Harivamsha Purana
295
अध्याय 295 / 318

Parva 3, Adhyāya 112

24 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ24 श्लोक

अध्याय 295

श्लोक 1

भगवता श्रीकृष्णेन हंसडिम्भकयोः वधाय प्रतिज्ञा, क्षमायाचनापूर्वकं यतीभ्यः भोजनदानं यतेर्वचनमाकर्ण्य मन्दमुच्छ्वस्य केशवः ।दुर्वाससं समालोक्य बभाषे यादवेश्वरः

bhagavatā śrīkṛṣṇena haṃsaḍimbhakayoḥ vadhāya pratijñā, kṣamāyācanāpūrvakaṃ yatībhyaḥ bhojanadānaṃ yatervacanamākarṇya mandamucchvasya keśavaḥ | durvāsasaṃ samālokya babhāṣe yādaveśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! यतिका यह वचन सुनकर यादवेश्वर श्रीकृष्णने धीरेसे उच्छवास लेकर दुर्वासाकी ओर देखा और इस प्रकार कहना आरम्भ किया—

अध्याय 295

श्लोक 2

क्षन्तव्यं भवता सर्वं दोष एष ममैव हि ।शृणु वाक्यं ममैतत् तु श्रुत्वा शान्तिपरो भव

kṣantavyaṃ bhavatā sarvaṃ doṣa eṣa mamaiva hi | śṛṇu vākyaṃ mamaitat tu śrutvā śāntiparo bhava

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌ ! अब जो कुछ हो गया, उस सबके लिये आप क्षमा करें; वास्तवमें यह मेरा ही दोष है। आप मेरी यह बात सुनें और सुनकर शान्त हो जायँ

अध्याय 295

श्लोक 3

जेष्यामि तौ रणे विप्र हंसं डिम्भकमेव च ।गिरीशो वा वरं दद्याच्छक्रो वा धनदोऽपि वा

jeṣyāmi tau raṇe vipra haṃsaṃ ḍimbhakameva ca | girīśo vā varaṃ dadyācchakro vā dhanado'pi vā

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

विप्रवर! मैं हंस और डिम्भकको युद्धमें पराजित करूँगा । उन्हें भगवान्‌ शड्र, इन्द्र, कुबेर, यम, वरुण अथवा चतुर्मुख ब्रह्मा कोई भी वर क्यों न दे, मैं सेना और बन्धु-बान्धवोंसहित उन दोनोंका वध करके पुन: आपलोगोंको प्रसन्नता प्रदान करूँगा

अध्याय 295

श्लोक 4

यमो वा वरुणो वापि ब्रह्मा वाथ चतुर्मुखः ।सबलौ सानुजौ हत्वा पुनर्दास्यामि वो रतिम्

yamo vā varuṇo vāpi brahmā vātha caturmukhaḥ | sabalau sānujau hatvā punardāsyāmi vo ratim

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 295

श्लोक 5

सत्येनैव शपाम्यद्य मा रोषवशगो भव ।रक्षां वोऽहं करिष्यामि हत्वा तौ च नृपाधमौ

satyenaiva śapāmyadya mā roṣavaśago bhava | rakṣāṃ vo'haṃ kariṣyāmi hatvā tau ca nṛpādhamau

हिन्दी अर्थ

आज मैं सत्यकी ही शपथ लेकर कहता हूँ कि आप रोषके वशीभूत न होइये। मैं उन दोनों नीच नरेशोंका वध करके आपलोगोंकी रक्षा करूँगा

अध्याय 295

श्लोक 6

जानामि तौ दुरात्मानौ युष्मद्दोषकरौ हि तौ ।श्रुतं च पूर्वमस्माभिस्तीक्ष्णदण्डधराविति

jānāmi tau durātmānau yuṣmaddoṣakarau hi tau | śrutaṃ ca pūrvamasmābhistīkṣṇadaṇḍadharāviti

श्लोक 6–7 का हिन्दी अर्थ

मैं उन दोनों दुरात्माओंको जानता हूँ, उन्हीं दोनोंने आपलोगोंका अपराध किया है। मैंने पहलेसे ही सुन रखा है कि वे दोनों कठोर दण्ड धारण करनेवाले हैं, अत्यन्त बलवान्‌ और मदमत्त हैं । भगवान्‌ शड्रका वर पानेसे उनका घमंड बढ़ा हुआ है। थोड़े-से प्रयत्रद्वारा उन्हें वशमें नहीं किया जा सकता। वे जरासंधके हितैषी हैं

अध्याय 295

श्लोक 7

अत्यन्तबलिनौ मत्तौ गिरीशवरदर्पितौ ।नाल्पप्रयत्नसंसाध्यौ जरासन्धहितैषिणौ

atyantabalinau mattau girīśavaradarpitau | nālpaprayatnasaṃsādhyau jarāsandhahitaiṣiṇau

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 295

श्लोक 8

प्राणानपि तयो राजा दास्यत्येव न संशयः ।जरासन्धो न भूपालो विना तौ जयते महीम्

prāṇānapi tayo rājā dāsyatyeva na saṃśayaḥ | jarāsandho na bhūpālo vinā tau jayate mahīm

हिन्दी अर्थ

इसमें संदेह नहीं कि राजा जरासंध उन दोनोंके लिये अपने प्राण भी दे डालेगा; क्योंकि उन दोनोंके बिना राजा जरासंध इस पृथ्वीपर विजय नहीं पा सकता

अध्याय 295

श्लोक 9

जये तयोर्विप्रवर्य तत्र श्रेयो भवेत् ततः ।यत्र यत्र तु तौ गत्वा स्थितावित्यनुशुश्रुम

jaye tayorvipravarya tatra śreyo bhavet tataḥ | yatra yatra tu tau gatvā sthitāvityanuśuśruma

श्लोक 9–12 का हिन्दी अर्थ

विप्रवर ! उन दोनोंको पराजित करते समय उन्हें वहाँ जरासंधकी ओरसे श्रेष्ठ सहायता प्राप्त हो सकती है तो भी वे दोनों जहाँ-जहाँ जाकर खड़े होंगे और इसका समाचार हम सुन लेंगे, वहाँ-वहाँ पहुँचकर मैं उन दोनोंका वध करूँगा, इसमें कोई अन्यथा विचार हहीं करना चाहिये । संन्यासियो ! आपलोग अपने कर्तव्य- पालनमें तत्पर रहकर जहाँ चाहें इच्छानुसार जायेँ। मैं थोड़े ही समयमें उन रणकुशल वीरोंको परास्त करूँगा।' ब प्रेमपूर्वक प्रसन्नचित्त हो दुर्वासाने यादवेश्वर श्रीकृष्णसे कहा—' श्रीकृष्ण! तीनों लोकोंका कल्याण करनेवाले आपका मज़ल हो। जगन्नाथ! केशव! कौन-सा ऐसा कार्य है, जो आपके लिये दुष्कर हो

अध्याय 295

श्लोक 10

तत्र तत्र च हन्ताहं नात्र कार्या विचारणा ।गच्छध्वं यतयः स्वैरं निजकार्यपरायणाः

tatra tatra ca hantāhaṃ nātra kāryā vicāraṇā | gacchadhvaṃ yatayaḥ svairaṃ nijakāryaparāyaṇāḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 295

श्लोक 11

अचिरेणैव कालेन जेष्यामि रणपुङ्गवौ ।ततः प्रीतः प्रसन्नात्मा यादवेश्वरमाह सः

acireṇaiva kālena jeṣyāmi raṇapuṅgavau | tataḥ prītaḥ prasannātmā yādaveśvaramāha saḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 295

श्लोक 12

स्वस्त्यस्तु भवते कृष्ण जगतां स्वस्ति कुर्वते ।किं नु नाम जगन्नाथ दुःसाध्यं तव केशव

svastyastu bhavate kṛṣṇa jagatāṃ svasti kurvate | kiṃ nu nāma jagannātha duḥsādhyaṃ tava keśava

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 295

श्लोक 13

त्रिलोकेश त्रिधामासि सर्वसंहारकारकः ।देवानामपि देवेशः सर्वत्र समदर्शनः

trilokeśa tridhāmāsi sarvasaṃhārakārakaḥ | devānāmapi deveśaḥ sarvatra samadarśanaḥ

हिन्दी अर्थ

त्रिलोकीनाथ ! भाप त्रिधामा हैं। आप ही सबका संहार करनेवाले हैं, रेवताओंके भी देवेश्वर हैं। आपकी सर्वत्र समान दृष्टि दे

अध्याय 295

श्लोक 14

विष्णो देव हरे कृष्ण नमस्ते चक्रपाणये ।नमः स्वभावशुद्धाय शुद्धाय नियताय च

viṣṇo deva hare kṛṣṇa namaste cakrapāṇaye | namaḥ svabhāvaśuddhāya śuddhāya niyatāya ca

हिन्दी अर्थ

विष्णो! देव! हरे! कृष्ण! हाथमें चक्र धारण करनेवाले ! आपको नमस्कार है। आप स्वभावसे शुद्ध ं, शुद्धस्वरूप हैं तथा शौच, संतोष आदि नियमोंसे पम्पन्न एवं सर्वव्यापी हैं

अध्याय 295

श्लोक 15

शब्दगोचर देवेश नमस्ते भक्तवत्सल ।अज्ञानादथवा ज्ञानाद् यन्मयोक्तं क्षमस्व तत्

śabdagocara deveśa namaste bhaktavatsala | ajñānādathavā jñānād yanmayoktaṃ kṣamasva tat

हिन्दी अर्थ

देवेश्वर! आप ही वैदिक ब्दोंके चरम तात्पर्य हैं। भक्तवत्सल! आपको मेरा मस्कार है | मैंने जानकर अथवा अनजानमें जो अनुचित आत कह दी हो, उसके लिये आप मुझे क्षमा करें

अध्याय 295

श्लोक 16

त्वमेवाहं जगन्नाथ नावयोरन्तरं पृथक् ।अतः क्षमस्व भगवन् क्षमासारा हि साधवः

tvamevāhaṃ jagannātha nāvayorantaraṃ pṛthak | ataḥ kṣamasva bhagavan kṣamāsārā hi sādhavaḥ

हिन्दी अर्थ

तगन्नाथ ! मैं आपका ही स्वरूप हूँ। हम दोनोंमें कोई भेद पा पार्थक्य नहीं है । अत: भगवन्‌! आप मुझे क्षमा करें; योंकि साधुपुरुषोंका सारतत्त्व क्षमा ही है

अध्याय 295

श्लोक 17

क्षन्तव्यं भवता विप्र क्षमासारा वयं सदा ।संन्यासिनः क्षमासाराः क्षमा तेषां परं बलम्

kṣantavyaṃ bhavatā vipra kṣamāsārā vayaṃ sadā | saṃnyāsinaḥ kṣamāsārāḥ kṣamā teṣāṃ paraṃ balam

हिन्दी अर्थ

ततमो श्डेरे५ श्रीभगवान्‌ बोले—विप्रवर! क्षमा तो आपको करनी चाहिये। हमलोग तो सदा आप महापुरुषोंकी ही क्षमाका आश्रय लेनेवाले हैं। संन्यासियोंका सारतत्त्व क्षमा ही है। क्षमा ही उनका उत्तम बल है

अध्याय 295

श्लोक 18

क्षमा मोक्षकरी नित्यं तत्त्वज्ञानमिव द्विज ।क्षमा धर्मः क्षमा सत्यं क्षमा दानं क्षमा यशः

kṣamā mokṣakarī nityaṃ tattvajñānamiva dvija | kṣamā dharmaḥ kṣamā satyaṃ kṣamā dānaṃ kṣamā yaśaḥ

श्लोक 18–19 का हिन्दी अर्थ

ब्रह्ममू! क्षमा तत््वज्ञानकी भाँति सदा ही मोक्ष प्रदान करनेवाली है। क्षमा धर्म, क्षमा सत्य, क्षमा दान और क्षमा यश है। वेदज्ञ पुरुष ऐसा मानते हैं कि क्षमा ही स्वर्गकी सीढ़ी है। अत: आपलोग पूरा प्रयत्न करके अपने क्षमाधर्मका पालन करें

अध्याय 295

श्लोक 19

क्षमा स्वर्गस्य सोपानमिति वेदविदो विदुः ।तस्मात् सर्वप्रयत्नेन क्षमां पालयत स्वकाम्

kṣamā svargasya sopānamiti vedavido viduḥ | tasmāt sarvaprayatnena kṣamāṃ pālayata svakām

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 295

श्लोक 20

प्रत्यक्षज्ञानसंयुक्ता यूयं सर्वे यतीश्वराः ।य एते यतयो विप्राः पूजनीया मयाद्य वै

pratyakṣajñānasaṃyuktā yūyaṃ sarve yatīśvarāḥ | ya ete yatayo viprāḥ pūjanīyā mayādya vai

श्लोक 20–24 का हिन्दी अर्थ

यतीथरो! आप सब लोग प्रत्यक्ष ज्ञानसे संयुक्त हैं। यहाँ जो यति- ब्राह्मण पधारे हैं, उन सबका आज मुझे पूजन करना है। यतिधर्ममें तत्पर रहनेवाले इन सभी भिक्षु ब्राह्मणोंको भोजन भी कराना है। तब ' बहुत अच्छा' कहकर उन सबने भगवान्‌के भवनमें भिक्षा ग्रहण करनेका विचार किया। तदनन्तर सर्वेधर विष्णु हरिने अपने भवनके भीतर प्रवेश करके विधिपूर्वक चार * प्रकारकी भोजन- सामग्री तैयार करायी और उन समस्त यतियोंको भोजन कराया। उस समय यतिश्रेष्ठ दुर्वासाने श्रीकृष्णका सम्मान किया। जनमेजय ! देवेश्वर श्रीकृष्णने उस समय कोमल वस्त्र फाड़-फाड़कर उन सब संन्यासियोंके लिये कौपीन आदि बनानेके लिये दिया। वे उन्हें पूर्ववत्‌ यथायोग्य पाकर बहुत प्रसन्न हुए। तत्पश्चात्‌ सब लोग वहाँसे चले गये

अध्याय 295

श्लोक 21

भोक्तव्या यतयो विप्रा भिक्षुकाः सर्व एव हि ।तथेति ते प्रतिज्ञाय भोक्तुमैच्छन् हरेर्गृहे

bhoktavyā yatayo viprā bhikṣukāḥ sarva eva hi | tatheti te pratijñāya bhoktumaicchan harergṛhe

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 295

श्लोक 22

ततः स्वभवनं विष्णुः प्रविश्य हरिरीश्वरः ।चतुर्विधं तथाऽऽहारं कारयित्वा यथाविधि

tataḥ svabhavanaṃ viṣṇuḥ praviśya harirīśvaraḥ | caturvidhaṃ tathā''hāraṃ kārayitvā yathāvidhi

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 295

श्लोक 23

भोजयामास तान् सर्वान्यतीन्यतिवरार्चितः ।छित्त्वा छित्त्वा च देवेशो दुकूलानि मृदूनि सः

bhojayāmāsa tān sarvānyatīnyativarārcitaḥ | chittvā chittvā ca deveśo dukūlāni mṛdūni saḥ

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 295

श्लोक 24

ददौ तेभ्यस्तदा विष्णुः सर्वेभ्यो जनमेजय ।ते च प्रीता यथायोगं यथापूर्वं ततो गताः

dadau tebhyastadā viṣṇuḥ sarvebhyo janamejaya | te ca prītā yathāyogaṃ yathāpūrvaṃ tato gatāḥ

अर्थ श्लोक 20 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.