Harivamsha Purana
313
अध्याय 313 / 318

Parva 3, Adhyāya 130

20 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ20 श्लोक

अध्याय 313

श्लोक 1

गोपगोपीभिःसहितेन यशोदानन्दयोः गोवर्धनपर्वते आगत्वा श्रीकृष्णबलभद्राभ्यां समागमम् ।यशोदा नन्दगोपश्च कृष्णदर्शनलालसौ ।गोवर्धनगतं श्रुत्वा वासुदेवं सहाग्रजम्

gopagopībhiḥsahitena yaśodānandayoḥ govardhanaparvate āgatvā śrīkṛṣṇabalabhadrābhyāṃ samāgamam | yaśodā nandagopaśca kṛṣṇadarśanalālasau | govardhanagataṃ śrutvā vāsudevaṃ sahāgrajam

श्लोक 1–3 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय ! यशोदा और नन्दगोपके मनमें श्रीकृष्णको देखनेके लिये बड़ी लालसा थी। जब उन्होंने सुना कि श्रीकृष्ण अपने बड़े भाईके साथ गोवर्धन पर्वतपर आये हैं, तब वे दोनों सहसा बड़े प्रसन्न हुए और मक्खन, दही, खीर, खिचड़ी, जंगली फूल तथा मोरपंखके बाजूबंद लेकर सब ओरसे एकत्र हुए दूसरे गोपों और गोपियोंके साथ गोवर्धन पर्वतपर गये

अध्याय 313

श्लोक 2

नवनीतं च दधि च पायसं कृसरं तथा ।वन्यं पुष्पं महाराज मयूराङ्गदमेव च

navanītaṃ ca dadhi ca pāyasaṃ kṛsaraṃ tathā | vanyaṃ puṣpaṃ mahārāja mayūrāṅgadameva ca

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 313

श्लोक 3

बल्लवैरपरैः सार्धं गोपिभिश्च समन्ततः ।जग्मतुः सहसा प्रीतौ गोवर्धनमथो नृप

ballavairaparaiḥ sārdhaṃ gopibhiśca samantataḥ | jagmatuḥ sahasā prītau govardhanamatho nṛpa

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 313

श्लोक 4

क्वचिद् वृक्षे समासक्तं कृष्णं कृष्णमृगेक्षणम् ।ददर्शतुर्महाबाहुं वासुदेवं सहाग्रजम्

kvacid vṛkṣe samāsaktaṃ kṛṣṇaṃ kṛṣṇamṛgekṣaṇam | dadarśaturmahābāhuṃ vāsudevaṃ sahāgrajam

हिन्दी अर्थ

वहाँ उन्होंने कृष्णमृगके समान विशाल नेत्रवाले वसुदेवनन्दन महाबाहु श्रीकृष्णको अपने बड़े भाईके साथ कहीं वृक्षके नीचे उससे सटकर बैठे देखा

अध्याय 313

श्लोक 5

प्रणेमतुः सुसंहृष्टौ तत्र दृष्ट्वा महाबलौ ।दर्शयामासतुर्देवौ पायसानि महान्ति च

praṇematuḥ susaṃhṛṣṭau tatra dṛṣṭvā mahābalau | darśayāmāsaturdevau pāyasāni mahānti ca

हिन्दी अर्थ

उन्हें देखकर नन्द और यशोदा बड़े प्रसन्न हुए, फिर उन महाबली देवता श्रीकृष्ण-बलदेवने नन्द और यशोदाकों प्रणाम किया। इसके बाद यशोदा और नन्दने खीर आदि महत्त्वपूर्ण उपहार उनके सामने प्रस्तुत किया

अध्याय 313

श्लोक 6

तात मातर्व्रजे गोष्ठे कुशलं वा स्वगोधनम् ।अपि गावः क्षीरवत्यो वत्सा वत्सतराः पितः

tāta mātarvraje goṣṭhe kuśalaṃ vā svagodhanam | api gāvaḥ kṣīravatyo vatsā vatsatarāḥ pitaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय श्रीकृष्णने पूछा—' बाबा! मैया! ब्रजके गोष्ठमें अपने सभी गोधन सकुशल तो हैं न? पिताजी! गौएँ दूध देती हैं न ? उनके बड़े-छोटे बछड़े सुखी हैं न?'

अध्याय 313

श्लोक 7

अपि वा सुशुभं क्षीरमपि गावः सुशोभनाः ।अपि वा दारका मातर्वत्सपालाः पिबन्ति च

api vā suśubhaṃ kṣīramapi gāvaḥ suśobhanāḥ | api vā dārakā mātarvatsapālāḥ pibanti ca

हिन्दी अर्थ

क्या ब्रजकी गौओंका दूध शुद्ध एवं मड़लकारी होता है ? क्या अपने यहाँ सुन्दर शोभामयी गौएँ हैं? मैया! छोटे-छोटे बच्चे और बछड़े चरानेवाले बालक भरपूर दूध पीते हैं न ?

अध्याय 313

श्लोक 8

बहूनि चापि दामानि कीलका अपि वा बहु ।तृणानि बहुरूपाणि किं वा सन्ति पितः सदा

bahūni cāpi dāmāni kīlakā api vā bahu | tṛṇāni bahurūpāṇi kiṃ vā santi pitaḥ sadā

हिन्दी अर्थ

बाबा! क्या अपने यहाँ बहुत-सी रस्सियाँ, बहुतेरे खूँटे तथा अनेक प्रकारकी घासें सदा प्रस्तुत रहती हैं ?'

अध्याय 313

श्लोक 9

शकटानि सुगन्धीनि किं वा सन्ति पितर्ध्रुवम् ।अपि गोप्यः पुत्रवत्यो दारकान्किमजीजनन्

śakaṭāni sugandhīni kiṃ vā santi pitardhruvam | api gopyaḥ putravatyo dārakānkimajījanan

हिन्दी अर्थ

पिताजी ! क्या छकड़े सदा गोरससे सुगन्धित रहते हैं ? कया गोपियाँ पुत्रवती हुई हैं? क्या उन्होंने बच्चोंको जन्म दिया है?

अध्याय 313

श्लोक 10

घटाः किं बहवो मातरभिन्नाः सर्वतो व्रजे ।किं गावः क्षीरमतुलं स्रवन्त्यहरहः पितः

ghaṭāḥ kiṃ bahavo mātarabhinnāḥ sarvato vraje | kiṃ gāvaḥ kṣīramatulaṃ sravantyaharahaḥ pitaḥ

हिन्दी अर्थ

श्३६७ 'मैया ! क्या ब्रजमें सब ओर बिना फूटे हुए बहुत- 'ड़े हैं ? बाबा ? क्या गौएँ प्रतिदिन अतुलनीय दुग्ध न करती हैं ?

अध्याय 313

श्लोक 11

हैयङ्गवीनं क्षीराणि दधि वा किमजीजनन् ।गोधनं सर्वमेवेदं नीरोगं प्रतिपद्यते

haiyaṅgavīnaṃ kṣīrāṇi dadhi vā kimajījanan | godhanaṃ sarvamevedaṃ nīrogaṃ pratipadyate

हिन्दी अर्थ

क्या अपनी गौओंने दूध-दही मक्‍्खनकी उपज बढ़ायी हैं? अपना सारा गोधन गतोहैन?'

अध्याय 313

श्लोक 12

सर्वमेतद् यदुश्रेष्ठ नीरोगं बहुशः प्रभो ।कुशलं गोधनस्यैव सर्वकालेषु केशव

sarvametad yaduśreṣṭha nīrogaṃ bahuśaḥ prabho | kuśalaṃ godhanasyaiva sarvakāleṣu keśava

हिन्दी अर्थ

नन्द बोले—प्रभो यदुश्रेष्ठ ! अपना यह सारा गोधन : नीरोग ही है। केशव ! गोधन तो सदा ही सकुशल

अध्याय 313

श्लोक 13

रक्षणात् तव देवेश सदा कुशलिनो वयम् ।सगोधनाः सवत्साश्च नीरोगा इव केशव

rakṣaṇāt tava deveśa sadā kuśalino vayam | sagodhanāḥ savatsāśca nīrogā iva keśava

हिन्दी अर्थ

देवेधर! तुम्हारे संरक्षणसे हमलोग सदा लपूर्वक रहते हैं। केशव ! हम गोधन और बछड़ोंसहित ग-से ही हैं

अध्याय 313

श्लोक 14

एकमेव सदा दुःखं न त्वां द्रक्ष्यामि केशव ।यदेतत् केवलं दुःखमिति धीः शीर्यते सदा

ekameva sadā duḥkhaṃ na tvāṃ drakṣyāmi keśava | yadetat kevalaṃ duḥkhamiti dhīḥ śīryate sadā

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण! मुझे तो सदा एक ही | बना रहता है कि मैं तुम्हें भर आँख देख नहीं पाता यह जो एक ही दुःख है, इससे सदा मेरा अन्त:करण थत रहता है

अध्याय 313

श्लोक 15

एवमादि विलप्यन्तं गच्छेत्याह स केशवः ।यशोदां पुनराहेदं मातर्गच्छ गृहं प्रति

evamādi vilapyantaṃ gacchetyāha sa keśavaḥ | yaśodāṃ punarāhedaṃ mātargaccha gṛhaṃ prati

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस तरह [प करते हुए नन्दसे भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा—भा! रोओ मत! अपने घरको जाओ।' फिर उन्होंने दासे कहा—' मैया ! तुम भी घर जाओ'

अध्याय 313

श्लोक 16

ये च त्वां कीर्तयिष्यन्ति ते च स्वर्गमवाप्नुयुः ।ये केचित् त्वां नमस्यन्ति ते मे प्रियतराः सदा

ye ca tvāṃ kīrtayiṣyanti te ca svargamavāpnuyuḥ | ye kecit tvāṃ namasyanti te me priyatarāḥ sadā

श्लोक 16–18 का हिन्दी अर्थ

जो तुम्हारा कोर्तन करेंगे, वे स्वर्गलोकमें जायेँगे तथा क्रोई तुम्हें नमस्कार करेंगे, वे सदा-सर्वदा मेरे परम भक्त होंगे।' ऐसा कहकर श्रीहरिने मैयासे कहा—जाओ'। माता-पितासे ऐसा कहकर सनातन भगवान्‌ देवने प्रसन्नतापूर्वक उनके गलेसे लगकर उन्हें विदा [। तत्पश्चात्‌ यशोदा और नन्दगोप अपने घरको लौट

अध्याय 313

श्लोक 17

मद्भक्ताः सर्वदा सन्तु गच्छेत्याह च तां हरिः ।इत्युक्त्वा पितरौ देवो वासुदेवः सनातनः

madbhaktāḥ sarvadā santu gacchetyāha ca tāṃ hariḥ | ityuktvā pitarau devo vāsudevaḥ sanātanaḥ

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 313

श्लोक 18

गाढमालिङ्ग्य तौ प्रीतौ प्रेषयामास केशवः ।यशोदा नन्दगोपश्च जग्मतुः स्वगृहं प्रति

gāḍhamāliṅgya tau prītau preṣayāmāsa keśavaḥ | yaśodā nandagopaśca jagmatuḥ svagṛhaṃ prati

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 313

श्लोक 19

ततः कृष्णो हृषीकेशो यादवैः सह वृष्णिभिः ।गन्तुमैच्छत्तदा विष्णुः पुरीं द्वारवतीं किल

tataḥ kṛṣṇo hṛṣīkeśo yādavaiḥ saha vṛṣṇibhiḥ | gantumaicchattadā viṣṇuḥ purīṃ dvāravatīṃ kila

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर इन्द्रियोंके प्रेरक विष्णुस्वरूप गान श्रीकृष्णने यादवों तथा वृष्णिवंशियोंके साथ गपुरीको लौट जानेकी इच्छा की

अध्याय 313

श्लोक 20

य एतच्छृणुयान्नित्यं पठेद् वापि समाहितः ।पुत्रवान् धनवांश्चैव अन्ते मोक्षं च गच्छति

ya etacchṛṇuyānnityaṃ paṭhed vāpi samāhitaḥ | putravān dhanavāṃścaiva ante mokṣaṃ ca gacchati

हिन्दी अर्थ

जो एकाग्रचित्त परदा इस प्रसंगको सुनता अथवा पढ़ता है, वह इस में पुत्रवान्‌ और धनवान्‌ होता है तथा अन्तमें मोक्ष कर लेता है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

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भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.