Harivamsha Purana
293
अध्याय 293 / 318

Parva 3, Adhyāya 110

17 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ17 श्लोक

अध्याय 293

श्लोक 1

दुर्वासादीनां मुनीनां द्वारकागमनं ततस्तौ हंसडिम्भकौ क्रुद्धौ कालेन चोदितौ ।शिक्यं कमण्डलुं चैव द्विदलं दारुमेव च

durvāsādīnāṃ munīnāṃ dvārakāgamanaṃ tatastau haṃsaḍimbhakau kruddhau kālena coditau | śikyaṃ kamaṇḍaluṃ caiva dvidalaṃ dārumeva ca

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय! दनन्तर कालसे प्रेरित हो क्रोधमें भरे हुए हंस और डिम्भकने उन यतियोंके छींके, कमण्डलु, दो दलोंसे पुक्त काप्ठमय भोजनपात्र, दण्ड और दूसरे-दूसरे विभिन्न पत्रोंको तोड़-फोड़कर उसी स्थानमें व्याधोंद्वारा मांस पकवाये

अध्याय 293

श्लोक 2

दण्डान् पात्रविशेषांश्च छित्त्वा भित्त्वा च सर्वशः ।तस्मिन् देशे महाराज व्याधैर्मांसान्यदीदहन्

daṇḍān pātraviśeṣāṃśca chittvā bhittvā ca sarvaśaḥ | tasmin deśe mahārāja vyādhairmāṃsānyadīdahan

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 293

श्लोक 3

भक्षयित्वा ततो देशात् स्वपुरीं तौ प्रजग्मतुः ।जनार्दनश्च धर्मात्मा स्नेहादनुययौ तयोः

bhakṣayitvā tato deśāt svapurīṃ tau prajagmatuḥ | janārdanaśca dharmātmā snehādanuyayau tayoḥ

हिन्दी अर्थ

उन्हें खाकर वे दोनों उस स्थानसे भपने नगरको गये। धर्मात्मा जनार्दन भी ख्रेहवश उन गौनोंका अनुसरण करता रहा

अध्याय 293

श्लोक 4

नष्टाविमाविति तदा स मेने दुःखितः परम् ।गतेषु तेषु सर्वेषु दुर्वासा यतिसत्तमः

naṣṭāvimāviti tadā sa mene duḥkhitaḥ param | gateṣu teṣu sarveṣu durvāsā yatisattamaḥ

श्लोक 4–8 का हिन्दी अर्थ

उसने अत्यन्त दुःखित होकर यह विश्वास कर लिया कि अब इन दोनोंके नष्ट हीनेमें कोई संदेह नहीं है। उन सबके चले जानेपर तियोंमें श्रेष्ठ दुर्वासाने यहाँसे पलायन करनेवाले समस्त ती श्वरोंसे इस प्रकार कहा—'यतिथ्रो! इस पुण्ययुक्त रेश पुष्करसे निकलकर धीरे-धीरे सुस्ताते और यत्र- त्र विश्राम करते हुए द्वारकापुरीमें प्रवेश करके हमलोग ड्ड, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्णसे मलेंगे और उनसे अपनी सारी कष्ट-कथा कहेंगे। वे स सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा करते हुए धर्मके मार्गपर स्थित ँ। वे ही आदिपुरुष, लोकगुरु, सर्वव्यापी, मनको शमें रखनेवाले और तत्त्ववेत्ताओंके प्रिय हैं। उन्होंने परे कण्टकोंका उन्मूलन करके इस पृथ्वीका शासन करैया है

अध्याय 293

श्लोक 5

पलायनपरान् सर्वानिदं प्राह यतीश्वरान् ।इतो देशाद्विनिर्गत्य पुष्करात्पुण्यसंयुतात्

palāyanaparān sarvānidaṃ prāha yatīśvarān | ito deśādvinirgatya puṣkarātpuṇyasaṃyutāt

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 293

श्लोक 6

मन्दं मन्दं समाश्वस्य विश्रम्य च ततस्ततः ।प्रविश्य द्वारकां देवं शङ्खचक्रगदाधरम्

mandaṃ mandaṃ samāśvasya viśramya ca tatastataḥ | praviśya dvārakāṃ devaṃ śaṅkhacakragadādharam

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 293

श्लोक 7

दृष्ट्वा च तस्मै प्रभवे वक्ष्यामो यतिसत्तमाः ।स हि रक्षञ्जगदिदं धर्मवर्त्मनि संस्थितः

dṛṣṭvā ca tasmai prabhave vakṣyāmo yatisattamāḥ | sa hi rakṣañjagadidaṃ dharmavartmani saṃsthitaḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 293

श्लोक 8

आद्यो लोकगुरुर्विष्णुर्यतात्मा तत्त्ववित्प्रियः ।उद्धृत्य कण्टकान् सर्वाञ्छशास पृथिवीमिमाम्

ādyo lokagururviṣṇuryatātmā tattvavitpriyaḥ | uddhṛtya kaṇṭakān sarvāñchaśāsa pṛthivīmimām

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 293

श्लोक 9

स च पापान् महाघोरान् सर्वान् पापकृतान् प्रभुः ।रक्षेन्नः सकलान् सर्वांज्ञानेषु नियतात्मनः

sa ca pāpān mahāghorān sarvān pāpakṛtān prabhuḥ | rakṣennaḥ sakalān sarvāṃjñāneṣu niyatātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

वे ही प्रभु समस्त महाभयंकर, पजन्मा पापियोंका उच्छेद करके अआअमानित्व और मदम्भित्व आदि ज्ञानसाधनोंमें नियतरूपसे मन लगानेवाले म सम्पूर्ण यतियोंकी रक्षा करेंगे

अध्याय 293

श्लोक 10

इदमद्य क्षमं विप्रा यानमद्य विधीयताम् ।साहसं यत्कृतं ताभ्यां पात्रभेदादि सत्तमाः

idamadya kṣamaṃ viprā yānamadya vidhīyatām | sāhasaṃ yatkṛtaṃ tābhyāṃ pātrabhedādi sattamāḥ

श्लोक 10–13 का हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणों! इस मय यही हमारे योग्य है; अत: अब द्वारकाकी त्रा करो। साधुशिरोमणियो! हंस और डिम्भकने जो मारे पात्रोंके तोड़ने-फोड़ने आदिका दु:साहस किया है, ये सारी वस्तुएँ हमलोग भगवान्‌ जनार्दनको दिखायें'। तब बहुत अच्छा' कहकर वे सब ज्ञानदर्शी संन्यासी हंस और डिम्भकद्वारा छिन्न-भिन्न किये गये छींके, लकड़ीके बने हुए द्विदल (दो दलोंसे युक्त भोजन-पात्र, जो गौके कानकी-सी आकृतिका बना होता है), गेरुए वस्त्र, कौपीन, वल्कल तथा कमण्डलुका आधा टुकड़ा (जो पूरे कमण्डलुको बीचसे चीर डालनेके कारण दो खण्डोंमें विभक्त हो गया था)—इन सबको तथा अन्य सब तोड़ी-फोड़ी गयी वस्तुओंको साथ लेकर भगवान्‌ श्रीकृष्णसे मिलनेके लिये आये

अध्याय 293

श्लोक 11

एतत् सर्वमशेषेण दर्शयाम जनार्दनम् ।तथेति ते प्रतिज्ञाय यतयो ज्ञानचक्षुषः

etat sarvamaśeṣeṇa darśayāma janārdanam | tatheti te pratijñāya yatayo jñānacakṣuṣaḥ

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 293

श्लोक 12

छिन्नं ताभ्यां समादाय शिक्यं दारुमयं तथा ।द्विदलं कर्पटं चैव कौपीनमथ वल्कलम्

chinnaṃ tābhyāṃ samādāya śikyaṃ dārumayaṃ tathā | dvidalaṃ karpaṭaṃ caiva kaupīnamatha valkalam

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 293

श्लोक 13

कमण्डलुं तथा राजन्नर्धप्रोतकपालकम् ।एतानन्यान् समादाय द्रष्टुं केशवमाययुः

kamaṇḍaluṃ tathā rājannardhaprotakapālakam | etānanyān samādāya draṣṭuṃ keśavamāyayuḥ

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 293

श्लोक 14

पञ्च चैव सहस्राणि पुरस्कृत्य महामुनिम् ।दुर्वाससं तपोयोनिमीश्वरस्यात्मसम्भवम्

pañca caiva sahasrāṇi puraskṛtya mahāmunim | durvāsasaṃ tapoyonimīśvarasyātmasambhavam

श्लोक 14–15 का हिन्दी अर्थ

उनकी संख्या पाँच हजार थी, वे जितेन्द्रिय महात्मा सिरके केश मुड़ाये रहते थे और उनके शेष शरीर रोमावलियोंसे युक्त थे। वे यतिगण भगवान्‌ शड्रके अंशसे उत्पन्न हुए तपोयोनि महामुनि दुर्वासाको आगे करके दिन-रात चलते हुए श्रीकृष्णपालित द्वारकापुरीमें जा पहुँचे

अध्याय 293

श्लोक 15

अहोरात्रेण ते सर्वे द्वारकां कृष्णपालिताम् ।ययुर्दान्ता महात्मानो लोमशाः केशवर्जिताः

ahorātreṇa te sarve dvārakāṃ kṛṣṇapālitām | yayurdāntā mahātmāno lomaśāḥ keśavarjitāḥ

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 293

श्लोक 16

प्रातः प्रविश्य राजेन्द्र वापिकायां यतीश्वराः ।स्नात्वोपस्पृश्य ते सर्वे यत्नेन महता तदा

prātaḥ praviśya rājendra vāpikāyāṃ yatīśvarāḥ | snātvopaspṛśya te sarve yatnena mahatā tadā

श्लोक 16–17 का हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! प्रात:काल पुरीमें प्रवेश करके वे यतीश्वरगण वहाँकी एक बावड़ीमें स्नान और आचमन करके बड़े प्रयत्रसे उन भगवान्‌ श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये उद्यत हुए, जो एकरूप धारण करके सुधर्मा-सभामें विराजमान हो जगत्‌के कण्टकोंको उखाड़ फेंकनेके प्रयत्रमें लगे हुए थे

अध्याय 293

श्लोक 17

द्रष्टुमभ्युद्यता विष्णुं कण्टकोद्धृतितत्परम् ।एकरूपं समास्थाय सुधर्मायामवस्थितम्

draṣṭumabhyudyatā viṣṇuṃ kaṇṭakoddhṛtitatparam | ekarūpaṃ samāsthāya sudharmāyāmavasthitam

अर्थ श्लोक 16 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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