Harivamsha Purana
314
अध्याय 314 / 318

Parva 3, Adhyāya 131

12 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ12 श्लोक

अध्याय 314

श्लोक 1

द्वारकां गच्छन्तं श्रीकृष्णस्य पुष्करे ऋषिभ्यः समागमं, ऋषिभिः तस्य स्तवनं गच्छन्नथ महाविप्णुः पुष्करं प्राप्य यादवैः ।अपश्यन्मुनिमुख्यांस्तु पुस्करस्थान् नृपोत्तम

dvārakāṃ gacchantaṃ śrīkṛṣṇasya puṣkare ṛṣibhyaḥ samāgamaṃ, ṛṣibhiḥ tasya stavanaṃ gacchannatha mahāvipṇuḥ puṣkaraṃ prāpya yādavaiḥ | apaśyanmunimukhyāṃstu puskarasthān nṛpottama

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! वहाँसे जाते हुए महाविष्णुस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्णने यादवोंके साथ पुष्करमें पहुँचकर वहाँ रहनेवाले श्रेष्ठ मुनियोंका दर्शन किया

अध्याय 314

श्लोक 2

ते समेत्य महादेवमृषयो वीतमत्सराः ।अर्घ्यादिसमुदाचारं कृत्वैनं यादवोत्तमम्

te sametya mahādevamṛṣayo vītamatsarāḥ | arghyādisamudācāraṃ kṛtvainaṃ yādavottamam

श्लोक 2–9 का हिन्दी अर्थ

उन मात्सर्यरहित ऋषियोंने इन यदुकुल-तिलक महान्‌ देव श्रीकृष्णसे मिलकर उन्हें अर्ध्य आदि निवेदन करनेके पश्चात्‌ भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी जगदी धर श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा—' विष्णो! जनार्दन ! आपका यह बल-पराक्रम अत्यन्त अद्भुत है, जिससे आपने युद्धमें हंस और डिम्भकको मार डाला। ' देव! जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुःसह था। उस दुर्जय वीर विचक्रको भी आपने युद्धस्थलमें मार डाला! उसे पराजित करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था। ऐसा हमारा विश्वास है'। ' अब उत्तम तपका आचरण करनेवाले हमलोगोंके सभी कार्योंमें क्षेम सुलभ हो गया । हरे ! हम आपके स्मरणसे सर्वथा निष्पाप हो जायेँगे। 'जो सदा आपका ध्यान करते हैं, उनके सभी दुःखोंको आप हर लेते हैं । प्रभो ! आपका बारम्बार चिन्तन प्राणिमात्रके लिये सदा पुण्य प्रदान करनेवाला है'। 'हरे! आप ही सदा हमारी तपस्याके धारण-पोषण करनेवाले हैं । आप ही ओंकार हैं । आप ही वषट्कार हैं । आप ही यज्ञ हैं और आप ही पितामह हैं । * आप ही ज्योति हैं। आप ही ब्रह्ममूर्ति हैं । आप ही ब्रह्मा और रुद्र हैं। आप ही सम्पूर्ण भूतोंके प्राण हैं । आप ही अन्तरात्मा कहलाते हैं। जगत्पते! यज्ञों और दानोंद्वारा समस्त प्राणियोंके लिये उपासना करने योग्य आप ही हैं '

अध्याय 314

श्लोक 3

प्रोचुर्विश्वेश्वरं विष्णुं भूतभव्यभवत्प्रभुम् ।अत्यद्भुतमिदं विष्णो तव वीर्यं जनार्दन

procurviśveśvaraṃ viṣṇuṃ bhūtabhavyabhavatprabhum | atyadbhutamidaṃ viṣṇo tava vīryaṃ janārdana

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 314

श्लोक 4

येन तौ निहतौ युद्धे हंसो डिम्भक एव च ।यो विचक्रो दुराधर्षो देवैरपि सुदुःसहः

yena tau nihatau yuddhe haṃso ḍimbhaka eva ca | yo vicakro durādharṣo devairapi suduḥsahaḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 314

श्लोक 5

सङ्गरे निहतो देव दुःसाध्य इति नो मतिः ।क्षेमो नः सर्वकार्येषु चरतां तप उत्तमम्

saṅgare nihato deva duḥsādhya iti no matiḥ | kṣemo naḥ sarvakāryeṣu caratāṃ tapa uttamam

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 314

श्लोक 6

निष्कल्मषा भविष्यामस्तव संस्मरणाद्धरे ।त्वं हि सर्वस्य दुःखस्य हर्ता त्वां ध्यायतां सदा

niṣkalmaṣā bhaviṣyāmastava saṃsmaraṇāddhare | tvaṃ hi sarvasya duḥkhasya hartā tvāṃ dhyāyatāṃ sadā

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 314

श्लोक 7

त्वदनुस्मरणं जन्तोः सदा पुण्यप्रदं प्रभो ।त्वं हि नः सततं धाता विधाता तपसो हरे

tvadanusmaraṇaṃ jantoḥ sadā puṇyapradaṃ prabho | tvaṃ hi naḥ satataṃ dhātā vidhātā tapaso hare

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 314

श्लोक 8

त्वमोङ्कारो वषट्कारस्त्वं यज्ञस्त्वं पितामहः ।त्वं ज्योतिर्ब्रह्मणो मूर्तित्वं ब्रह्मा रुद्र एव च

tvamoṅkāro vaṣaṭkārastvaṃ yajñastvaṃ pitāmahaḥ | tvaṃ jyotirbrahmaṇo mūrtitvaṃ brahmā rudra eva ca

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 314

श्लोक 9

प्राणस्त्वं सर्वभूतानामन्तरात्मेति कथ्यते ।उपास्यः सर्वभूतानां यज्ञैर्दानैर्जगत्पते

prāṇastvaṃ sarvabhūtānāmantarātmeti kathyate | upāsyaḥ sarvabhūtānāṃ yajñairdānairjagatpate

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 314

श्लोक 10

नमो विश्वसृजे देव नमस्ते विश्वमूर्तये ।पाहि लोकमिमं देव हत्वा ब्रह्मद्विषः सदा

namo viśvasṛje deva namaste viśvamūrtaye | pāhi lokamimaṃ deva hatvā brahmadviṣaḥ sadā

हिन्दी अर्थ

देव! आप विश्वकी सृष्टि करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है । सम्पूर्ण विश्व आपकी मूर्ति है, आपको नमस्कार है। देव! आप ब्रहमद्रोहियोंका वध करके सदा इस विश्वका पालन कीजिये'

अध्याय 314

श्लोक 11

स तथेति हरिर्विष्णुर्ययौ द्वारवतीं पुरीम् ।अवसद्वृष्णिभिः सार्ध स्तूयमानः समागधैः

sa tatheti harirviṣṇuryayau dvāravatīṃ purīm | avasadvṛṣṇibhiḥ sārdha stūyamānaḥ samāgadhaiḥ

हिन्दी अर्थ

तब * बहुत अच्छा कहकर श्रीविष्णु हरि द्वारकापुरीको गये और मागधोंसे अपनी स्तुति सुनते हुए वृष्णिवंशियोंकि साथ वहाँ निवास करने लगे

अध्याय 314

श्लोक 12

इयं च देवदेवस्य चेष्टा हि जनमेजय ।प्रोक्ता ते पृच्छते राजन्किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि

iyaṃ ca devadevasya ceṣṭā hi janamejaya | proktā te pṛcchate rājankimanyacchrotumicchasi

हिन्दी अर्थ

राजा जनमेजय ! तुम्हारे पूछनेपर मैंने देवाधिदेव श्रीकृष्णकी यह लीला तुम्हें बतायी है। तुम और क्या सुनना चाहते हो ?

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.