अध्याय 96

श्लोक 33

कौशेयानि च नीलानि समुद्रार्हाणि भावतः ।हारं च पीनतरलं समुद्राभ्यन्तरोऽषितम्

kauśeyāni ca nīlāni samudrārhāṇi bhāvataḥ | hāraṃ ca pīnataralaṃ samudrābhyantaro'ṣitam

हिन्दी अर्थ

जो समुद्रमें ही मिल सकते हैं, ऐसे कितने ही नीले रंगके रेशमी वस्त्र (अथवा आपकी इच्छाके अनुरूप नील कौशेय वस्त्र) तथा यह पीन तरल हार, जो समुद्रमें ही विद्यमान था, मैं आपके लिये लायी हूँ। आप इसे सादर ग्रहण करें

अध्याय 96

श्लोक 34

देवेमां प्रतिगृह्णीष्व पौराणी भूषणक्रियाम् ।समयस्ते महाबाहो भूषणानामलङ्क्रिया

devemāṃ pratigṛhṇīṣva paurāṇī bhūṣaṇakriyām | samayaste mahābāho bhūṣaṇānāmalaṅkriyā

हिन्दी अर्थ

देव! यह सब आपकी पुरातन भूषण-सामग्री है। इसे ग्रहण कीजिये। महाबाहो! यह आपके भूषण ग्रहण करनेका समय है। आपसे ही इन भूषणोंकी शोभा है, इनसे आपकी नहीं '

अध्याय 96

श्लोक 35

सङ्गृह्य तमलङ्कारं ताश्च तिस्रः सुरस्त्रियः ।शुशुभे बलदेवो हि शारदेन्दुसमप्रभः

saṅgṛhya tamalaṅkāraṃ tāśca tisraḥ surastriyaḥ | śuśubhe baladevo hi śāradendusamaprabhaḥ

हिन्दी अर्थ

वह अलड्लार तथा उन तीनों देवाज्नाओंको ग्रहण करके बलदेवजी शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाने लगे

अध्याय 96

श्लोक 36

स समागम्य कृष्णेन जलजाम्भोदवर्चसा ।मुदं परमिकां लेभे ग्रहयुक्तः शशी यथा

sa samāgamya kṛṣṇena jalajāmbhodavarcasā | mudaṃ paramikāṃ lebhe grahayuktaḥ śaśī yathā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वे नील कमल और मेघके समान श्याम कान्तिवाले श्रीकृष्णके साथ मिलकर ग्रहयुक्त चन्द्रमाके समान सुशोभित होने लगे। उस समय उनको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई

अध्याय 96

श्लोक 37

ताभ्यामुभाभ्यां संलापे वर्तमाने गृहे यथा ।वैनतेयस्ततोऽध्वानमतिचक्राम वेगतः

tābhyāmubhābhyāṃ saṃlāpe vartamāne gṛhe yathā | vainateyastato'dhvānamaticakrāma vegataḥ

हिन्दी अर्थ

वे दोनों भाई जैसे घरमें बैठे हों, उस प्रकार बातचीत करने लगे। इसी समय विनतानन्दन गरुड़ बड़े वेगसे विशाल मार्ग तै करके वहाँ आये

अध्याय 96

श्लोक 38

सङ्ग्राममुक्तस्तेजस्वी दैत्यप्रहरणाङ्कितः ।देवतानां जयश्लाघी दिव्यस्रगनुलेपनः

saṅgrāmamuktastejasvī daityapraharaṇāṅkitaḥ | devatānāṃ jayaślāghī divyasraganulepanaḥ

हिन्दी अर्थ

तेजस्वी गरुड़ उस समय एक संग्रामसे छूटकर आये थे। दैत्योंके प्रहारोंके चिह्न उस समय भी उनके अआज्लोंगें अड्ित थे। वे देवताओंकी विजय चाहनेवाले तथा दिव्य पुष्पोंकी माला और दिव्य चन्दन धारण करनेवाले थे

अध्याय 96

श्लोक 39

सुप्तस्य शयने दिव्ये क्षीरोदे वरुणालये ।विष्णोः किरीटं दैत्येन हृतं वैरोचनेन वै

suptasya śayane divye kṣīrode varuṇālaye | viṣṇoḥ kirīṭaṃ daityena hṛtaṃ vairocanena vai

हिन्दी अर्थ

वरुणके निवासभूत क्षीरसमुद्रमें जब भगवान्‌ विष्णु दिव्य शय्यापर सो रहे थे, उस समय विरोचनके पुत्र एक दैत्यने उनका किरीट चुरा लिया

अध्याय 96

श्लोक 40

तदर्थस्तेन सङ्ग्रामः कृतो गुर्वर्थमोजसा ।किरीटार्थे समुद्रस्य मध्ये दैत्यगणैः सह

tadarthastena saṅgrāmaḥ kṛto gurvarthamojasā | kirīṭārthe samudrasya madhye daityagaṇaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

अपने गुरुरूप भगवान्‌के लिये उस किरीटको वापस लानेके उद्देश्यसे गरुड़ने बीच समुद्रमें दैत्योंके साथ बलपूर्वक संग्राम किया

अध्याय 96

श्लोक 41

मोक्षयित्वा किरीटं तु वैष्णवं पततां वरः ।व्यत्यक्रमत वेगेन गगनं देवतालयम्

mokṣayitvā kirīṭaṃ tu vaiṣṇavaṃ patatāṃ varaḥ | vyatyakramata vegena gaganaṃ devatālayam

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ विष्णुके उस किरीटको दैत्योंके हाथसे छुड़ाकर पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ बड़े वेगसे देवताओंके निवासभूत आकाशमें उड़ चले

अध्याय 96

श्लोक 42

स ददर्श गुरुं शैले विष्णुं कार्यान्तरागतम् ।तेन क्रीडावलम्बेन किरीटेन विराजता

sa dadarśa guruṃ śaile viṣṇuṃ kāryāntarāgatam | tena krīḍāvalambena kirīṭena virājatā

हिन्दी अर्थ

उन्होंने देखा, मेरे स्वामी विष्णु दूसरे कार्यसे इस पर्वतपर पधारे हैं। वे उस समय उस प्रकाशमान किरीटको क्रीडापूर्वक अपनी चोंचमें लटकाये चल रहे थे

अध्याय 96

श्लोक 43

स दृष्ट्वा मानुषं विष्णुं शैलराजशिरोगतम् ।प्रकाशचेष्टानिर्मुक्तं विमौलिमिव मानुषम्

sa dṛṣṭvā mānuṣaṃ viṣṇuṃ śailarājaśirogatam | prakāśaceṣṭānirmuktaṃ vimaulimiva mānuṣam

श्लोक 43–44 का हिन्दी अर्थ

गिरिराज गोमन्तके शिखरपर विराजमान मानवरूपधारी विष्णुको प्रकाश और चेष्टाओंसे रहित तथा मुकुटहीन देख उनके मानसिक भावों को समझनेवाले पक्षियों में श्रेष्ठ गरुड़ने आकाशमें स्थित होकर बड़े हर्षके साथ उन श्रीविष्णुके सिरपर वह मुकुट डाल दिया

अध्याय 96

श्लोक 44

अभिज्ञस्तस्य भावानां गरुत्मान् पततां वरः ।चिक्षेप खं गतो मौलिं विष्णोः शिरसि हृष्टवत्

abhijñastasya bhāvānāṃ garutmān patatāṃ varaḥ | cikṣepa khaṃ gato mauliṃ viṣṇoḥ śirasi hṛṣṭavat

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 96

श्लोक 45

उपेन्द्रमूर्ध्नि सा मौलिरपिनद्धा इवापतत् ।शिरसः स्थाननिर्युक्ता कृष्णं चैवान्वशोभयत् ।यथैव मेरुशिखरे भानुर्मध्यन्दिने यथा

upendramūrdhni sā maulirapinaddhā ivāpatat | śirasaḥ sthānaniryuktā kṛṣṇaṃ caivānvaśobhayat | yathaiva meruśikhare bhānurmadhyandine yathā

हिन्दी अर्थ

वह मुकुट श्रीकृष्णके मस्तकपर गिरा और इस प्रकार बैठ गया मानो किसीने पहना दिया हो। मस्तकके स्थानपर निश्चितरूपसे आबद्ध होकर उस मुकुटने भगवान्‌ श्रीकृष्णकी शोभा बढ़ा दी। जैसे दोपहरके समय मेरुके शिखरपर सूर्यदेव प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार वह मुकुट भी देदीप्यमान हो रहा था

अध्याय 96

श्लोक 46

वैनतेयप्रयोगेण विदित्वा मौलिमागताम् ।कृष्णः प्रहृष्टवदनो रामं वचनमब्रवीत्

vainateyaprayogeṇa viditvā maulimāgatām | kṛṣṇaḥ prahṛṣṭavadano rāmaṃ vacanamabravīt

हिन्दी अर्थ

गरुड़के प्रयोगसे मपुकुटको मस्तकपर आया हुआ जान श्रीकृष्णका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और वे बलरामजीसे इस प्रकार बोले-

अध्याय 96

श्लोक 47

त्वरते खलु कार्यार्थो देवतानां न संशयः ।यथेयमावयोः शैले सङ्ग्रामरचना कृता

tvarate khalu kāryārtho devatānāṃ na saṃśayaḥ | yatheyamāvayoḥ śaile saṅgrāmaracanā kṛtā

हिन्दी अर्थ

भैया ! इस पर्वतपर हम दोनोंके लिये जिस प्रकार युद्धोपयोगी वेष-भूषाकी रचना कर दी गयी है, इससे यही अनुमान होता है कि देवताओंका कार्य एवं प्रयोजन शीघ्र ही सिद्ध होना चाहता है, इसमें संशय नहीं है

अध्याय 96

श्लोक 48

वैरोचनेन lद्क़्‍सुप्तस्यrद्क़्‍ मम मौलिर्महोदधौ ।शक्रस्य सदृशं रूपं दिव्यमास्थाय सागरात्

vairocanena ldq‍suptasyardq‍ mama maulirmahodadhau | śakrasya sadṛśaṃ rūpaṃ divyamāsthāya sāgarāt

श्लोक 48–49 का हिन्दी अर्थ

जब मैं महासागरमें सो रहा था, उस समय विरोचनका पुत्र इन्द्रका-सा रूप धारण करके वहाँ चला गया और जब मैं शेष-शय्यासे उठकर यहाँ आ गया, तब वह ग्राहरूप धारण करके वहाँसे मेरा मुकुट उठा लाया। वही मुकुट गरुड़ उससे छीन लाये हैं और उन्होंने इसे मेरे मस्तकपर रख दिया है

अध्याय 96

श्लोक 49

ग्राहरूपेण यो नीत आनीतोऽसौ गरुत्मता ।ममाहिशयनान्मौलिर्हृत्वा क्षिप्तो गरुत्मता

grāharūpeṇa yo nīta ānīto'sau garutmatā | mamāhiśayanānmaulirhṛtvā kṣipto garutmatā

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 96

श्लोक 50

सुव्यक्तं सन्निकृष्टः स जरासन्धो नराधिपः ।लक्ष्यन्ते हि ध्वजाग्राणि रथानां वातरंहसाम्

suvyaktaṃ sannikṛṣṭaḥ sa jarāsandho narādhipaḥ | lakṣyante hi dhvajāgrāṇi rathānāṃ vātaraṃhasām

हिन्दी अर्थ

निश्चय ही राजा जरासंध अब बहुत निकट आ गया है; क्योंकि वायुके समान वेगवाले रथोंकी ध्वजाओंके अग्रभाग दिखायी दे रहे हैं

अध्याय 96

श्लोक 51

एतानि विजिगीषूणां शशिकल्पानि भूभृताम् ।छत्राण्यार्य विराजन्ते दंशितानि मितानि च

etāni vijigīṣūṇāṃ śaśikalpāni bhūbhṛtām | chatrāṇyārya virājante daṃśitāni mitāni ca

हिन्दी अर्थ

आर्य! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले राजाओंके ये चन्द्रमा-जैसे श्वेत कान्तिवाले सुसज्जित छत्र प्रकाशित हो रहे हैं; इनकी संख्या परिमित ही है

अध्याय 96

श्लोक 52

अहो नृपरथोदग्रा विमलाश्छत्रपङ्क्तयः ।अभिवर्तन्ति नः शुभ्रा यथा खे हंसपङ्क्तयः

aho nṛparathodagrā vimalāśchatrapaṅktayaḥ | abhivartanti naḥ śubhrā yathā khe haṃsapaṅktayaḥ

हिन्दी अर्थ

अहो ! राजाओंके रथों पर विराजमान जो ये श्वेत वर्णवाली ऊँची छत्र-पड़क्तियाँ हमलोगोंकी ओर बढ़ी आ रही हैं, थे आकाशमें उज्ज्वल हंसपर्डक्तियोंके समान सुशोभित होती हैं

अध्याय 96

श्लोक 53

अहो द्यौर्विमलाभानां शस्त्राणां विमलानना ।प्रभा भास्करभामिश्रा चरन्तीव दिशो दृश

aho dyaurvimalābhānāṃ śastrāṇāṃ vimalānanā | prabhā bhāskarabhāmiśrā carantīva diśo dṛśa

हिन्दी अर्थ

अहो! इन निर्मल प्रभावाले शस्त्रोंकी चमकसे आकाशका मुख भी उज्वल एवं प्रकाशित हो उठा है। शस्त्रोंकी ये दीपतियाँ सूर्यदेवकी किरणोंसे मिलकर दसों दिशाओंमें विचरती-सी प्रतीत होती हैं

अध्याय 96

श्लोक 54

एतानि नूनं समरे पार्थिवैरायुधानि च ।क्षिप्तानि विनशिष्यन्ति मयि सर्वाणि संयुगे

etāni nūnaṃ samare pārthivairāyudhāni ca | kṣiptāni vinaśiṣyanti mayi sarvāṇi saṃyuge

हिन्दी अर्थ

निश्चय ही समराज़णमें भूमिपालॉंद्वारा मुझपर चलाये गये ये पमस्त अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो जायूँगे

अध्याय 96

श्लोक 55

काले खलु नृपः प्राप्तो जरासन्धो महीपतिः ।आवयोर्युद्धनिकषः प्रथमः समरातिथिः

kāle khalu nṛpaḥ prāpto jarāsandho mahīpatiḥ | āvayoryuddhanikaṣaḥ prathamaḥ samarātithiḥ

हिन्दी अर्थ

राजा जरासंध ठीक समयपर आया है । यह हमलोगोंके युद्ध-कौशलकी क्रसौटी है तथा समराड्णका पहला अतिथि है

English

Thereupon, O Janamejaya, in that battle-field there flew a river of blood like a stream filled with water in the rainy season. It took its rise from the mountain Govinda and its water was the blood of the Asuras. The hairs were the mosses and creepers. The wheels were the tortoises and the cars were the whirlpools. It was beautified with rocks of elephants and covered with trees of flags. The cries constituted the noise of the flowing stream—and the foams of blood were the bubbles. The swords were the fishes. And it assailed the heart of the coward (10–12). Beholding all his comrades slain and the enemies increase in power, Nikumbha, by virtue of his own energy, all on a sudden leaped up. O descendant of Bharata, there Jayanta and Pravara, with arrows resembling thunder-bolts, obstructed Nikumbha irrepressible in fight. Desisting and biting his own lips the wicked Nikumbha struck Pravara with his Parigha who fell down on earth. As soon as he fell down Indra's son held him up and embraced him with his arms. Knowing him alive he at once let him off and ran towards the Asura. Nearing Nikumbha Jayanta struck him with a Nishtringsha and the Daitya too struck him with a Parigha (13–17). In the very next moment Indra's son wounded Nikumbha's person with numerous shafts. Thus wounded in that dreadful battle the great Asura thought:—"I shall fight in the battle-field with my enemy Krishna who has killed my kinsmen. Why do I make myself exhausted by fightlng with Indra's son"

अध्याय 96

श्लोक 56

आर्य तिष्ठाव सहितौ न खल्वानागते नृपे ।युद्धारम्भः प्रयोक्तव्यो बलं तावद् विमृश्यताम्

ārya tiṣṭhāva sahitau na khalvānāgate nṛpe | yuddhārambhaḥ prayoktavyo balaṃ tāvad vimṛśyatām

हिन्दी अर्थ

आर्य! हम दोनों साथ रहें । राजा जरासंधके आनेसे पहले अभी हमें युद्ध आरम्भ नहीं करना चाहिये। जबतक वह नहीं आता है, तबतक हम उसके बलका विचार कर लें

अध्याय 96

श्लोक 57

एवमुक्त्वा ततः कृष्णः स्वस्थः सङ्ग्रामलालसः ।जरासन्धवधं प्रेप्सुश्चकार बलदर्शनम्

evamuktvā tataḥ kṛṣṇaḥ svasthaḥ saṅgrāmalālasaḥ | jarāsandhavadhaṃ prepsuścakāra baladarśanam

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर श्रीकृष्ण स्वस्थभावसे संग्रामकी इच्छा रखकर जरासंधका वध चाहते हुए उसके सैनिक-बलका निरीक्षण करने लगे

अध्याय 96

श्लोक 58

वीक्षमाणश्च तान्सर्वान् नृपान् यदुवरोऽव्ययः ।आत्मानमात्मनोवाच यत्पूर्वं दिवि मन्त्रितम्

vīkṣamāṇaśca tānsarvān nṛpān yaduvaro'vyayaḥ | ātmānamātmanovāca yatpūrvaṃ divi mantritam

श्लोक 58–59 का हिन्दी अर्थ

उन सब राजाओका निरीक्षण करते हुए अविनाशी यदुकुलतिलक भगवान्‌ श्रीकृष्ण स्वयं ही अपने-आपसे कहने लगे—मन्त्रणा की गयी थी, उसके अनुसार ये भूमिपाल राजोचित्त मार्गपर स्थित हैं । ये शास्त्रोक्त विधिसे संग्राममें विनाशको प्राप्त होंगे

अध्याय 96

श्लोक 59

इमे ते पृथिवीपालाः पार्थिवे वर्त्मनि स्थिताः ।ये विनाशं गमिष्यन्ति शास्त्रदृष्टेन कर्मणा

ime te pṛthivīpālāḥ pārthive vartmani sthitāḥ | ye vināśaṃ gamiṣyanti śāstradṛṣṭena karmaṇā

अर्थ श्लोक 58 के साथ

अध्याय 96

श्लोक 60

प्रोक्षितान्खल्विमान् मन्ये मृत्युना नृपसत्तमान् ।स्वर्गगामीनि चाप्येषां वपुंषि प्रचकाशिरे

prokṣitānkhalvimān manye mṛtyunā nṛpasattamān | svargagāmīni cāpyeṣāṃ vapuṃṣi pracakāśire

हिन्दी अर्थ

मैं तो समझता हूँ कि मृत्युने रणयज्ञमें आहुति देनेके लिये इन श्रेष्ठ राजाओंका प्रोक्षण कर लिया है। इनके स्वर्गगामी शरीर अभीसे प्रकाशित हो रहे हैं

अध्याय 96

श्लोक 61

स्थाने भारपरिश्रान्ता वसुधेयं दिवं गता ।एषां नृपतिसिंहानां बलौघैरभिपीडिता

sthāne bhārapariśrāntā vasudheyaṃ divaṃ gatā | eṣāṃ nṛpatisiṃhānāṃ balaughairabhipīḍitā

हिन्दी अर्थ

यह पृथ्वी इन राजसिंहोंके सैन्यसमूहोंसे पीड़ित हो इनके भारसे थककर जो देवलोकमें गयी थी, वह इसका जाना उचित ही था

अध्याय 96

श्लोक 62

अल्पेन खलु कालेन विविक्तं पृथिवीतलम् ।भविष्यति नरेन्द्रौघैराकीर्णं च नभस्तलम्

alpena khalu kālena viviktaṃ pṛthivītalam | bhaviṣyati narendraughairākīrṇaṃ ca nabhastalam

हिन्दी अर्थ

अब थोड़े ही समयमें यह भूमण्डल इन राजसमूहोंसे खाली हो जायगा और आकाश भर जायगा'

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.