Harivamsha Purana
315
अध्याय 315 / 318

Parva 3, Adhyāya 132

99 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ99 श्लोक

अध्याय 315

श्लोक 1

महाभारतहरिवंशयोः श्रवणविधिः फलं च, वाचकस्य गुणाः, प्रतिपर्वणि दानार्हं द्रव्यं, एकतः दशसङ्ख्याकानां पारणानां महत्त्वं, महाभारतहरिवंशयोः माहात्म्यं भगवन् केन विधिना श्रोतव्यं भारतं बुधैः ।फलं किं के च देवाश्च पूज्या वै पारणेष्विह

mahābhārataharivaṃśayoḥ śravaṇavidhiḥ phalaṃ ca, vācakasya guṇāḥ, pratiparvaṇi dānārhaṃ dravyaṃ, ekataḥ daśasaṅkhyākānāṃ pāraṇānāṃ mahattvaṃ, mahābhārataharivaṃśayoḥ māhātmyaṃ bhagavan kena vidhinā śrotavyaṃ bhārataṃ budhaiḥ | phalaṃ kiṃ ke ca devāśca pūjyā vai pāraṇeṣviha

हिन्दी अर्थ

ततमो श्३६९ ततमो$ध्याय: व्स्स्सस्‍्टा , वाचकके गुण, प्रत्येक पर्वपर दान देने योग्य तथा महाभारत एवं हरिवंशका माहात्म्य जनमेजयने पूछा—भगवन्‌! विद्वान्‌ पुरुषोंको हहाभारतका श्रवण किस विधिसे करना चाहिये? सका फल क्या है? तथा इसकी समाप्तिपर किन-किन रवताओंका पूजन करना चाहिये ?

अध्याय 315

श्लोक 2

देयं समाप्ते भगवन् किं च पर्वणि पर्वणि ।वाचकः कीदृशश्चात्र यष्टव्यस्तद् ब्रवीहि मे

deyaṃ samāpte bhagavan kiṃ ca parvaṇi parvaṇi | vācakaḥ kīdṛśaścātra yaṣṭavyastad bravīhi me

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌ ! प्रत्येक रवके समाप्त होनेपर क्या दान देना चाहिये ? तथा इसमें से वाचकका पूजन करना चाहिये ? यह सब मुझे तताइये

अध्याय 315

श्लोक 3

शृणु राजन् विधिमिमं फलं यच्चापि भारतात् ।श्रुताद् भवति राजेन्द्र यत् त्वं मामनुपृच्छसि

śṛṇu rājan vidhimimaṃ phalaṃ yaccāpi bhāratāt | śrutād bhavati rājendra yat tvaṃ māmanupṛcchasi

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजीने कहा—राजन्‌ ! महाभारत सुननेकी स विधिको सुनिये। राजेन्द्र । महाभारत श्रवण करनेसे पे फल होता है, जिसके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे गो, वह भी बताता हूँ, सुनो

अध्याय 315

श्लोक 4

दिवि देवा महीपाल क्रीडार्थमवनिं गताः ।कृत्वा कार्यमिदं चैव ततश्च दिवमागताः

divi devā mahīpāla krīḍārthamavaniṃ gatāḥ | kṛtvā kāryamidaṃ caiva tataśca divamāgatāḥ

हिन्दी अर्थ

महीपाल! स्वर्गके ववता लीलाके लिये पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए थे। वे यह अवतार-) कार्य करके वहाँसे देवलोकको लौट नये

अध्याय 315

श्लोक 5

हन्त यत् ते प्रवक्ष्यामि तच्छृणुष्व समाहितः ।ऋषीणां देवतानां च सम्भवं वसुधातले

hanta yat te pravakṣyāmi tacchṛṇuṣva samāhitaḥ | ṛṣīṇāṃ devatānāṃ ca sambhavaṃ vasudhātale

हिन्दी अर्थ

जनमेजय ! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे जो कुछ रहता हूँ, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो । भूतलपर ऋषियों गौर देवताओंका प्रादुर्भाव हुआ था

अध्याय 315

श्लोक 6

अत्र रुद्रास्तथा साध्या विश्वेदेवाश्च शाश्वताः ।आदित्याश्चाश्विनौ देवौ लोकपाला महर्षयः

atra rudrāstathā sādhyā viśvedevāśca śāśvatāḥ | ādityāścāśvinau devau lokapālā maharṣayaḥ

श्लोक 6–9 का हिन्दी अर्थ

भरतत्रेष्ठ ! रुद्र, आाध्य, सनातन विश्वेदेव, आदित्य, दोनों अश्विनीकुमार गमक देवता, लोकपाल, महर्षि, गुह्मक, गन्धर्व, नाग, त्रद्याधर, सिद्ध, धर्म, स्वयम्भू ब्रह्माजी, श्रेष्ठ कात्यायन [नि, पर्वत, सागर, नदियाँ, अप्सराएँ, ग्रह, संवत्सर, पयन, ऋतु, स्थावर-जज़मरूप सारा जगत्‌, देवता और ससुर—ये इस महाभारतमें एकत्र स्थित देखे जाते

अध्याय 315

श्लोक 7

गुह्यकाश्च सगन्धर्वा नागा विद्याधरास्तथा ।सिद्धा धर्मः स्वयम्भूश्च मुनिः कात्यायनो वरः

guhyakāśca sagandharvā nāgā vidyādharāstathā | siddhā dharmaḥ svayambhūśca muniḥ kātyāyano varaḥ

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 8

गिरयः सागरा नद्यस्तथैवाप्सरसां गणाः ।ग्रहाः संवत्सराश्चैव अयनान्यृतवस्तथा

girayaḥ sāgarā nadyastathaivāpsarasāṃ gaṇāḥ | grahāḥ saṃvatsarāścaiva ayanānyṛtavastathā

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 9

स्थावरं जङ्गमं चैव जगत् सर्वं सुरासुरम् ।भारते भरतश्रेष्ठ एकस्थमिह दृश्यते

sthāvaraṃ jaṅgamaṃ caiva jagat sarvaṃ surāsuram | bhārate bharataśreṣṭha ekasthamiha dṛśyate

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 10

तेषां श्रुतिप्रतिष्ठानां नामकर्मानुकीर्तनात् ।कृत्वापि पातकं घोरं सद्यो मुच्येत मानवः

teṣāṃ śrutipratiṣṭhānāṃ nāmakarmānukīrtanāt | kṛtvāpi pātakaṃ ghoraṃ sadyo mucyeta mānavaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रुतिमें प्रतिष्ठित हुए इन सबके नाम और मॉका बारम्बार कीर्तन करनेसे मनुष्य घोर पातक ररनेपर भी उससे तत्काल मुक्त हो जाता है

अध्याय 315

श्लोक 11

इतिहासमिमं श्रुत्वा यथावदनुपूर्वशः ।संयतात्मा शुचिर्भूत्वा पारं गत्वा च भारते

itihāsamimaṃ śrutvā yathāvadanupūrvaśaḥ | saṃyatātmā śucirbhūtvā pāraṃ gatvā ca bhārate

श्लोक 11–13 का हिन्दी अर्थ

रत! मनुष्य संयतचित्त एवं पवित्र हो इस इतिहासको ममश: यथावत्‌ रूपसे सुनकर समूचे महाभारतके पार कर भारतयुद्धमें काम आये हुए वीरोंके किस प्रकार ाद्ध करने चाहिये, यह बताता हूँ सुनो। भरतत्रेष्ठ! हाभारत सुनकर यथाशक्ति भक्तिपूर्वक उनके लिये ाह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न एवं बड़े-बड़े दान देने ाहिये। गौएँ, काँसके दुग्धपात्र तथा वस्त्राभूषणों से शभूषित कन्याएँ देनी चाहिये

अध्याय 315

श्लोक 12

तेषां शृणु त्वं श्राद्धानि श्रुत्वा भारत भारतम् ।ब्राह्मणेभ्यो यथाशक्त्या भक्त्या च भरतर्षभ

teṣāṃ śṛṇu tvaṃ śrāddhāni śrutvā bhārata bhāratam | brāhmaṇebhyo yathāśaktyā bhaktyā ca bharatarṣabha

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 13

महादानानि देयानि रत्नानि विविधानि च ।गावः कांस्योपदोहाश्च कन्याश्चैव स्वलङ्कृताः

mahādānāni deyāni ratnāni vividhāni ca | gāvaḥ kāṃsyopadohāśca kanyāścaiva svalaṅkṛtāḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 14

सर्वकामगुणोपेता यानानि विविधानि च ।भाजनानि विचित्राणि भूमिर्वासांसि काञ्चनम्

sarvakāmaguṇopetā yānāni vividhāni ca | bhājanāni vicitrāṇi bhūmirvāsāṃsi kāñcanam

हिन्दी अर्थ

वे कन्याएँ सम्पूर्ण कमनीय गुणोंसे सम्पन्न हों। इनके दि सिवा नाना प्रकारके वाहन, विचित्र पात्र, पृथ्वी, वस्त्र एवं सुवर्णका दान करना चाहिये

अध्याय 315

श्लोक 15

वाहनानि च देयानि हया मत्ताश्च वारणाः ।शयनं शिबिकाश्चैव स्यन्दनाश्च स्वलङ्कृताः

vāhanāni ca deyāni hayā mattāśca vāraṇāḥ | śayanaṃ śibikāścaiva syandanāśca svalaṅkṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

वाहन, घोड़े, मतवाले हाथी, शय्या, शिविका और सजे-सजाये रथ भी देने चाहिये

अध्याय 315

श्लोक 16

यद् यद् गृहे वरं किञ्चिद् यद् यदस्ति महद्वसु ।तत् तद् देयं द्विजातिभ्य आत्मा दाराश्च सूनवः

yad yad gṛhe varaṃ kiñcid yad yadasti mahadvasu | tat tad deyaṃ dvijātibhya ātmā dārāśca sūnavaḥ

हिन्दी अर्थ

अपने घरमें जो-जो कोई श्रेष्ठ वस्तु हो और अपने स्त्री-पुत्र और शरीरको भी उनकी सेवामें अर्पण कर देना चाहिये

अध्याय 315

श्लोक 17

श्रद्धया परया दद्यात् क्रमशस्तस्य पारगः ।शक्तितः सुमना हृष्टः शुश्रूषुरविकम्पनः

śraddhayā parayā dadyāt kramaśastasya pāragaḥ | śaktitaḥ sumanā hṛṣṭaḥ śuśrūṣuravikampanaḥ

हिन्दी अर्थ

पुरुष शुद्ध हृदयसे हर्षपूर्वक मनमें सेवाभाव रखते हुए स्थिरतापूर्वक बड़ी श्रद्धाके साथ यथाशक्ति पूर्वेक्त वस्तुओंका दान करे

अध्याय 315

श्लोक 18

सत्यार्जवरतो यत्तः शुचिः शौचपरायणः ।श्रद्दधानो जितक्रोधो यथा सिद्ध्यति तच्छ्रृणु

satyārjavarato yattaḥ śuciḥ śaucaparāyaṇaḥ | śraddadhāno jitakrodho yathā siddhyati tacchrṛṇu

हिन्दी अर्थ

सत्य और सरलतामें तत्पर, प्रयलशील, 9 . पवित्र, शौचाचारपरायण, क्रोधको जीतनेवाले तथा श्रद्धालु श्रोताको जिस प्रकार सिद्धि प्रास होती है, वह बताता हूँ, उसे सुनो

अध्याय 315

श्लोक 19

शुचिः शीलान्विताचारः शुक्लवासा जितेन्द्रियः ।संस्कृतः सर्वशास्त्रज्ञः श्रद्दधानोऽनसूयकः

śuciḥ śīlānvitācāraḥ śuklavāsā jitendriyaḥ | saṃskṛtaḥ sarvaśāstrajñaḥ śraddadhāno'nasūyakaḥ

श्लोक 19–20 का हिन्दी अर्थ

जो शुद्ध, सुशील, सदाचारी, श्रेतवस्त्रधारी, , | जितेद्दरिय, संस्कारसम्पन्न, सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता, श्रद्धालु, दमन करनेवाला, सत्यवादी, इन्द्रियविजयी तथा दान-मानको ग्रहण करनेवाला हो, ऐसे विद्वान्‌ पुरुषको ही वाचक बनाना दे | चाहिये

अध्याय 315

श्लोक 20

रूपवान् सुभगो दान्तः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।दानमानग्रहीता च कार्यो भवति वाचकः

rūpavān subhago dāntaḥ satyavādī jitendriyaḥ | dānamānagrahītā ca kāryo bhavati vācakaḥ

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 21

अविलम्बमनायस्तमद्रुतं घोरमूर्जितम् ।असंसक्ताक्षरपदं न च भावसमन्वितम्

avilambamanāyastamadrutaṃ ghoramūrjitam | asaṃsaktākṣarapadaṃ na ca bhāvasamanvitam

श्लोक 21–22 का हिन्दी अर्थ

स्वस्थ वाचक स्वाधीन और एकाग्रचित्त हो इस तरह कथा बाँचे कि विलम्बसे या रुक-रुककर शब्द न निकले ( धारावाहिकरूपसे कथा चलती रहे), कठोर » | अक्षरका उच्चारण न करे, जल्दबाजी न करे, अस्पष्ट रूपसे शब्दोंका उच्चारण न करे-इस तरह बोले कि कोई अक्षर या पद टूटने न पाये, मनमें कोई विशेष अभिप्राय (लोभ आदि) रखकर कथा न बाँचे। आठ" स्थानोंसे उच्चरित होनेवाले | रेतिरसठ वर्णासि युक्त महाभारतका इस तरह पाठ करे कि प्रत्येक वर्णका स्पष्ठत: विवेक होता रहे

अध्याय 315

श्लोक 22

त्रिषष्टिवर्णसंयुक्तमष्टस्थानसमीरितम् ।वाचयेद् वाचकः स्वस्थः स्वाधीनः सुसमाहितः

triṣaṣṭivarṇasaṃyuktamaṣṭasthānasamīritam | vācayed vācakaḥ svasthaḥ svādhīnaḥ susamāhitaḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 23

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्

nārāyaṇaṃ namaskṛtya naraṃ caiva narottamam | devīṃ sarasvatīṃ vyāsaṃ tato jayamudīrayet

हिन्दी अर्थ

पुराण एवं महाभारत) -का पाठ आरम्भ करे

अध्याय 315

श्लोक 24

ईदृशाद्वाचकाद्राजञ्च्छ्रुत्वा भारत भारतम् ।नियमस्थः शुचिः श्रोता शृण्वन्स फलमश्नुते

īdṛśādvācakādrājañcchrutvā bhārata bhāratam | niyamasthaḥ śuciḥ śrotā śṛṇvansa phalamaśnute

हिन्दी अर्थ

र हृदय—ये वर्णोके उच्चारणके आठ स्थान हैं। २-पाणिनीय शिक्षामें पच्चीस स्पर्श, आठ यादि, चार यम, अनुस्वार, विसर्ग, क, प तथा इस प्रकार है—अ इ उ ऋ' ये चार स्वर हस्व, दीर्घ और प्लुतके का केवल हस्वरूप ही ग्रहण किया गया है—इस प्रकार ये तेरह स्वर -दो प्रकारके हैं, अत: आठ हुए। पूर्वोक्त १३ और ये ८ मिलकर २१ ते हैं। इनको मिलानेसे ४६ अक्षर हुए। *य' से लेकर 'ह' तकके आठ अनुसार चार यम होते हैं । यथा—' पलिक्कनी ' ' चखूख्नतु: ', ' अग्गिन: !, रर्ण हैं, इन्हींकी ' यम' संज्ञा है। इन चार यमोंको जोड़ लेनेसे अक्षरोंकी अ:) क (जिह्लामूलीय), प (उपध्मानीय) तथा दुःस्पृष्ठर्ण (दो स्वरोंके योग तिरसठ होता है। ये ही तिरसठ अक्षर हैं। राजन्‌! भरतनन्दन! जो श्रोता शौच, संतोष आदि नियमोंके पालनमें तत्पर एवं पवित्र रहकर ऐसे वाचकसे महाभारत सुनता है, वह उसके पूर्ण फलको प्राप्त कर लेता है

अध्याय 315

श्लोक 25

पारणं प्रथमं प्राप्य द्विजान् कामैश्च तर्पयेत् ।अग्निष्टोमस्य यागस्य फलं वै लभते नरः

pāraṇaṃ prathamaṃ prāpya dvijān kāmaiśca tarpayet | agniṣṭomasya yāgasya phalaṃ vai labhate naraḥ

हिन्दी अर्थ

प्रथम बार नियमपूर्वक हरिवंशान्त महाभासतका श्रवण पूरा करके ब्राह्मणोंको उनके इच्छानुसार वस्तुओंसे तुप्त करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य अग्रिष्टोम यागका फल पाता है

अध्याय 315

श्लोक 26

अप्सरोगणसङ्कीर्णं विमानं लभते महत् ।प्रहृष्टः स तु देवैश्च दिवं याति समाहितः

apsarogaṇasaṅkīrṇaṃ vimānaṃ labhate mahat | prahṛṣṭaḥ sa tu devaiśca divaṃ yāti samāhitaḥ

हिन्दी अर्थ

उसे अप्सराओंसे भरा हुआ महान्‌ विमान प्रात होता है और वह हर्षसे उत्फुल्ल एवं एकाग्रचित्त होकर देवताओंके साथ स्वर्गलोकमें जाता है

अध्याय 315

श्लोक 27

द्वितीयं पारणं प्राप्य अतिरात्रफलं लभेत् ।सर्वरत्नमयं दिव्यं विमानमधिरोहति

dvitīyaṃ pāraṇaṃ prāpya atirātraphalaṃ labhet | sarvaratnamayaṃ divyaṃ vimānamadhirohati

हिन्दी अर्थ

दूसरी बार हरिवंशान्त महाभारतका श्रवण कर लेनेपर श्रोताको अतिरात्रयज्ञका फल मिलता है तथा वह सम्पूर्ण रत्नोंसे बने हुए दिव्य विमानपर आरूढ़ होता है

अध्याय 315

श्लोक 28

दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धविभूषितः ।दिव्याङ्गदधरो नित्यं देवलोके महीयते

divyamālyāmbaradharo divyagandhavibhūṣitaḥ | divyāṅgadadharo nityaṃ devaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

वहाँ तह दिव्य माला और वस्त्र धारण करके दिव्य गन्धसे विभूषित हो, दिव्य अड्भद आदि आभूषण पहनकर सदा देवलोकमें सम्मानित होता है

अध्याय 315

श्लोक 29

तृतीयं पारणं प्राप्य द्वादशाहफलं लभेत् ।वसत्यमरसङ्काशो वर्षाण्ययुतशो दिवि

tṛtīyaṃ pāraṇaṃ prāpya dvādaśāhaphalaṃ labhet | vasatyamarasaṅkāśo varṣāṇyayutaśo divi

हिन्दी अर्थ

तीसरी पारणा पूरी करनेपर उसे द्वादशाह यज्ञका फल प्राप्त होता है तथा वह देवताओंके समान तेजस्वी रूप धारण करके दस हजार वर्षोतक देवलोकमें निवास करता है

अध्याय 315

श्लोक 30

चतुर्थं वाजपेयस्य पञ्चमे द्विगुणं फलम् ।उदितादित्यसङ्काशं ज्वलन्तमनलोपमम्

caturthaṃ vājapeyasya pañcame dviguṇaṃ phalam | uditādityasaṅkāśaṃ jvalantamanalopamam

श्लोक 30–31 का हिन्दी अर्थ

चौथी पारणापर ताजपेय यज्ञका और पाँचवींपर उससे दूना फल मिलता है । वह उदयकालके सूर्य तथा प्रज्वलित अग्रिके समान तेजस्वी विमानपर देवताओंके साथ आरूढ़ हो देवलोकमें जाता है और वहाँ इन्द्रभवनमें दस हजार वर्षोतक आनन्द भोगता है

अध्याय 315

श्लोक 31

विमानं विबुधैः सार्धमारुह्य दिवि गच्छति ।वर्षायुतानि भवने शक्रस्य दिवि मोदते

vimānaṃ vibudhaiḥ sārdhamāruhya divi gacchati | varṣāyutāni bhavane śakrasya divi modate

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 32

षष्ठे द्विगुणमस्तीति सप्तमे त्रिगुणं फलम् ।कैलासशिखराकारं वैदूर्यमणिवेदिकम्

ṣaṣṭhe dviguṇamastīti saptame triguṇaṃ phalam | kailāsaśikharākāraṃ vaidūryamaṇivedikam

श्लोक 32–35 का हिन्दी अर्थ

छठी पारणामें इससे दूना अर्थात्‌ वार वाजपेय यज्ञोंका फल पाता है। सातवेंमें तीन पने अर्थात्‌ बारह वाजपेय यज्ञोंके फलकी प्राप्ति होती है । वह कैलासशिखरके समान उज्चल एवं विशाल वैदूर्यमणिकी वेदीसे विभूषित, अनेक प्रकारके मण्डलाकार पार्गोंसे युक्त, मणियों और मुूँगोंसे अलंकृत, अप्सराओंसे परिपूर्ण तथा इच्छानुसार चलनेवाले विमानपर बैठकर दूसरे सूर्यके समान सम्पूर्ण लोकों में विचरता है । आठवीं पारणा पूरी होनेपर उसे राजसूय यज्ञका फल मिलता है। तरह चन्द्रोदयके समान रमणीय विमानपर आरूढ़ होता है । जिसमें चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्वल और मनके समान वेगशाली घोड़े जुते होते हैं

अध्याय 315

श्लोक 33

परिक्षिप्तं च बहुधा मणिविद्रुमभूषितम् ।विमानं समधिष्ठाय कामगं साप्सरोगणम्

parikṣiptaṃ ca bahudhā maṇividrumabhūṣitam | vimānaṃ samadhiṣṭhāya kāmagaṃ sāpsarogaṇam

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 34

सर्वांल्लोकान् विचरते द्वितीय इव भास्करः ।अष्टमे राजसूयस्य पारणे लभते फलम्

sarvāṃllokān vicarate dvitīya iva bhāskaraḥ | aṣṭame rājasūyasya pāraṇe labhate phalam

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 35

चन्द्रोदयनिभं रम्यं विमानमधिरोहति ।चन्द्ररश्मिप्रतीकाशैर्हयैर्युक्तं मनोजवैः

candrodayanibhaṃ ramyaṃ vimānamadhirohati | candraraśmipratīkāśairhayairyuktaṃ manojavaiḥ

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 36

सेव्यमानो वरस्त्रीणां चन्द्रकान्ततरैर्मुखैः ।मेखलानां निनादेन नूपुराणां च निःस्वनैः

sevyamāno varastrīṇāṃ candrakāntatarairmukhaiḥ | mekhalānāṃ ninādena nūpurāṇāṃ ca niḥsvanaiḥ

श्लोक 36–40 का हिन्दी अर्थ

तरह देवसुन्दरियोंके चन्द्रमासे भी अधिक कमनीय मुखोंसे, उनकी मेखलाओंकी ध्वनिसे तथा नूपुरोंकी झनकारोंसे सेवित हो दिव्याज़नाओंके अड््में सुखपूर्वक सोता और जागता है। भरतनन्दन! नवीं पारणा पूर्ण करके श्रोता यज्ञोंके राजा अश्वमेधका फल पाता है। वह सोनेके खम्भों और कँगूरोंसे सुशोभित, वैदूर्यमणिकी वेदीसे अलंकृत, सब ओर बने हुए सुवर्णमय दिव्य गवाक्षोंसे आवृत तथा स्वर्गमें विचरनेवाले गन्धर्वों और अप्सराओंसे सेवित विमानपर बैठकर अपनी उत्कृष्ट प्रभासे प्रकाशित होता है तथा दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करके दिव्य चन्दनसे चर्चित हो दूसरे देवताकी भाँति देवलोकमें देवगणोंके साथ आनन्द भोगता है

अध्याय 315

श्लोक 37

अङ्के परमनारीणां सुखं सुप्तो विबुध्यते ।नवमं क्रतुराजस्य वाजिमेधस्य भारत

aṅke paramanārīṇāṃ sukhaṃ supto vibudhyate | navamaṃ kraturājasya vājimedhasya bhārata

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 38

काञ्चनस्तम्भनिर्व्यूहं वैदूर्यकृतवेदिकम् ।जाम्बूनदमयैर्दिव्यैर्गवाक्षैः सर्वतो वृतम्

kāñcanastambhanirvyūhaṃ vaidūryakṛtavedikam | jāmbūnadamayairdivyairgavākṣaiḥ sarvato vṛtam

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 39

सेवितं चाप्सरसङ्घैर्गन्धर्वैर्दिविचारिभिः ।विमानं समधिष्ठाय श्रिया परमया ज्वलन्

sevitaṃ cāpsarasaṅghairgandharvairdivicāribhiḥ | vimānaṃ samadhiṣṭhāya śriyā paramayā jvalan

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 40

दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यचन्दनभूषितः ।मोदते दैवतैः सार्धं दिवि देव इवापर

divyamālyāmbaradharo divyacandanabhūṣitaḥ | modate daivataiḥ sārdhaṃ divi deva ivāpara

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 41

दशमं पारणं प्राप्य द्विजातीनभिवन्द्य च ।किङ्किणीजालनिर्घोषं पताकाध्वजशोभितम्

daśamaṃ pāraṇaṃ prāpya dvijātīnabhivandya ca | kiṅkiṇījālanirghoṣaṃ patākādhvajaśobhitam

श्लोक 41–43 का हिन्दी अर्थ

दसवीं पारणा पूरी करके ब्राह्मणोंको प्रणाम करे, ऐसा करके श्रोता पुण्यात्माओंकि आवासस्थान दिव्य विमानको सुखपूर्वक पा लेता है। उस विमानमें छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरें लगी होती हैं, जिनसे मधुर ध्वनि होती रहती है। ध्वजा और पताकाएँ उस विमानकी शोभा बढ़ाती हैं। वह रत्रमयी तरेदिकाओंसे प्रकाशित होता है । उसमें वैदूर्यमणिके फाटक लगे होते हैं। वह सब ओरसे सोनेकी जालीसे घिरा रहता है। उसके छज्जोंका मुखभाग मुूँगोंसे अलंकृत होता है तथा पीतकुशल गन्धर्व और अप्सराएँ उस विमानपर सेवाके लिये उपस्थित रहती हैं

अध्याय 315

श्लोक 42

रत्नवेदिकसङ्काशं वैदूर्यमणितोरणम् ।हेमजालपरिक्षिप्तं प्रवालवलभीमुखम्

ratnavedikasaṅkāśaṃ vaidūryamaṇitoraṇam | hemajālaparikṣiptaṃ pravālavalabhīmukham

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 43

गन्धर्वैर्गीतकुशलैरप्सरोभिर्निषेवितम् ।विमानं सुकृतावासं सुखेनैवोपपद्यते

gandharvairgītakuśalairapsarobhirniṣevitam | vimānaṃ sukṛtāvāsaṃ sukhenaivopapadyate

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 44

मुकुटेनार्कवर्णेन जाम्बूनदविभूषणः ।दिव्यचन्दनदिग्धाङ्गो दिव्यमाल्यविभूषितः

mukuṭenārkavarṇena jāmbūnadavibhūṣaṇaḥ | divyacandanadigdhāṅgo divyamālyavibhūṣitaḥ

श्लोक 44–45 का हिन्दी अर्थ

वह पुरुष अपने मस्तकपर सूर्यके समान प्रकाशमान मुकुटसे सुशोभित हो जाम्बूनद (सुवर्ण)-के आभूषण धारण करके सारे अज्जोंमें देव्य चन्दनसे चर्चित और दिव्य मालाओंसे विभूषित हो, दिव्य भोगों तथा उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न होकर, देवताओंके प्रसादसे दिव्य लोकोंमें विचरता है

अध्याय 315

श्लोक 45

दिव्याँल्लोकान् प्रचरति दिव्यैर्भोगैः समन्वितः ।विबुधानां प्रसादेन श्रिया परमया युतः

divyā~llokān pracarati divyairbhogaiḥ samanvitaḥ | vibudhānāṃ prasādena śriyā paramayā yutaḥ

अर्थ श्लोक 44 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 46

अथ वर्षगणानेवं स्वर्गलोके महीयते ।ततो गन्धर्वसहितः सहस्राण्येकविंशतिः

atha varṣagaṇānevaṃ svargaloke mahīyate | tato gandharvasahitaḥ sahasrāṇyekaviṃśatiḥ

श्लोक 46–52 का हिन्दी अर्थ

इस प्रकार त्रहुत वर्षोतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है । तदनन्तर न्धर्वोके साथ रमणीय पुरन्दरपुरी अमरावतीमें रहकर क्कीस हजार वर्षोतक इन्द्रके साथ आनन्द भोगता है ॥ सके बाद नाना प्रकारके पुण्यलोकोंमें दिव्य यानों और वमानॉपर दिव्य नारियोंसे घिरा रहकर वहाँ देवताके समान निवास करता है। राजन्‌ ! तत्पश्चात्‌ वह क्रमश: सूर्यभवनमें, वन्द्रलोकमें तथा भगवान्‌ शिवके धाममें निवास करके अन्तमें भगवान्‌ विष्णुका सालोक्य प्रात कर लेता है। प्हाराज ! यह ठीक ऐसी ही बात है। इस विषयमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। इसपर श्रद्धा करनी चाहिये। पह मेरे गुरु व्यासजीका कथन है। वाचकको वह मनसे जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करे, वही देनी चाहिये। वशेषत: हाथी, घोड़े, रथ और शिविका आदि वाहनका दान करना उचित है। उसके लिये कड़े, कुण्डल, नूतन पज्ञोपवीत, विचित्र वस्त्र तथा विशेषत: गन्ध आदि देकर रैवताके समान उनकी पूजा करनी चाहिये । ऐसा करनेवाला पुरुष भगवान्‌ विष्णुके लोकमें जाता है

अध्याय 315

श्लोक 47

पुरन्दरपुरे रम्ये शक्रेण सह मोदते ।दिव्ययानविमानेषु लोकेषु विविधेषु च

purandarapure ramye śakreṇa saha modate | divyayānavimāneṣu lokeṣu vividheṣu ca

अर्थ श्लोक 46 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 48

दिव्यनारीगणाकीर्णो निवसत्यमरो यथा ।ततः सूर्यस्य भवने चन्द्रस्य भवने तथा

divyanārīgaṇākīrṇo nivasatyamaro yathā | tataḥ sūryasya bhavane candrasya bhavane tathā

अर्थ श्लोक 46 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 49

शिवस्य भवने राजन् विष्णोर्याति सलोकताम् ।एवमेतन्महाराज नात्र कार्या विचारणा

śivasya bhavane rājan viṣṇoryāti salokatām | evametanmahārāja nātra kāryā vicāraṇā

अर्थ श्लोक 46 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 50

श्रद्दधानेन वै भाव्यमेवमाह गुरुर्मम ।वाचकस्य तु दातव्यं मनसा यद् यदिच्छति

śraddadhānena vai bhāvyamevamāha gururmama | vācakasya tu dātavyaṃ manasā yad yadicchati

अर्थ श्लोक 46 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 51

हस्त्यश्वरथयानादि वाहनं च विशेषतः ।कटके कुण्डले चैव ब्रह्मसूत्रं तथापरम्

hastyaśvarathayānādi vāhanaṃ ca viśeṣataḥ | kaṭake kuṇḍale caiva brahmasūtraṃ tathāparam

अर्थ श्लोक 46 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 52

वस्त्रं चैव विचित्रं च गन्धं चैवं विशेषतः ।देववत् पूजयेत्तं तु विष्णुलोकमवाप्नुयात्

vastraṃ caiva vicitraṃ ca gandhaṃ caivaṃ viśeṣataḥ | devavat pūjayettaṃ tu viṣṇulokamavāpnuyāt

अर्थ श्लोक 46 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 53

अतः परं प्रवक्ष्यामि यानि देयानि भारते ।वाच्यमानेऽथ विप्रेभ्यो राजन् पर्वणि पर्वणि

ataḥ paraṃ pravakṣyāmi yāni deyāni bhārate | vācyamāne'tha viprebhyo rājan parvaṇi parvaṇi

हिन्दी अर्थ

जन ! अब मैं यह बता रहा हूँ कि जब महाभारतका गरायण आरम्भ हो जाय, तब प्रत्येक पर्वकी समापिपर ह्मणोंके लिये किन-किन वस्तुओंका दान देना चाहिये

अध्याय 315

श्लोक 54

जातिं देशं च सत्यं च माहात्म्यं भरतर्षभ ।धर्मवृत्तिं च विज्ञाय ब्राह्मणानां नराधिप

jātiṃ deśaṃ ca satyaṃ ca māhātmyaṃ bharatarṣabha | dharmavṛttiṃ ca vijñāya brāhmaṇānāṃ narādhipa

श्लोक 54–55 का हिन्दी अर्थ

सरतश्रेष्ठ ! नरेश्वर! पर्वके आरम्भमें ब्राह्मणोंकी जाति, रेश, सत्य, माहात्म्य तथा धर्मवृत्तिको जानकर पहले उनके रा स्वस्तिवाचन कराना चाहिये । तदनन्तर कार्य (कथा- अवण) आरम्भ करे। फिर उस पर्वकी समाप्ति होनेपर भपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको तृप्त करे

अध्याय 315

श्लोक 55

स्वस्ति वाच्यं द्विजैरादौ ततः कार्यं प्रवर्तयेत् ।समाप्तपर्वणि ततः स्वशक्त्या तर्पयेद् द्विजान्

svasti vācyaṃ dvijairādau tataḥ kāryaṃ pravartayet | samāptaparvaṇi tataḥ svaśaktyā tarpayed dvijān

अर्थ श्लोक 54 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 56

आदौ तु वाचकं चैव वस्त्रगन्धसमन्वितम् ।विधिवद् भोजयेद् राजन् मधुपायससंयुतम्

ādau tu vācakaṃ caiva vastragandhasamanvitam | vidhivad bhojayed rājan madhupāyasasaṃyutam

हिन्दी अर्थ

जन्‌ ! आदिपर्वके अनुक्रमणिकापर्वमें पहले वाचककी स्त्र और गन्ध आदिसे पूजा करके उसे मधुयुक्त खीरका तधिवत्‌ भोजन कराये

अध्याय 315

श्लोक 57

ततो मूलफलप्रायं पायसं मधुसर्पिषा ।आस्तीके भोजयेद् राजन् दद्याच्चैव गुडौदनम्

tato mūlaphalaprāyaṃ pāyasaṃ madhusarpiṣā | āstīke bhojayed rājan dadyāccaiva guḍaudanam

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर ! तदनन्तर आस्तीकपर्वमें ाय: फल-मूल तथा मधु और घीसे युक्त खीर भोजन राये तथा गुड़ और चावलका दान करे

अध्याय 315

श्लोक 58

अपूपैश्चैव पूपैश्च मोदकैश्च समन्वितम् ।सभापर्वणि राजेन्द्र हविष्यं भोजयेद् द्विजान्

apūpaiścaiva pūpaiśca modakaiśca samanvitam | sabhāparvaṇi rājendra haviṣyaṃ bhojayed dvijān

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र! फेर सभापर्वमें पूष (पुआ), अपूप (मालपुआ) और दक (लड़) -के साथ खीर ब्राह्मणोंको भोजन कराये

अध्याय 315

श्लोक 59

आरण्यके मूलफलैस्तर्पयेच्च द्विजोत्तमान् ।अरणीपर्व आसाद्य जलकुम्भान् प्रदापयेत्

āraṇyake mūlaphalaistarpayecca dvijottamān | araṇīparva āsādya jalakumbhān pradāpayet

हिन्दी अर्थ

गरण्यक (वन) पर्वमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको फल-मूलसे तृप्त ररे। अरणीपर्वमें पहुँचकर जलसे भरे हुए घड़ोंका दान रे

अध्याय 315

श्लोक 60

तर्पणानि च मुख्यानि वन्यमूलफलानि च ।सर्वकामगुणोपेतं विप्रेभ्योऽन्नं प्रदापयेत्

tarpaṇāni ca mukhyāni vanyamūlaphalāni ca | sarvakāmaguṇopetaṃ viprebhyo'nnaṃ pradāpayet

हिन्दी अर्थ

तृसिके मुख्य साधन, जंगली फल-मूल तथा नोवाज्छित गुणोंसे सम्पन्न अन्नका ब्राह्मणोंको दान करे

अध्याय 315

श्लोक 61

विराटपर्वणि तथा वासांसि विविधानि च ।उद्योगे भरतश्रेष्ठ सर्वकामगुणान्वितम्

virāṭaparvaṇi tathā vāsāṃsi vividhāni ca | udyoge bharataśreṣṭha sarvakāmaguṇānvitam

श्लोक 61–62 का हिन्दी अर्थ

्राटपर्वमें भाँति-भाँतिके वस्त्र दान करे। भरतत्रेष्ठ ! द्योगपर्वमें ब्राह्मणोंको गन्ध और मालाओंसे अलंकृत रके उन्हें मनोवाज्छित गुणोंसे सम्पन्न अन्नका भोजन राये। राजेन्द्र ! भीष्मपर्वमें परम उत्तम शिबिकाका दान रके अच्छी तरह छौंक-बघारकर तैयार किये गये वगुण-सम्पन्न अन्नका दान करे

अध्याय 315

श्लोक 62

भोजनं भोजयेद् विप्रान् गन्धमाल्यैरलकृतान् ।भीष्मपर्वणि राजेन्द्र दत्त्वा यानमनुत्तमम् ।ततः सर्वगुणोपेतमन्नं दद्यात् सुसंस्कृतम्

bhojanaṃ bhojayed viprān gandhamālyairalakṛtān | bhīṣmaparvaṇi rājendra dattvā yānamanuttamam | tataḥ sarvaguṇopetamannaṃ dadyāt susaṃskṛtam

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 63

द्रोणपर्वणि विप्रेभ्यो भोजनं परमार्चितम् ।शराश्च देया राजेन्द्र चापान्यसिवरांस्तथा

droṇaparvaṇi viprebhyo bhojanaṃ paramārcitam | śarāśca deyā rājendra cāpānyasivarāṃstathā

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! णपर्वमें ब्राह्मणोंको परम उत्तम भोजन अर्पित करे तथा नहें धनुष, बाण एवं उत्तम खड़ग दे

अध्याय 315

श्लोक 64

कर्णपर्वण्यपि तथा भोजनं सार्वकामिकम् ।विप्रेभ्यः संस्कृतं सम्यग् दद्यात् संयतमानसः

karṇaparvaṇyapi tathā bhojanaṃ sārvakāmikam | viprebhyaḥ saṃskṛtaṃ samyag dadyāt saṃyatamānasaḥ

हिन्दी अर्थ

कर्णपर्वमें भी नको संयममें रखकर ब्राह्मणोंको सबकी रुचिके अनुकूल त्तम संस्कारयुक्त भोजन दे

अध्याय 315

श्लोक 65

शल्यपर्वणि राजेन्द्र मोदकैः सगुडौदनैः ।अपूपैस्तर्पयेच्चैव सर्वमन्नं प्रदापयेत्

śalyaparvaṇi rājendra modakaiḥ saguḍaudanaiḥ | apūpaistarpayeccaiva sarvamannaṃ pradāpayet

हिन्दी अर्थ

महाराज ! शल्यपर्वमें डू, गुडमिश्रित ओदन और पूओंसे ब्राह्मणोंको तृप्त करे था उन्हें सब प्रकारके अन्नका दान दे

अध्याय 315

श्लोक 67

गदापर्वण्यपि तथा मुद्गमिश्रं प्रदापयेत् ।स्त्रीपर्वणि तथा रत्नैस्तर्पयेत् तु द्विजोत्तमान् ६६॥ घृतौदनं पुरस्ताच्च ऐषीके दापयेत् पुनः ।ततः सर्वगुणोपेतमन्नं दद्यात् सुसंस्कृतम्

gadāparvaṇyapi tathā mudgamiśraṃ pradāpayet | strīparvaṇi tathā ratnaistarpayet tu dvijottamān 66|| ghṛtaudanaṃ purastācca aiṣīke dāpayet punaḥ | tataḥ sarvaguṇopetamannaṃ dadyāt susaṃskṛtam

हिन्दी अर्थ

ऐषीकपर्वमें पहले घी लाये हुए भातका दान करे । तत्पश्चात्‌ अच्छी तरह छौंक- घारकर बनाया हुआ सर्वगुण-सम्पन्न अन्नका दान दे

अध्याय 315

श्लोक 68

शान्तिपर्वण्यपि गते हविष्यं भोजयेद्द्विजान् ।आश्वमेधिकमासाद्य भोजनं सार्वकामिकम्

śāntiparvaṇyapi gate haviṣyaṃ bhojayeddvijān | āśvamedhikamāsādya bhojanaṃ sārvakāmikam

हिन्दी अर्थ

शान्तिपर्व पूर्ण होनेपर ब्राह्मणोंको हविष्यका भोजन कराये। फिर आश्वमेधिकपर्वमें पहुँचकर सबकी रुचिके अनुकूल भोजन दे

अध्याय 315

श्लोक 69

तथाऽऽश्रमनिवासे तु हविष्यं भोजयेद् द्विजान् ।मौसले सार्वगुणिकं गन्धमाल्यानुलेपनम्

tathā''śramanivāse tu haviṣyaṃ bhojayed dvijān | mausale sārvaguṇikaṃ gandhamālyānulepanam

हिन्दी अर्थ

आश्रमवासिकपर्वमें ब्राह्मणोंको हविष्य भोजन कराये। मौसलपर्वमें सर्वगुणसम्पन्न अन्न तथा गन्ध, माला और अनुलेपनका दान करे

अध्याय 315

श्लोक 70

महाप्रास्थानिके तद्वत् सर्वकामगुणान्वितम् ।स्वर्गपर्वण्यपि तथा हविष्यं भोजयेद् द्विजान्

mahāprāsthānike tadvat sarvakāmaguṇānvitam | svargaparvaṇyapi tathā haviṣyaṃ bhojayed dvijān

हिन्दी अर्थ

उसी प्रकार महाप्रस्थानिकपर्वमें समस्त मनोवाज्छित गुणोंसे सम्पन्न अन्नका तथा स्वर्गारोहणपर्वमें हविष्यका ब्राह्मणोंको भोजन कराये

अध्याय 315

श्लोक 71

हरिवंशसमाप्तौ तु सहस्रं भोजयेद् द्विजान् ।गामेकां निष्कसंयुक्तां ब्राह्मणाय निवेदयेत्

harivaṃśasamāptau tu sahasraṃ bhojayed dvijān | gāmekāṃ niṣkasaṃyuktāṃ brāhmaṇāya nivedayet

हिन्दी अर्थ

हरिवंशकी समासि होनेपर एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराये तथा स्वर्णपदकसे युक्त एक गौका ब्राह्मणको दान करे

अध्याय 315

श्लोक 72

तदर्धेनापि दातव्या दरिद्रेणापि पार्थिव ।प्रतिपर्वसमाप्तौ तु पुस्तकं वै विचक्षणः

tadardhenāpi dātavyā daridreṇāpi pārthiva | pratiparvasamāptau tu pustakaṃ vai vicakṣaṇaḥ

श्लोक 72–74 का हिन्दी अर्थ

पृथ्वीनाथ! दरिद्रको भी पूरा नहीं तो आधा दान अवश्य करना चाहिये । बुद्धिमान्‌ मनुष्य प्रत्येक पर्वकी समासिपर वाचकको सुवर्णयुक्त पुस्तक अर्पित करे। हरिवंशपर्वमें ब्राह्मणोंको खीर भोजन कराये । राजकुमार! जो एकाग्रचित्त होकर हरिवंशके एक श्लोक, एक चरण अथवा एक अक्षरका भी श्रवण करता है, वह भगवान्‌ विष्णुका प्रिय भक्त होता है

अध्याय 315

श्लोक 73

सुवर्णेन च संयुक्तं वाचकाय निवेदयेत् ।हरिवंशे पर्वणि च पायसं तत्र भोजयेत्

suvarṇena ca saṃyuktaṃ vācakāya nivedayet | harivaṃśe parvaṇi ca pāyasaṃ tatra bhojayet

अर्थ श्लोक 72 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 74

श्लोकं वा श्लोकपादं वा अक्षरं वा नृपात्मज ।शृणुयादेकचित्तस्तु स विप्णुदयितो भवेत्

ślokaṃ vā ślokapādaṃ vā akṣaraṃ vā nṛpātmaja | śṛṇuyādekacittastu sa vipṇudayito bhavet

अर्थ श्लोक 72 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 75

व्यासं चैव सपत्नीकं पूजयेच्च यथाविधि ।लक्ष्मीनारायणं देवं पूजितं तं च पूजयेत्

vyāsaṃ caiva sapatnīkaṃ pūjayecca yathāvidhi | lakṣmīnārāyaṇaṃ devaṃ pūjitaṃ taṃ ca pūjayet

हिन्दी अर्थ

कथावाचक व्यासकी उसकी पत्नीके साथ विधिवत्‌ पूजा करे। इससे भगवान्‌ लक्ष्मीनारायणका पूजन हो जाता है। फिर पूर्वपूजित भगवान्‌ लक्ष्मी-नारायणकी भी पूजा करे

अध्याय 315

श्लोक 76

वाचकं पूजयेद् यस्तु भूमिवस्त्रसुधेनुभिः ।विष्णुः सम्पूजितस्तेन स साक्षाद् देवकीसुतः

vācakaṃ pūjayed yastu bhūmivastrasudhenubhiḥ | viṣṇuḥ sampūjitastena sa sākṣād devakīsutaḥ

हिन्दी अर्थ

जो भूमि, वस्त्र और उत्तम धेनु देकर वाचककी पूजा करता है, उसके द्वारा साक्षात्‌ विष्णुस्वरूप देवकीनन्दन श्रीकृष्णका पूजन सम्पन्न हो जाता है

अध्याय 315

श्लोक 77

पारणे पारणे राजन् यथावद् भरतर्षभ ।समाप्य सर्वाः प्रयतः संहिताः शास्त्रकोविदः

pāraṇe pāraṇe rājan yathāvad bharatarṣabha | samāpya sarvāḥ prayataḥ saṃhitāḥ śāstrakovidaḥ

श्लोक 77–79 का हिन्दी अर्थ

राजन्‌ भरतवंशावतंस जनमेजय! शास्त्रज्ञ पुरुष इन्द्रिय- संयमपूर्वक यथोचित रूपसे सम्पूर्ण महाभारत-संहिताको (हरिवंशसहित) पूर्ण करके प्रत्येक पारणामें वाचकको शुभ स्थानमें बैठाकर रेशमी वस्त्र अथवा शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण करके शोभा-सम्पन्न, पतरित्र एवं अलंकृत हो यथोचित रीतिसे पृथक्‌-पृथक्‌ गन्ध, माल्य आदि अर्पित करके उस वाचककी पूजा करे । राजन्‌ ! संयतचित्त एवं शिष्ट पुरुषोंद्वारा सम्मानित पुरुष संहिताकी पुस्तकोंका भी. पूजन करे

अध्याय 315

श्लोक 78

शुभे देशे निवेश्याथ क्षौमवस्त्राभिसंवृतः ।शुक्लाम्बरधरः श्रीमाञ्छुचिर्भूत्वा स्वलङ्कृतः

śubhe deśe niveśyātha kṣaumavastrābhisaṃvṛtaḥ | śuklāmbaradharaḥ śrīmāñchucirbhūtvā svalaṅkṛtaḥ

अर्थ श्लोक 77 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 79

अर्चयेत् तं यथान्यायं गन्धमाल्यैः पृथक् पृथक् ।संहितापुस्तकान् राजन् प्रयतः शिष्टसम्मतः

arcayet taṃ yathānyāyaṃ gandhamālyaiḥ pṛthak pṛthak | saṃhitāpustakān rājan prayataḥ śiṣṭasammataḥ

अर्थ श्लोक 77 के साथ

अध्याय 315

श्लोक 80

भक्ष्यैर्भोज्यैश्च पेयैश्च कामैश्च विविधैः शुभैः ।हिरण्यं गां च वस्त्रं च दक्षिणामथ दापयेत्

bhakṣyairbhojyaiśca peyaiśca kāmaiśca vividhaiḥ śubhaiḥ | hiraṇyaṃ gāṃ ca vastraṃ ca dakṣiṇāmatha dāpayet

हिन्दी अर्थ

वाचकको उत्तमोत्तम भक्ष्य-भोज्य पदार्थ, पेय रस आदि तथा नाना प्रकारकी शुभ मनोवाज्छित वस्तुओंके साथ सुवर्ण, गौ, वस्त्र तथा दक्षिणा समर्पित करे

अध्याय 315

श्लोक 81

सर्वत्र त्रिपलं स्वर्णं दातव्यं प्रणतात्मना ।तदर्धं पादशेषं वा वित्तशाठ्यविवर्जितम्

sarvatra tripalaṃ svarṇaṃ dātavyaṃ praṇatātmanā | tadardhaṃ pādaśeṣaṃ vā vittaśāṭhyavivarjitam

हिन्दी अर्थ

सभी पारणाओंमें प्रणतभावसे तीन पल (तीन भर) सुवर्ण देना चाहिये। इतना सम्भव न हो तो सवा दो भर या डेढ़ भर अवश्य दे। धन रहते हुए कंजूसी न करे

अध्याय 315

श्लोक 82

यद् यदेवात्मनोऽभीष्टं तत् तद् देयं द्विजातये ।सर्वथा तोषयेत् भक्त्या वाचकं गुरुमात्मनः ।देवताः कीर्तयेत् सर्वा नरनारायणौ तथा

yad yadevātmano'bhīṣṭaṃ tat tad deyaṃ dvijātaye | sarvathā toṣayet bhaktyā vācakaṃ gurumātmanaḥ | devatāḥ kīrtayet sarvā naranārāyaṇau tathā

हिन्दी अर्थ

जो-जो वस्तु अपनेको अभीष्ट हो, उसी-उसीका ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये। वाचक अपना गुरु है, अतः: भक्ति-भावसे उसको सर्वथा संतुष्ट करे। उस समय सम्पूर्ण देवताओंका तथा नर-नारायणका कीर्तन करे

अध्याय 315

श्लोक 83

ततो गन्धैश्च माल्यैश्च स्वलङ्कृतद्विजोत्तमान् ।तर्पयेद् विविधैः कामैर्दानैश्चोच्चावचैस्तथा

tato gandhaiśca mālyaiśca svalaṅkṛtadvijottamān | tarpayed vividhaiḥ kāmairdānaiścoccāvacaistathā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर गन्ध, माल्य आदिसे भलीभाँति अलंकृत किये गये श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार नाना प्रकारके कमनीय पदार्थ तथा अनेक प्रकारके छोटे-बड़े दान देकर तृत्त करे

अध्याय 315

श्लोक 85

अतिरात्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ।प्राप्नुयाच्च क्रतुफलं तथा पर्वणि पर्वणि ॥ ८४॥।वाचको भरतश्रेष्ठ व्यक्ताक्षरपदस्वरः ।भविष्यं श्रावयेद् विप्रान् भारतं भरतर्षभ

atirātrasya yajñasya phalaṃ prāpnoti mānavaḥ | prāpnuyācca kratuphalaṃ tathā parvaṇi parvaṇi || 84||| vācako bharataśreṣṭha vyaktākṣarapadasvaraḥ | bhaviṣyaṃ śrāvayed viprān bhārataṃ bharatarṣabha

हिन्दी अर्थ

भरतकुलतिलक जनमेजय! वाचकको चाहिये कि वह सुस्पष्ट अक्षर, पद एवं स्वरके साथ ब्राह्मणोंको भविष्यपर्व एवं भारतका श्रवण कराये

अध्याय 315

श्लोक 86

भुक्तवत्सु द्विजेन्द्रेषु यथावत् सम्प्रदापयेत् ।वाचकं भरतश्रेष्ठ भोजयित्वा स्वलङ्कृतम्

bhuktavatsu dvijendreṣu yathāvat sampradāpayet | vācakaṃ bharataśreṣṭha bhojayitvā svalaṅkṛtam

हिन्दी अर्थ

भरततश्रेष्ठ ! श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर वाचकको भी भोजन कराकर उसे भलीभाँति अलंकृत करके यथोचित रूपसे दक्षिणा दे

अध्याय 315

श्लोक 87

वाचके परितुष्टे तु शुभा प्रीतिरनुत्तमा ।ब्राह्मणेषु च तुष्टेषु प्रसन्नाः सर्वदेवताः

vācake parituṣṭe tu śubhā prītiranuttamā | brāhmaṇeṣu ca tuṣṭeṣu prasannāḥ sarvadevatāḥ

हिन्दी अर्थ

वाचकके संतुष्ट होनेपर परम उत्तम मड्लमयी प्रीति प्राप्त होती है। अन्य ब्राह्मणोंके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होते हैं

अध्याय 315

श्लोक 88

ततो हि भरणं कार्यं द्विजानां भरतर्षभ ।सर्वकामैर्यथान्यायं साधुभिश्च यथाक्रमम्

tato hi bharaṇaṃ kāryaṃ dvijānāṃ bharatarṣabha | sarvakāmairyathānyāyaṃ sādhubhiśca yathākramam

हिन्दी अर्थ

भरतभूषण ! तत्पश्चात्‌ यथोचित रूपसे सब प्रकारके उत्तम, मनोवाज्छित पदार्थ देकर क्रमश: सभी द्विजोंका भरण-पोषण करना चाहिये

अध्याय 315

श्लोक 89

इत्येष विधिरुद्दिष्टो मया ते द्विपदां वर ।श्रद्दधानेन वै भाव्यं यन्मां त्वं परिपृच्छसि

ityeṣa vidhiruddiṣṭo mayā te dvipadāṃ vara | śraddadhānena vai bhāvyaṃ yanmāṃ tvaṃ paripṛcchasi

हिन्दी अर्थ

नरश्रेष्ठ ! तुमने मुझसे जो पूछा था, उसके अनुसार मैंने तुमसे महाभारत और हरिवंश सुननेकी यह विधि बतायी है । तुम्हें इसपर श्रद्धा करनी चाहिये

अध्याय 315

श्लोक 90

भारतश्रवणे राजन् पारणे च नृपोत्तम ।सदा यत्नवता भाव्यं श्रेयस्तु परमिच्छता

bhārataśravaṇe rājan pāraṇe ca nṛpottama | sadā yatnavatā bhāvyaṃ śreyastu paramicchatā

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! नृपश्रेष्ठ ! जो परम कल्याणकी इच्छा रखता हो, उसे हरिवंशसहित महाभारत सुनने और उसकी पारणा पूरी करनेके लिये सदा यत्रशील रहना चाहिये

अध्याय 315

श्लोक 91

भारतं शृणुयान्नित्यं भारतं परिकीर्तयेत् ।भारतं भवने यस्य तस्य हस्तगतो जयः

bhārataṃ śṛṇuyānnityaṃ bhārataṃ parikīrtayet | bhārataṃ bhavane yasya tasya hastagato jayaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रतिदिन भारतका श्रवण करे। नित्य-प्रति भारतका कीर्तन करे। जिसके घरमें महाभारतकी पुस्तक है, उसके हाथमें विजय है

अध्याय 315

श्लोक 92

भारतं परमं पुण्यं भारते विविधाः कथाः ।भारतं सेव्यते देवैर्भारतं परिकीर्तयेत्

bhārataṃ paramaṃ puṇyaṃ bhārate vividhāḥ kathāḥ | bhārataṃ sevyate devairbhārataṃ parikīrtayet

हिन्दी अर्थ

भारत परम पुण्यमय ग्रन्थ है। भारतमें नाना प्रकारकी कथाएँ हैं । देवतालोग भी भारतका सेवन करते हैं, अत: भारतका अवश्य कीर्तन करे

अध्याय 315

श्लोक 93

भारतं सर्वशास्त्राणामुत्तमं भरतर्षभ ।भारतात् प्राप्यते मोक्षस्तत्त्वमेतद् ब्रवीमि ते

bhārataṃ sarvaśāstrāṇāmuttamaṃ bharatarṣabha | bhāratāt prāpyate mokṣastattvametad bravīmi te

हिन्दी अर्थ

भरतश्रेष्ठ! भारत सम्पूर्ण शास्त्रोंमें उत्तम है। भारतके अनुशीलनसे मोक्ष प्राप्त होता है। यह मैं तुम्हें तत्वकी बात बता रहा हूँ

अध्याय 315

श्लोक 94

महाभारतमाख्यानं क्षितिं गां च सरस्वतीम् ।ब्राह्मणं केशवं चापि कीर्तयन् नावसीदति

mahābhāratamākhyānaṃ kṣitiṃ gāṃ ca sarasvatīm | brāhmaṇaṃ keśavaṃ cāpi kīrtayan nāvasīdati

हिन्दी अर्थ

जो महाभारत इतिहास, पृथ्वी, गौ, सरस्वती, ब्राह्मण और भगवान्‌ श्रीकृष्णका कीर्तन करता है, वह कभी कष्टमें नहीं पड़ता

अध्याय 315

श्लोक 95

वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ ।आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते

vede rāmāyaṇe puṇye bhārate bharatarṣabha | ādau cānte ca madhye ca hariḥ sarvatra gīyate

हिन्दी अर्थ

भरतभूषण! वेद, रामायण तथा पवित्र महाभारतके आदि, मध्य और अन्तमें सर्वत्र श्रीहरिका गान किया जाता है

अध्याय 315

श्लोक 96

यत्र विष्णुकथा दिव्याः श्रुतयश्च सनातनाः ।तच्छ्रोतव्यं मनुष्येण परं पदमिहेच्छता

yatra viṣṇukathā divyāḥ śrutayaśca sanātanāḥ | tacchrotavyaṃ manuṣyeṇa paraṃ padamihecchatā

हिन्दी अर्थ

जो इस लोकमें परम पदकी इच्छा रखता हो, उस मनुष्यको चाहिये कि जिसमें भगवान्‌ विष्णुकी दिव्य कथाएँ और सनातन श्रुतियाँ हैं, उस महाभारत एवं हरिवंशका वह श्रवण करे

अध्याय 315

श्लोक 97

एतत् पवित्रं परममेतद् धर्मनिदर्शनम् ।एतत् सर्वगुणोपेतं श्रोतव्यं भूतिमिच्छता

etat pavitraṃ paramametad dharmanidarśanam | etat sarvaguṇopetaṃ śrotavyaṃ bhūtimicchatā

हिन्दी अर्थ

यह परम पवित्र है। यह धर्मका निरूपण करनेवाला शास्त्र है तथा यह समस्त उत्तम गुणोंसे युक्त है। अत: कल्याणकामी पुरुषको इसका श्रवण करना चाहिये

अध्याय 315

श्लोक 98

क्रियतेऽसारसंसारे वाञ्छितस्यैव कारणम् ।हरिवंशस्य श्रवणमिति द्वैपायनोऽब्रवीत्

kriyate'sārasaṃsāre vāñchitasyaiva kāraṇam | harivaṃśasya śravaṇamiti dvaipāyano'bravīt

हिन्दी अर्थ

इस असार संसारमें हरिवंशका श्रवण सभी मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाला है, इसलिये श्रेष्ठ पुरुष इसका श्रवण करते हैं। ऐसा द्वैपायन वेदव्यासका कथन है

अध्याय 315

श्लोक 99

अश्वमेधसहस्रेण वाजपेयशतैस्तथा ।यत् फलं प्राप्यते पुम्भिस्तद्धरेर्वंशपारणात्

aśvamedhasahasreṇa vājapeyaśataistathā | yat phalaṃ prāpyate pumbhistaddharervaṃśapāraṇāt

हिन्दी अर्थ

एक हजार अश्वमेध और एक सौ वाजपेय यज्ञ करनेसे मनुष्योंको जो फल प्राप्त होता है, वह हरिवंशका पारायण करनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है

अध्याय 315

श्लोक 100

अजरममरमेकं ध्येयमाद्यन्तशून्यं सगुणमगुणमाद्यं स्थूलमत्यन्तसूक्ष्मम् ।निरुपममनुमेयं योगिनां ज्ञानगम्यं त्रिभुवनगुरुमीशं त्वां प्रपन्नोऽस्मि विष्णो

ajaramamaramekaṃ dhyeyamādyantaśūnyaṃ saguṇamaguṇamādyaṃ sthūlamatyantasūkṣmam | nirupamamanumeyaṃ yogināṃ jñānagamyaṃ tribhuvanagurumīśaṃ tvāṃ prapanno'smi viṣṇo

हिन्दी अर्थ

विष्णो! आप अजर, अमर, एक (अद्वितीय), ध्यान करने योग्य, अनादि, अनन्त, सगुण, निर्गुण, सबके आदिकारण, स्थूल, अत्यन्त सूक्ष्म, उपमारहित, अनुमानके योग्य, योगियोंके लिये ज्ञानगम्य, तीनों लोकोंके गुरु तथा ईश्वर हैं, अत: मैं आपकी शरणमें आया हूँ

अध्याय 315

श्लोक 101

सर्वस्तरतु दुर्गाणि सर्वो भद्राणि पश्यतु ।सर्वेषां वाञ्छिता अर्था भवन्त्वस्य च पारणात्

sarvastaratu durgāṇi sarvo bhadrāṇi paśyatu | sarveṣāṃ vāñchitā arthā bhavantvasya ca pāraṇāt

हिन्दी अर्थ

इस ग्रन्थके नियमपूर्वक पठन एवं श्रवणसे सब लोग दुर्गम संकटोंसे पार हो जाय, सब कल्याणका दर्शन करें तथा सबके मनोवाज्छित अर्थ सिद्ध हो जायँँ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.