Harivamsha Purana
312
अध्याय 312 / 318

Parva 3, Adhyāya 129

14 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ14 श्लोक

अध्याय 312

श्लोक 1

डिम्भकस्य आत्महत्या श्रुत्वा निहतमत्युग्रं भ्रातरं वीर्यशालिनम् ।बलदेवं परित्यज्य युध्यमानं महारणे

ḍimbhakasya ātmahatyā śrutvā nihatamatyugraṃ bhrātaraṃ vīryaśālinam | baladevaṃ parityajya yudhyamānaṃ mahāraṇe

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अपने पराक्रमशाली भाई अत्यन्त उग्र हंसको उस महासमरमें मारा गया सुनकर बलवान्‌ डिम्भक जूझते हुए बलभद्रको वहीं छोड़कर यमुनाजीके तटपर गया। उस समय हलधर बलभद्रने बड़े वेगसे उसका पीछा किया

अध्याय 312

श्लोक 2

डिम्भको वीर्यसम्पन्नो यमुनामनुजग्मिवान् ।तमन्वधावद् वेगेन बलभद्रो हलायुधः

ḍimbhako vīryasampanno yamunāmanujagmivān | tamanvadhāvad vegena balabhadro halāyudhaḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 312

श्लोक 3

हंसो हि यत्र पतितस्तत्रासौ निपपात ह ।यमुनायां महाराज विलोड्य जलसञ्चयम्

haṃso hi yatra patitastatrāsau nipapāta ha | yamunāyāṃ mahārāja viloḍya jalasañcayam

हिन्दी अर्थ

महाराज ! हंस जहाँ यमुनाजीमें कूदा था, वहीं डिम्भक भी कूद पड़ा। उसने यमुनाकी जलराशिको मथ डाला

अध्याय 312

श्लोक 5

अथं क्रुद्धः स डिम्भको भ्रामयित्वा जलं बहु ।उन्मज्ज्योन्मज्ज्य सहसा निमज्ज्य च पुनः पुनः ४॥ न ददर्श तदा राजन् भ्रातरं वीर्यशालिनम् ।उन्मज्ज्याथ महाबाहुर्वासुदेवं विलोक्य च

athaṃ kruddhaḥ sa ḍimbhako bhrāmayitvā jalaṃ bahu | unmajjyonmajjya sahasā nimajjya ca punaḥ punaḥ 4|| na dadarśa tadā rājan bhrātaraṃ vīryaśālinam | unmajjyātha mahābāhurvāsudevaṃ vilokya ca

अध्याय 312

श्लोक 6

उवाच वचनं राजन् डिम्भको वीर्यवत्तमः ।अरे गोपकदायाद क्वासौ हंस इति स्थितः

uvāca vacanaṃ rājan ḍimbhako vīryavattamaḥ | are gopakadāyāda kvāsau haṃsa iti sthitaḥ

अध्याय 312

श्लोक 7

वासुदेवोऽपि धर्मात्मा यमुनां पृच्छ राजक ।इत्यब्रवीत् प्रसन्नात्मा वासुदेवः प्रतापवान्

vāsudevo'pi dharmātmā yamunāṃ pṛccha rājaka | ityabravīt prasannātmā vāsudevaḥ pratāpavān

अध्याय 312

श्लोक 8

तच्छ्रुत्वा यमुनां भूयः प्रविश्य डिम्भकः किल ।बहुप्रकारमुद्वीक्ष्य भ्रातरं भ्रातृवत्सलः

tacchrutvā yamunāṃ bhūyaḥ praviśya ḍimbhakaḥ kila | bahuprakāramudvīkṣya bhrātaraṃ bhrātṛvatsalaḥ

अध्याय 312

श्लोक 9

विललाप ततो राजा डिम्भको भ्रान्तमानसः ।क्व नु गच्छसि राजेन्द्र विहायैनमबान्धवम्

vilalāpa tato rājā ḍimbhako bhrāntamānasaḥ | kva nu gacchasi rājendra vihāyainamabāndhavam

अध्याय 312

श्लोक 10

कुतो भ्रातरितो गच्छेः परित्यज्यैव मामिह ।विलप्यैवं नृपश्रेष्ठ डिम्भको भ्रातृवत्सलः

kuto bhrātarito gaccheḥ parityajyaiva māmiha | vilapyaivaṃ nṛpaśreṣṭha ḍimbhako bhrātṛvatsalaḥ

अध्याय 312

श्लोक 11

आत्मत्यागे मनः कुर्वन् यमुनाया महाह्रदे ॥ निमज्योन्मज्य सहसा मरणे कृतनिश्चयः

ātmatyāge manaḥ kurvan yamunāyā mahāhrade || nimajyonmajya sahasā maraṇe kṛtaniścayaḥ

अध्याय 312

श्लोक 12

हस्तेन जिह्वामाकृष्य भूयो भूयो विलप्य च ।ततः समूलामाकृष्य जिह्वां साहसकृत् स्वयम्

hastena jihvāmākṛṣya bhūyo bhūyo vilapya ca | tataḥ samūlāmākṛṣya jihvāṃ sāhasakṛt svayam

अध्याय 312

श्लोक 13

ममारान्तर्जले राजन् डिम्भको नरकाय वै ।एवं तु निहते हंसे डिम्भके वीर्यशालिनि

mamārāntarjale rājan ḍimbhako narakāya vai | evaṃ tu nihate haṃse ḍimbhake vīryaśālini

अध्याय 312

श्लोक 14

आगमत्पुण्डरीकाक्षो भूतान्विस्मापयन्निव ।ततः प्रीतः प्रसन्नात्मा वासुदेवः प्रतापवान्

āgamatpuṇḍarīkākṣo bhūtānvismāpayanniva | tataḥ prītaḥ prasannātmā vāsudevaḥ pratāpavān

अध्याय 312

श्लोक 15

गोवर्धनेऽथ विश्रम्य बलभद्रसहायवान् ।कञ्चित् कालं महाराज पूर्वभुक्तमुवास ह

govardhane'tha viśramya balabhadrasahāyavān | kañcit kālaṃ mahārāja pūrvabhuktamuvāsa ha

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

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पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.