Harivamsha Purana
294
अध्याय 294 / 318

Parva 3, Adhyāya 111

70 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ70 श्लोक

अध्याय 294

श्लोक 1

श्रीकृष्णस्य गोलक्रीडा, सुधर्मासभायां दुर्वासादीनां मुनीनां आगमनं, यादवेभिः कृष्णेन च तेषां सत्कारं, श्रीकृष्णेन तेभ्यः आगमनस्य कारणस्य पृच्छा, दुर्वाससा भगवतः स्तुति एवं उपालम्भनपूर्वकं तस्य प्रश्नस्य प्रतिवादं कृत्वा स्वदुर्दशायाः वृत्तान्तकथनं अथ सर्वेश्वरो विष्णुः पद्मकिञ्जल्कलोचनः ।श्यामः पीताम्बरः श्रीमान् प्रलम्बाम्बरभूषणः

śrīkṛṣṇasya golakrīḍā, sudharmāsabhāyāṃ durvāsādīnāṃ munīnāṃ āgamanaṃ, yādavebhiḥ kṛṣṇena ca teṣāṃ satkāraṃ, śrīkṛṣṇena tebhyaḥ āgamanasya kāraṇasya pṛcchā, durvāsasā bhagavataḥ stuti evaṃ upālambhanapūrvakaṃ tasya praśnasya prativādaṃ kṛtvā svadurdaśāyāḥ vṛttāntakathanaṃ atha sarveśvaro viṣṇuḥ padmakiñjalkalocanaḥ | śyāmaḥ pītāmbaraḥ śrīmān pralambāmbarabhūṣaṇaḥ

श्लोक 1–3 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेधर! जो सबके ईथर और सर्वव्यापी हैं, जिनके नेत्र कमलदलके समान सुन्दर हैं, जो श्यामसुन्दर, पीताम्बरधारी, श्रीसम्पन्न, लटकते हुए लम्बे वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित, मुकुटमण्डित और लक्ष्मीके अधिपति हैं, जिनके मस्तकपर काले- काले घुँघराले केश शोभा पाते हैं, जो अव्यक्त, सनातनदेव, सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त, कलातीत एवं कल्याणमय हैं, ते भगवान्‌ श्रीकृष्ण किसी समय सात्यकि आदि अन्य कुमारोंके साथ क्रीडा-विहारमें लगे हुए थे

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श्लोक 2

किरीटी श्रीपतिः कृष्णो नीलकुञ्चितमूर्धजः ।अव्यक्तः शाश्वतो देवः सकलो निष्कलः शिवः

kirīṭī śrīpatiḥ kṛṣṇo nīlakuñcitamūrdhajaḥ | avyaktaḥ śāśvato devaḥ sakalo niṣkalaḥ śivaḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

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श्लोक 3

क्रीडाविहारोपगतः कदाचिदभवद्धरिः ।कुमारैरपरैः सार्धं सात्यकिप्रमुखैर्नृप

krīḍāvihāropagataḥ kadācidabhavaddhariḥ | kumārairaparaiḥ sārdhaṃ sātyakipramukhairnṛpa

अर्थ श्लोक 1 के साथ

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श्लोक 4

गोलक्रीडां सुधर्माया मध्ये यादवसत्तमः ।चकार प्रियकृत् कृष्णो युयुधानेन केशवः

golakrīḍāṃ sudharmāyā madhye yādavasattamaḥ | cakāra priyakṛt kṛṣṇo yuyudhānena keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

सुधर्मा-सभाके मध्यभागमें विराजमान हो सबका प्रेय करनेवाले यादवशिरोमणि केशव कृष्ण सात्यकिके पाथ गोलक्रीडा कर रहे थे

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श्लोक 5

ममायं प्रथमो गोलस्तव पश्चाद् भविष्यति ।इति ब्रुवंस्तदा विष्णुः सात्यकिं कमलेक्षणः

mamāyaṃ prathamo golastava paścād bhaviṣyati | iti bruvaṃstadā viṣṇuḥ sātyakiṃ kamalekṣaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय कमलनयन श्रीकृष्ण सात्यकिसे यह कह रहे थे कि *यह पहला गोल पेरा है, तुम्हारा पीछे होगा '

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श्लोक 6

पार्श्वस्था यादवास्तस्य वसुदेवपुरोगमाः ।उद्धवप्रमुखा राजन्नासेदुः क्वचिदत्र वै

pārśvasthā yādavāstasya vasudevapurogamāḥ | uddhavapramukhā rājannāseduḥ kvacidatra vai

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! उनके पार्शभागमें रसुदेव तथा उद्धव आदि प्रमुख यादव यथोचित स्थानपर बैठे थे

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श्लोक 7

अन्यव्यापाररहितो भूतात्मा भूतभावनः ।विजहार यथा रामः सुग्रीवेण पुरा नृप

anyavyāpārarahito bhūtātmā bhūtabhāvanaḥ | vijahāra yathā rāmaḥ sugrīveṇa purā nṛpa

हिन्दी अर्थ

नरेधर! जैसे पूर्वकालमें भगवान्‌ श्रीराम भपने सखा सुग्रीवके साथ क्रीडा-विहार करते थे, उसी कार जब दूसरा व्यापार (कार्य) नहीं रहता, तब भूतात्मा भूत-भावन भगवान्‌ श्रीकृष्ण भी अपने सुहदोंके पाथ मनोरज्जन करते थे

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श्लोक 8

मध्यन्दिने महाविष्णुः शैनेयेन सहाच्युतः ।विक्रीड्य सुचिरं कृष्ण उपारंसीत् स यादवः

madhyandine mahāviṣṇuḥ śaineyena sahācyutaḥ | vikrīḍya suciraṃ kṛṣṇa upāraṃsīt sa yādavaḥ

हिन्दी अर्थ

उस दिन दोपहरके समय पहाविष्णुस्वरूप अच्युत श्रीकृष्ण सात्यकिके साथ देरतक ऐलक्रीडा करके यादवोंसहित उससे विरत हो गये

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श्लोक 9

द्वाःस्थेन वारिताः पूर्वं द्वार्येव च समास्थिताः ।इदमन्तरमित्येव विविशुस्तां सभां नृप

dvāḥsthena vāritāḥ pūrvaṃ dvāryeva ca samāsthitāḥ | idamantaramityeva viviśustāṃ sabhāṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

गजन्‌ ! जिन्हें द्वारपालने पहले भीतर आनेसे रोक दिया था और द्वारपर ही आदरपूर्वक बिठा रखा था, वे मुनि यह भीतर प्रवेश करनेका अवसर है' ऐसा जानकर उस पमय उस सभामें प्रविष्ट हुए

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श्लोक 10

यतयो दीर्घतपसः पुरस्कृत्य तपोधनम् ।दुर्वाससं सुमनसो ददृशुर्यादवेश्वरम्

yatayo dīrghatapasaḥ puraskṛtya tapodhanam | durvāsasaṃ sumanaso dadṛśuryādaveśvaram

श्लोक 10–12 का हिन्दी अर्थ

दीर्घकालसे तपस्या करनेवाले उन शुद्धचेता यतियोंने तपोधन दुर्वासाकों भागे करके यादवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन किया, जो पहले ऐलक्रीडामें आसक्त थे और उस समय भी जिनके . हाथमें गोल मौजूद था। वे प्रफुल्ल कमलदलके समान विशाल नेत्रवाले श्रीविष्णु हरि एक नेत्रसे सात्यकिको भानन्द प्रदान करते थे और दूसरेसे उस गोलकी ओर रेख रहे थे। महाराज! इसी समय वे यति उनके सामने देखायी दिये

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श्लोक 11

गोलक्रीडासमासक्तं करसंस्थितगोलकम् ।पद्मपत्रविशालाक्षं विष्णुं तं सात्यकिं हरिम्

golakrīḍāsamāsaktaṃ karasaṃsthitagolakam | padmapatraviśālākṣaṃ viṣṇuṃ taṃ sātyakiṃ harim

अर्थ श्लोक 10 के साथ

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श्लोक 12

एकेनाक्ष्णा ह्लादयन्तं परेणान्येन गोलकम् ।यतयश्च महाराज प्रत्यदृश्यन्त तत्पुरः

ekenākṣṇā hlādayantaṃ pareṇānyena golakam | yatayaśca mahārāja pratyadṛśyanta tatpuraḥ

अर्थ श्लोक 10 के साथ

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श्लोक 13

वृष्णिपः पुण्डरीकाक्षः सात्यकिर्बलभद्रकः ।वसुदेवस्तथाक्रूरः उग्रसेनस्तथा नृप

vṛṣṇipaḥ puṇḍarīkākṣaḥ sātyakirbalabhadrakaḥ | vasudevastathākrūraḥ ugrasenastathā nṛpa

श्लोक 13–14 का हिन्दी अर्थ

वृष्णि-पालक कमलनयन प्रीकृष्ण सात्यकि, बलभद्र, वसुदेव, अक्रूर, उम्रसेन तथा अन्य सब यादव उन यतियोंको देखकर बड़ी घबराहठमें ड़ गये और शड्ितचित्त होकर एक-दूसरेसे पूछने नगे-'यह क्या है? कैसी बात है ?'

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श्लोक 14

अन्ये च यादवाः सर्वे सम्भ्रमं प्रतिपेदिरे ।इदं किमिदमित्येवं व्याशङ्कमनसोऽभवन्

anye ca yādavāḥ sarve sambhramaṃ pratipedire | idaṃ kimidamityevaṃ vyāśaṅkamanaso'bhavan

अर्थ श्लोक 13 के साथ

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श्लोक 15

पृष्ठतोऽप्यनुगच्छन्ति दिधक्षन्तं जगत्त्रयम् ।अर्धकौपीनवसनं स्मरन्तं कमपि द्विजम्

pṛṣṭhato'pyanugacchanti didhakṣantaṃ jagattrayam | ardhakaupīnavasanaṃ smarantaṃ kamapi dvijam

श्लोक 15–17 का हिन्दी अर्थ

वे पादव उन अद्भुत प्रभावशाली ब्राह्मण दुर्वासाके पीछे- पीछे चलने लगे, जो मानो तीनों लोकोंको जलाकर भस्म कर देना चाहते थे। उनके कौपीनका आधा ही वस्त्र शेष था। वे बार-बार किसीको याद करते थे, उनके मनमें ्ड़ा संताप था। उन्होंने टूटा हुआ दण्ड धारण कर खा था। राजा हंसने उन्हें बहुत कष्ट पहुँचाया था, अतः ते भीतर-ही-भीतर रोषसे जल रहे थे। उनके नेत्रसे हाभयंकर अग्ि प्रकट हो रही थी। वे यादवेश्र ग्रीकृष्णकी ओर देख रहे थे। इस अवस्थामें संन्यासी र्वासाको उन यादवशिरोमणियोंने भयभीत होकर रेखा

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श्लोक 16

अन्तस्तापसमायुक्तं छिन्नदण्डधरं यतिम् ।अन्तर्ज्वलन्तं रोषेण हंसासादितकल्मषम्

antastāpasamāyuktaṃ chinnadaṇḍadharaṃ yatim | antarjvalantaṃ roṣeṇa haṃsāsāditakalmaṣam

अर्थ श्लोक 15 के साथ

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श्लोक 17

नेत्रोत्थितमहावह्निं प्रेक्षन्तं यादवेश्वरम् ।दुर्वाससं ते ददृशुर्भीता यादवसत्तमाः

netrotthitamahāvahniṃ prekṣantaṃ yādaveśvaram | durvāsasaṃ te dadṛśurbhītā yādavasattamāḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

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श्लोक 18

किं करिष्यत्यसौ क्रुद्धः कि वा वक्ष्यति नः प्रभुः ।इति प्राञ्जलयः सर्वे यादवाः प्रतिपेदिरे

kiṃ kariṣyatyasau kruddhaḥ ki vā vakṣyati naḥ prabhuḥ | iti prāñjalayaḥ sarve yādavāḥ pratipedire

श्लोक 18–20 का हिन्दी अर्थ

ततमो श्३१९ वे मन-ही-मन सोचने लगे-' पता नहीं, यह कुपित होकर क्या करेंगे ? और हमारे स्वामी श्रीकृष्ण इनसे क्या कहेंगे ।' ऐसा विचार करते हुए वे समस्त यादव और तृष्णिवंशी हाथ जोड़कर उनकी सेवामें उपस्थित हुए और कुछ मन्द स्वरमें बोले-' भगवन्‌! आपके लिये पह आसन है।' इसी समय इन्द्रियोंके नियन्ता भगवान्‌ श्रीकृष्ण कुछ उछलकर दुर्वासाके आगे चले आये और बोले-विप्रवर! यह आसन है, इसपर सुखपूर्वक बैठिये। आज मैं आपकी सेवामें खड़ा हूँ, मैं आपका केड्र हूँ

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श्लोक 19

इदमासनमित्येवं किञ्चिदूचुश्च वृष्णयः ।ततः कृष्णो हृषीकेशः किञ्चिदुत्प्लुत्य तत्पुरः

idamāsanamityevaṃ kiñcidūcuśca vṛṣṇayaḥ | tataḥ kṛṣṇo hṛṣīkeśaḥ kiñcidutplutya tatpuraḥ

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 20

इदमासनमित्येवं स्थीयतामिह निर्वृतः ।अहमद्य स्थितो विप्र किङ्करोऽस्मीति चाव्रवीत्

idamāsanamityevaṃ sthīyatāmiha nirvṛtaḥ | ahamadya sthito vipra kiṅkaro'smīti cāvravīt

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 21

ततः किञ्चिदिवासीन आसने यतिविग्रहः ।आसने संस्थिते तस्मिन् यतयो वीतमत्सराः

tataḥ kiñcidivāsīna āsane yativigrahaḥ | āsane saṃsthite tasmin yatayo vītamatsarāḥ

श्लोक 21–33 का हिन्दी अर्थ

तब वे संन्यासीरूपधारी दुर्वासा उस आसनपर कुछ बैठ-से गये। उनके आसन ग्रहण कर लेनेपर अन्य मात्सर्यरहित संन्यासियोंने भी संतोषपूर्वक पथायोग्य आसन स्वीकार किये। किरीटधारी श्रीकृष्णने भर्घ्ध आदिके क्रमसे उनका उत्तम आतिथ्य-सत्कार केया, फिर वे भगवान्‌ हषीकेश उन प्रभावशाली यति ुर्वासासे इस प्रकार बोले—“विप्रवर! बताइये, इस गगरमें आपलोगोंका शुभागमन किसलिये हुआ है? अथवा आपलोगोंको यहाँ आनेमें कोई महान्‌ कारण देखायी दिया है ? आपलोग द्विजोंमें श्रेष्ठ एवं निष्पाप मंन्यासी हैं; विप्रवरो ! आपलोग हम-जैसे गृहस्थोंसे सदा ने:स्पृह रहते हैं। आपके लिये कोई प्रार्थथीय वस्तु ही हीं है; क्योंकि आपलोगोंके हृदयमें किसी वस्तुकी कामना ही नहीं होती है। जो लोग किसी स्पृहासे प्रेरित कर कर्म करनेवाले हैं वे उत्तम ब्रतधारी ब्राह्मण अपनी मभीष्ट वस्तु माँगनेके लिये क्षत्रियोंके पास जाते हैं। किंतु वप्रवर ! हमारे बहुत सोचने-विचारनेपर भी कोई ऐसी बात दिखायी नहीं देती, जिसके लिये आपलोगोंका पहाँतक आना सम्भव हो । ब्रह्मन्‌ ! फिर आपके आगमनका या कारण है, यह मेरी समझमें नहीं आता। आप पहाँतक पधारे हैं, इतनेसे ही यह अनुमान होता है कि भापके शुभागमनका कोई-न-कोई कारण अवश्य है। दि है तो आप उसे बताइये। हम आपसे ही उसका नान प्राप्त करेंगे। राजन्‌ ! देवेश्वर चक्रपाणि जनार्दनके सा कहनेपर उन ब्राह्मण दुर्वासाका महान्‌ कोप पर भी बढ़ गया। पहलेका जो क्रोध था, उससे अधिक भर महान्‌ कोप प्रकट होने लगा, मानो वे तीनों नोकोंको जला देना और अपनी ओर देखनेवाले लोगोंको त्रा जाना चाहते हों । क्रोधसे मूर्च्छित हुए दुर्वासा रोषसे नाल आँखें करके क्रोधपूर्वक हँसते और जलाते हुए-से स समय श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले-'यादवेश्र ! भाप हमसे ऐसी बात क्यों कहते हैं कि आपके भागमनका कारण मेरी समझमें नहीं आता' मैं आपको नानता हूँ। आप महान्‌ देव विष्णु हैं; फिर भी हमें ठगते ए-से बात करते हैं। विष्णो ! हम बहुत पुराने हैं और र्वकालके वृत्तान्तोंको जानते हैं, जिसके अनुसार हम रहते हैं कि आप देवताओंके भी देवता हैं और आपने पयासे मानवशरीर धारण किया है। जगदीश्वर ! अतः माप हमारे स्वामी होकर हमसे अपने-आपको क्यों छिपा हे हैं ?

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श्लोक 22

आसनानि यथायोगं भेजिरे निर्वृताः किल ।अर्घ्यादिसमुदाचारं चक्रे कृष्णः किरीटभृत्

āsanāni yathāyogaṃ bhejire nirvṛtāḥ kila | arghyādisamudācāraṃ cakre kṛṣṇaḥ kirīṭabhṛt

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 23

आह भूयो हृषीकेशो यतिं दुर्वाससं प्रभुम् ।किमर्थं ब्रूहि विप्रेन्द्र अस्मिन् प्रत्यागमो हि वः

āha bhūyo hṛṣīkeśo yatiṃ durvāsasaṃ prabhum | kimarthaṃ brūhi viprendra asmin pratyāgamo hi vaḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 24

दृष्टं वा ह्यथवा किञ्चित् कारणं चास्ति वो महत् ।संन्यासिनो द्विजश्रेष्ठा यूयं विगतकल्मषाः

dṛṣṭaṃ vā hyathavā kiñcit kāraṇaṃ cāsti vo mahat | saṃnyāsino dvijaśreṣṭhā yūyaṃ vigatakalmaṣāḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

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श्लोक 25

निःस्पृहाश्च सदा यूयमस्मत्तो द्विजपुङ्गवाः ।प्रार्थ्यं नाम न चैवास्ति स्पृहा नैवास्ति वो यतः

niḥspṛhāśca sadā yūyamasmatto dvijapuṅgavāḥ | prārthyaṃ nāma na caivāsti spṛhā naivāsti vo yataḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 26

स्पृहाप्रेरितकर्माणः क्षत्रियान् यान्ति सुव्रताः ।निरूप्यमाणमस्माभिर्विप्र किञ्चिन्न दृश्यते

spṛhāpreritakarmāṇaḥ kṣatriyān yānti suvratāḥ | nirūpyamāṇamasmābhirvipra kiñcinna dṛśyate

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 27

न जाने कारणं ब्रह्मन् युष्मदागमनं प्रति ।एतावता चानुमेयं किएचित्कारणमस्ति वै

na jāne kāraṇaṃ brahman yuṣmadāgamanaṃ prati | etāvatā cānumeyaṃ kiecitkāraṇamasti vai

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 28

तद् ब्रूहि यदि विद्येत त्वत्तो ज्ञास्यामहे वयम् ।इत्युक्तवति देवेशे चक्रपाणौ जनार्दने

tad brūhi yadi vidyeta tvatto jñāsyāmahe vayam | ityuktavati deveśe cakrapāṇau janārdane

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 29

तस्यापि राजन्विप्रस्य भूयः कोपो महानभूत् ।तस्मादभ्यधिकः पूर्वात् कोपः सञ्जायते महान्

tasyāpi rājanviprasya bhūyaḥ kopo mahānabhūt | tasmādabhyadhikaḥ pūrvāt kopaḥ sañjāyate mahān

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 30

दिधक्षन्निव लोकांस्त्रीन् भक्षयन्निव पश्यतः ।रोषरक्तेक्षणः क्रुद्धो हसन्निव दहन्निव

didhakṣanniva lokāṃstrīn bhakṣayanniva paśyataḥ | roṣaraktekṣaṇaḥ kruddho hasanniva dahanniva

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 31

उवाच वचनं विष्णुं दुर्वासा क्रोधमूर्च्छितः ।न जाने इति कस्मात् त्वं ब्रूषे नो यादवेश्वर

uvāca vacanaṃ viṣṇuṃ durvāsā krodhamūrcchitaḥ | na jāne iti kasmāt tvaṃ brūṣe no yādaveśvara

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 32

जानामि त्वां महादेवं वञ्चयन्निव भाषसे ।पुरातना वयं विष्णो पूर्ववृत्तान्तवेदिनः

jānāmi tvāṃ mahādevaṃ vañcayanniva bhāṣase | purātanā vayaṃ viṣṇo pūrvavṛttāntavedinaḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 33

यथा हि देवदेवोऽसि मायामानुषदेहवान् ।निगूहसे प्रभुरतः कस्मान्नो जगतीपते

yathā hi devadevo'si māyāmānuṣadehavān | nigūhase prabhurataḥ kasmānno jagatīpate

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 34

सोऽसि ब्रह्मविदां मूर्तिस्तवैतत् परमं पदम् ।यदभ्यर्च्य पुरा ब्रह्मा यच्च ज्ञाना वयं पुरा

so'si brahmavidāṃ mūrtistavaitat paramaṃ padam | yadabhyarcya purā brahmā yacca jñānā vayaṃ purā

हिन्दी अर्थ

आप ही ब्रह्मवेत्ताओंके आत्मा हैं। ह परमपद आपका ही स्वरूप है, पूर्वकालमें जिसकी माराधना करके ब्रह्माजी ज्ञानवान्‌ू हुए और हम भी जिसकी उपासना करके ज्ञानी हुए हैं

अध्याय 294

श्लोक 35

यतो विश्वमिदं भूतं तदेतत् परमं पदम् ।यच्च स्थूलं विजानन्ति पुरा तत्त्वेन चेतसा

yato viśvamidaṃ bhūtaṃ tadetat paramaṃ padam | yacca sthūlaṃ vijānanti purā tattvena cetasā

श्लोक 35–40 का हिन्दी अर्थ

जिससे यह म्पूर्ण जगत्‌ प्रकट हुआ है, वही आपका यह परम- द है। विश्वे्वर! जिसे पूर्वकालमें पुराणवेत्ता पुरुष त््वनिष्ठ चित्तसे स्थूल (विराट) -रूपसे जानते थे, यह ही आपका ही सर्वोत्कृष्ट स्वरूप है। जो भगवदर्थ कर्म भगवान्‌के समर्पणपूर्वक किये गये यज्ञ आदिके अनुष्ठान मथवा भजन-साधन) -से प्राप्त होता है, जिसका स्मरण रके हम वीतराग संन्यासी भी परमानन्दमें निमग्र हो तते हैं तथा प्रेमी भक्तोंको जिसका प्रत्यक्ष दर्शन होता , आपके उस सगुण-साकार (सच्चिदानन्दघन) विग्रहको ढ-बुद्धि मनुष्य नहीं जानते हैं। देव! हरे! हम वैसे आज्ञानी) नहीं हैं (हम आपको जानते और पहचानते ) ! अत: आप हमारे सामने जो यह कहते हैं कि *हम पके आनेका कारण नहीं जानते हैं, ' इससे अधिक ाहसपूर्ण बात और क्या हो सकती है ? देव ! केशिनिषूदन ! हम जड-मूलकी बातें जानते हैं, उनके सामने इस प्रकार पपर-ऊपरकी बातोंका विवेचन करनेसे आपको क्या ाभ होगा? वेदान्त-शास्त्र (उपनिषद्‌ आदि) -में भी आपके इसी विख्यात तेजोमय स्वरूपका ब्रह्म आदि मोंसे विचार किया जाता है। प्रभो! जो विज्ञानसे तृ्त ष्याप योगी जन हैं, वे भी अपने हृदयकमलमें आपके सी स्वरूपका दर्शन करते हैं

अध्याय 294

श्लोक 36

पुराविदोऽथ विश्वेश यदेतत् परमं वपुः ।कर्मणा प्राप्यते यत्तु यत्स्मृत्वा निर्वृता वयम्

purāvido'tha viśveśa yadetat paramaṃ vapuḥ | karmaṇā prāpyate yattu yatsmṛtvā nirvṛtā vayam

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 37

प्रत्यक्षमपि यद्रूपं नैव जानन्ति मानुषाः ।न हि मूढधियो देव न वयं तादृशा हरे

pratyakṣamapi yadrūpaṃ naiva jānanti mānuṣāḥ | na hi mūḍhadhiyo deva na vayaṃ tādṛśā hare

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 38

न जाने इति यद् ब्रूषे किमतः साहसं वचः ।ये हि मूलं विजानन्ति तेषां तु प्रविवेचनम्

na jāne iti yad brūṣe kimataḥ sāhasaṃ vacaḥ | ye hi mūlaṃ vijānanti teṣāṃ tu pravivecanam

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 39

कुर्वतः किं फलं देव तव केशिनिषूदन ।वेदान्ते प्रथितं तेजस्तव चेदं विचार्यते

kurvataḥ kiṃ phalaṃ deva tava keśiniṣūdana | vedānte prathitaṃ tejastava cedaṃ vicāryate

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 40

ये च विज्ञानतृप्तास्तु योगिनो वीतकल्मषाः ।पश्यन्ति हृत्सरोजेऽपि तदेवेदं वपुः प्रभो

ye ca vijñānatṛptāstu yogino vītakalmaṣāḥ | paśyanti hṛtsaroje'pi tadevedaṃ vapuḥ prabho

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 41

वेदैर्यद् गीयते तेजो ब्रह्मेति प्रतिपाद्य वै ।तदेवेदं विजानेऽहं रूपमैश्वरमेव च

vedairyad gīyate tejo brahmeti pratipādya vai | tadevedaṃ vijāne'haṃ rūpamaiśvarameva ca

हिन्दी अर्थ

वेदॉंद्वारा हा कहकर जिस तेजोमय परमतत्त्वका गान किया ता है, आपका यह ऐश्वर्यशाली रूप वही है (उस रब्रह्मसे अभिन्न ही है), ऐसा मैं जानता हूँ'

अध्याय 294

श्लोक 42

वैष्णवं परमं तेज इति वेदेषु पठ्यते ।अवगच्छाम्यहं विष्णो तदेवेदं वपुस्तव

vaiṣṇavaṃ paramaṃ teja iti vedeṣu paṭhyate | avagacchāmyahaṃ viṣṇo tadevedaṃ vapustava

हिन्दी अर्थ

शततमो5ध्याय: + श्३े२१ “विष्णो ! वेदों में 'तद्विष्णो: परमं पदम्‌' इत्यादिरूपसे विष्णुके जिस परम तेजोमय तत्त्वका प्रतिपादन किया जाता है, वही आपका यह स्वरूप है—यह मैं अच्छी तरह जानता हूँ

अध्याय 294

श्लोक 43

य ओमित्युच्यते शब्दो यस्य वागिति गीयते ।स एवासि प्रभो विष्णो न जाने इति मा वद

ya omityucyate śabdo yasya vāgiti gīyate | sa evāsi prabho viṣṇo na jāne iti mā vada

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! विष्णो ! जिस 3 शब्दका उच्चारण होता है, वह जिनकी वाणीके रूपमें गाया जाता है, वे ही परमात्मा आप हैं; अत: आप यह न कहिये कि 'मैं आपके आनेका कारण नहीं जानता

अध्याय 294

श्लोक 44

परोक्षं यदि किञ्चित् स्यात् तव वक्तुं प्रयुज्यते ।न जाने इति गोविन्द मा वादीः साहसं हरे

parokṣaṃ yadi kiñcit syāt tava vaktuṃ prayujyate | na jāne iti govinda mā vādīḥ sāhasaṃ hare

हिन्दी अर्थ

गोविन्द! हरे! यदि आपके लिये कोई भी वस्तु परोक्ष होती तो आपका ऐसा कहना उचित हो सकता था; अतः "मैं नहीं जानता' यह साहसपूर्ण वचन आप मत कहिये

अध्याय 294

श्लोक 45

विश्वं यतः प्रादुरासीद् यस्मिँल्लीन क्षये सति ।इदं तदैश्वरं तेजस्त्ववगच्छाघि केशव

viśvaṃ yataḥ prādurāsīd yasmi~llīna kṣaye sati | idaṃ tadaiśvaraṃ tejastvavagacchāghi keśava

हिन्दी अर्थ

केशव! पूर्वकालमें यह विश्व जिससे प्रकट हुआ था और संहारकालमें यह फिर जिसमें लीन हो जायगा, वही आपका यह ईधरीय तेजोमय विग्रह है, ऐसा मैं जानता हूँ

अध्याय 294

श्लोक 46

कर्ता त्वं भूतभव्येश प्रतिभासि सदा हृदि ।यद् यद् रूपं स्मरे नित्यं तत् तदेवासि मे हृदि

kartā tvaṃ bhūtabhavyeśa pratibhāsi sadā hṛdi | yad yad rūpaṃ smare nityaṃ tat tadevāsi me hṛdi

हिन्दी अर्थ

भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी हरे! आप ही सबके कर्ता हैं और सदा मेरे हृदयमें प्रकाशित होते रहते हैं। मैं जिस-जिस रूपका स्मरण करता हूँ, आप सदा उसी-उसी रूपसे मेरे हदयमें विद्यमान हैं

अध्याय 294

श्लोक 47

वायुरेव यदा विष्णुरिति मे धीयते मतिः ।तदा तद्रूप एवासि हृन्मध्ये संस्थितो विभो

vāyureva yadā viṣṇuriti me dhīyate matiḥ | tadā tadrūpa evāsi hṛnmadhye saṃsthito vibho

हिन्दी अर्थ

विभो ! जब मेरी बुद्धि ऐसा निश्चय करती है कि वायु ही विष्णु हैं, तब आप वायुरूपसे ही मेरे हृदयमें विराजमान होते हैं

अध्याय 294

श्लोक 48

आकाशो विष्णुरित्येव कदाचिद्धीयते मतिः ।तदा तद्रूप एवासि हृन्मध्ये संस्थितो विभो

ākāśo viṣṇurityeva kadāciddhīyate matiḥ | tadā tadrūpa evāsi hṛnmadhye saṃsthito vibho

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! जब मेरी बुद्धि कभी इस निश्चयपर पहुँचती है कि आकाश ही विष्णु है, तब आप उसी रूपमें मेरेमें प्रतिष्ठित होते हैं

अध्याय 294

श्लोक 49

पृथिवी विष्णुरित्येतत् कदाचिद्धीयते मतिः ।तदा पार्थिवरूपस्त्वं प्रतिभासि सदा मम

pṛthivī viṣṇurityetat kadāciddhīyate matiḥ | tadā pārthivarūpastvaṃ pratibhāsi sadā mama

हिन्दी अर्थ

जब कभी मेरी बुद्धिका यह निश्चय होता है कि 'पृथिवी ही विष्णु है', तब आप सदा मुझे पार्थिवरूप ही प्रतीत होते हैं

अध्याय 294

श्लोक 50

रसोऽयं देव इत्येव कदाचिच्चिन्त्यते मया ।तदा रसात्मना विष्णो हृन्मध्येसंस्थितोविभो

raso'yaṃ deva ityeva kadāciccintyate mayā | tadā rasātmanā viṣṇo hṛnmadhyesaṃsthitovibho

हिन्दी अर्थ

प्रभो! विष्णो! जब कभी मैं यह सोचता हूँ कि यह रस ही नारायणदेव है', तब आप रसरूपसे मेरे हृदयमें प्रतिष्ठित होते हैं

अध्याय 294

श्लोक 51

यदा त्वां तेज इत्येवं स्मर्ता स्यां पुरुषोत्तम ।तदा तद्रूपसम्पन्नः प्रतिभासि सदा हृदि

yadā tvāṃ teja ityevaṃ smartā syāṃ puruṣottama | tadā tadrūpasampannaḥ pratibhāsi sadā hṛdi

हिन्दी अर्थ

पुरुषोत्तम! जब मैं आपका तेजोरूपसे स्मरण करता हूँ, तब आप सदा उसी रूपसे सम्पन्न होकर मेरे हृदयमें प्रकाशित होते हैं

अध्याय 294

श्लोक 52

चन्द्रमा हरिरित्येवं तदा चान्द्रमसं वपुः ।निरीक्ष्य चक्षुषा देव ततः प्रीतोऽस्मि केशव

candramā harirityevaṃ tadā cāndramasaṃ vapuḥ | nirīkṣya cakṣuṣā deva tataḥ prīto'smi keśava

हिन्दी अर्थ

देव ! केशव! जब मैंने ऐसा निश्चय किया कि “चन्द्रमा ही श्रीहरि हैं,' तब मैं चन्द्रमाके रूपमें ही आपके स्वरूपका नेत्रोंद्वारा दर्शन करके प्रसन्न होता हूँ

अध्याय 294

श्लोक 53

यदा सौरं वपुरिति स्मर्ता स्यां जगतीपते ।तदा तद्भावनायोगात् सूर्य एव विराजसे

yadā sauraṃ vapuriti smartā syāṃ jagatīpate | tadā tadbhāvanāyogāt sūrya eva virājase

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीनाथ! जब मैं ऐसा चिन्तन करता हूँ कि “यह सूर्यमण्डल ही आपका स्वरूप है, ' तब आप मेरी उस भावनाके योगसे सूर्यरूप होकर ही विराजमान होते हैं

अध्याय 294

श्लोक 54

तस्मात् सर्वं त्वमेवासि निश्चिता मतिरीदृशी ।अतो न जानेऽहमिति वक्तुं नेशो जनार्दन

tasmāt sarvaṃ tvamevāsi niścitā matirīdṛśī | ato na jāne'hamiti vaktuṃ neśo janārdana

हिन्दी अर्थ

अत: सब कुछ आप ही हैं, यह मेरी बुद्धिका निश्चय है; इसलिये जनार्दन! आप यह नहीं कह सकते कि ' मैं आपलोगोंके आनेका कारण नहीं जानता '

अध्याय 294

श्लोक 55

इत्यर्थं संस्थितो विष्णो पीडां नो नैव चिन्त्यसे ।अत्यन्तदुःखिता विष्णो वयं त्वामनुसंस्थिताः

ityarthaṃ saṃsthito viṣṇo pīḍāṃ no naiva cintyase | atyantaduḥkhitā viṣṇo vayaṃ tvāmanusaṃsthitāḥ

हिन्दी अर्थ

हमारी पीड़ाका कुछ विचार नहीं कर रहे हैं। भगवन्‌! हम अत्यन्त दुःखित होकर आपकी शरणमें आये हैं

अध्याय 294

श्लोक 56

ईदृशीयमवस्था नो नैतां स्मरसि केशव ।एतत् पुनर्भाग्यमतो नष्टमित्येव चिन्तये

īdṛśīyamavasthā no naitāṃ smarasi keśava | etat punarbhāgyamato naṣṭamityeva cintaye

श्लोक 56–58 का हिन्दी अर्थ

केशव! हमारी तो ऐसी दुर्दशा हो रही है और आप इसकी ओर ध्यान ही नहीं देते हैं; इससे हम बार- बार यही सोचते हैं कि हमारा भाग्य ही नष्ट हो गया है। प्रभो ! विष्णो ! हमलोग बड़े भाग्यहीन हैं, क्योंकि आप हमारा स्मरण नहीं करते हैं । जनार्दन ! कोई दो क्षत्रियकुमार हैं, जो भगवान्‌ शड्रका वर पाकर घमंडमें भर गये हैं । उन दोनोंके नाम हंस और डिम्भक हैं। केशव! वे दोनों यह कहते हुए कि गृहस्थ आश्रम ही सदा श्रेयस्कर है, हमें सताने लगे हैं

अध्याय 294

श्लोक 57

मन्दभाग्या वयं विष्णो यतो नो न स्मरेः प्रभो ।कौचित् क्षत्रियदायादौ गिरीशवरगर्वितौ

mandabhāgyā vayaṃ viṣṇo yato no na smareḥ prabho | kaucit kṣatriyadāyādau girīśavaragarvitau

अर्थ श्लोक 56 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 58

नाम्ना च हंसडिम्भकौ बाधेते नो जनार्दन ।गार्हस्थ्यं हि सदा श्रेयो वदन्ताविति केशव

nāmnā ca haṃsaḍimbhakau bādhete no janārdana | gārhasthyaṃ hi sadā śreyo vadantāviti keśava

अर्थ श्लोक 56 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 59

इतस्ततश्च धावन्तौ वदन्तौ बहु किल्बिषम् ।अयुक्तं बहु भाषन्तौ धर्षयन्तौ च नः सदा

itastataśca dhāvantau vadantau bahu kilbiṣam | ayuktaṃ bahu bhāṣantau dharṣayantau ca naḥ sadā

हिन्दी अर्थ

वे इधर-उधर दौड़ते, बहुत-सी पापपूर्ण बातें मुँहसे निकालते और बहुत-सा अनुचित भाषण करते हुए सदा हमारा तिरस्कार करते हैं

अध्याय 294

श्लोक 60

इदमन्यत् कृतं देव असह्यं पापमुच्यते ।पश्येदं बहुधा देव भिन्नं भिन्नं सहस्रशः

idamanyat kṛtaṃ deva asahyaṃ pāpamucyate | paśyedaṃ bahudhā deva bhinnaṃ bhinnaṃ sahasraśaḥ

श्लोक 60–63 का हिन्दी अर्थ

देव! उन दोनोंने जो दूसरा असह्य अपराध किया है, उसे बताया जाता है- देखिये! ये जो हमारे सहस्रों छींके, लकड़ीके पात्र, द्विल और बहुत-से बाँसके पिटारे आदि हैं, इन सबके उन्होंने अनेकानेक टुकड़े कर डाले हैं । उन दोनोंकी यह दूसरी दु:साहसपूर्ण चेष्टा देखिये—हमारा जो कौपीन था, उसके भी उन्होंने चीथड़े-चीथड़े कर डाले हैं; वह कौपीन ही हमारा महान्‌ धन है । जगदीश्वर ! उन्होंने हमारे कमण्डलुको भी तोड़- फोड़कर कपाल (खपड़े या खप्पर)-का रूप दे दिया है। आप क्षत्रियधर्मका आश्रय लेकर सदा हम सबकी रक्षा करते हैं तो भी हमारी यह दशा हो गयी। देव! यह बड़ी विचित्र और अद्भुत बात है। आप निरन्तर रक्षा करते हैं और सदा सर्वत्र विद्यमान भी हैं तो भी हमारी रक्षा न हो सकी

अध्याय 294

श्लोक 61

शक्यं च दारवं पात्रं द्विदलान् वेणुकान् बहून् ।इदमप्यपरं पश्य तयोः साहसचेष्टितम्

śakyaṃ ca dāravaṃ pātraṃ dvidalān veṇukān bahūn | idamapyaparaṃ paśya tayoḥ sāhasaceṣṭitam

अर्थ श्लोक 60 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 62

कौपीनं बहुधा छिन्नं तदस्माकं महद्धनम् ।कृतं कपालमात्रेण कमण्डलु जगत्प्रभो

kaupīnaṃ bahudhā chinnaṃ tadasmākaṃ mahaddhanam | kṛtaṃ kapālamātreṇa kamaṇḍalu jagatprabho

अर्थ श्लोक 60 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 63

त्वं तु नो रक्षसे नित्यं क्षात्रं वै व्रतमास्थितः ।चित्रं चित्रमिदं देव रक्षस्यसि सदानिशम्

tvaṃ tu no rakṣase nityaṃ kṣātraṃ vai vratamāsthitaḥ | citraṃ citramidaṃ deva rakṣasyasi sadāniśam

अर्थ श्लोक 60 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 64

किं करिष्यामि मन्दात्मा मन्दभोग्या वयं विभो ।किं नः शरणमद्यैव तद् ब्रूहि जगतां पते

kiṃ kariṣyāmi mandātmā mandabhogyā vayaṃ vibho | kiṃ naḥ śaraṇamadyaiva tad brūhi jagatāṃ pate

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! मेरी बुद्धि मन्द है। मैं क्या करूँ ? हम सबलोग बड़े भाग्यहीन हैं। जगत्पते ! इस समय हम किसकी शरणमें जायँँ, यह बताइये

अध्याय 294

श्लोक 65

जीवन्तौ तौ यदि स्यातां नष्टा लोका इमे त्रयः ।न विप्रा न च राजानो न वैश्या न च पादजाः

jīvantau tau yadi syātāṃ naṣṭā lokā ime trayaḥ | na viprā na ca rājāno na vaiśyā na ca pādajāḥ

हिन्दी अर्थ

यदि वे दोनों जीवित रह गये तो ये तीनों लोक नष्ट हो जायँगे। न ब्राह्मण बचेंगे न क्षत्रिय, न वैश्य रह जायँगे और न शूद्र

अध्याय 294

श्लोक 66

अत्यन्तबलिनौ मत्तौ तीक्ष्णदण्डधरौ नृप ।न तयोः पुरतः स्थातुं शक्ता देवाः सवासवाः

atyantabalinau mattau tīkṣṇadaṇḍadharau nṛpa | na tayoḥ purataḥ sthātuṃ śaktā devāḥ savāsavāḥ

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! वे दोनों अत्यन्त बलवान, मदमत्त और कठोर दण्ड धारण करनेवाले हैं; उन दोनोंके सामने इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी टिक नहीं सकते '

अध्याय 294

श्लोक 67

न च भीष्मो न वा राजा वाह्लीको भीमविक्रमः ।यो हि वीरो जरासन्धः क्षत्रियाणां भयङ्करः

na ca bhīṣmo na vā rājā vāhlīko bhīmavikramaḥ | yo hi vīro jarāsandhaḥ kṣatriyāṇāṃ bhayaṅkaraḥ

श्लोक 67–68 का हिन्दी अर्थ

श्डेरे “न भीष्म और न भयंकर पराक्रमी राजा बाह्ीक ही उन दोनोंका सामना कर सकते हैं। श्रीकृष्ण! हरे! क्षत्रियोंके लिये भयंकर जो वीर जरासंध है, वह भी प्राय: उन दोनोंके सामने नहीं ठहर सकता; क्योंकि भगवान्‌ शड्टरके वरदानसे उनका गर्व बहुत बढ़ गया है। वे सदा एक-दूसरेके साथ रहते हैं। उनमें कभी पार्थक्य अथवा विरोध नहीं होता

अध्याय 294

श्लोक 68

नैव च प्रायशः स्थातुं गिरीशवरदर्पिणोः ।तयोः कृष्ण हरे शक्तो नित्यमप्रतिसङ्गिनोः

naiva ca prāyaśaḥ sthātuṃ girīśavaradarpiṇoḥ | tayoḥ kṛṣṇa hare śakto nityamapratisaṅginoḥ

अर्थ श्लोक 67 के साथ

अध्याय 294

श्लोक 69

तस्मात् त्वं जहि तौ वीरौ रक्ष लोकानिमान् प्रभो ।अन्यथा रक्षसीत्येवं व्यर्थः शब्दोऽत्र जायते

tasmāt tvaṃ jahi tau vīrau rakṣa lokānimān prabho | anyathā rakṣasītyevaṃ vyarthaḥ śabdo'tra jāyate

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! इसलिये आप ही उन दोनों वीरोंका वध कीजिये और इन तीनों लोकोंको विनाशसे बचाइये; अन्यथा * आप रक्षा करते हैं' यह कथन यहाँ व्यर्थ हो रहा है

अध्याय 294

श्लोक 70

बहुनात्र किमुक्तेन रक्ष रक्ष जनत्त्रयम् ।इत्युक्त्वा विररामैव दुर्वासाः क्रोधमूर्च्छितः

bahunātra kimuktena rakṣa rakṣa janattrayam | ityuktvā virarāmaiva durvāsāḥ krodhamūrcchitaḥ

हिन्दी अर्थ

यहाँ अधिक कहनेसे क्या लाभ? आप तीनों लोकोंकी रक्षा कौजिये! रक्षा कीजिये! !' ऐसा कहकर क्रोधसे मूर्च्छित हुए दुर्वासा चुप हो गये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.