Harivamsha Purana
279
अध्याय 279 / 318

Parva 3, Adhyāya 96

37 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ37 श्लोक

अध्याय 279

श्लोक 1

पौण्ड्रकस्य सात्यकिना सह युद्धं ततः क्रुद्धो महाराज सात्यकिर्वृष्णिपुङ्गवः ।उवाच वचनं राजन् वासुदेवं स्मरन्निव

pauṇḍrakasya sātyakinā saha yuddhaṃ tataḥ kruddho mahārāja sātyakirvṛṣṇipuṅgavaḥ | uvāca vacanaṃ rājan vāsudevaṃ smaranniva

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय ! तदनन्तर ष्णिकुलके श्रेष्ठ वीर सात्यकिने कुपित होकर भगवान्‌ रीकृष्णका स्मरण करते हुए-से इस प्रकार कहा—

अध्याय 279

श्लोक 2

अवोचदीदृशं वाक्यं वासुदेवं नृपाधमः ।को नाम जगतां नाथमित्थं ब्रूयाज्जिजीविषुः

avocadīdṛśaṃ vākyaṃ vāsudevaṃ nṛpādhamaḥ | ko nāma jagatāṃ nāthamitthaṃ brūyājjijīviṣuḥ

हिन्दी अर्थ

पौण्ड्क! तू राजाओंमें अधम है। इसीलिये भगवान्‌ ासुदेवके प्रति तूने ऐसी बात कह डाली है। अपने पीवनकी इच्छा रखनेवाला कौन ऐसा पुरुष होगा, जो गगन्नाथ श्रीकृष्णके प्रति ऐसी बात कह सकेगा ?

अध्याय 279

श्लोक 3

मृत्युस्त्वां सर्वथा याति वदन्तं तादृशं वचः ।जिह्वा ते शतधा दीर्याद् वदतस्तादृशं वचः

mṛtyustvāṃ sarvathā yāti vadantaṃ tādṛśaṃ vacaḥ | jihvā te śatadhā dīryād vadatastādṛśaṃ vacaḥ

हिन्दी अर्थ

सी कठोर बात कहते हुए तेरे पीछे-पीछे सर्वथा मृत्यु बल रही है। इस तरहकी अनुचित बात कहते समय री जिह्लाके सौ-सौ टुकड़े हो जाने चाहिये

अध्याय 279

श्लोक 4

एष ते पातयिष्यामि शिरः कायाच्च पौण्ड्रक ।यन्नाम वासुदेवेति तव सम्प्रति वर्तते

eṣa te pātayiṣyāmi śiraḥ kāyācca pauṇḍraka | yannāma vāsudeveti tava samprati vartate

श्लोक 4–5 का हिन्दी अर्थ

पौण्ड्रक ! मैं अभी तेरा सिर धड़से काट गिराऊँगा। स समय जिनका वासुदेव नाम तेरे साथ जुड़ा हुआ , वह तभीतक है, जबतक कि धड़से तेरा सिर ओचे नहीं गिर जाता। अब कलसे तू भगवान्‌ वासुदेव हीं रह जायगा (कालका ग्रास बन जायगा)

अध्याय 279

श्लोक 5

यावत् पतति कायात्ते शिरस्तावत्प्रवर्तते ।स एव श्वो न भगवान् वासुदेवो भविष्यसि

yāvat patati kāyātte śirastāvatpravartate | sa eva śvo na bhagavān vāsudevo bhaviṣyasi

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 279

श्लोक 6

एक एव जगन्नाथः कर्ता सर्वस्य सर्वगः ।दुरात्मन् सर्वथा देवो भविष्यति न संशयः

eka eva jagannāthaḥ kartā sarvasya sarvagaḥ | durātman sarvathā devo bhaviṣyati na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

रात्मन्‌ ! जो सबके कर्ता और सर्वव्यापी हैं, वे एकमात्र गगदीश्वर श्रीकृष्ण ही सर्वथा वासुदेव बने रहेंगे—इसमें शय नहीं है

अध्याय 279

श्लोक 7

एष तेऽहं शिरः कायात् पातयिष्यामि राजक ।यदसौ भगवान् विष्णुर्नागमिष्यति साम्प्रतम्

eṣa te'haṃ śiraḥ kāyāt pātayiṣyāmi rājaka | yadasau bhagavān viṣṇurnāgamiṣyati sāmpratam

श्लोक 7–8 का हिन्दी अर्थ

तुच्छ नरेश! मैं अभी तेरे मस्तकको रीरसे काट गिराता हूँ। इस समय वे भगवान्‌ श्रीकृष्ण बितक लौटकर नहीं आ जाते, तबतक ही तू अपना रा अस्त्रबल और पराक्रम दिखा ले। राजन्‌! इससे ढ़कर तुझे अपने बल-पराक्रमको प्रकट करनेका मवसर नहीं मिलेगा

अध्याय 279

श्लोक 8

अस्त्रवीर्यं बलं चैव सर्वं दर्शय साम्प्रतम् ।नातः परतरं राजन् वीर्यं च तव वर्तते

astravīryaṃ balaṃ caiva sarvaṃ darśaya sāmpratam | nātaḥ parataraṃ rājan vīryaṃ ca tava vartate

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 279

श्लोक 9

सर्वं दर्शय यत्नेन स्थितोऽस्मि व्यवसायवान् ।शरी चापी गदी खड्गी सर्वथाहमुपस्थितः

sarvaṃ darśaya yatnena sthito'smi vyavasāyavān | śarī cāpī gadī khaḍgī sarvathāhamupasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

मैं युद्धका निश्चय लेकर त्रड़ा हूँ। तू यत्पूर्क अपनी सारी शक्ति दिखा। मैं ननुष, बाण, गंदा और खड्गसे युक्त हो सर्वदा तेरा मना करनेके लिये उपस्थित हूँ

अध्याय 279

श्लोक 10

नैतन्नगरमायासीः सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम् ।सर्वथा कृतकृत्योऽस्मि दृष्ट्वा त्वां वासुदेवकम्

naitannagaramāyāsīḥ satyametad bravīmyaham | sarvathā kṛtakṛtyo'smi dṛṣṭvā tvāṃ vāsudevakam

हिन्दी अर्थ

मैं सच कहता , तू आजसे पहले इस नगरमें नहीं आया था। तुझ- से वासुदेवके पुतलेको देखकर मैं कृतकृत्य हो गया

अध्याय 279

श्लोक 11

तवाङ्गं तिलशः कृत्वा श्वभ्यो दास्यामि राजक ।इत्युक्त्वा बाणमादाय वासुदेवं महाबलः

tavāṅgaṃ tilaśaḥ kṛtvā śvabhyo dāsyāmi rājaka | ityuktvā bāṇamādāya vāsudevaṃ mahābalaḥ

श्लोक 11–14 का हिन्दी अर्थ

अधम नरेश! तेरे शरीरके तिलके बराबर कड़े-टुकड़े करके कुत्तोंको बाँट दूँगा।' वासुदेव मधारी पौण्ड्रकसे ऐसा कहकर महाबली सात्यकिने क॒ तीखा बाण लेकर उसे कानतक खींचकर छोड़ा और पौण्ड्रकको घायल कर दिया। नृपतश्रेष्ठ ! यदुवंशी और सात्यकिके द्वारा बाणसे घायल किये जानेपर प्रतापी और वासुदेव अपने आड्गों और नेत्रोंसे अत्यन्त गरम- रम रक्त बहाने लगा। तब प्रतापी राजा वासुदेव भी पित हो उठा। उसने बास्म्बार सिंहनाद करते हुए [की हुई गाँठवाले नौ-दस बाणोंसे सात्यकिको घायल रर दिया

अध्याय 279

श्लोक 12

आकर्णपूर्णमाकृष्य विव्याध निशितं शरम् ।स तेन विद्धो यदुना वासुदेवः प्रतापवान्

ākarṇapūrṇamākṛṣya vivyādha niśitaṃ śaram | sa tena viddho yadunā vāsudevaḥ pratāpavān

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 279

श्लोक 13

वमञ्छोणितमत्युष्णमङ्गान्नेत्रान्नृपोत्तम ।ततश्चुक्रोध नृपतिर्वासुदेवः प्रतापवान्

vamañchoṇitamatyuṣṇamaṅgānnetrānnṛpottama | tataścukrodha nṛpatirvāsudevaḥ pratāpavān

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 279

श्लोक 14

नवभिर्दशभिश्चैव शरैः सन्नतपर्वभिः ।विव्याध सात्यकिं राजा नदंश्च बहुधा किल

navabhirdaśabhiścaiva śaraiḥ sannataparvabhiḥ | vivyādha sātyakiṃ rājā nadaṃśca bahudhā kila

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 279

श्लोक 15

ततो नाराचमादाय निशितं यमसन्निभम् ।धनुराकृष्य भगवान् वासुदेवो नृपोत्तम

tato nārācamādāya niśitaṃ yamasannibham | dhanurākṛṣya bhagavān vāsudevo nṛpottama

श्लोक 15–17 का हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ ! तत्पश्चात्‌ तथाकथित गगवान्‌ वासुदेव पौण्ड्रकने धनुष खींचकर उसपर मराजके समान भयंकर तीखे नाराचका संधान किया गौर उस रातमें अपने सैनिकोंका हर्ष बढ़ाते हुए पुनः गात्यकिको घायल कर दिया। ललाठमें उस नाराचकी हरी चोट खाकर वृष्णिवंशके अग्रगण्य वीर सत्यप्रतिज्ञ पात्यकि, जो सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ थे, अपने रथके पिछले पगमें निश्चेष्टकी भाँति बैठ गये

अध्याय 279

श्लोक 16

विव्याध सात्यकिं भूयो निशि प्रह्रादयन् स्वकान् ।नाराचेन समाविद्धः सात्यकिः सत्यसङ्गरः

vivyādha sātyakiṃ bhūyo niśi prahrādayan svakān | nārācena samāviddhaḥ sātyakiḥ satyasaṅgaraḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 279

श्लोक 17

ललाटे सुदृढं वीरो वृष्णीनामग्रणीस्तदा ।निषसाद रथोपस्थे निश्चेष्ट इव सत्तमः

lalāṭe sudṛḍhaṃ vīro vṛṣṇīnāmagraṇīstadā | niṣasāda rathopasthe niśceṣṭa iva sattamaḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 279

श्लोक 18

ततः स पौण्ड्रको राजा विद्ध्वा दशभिराशुगैः ।सारथिं पञ्चविंशत्या हयांश्च चतुरो नृप

tataḥ sa pauṇḍrako rājā viddhvā daśabhirāśugaiḥ | sārathiṃ pañcaviṃśatyā hayāṃśca caturo nṛpa

हिन्दी अर्थ

नरेधर! दनन्तर राजा पौण्ड्रकने दस शीघ्रगामी बाणोंद्वारा सारधिको गौर पच्चीस बाणोंसे सात्यकिके चारों घोड़ोंको क्षत- क्षत कर दिया

अध्याय 279

श्लोक 19

ते हया रुधिराक्ताङ्गाः सारथिश्च समन्ततः ।विह्वलाः समपद्यन्त वासुदेवस्य पश्यतः

te hayā rudhirāktāṅgāḥ sārathiśca samantataḥ | vihvalāḥ samapadyanta vāsudevasya paśyataḥ

हिन्दी अर्थ

वे घोड़े और सारथि सब ओरसे घायल हो खूनसे लथपथ हो गये और वासुदेवके सामने ही अत्यन्त व्याकुल हो उठे

अध्याय 279

श्लोक 20

वासुदेवो रथे चापि सिंहनादं समाददे ।तेन नादेन तत्राभूद् विबुद्धः सात्यकिर्नृप

vāsudevo rathe cāpi siṃhanādaṃ samādade | tena nādena tatrābhūd vibuddhaḥ sātyakirnṛpa

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! बासुदेव अपने रथपर बैठा हुआ जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा। उसकी उस गर्जनासे सात्यकि मूरच्छांसि जग उठे

अध्याय 279

श्लोक 21

विद्धान् हयांस्तथा दृष्ट्वा सारथिं च तथागतम् ।शैनेयोऽथ महावीर्यो रुषितो नृपसत्तम

viddhān hayāṃstathā dṛṣṭvā sārathiṃ ca tathāgatam | śaineyo'tha mahāvīryo ruṣito nṛpasattama

हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ ! अपने घोड़ों और सारथिको इस प्रकार घायल हुआ देख महापराक्रमी सात्यकि रोषसे भर गये

अध्याय 279

श्लोक 22

अलं द्रक्ष्यामि ते वीर्यमित्युक्त्वा बाणमाददे ।विव्याध तेन बाणेन वक्षस्येनं महाबलः

alaṃ drakṣyāmi te vīryamityuktvā bāṇamādade | vivyādha tena bāṇena vakṣasyenaṃ mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

वे बोले—' अब देखूँगा कि तुझमें कितना बल है।' ऐसा कहकर महाबली सात्यकिने बाण हाथमें लिया और उसके द्वारा पौण्ड्रककी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी

अध्याय 279

श्लोक 23

ततश्चचाल तेनाजौ वासुदेवः शरेण ह ।सुस्राव रुधिरं घोरमत्युष्णं वक्षसो नृप

tataścacāla tenājau vāsudevaḥ śareṇa ha | susrāva rudhiraṃ ghoramatyuṣṇaṃ vakṣaso nṛpa

श्लोक 23–24 का हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! उस बाणसे घायल होकर वासुदेव युद्धस्थलमें काँप उठा और उसकी छातीसे अत्यन्त गरम-गरम भयंकर रक्तकी धारा बहने लगी। वह फुफकारते हुए सर्पके समान लम्बी साँस खींचता हुआ तुरंत रथकी बैठकमें गिर पड़ा। उसे कर्तव्यका भी ज्ञान न रहा। वह केवल रथपर बैठा रहा

अध्याय 279

श्लोक 25

रथोपस्थे पपाताशु निःश्वसन्नुरगो यथा ।कृत्यं चापि न जानाति केवलं निषसाद ह ॥ २४॥।सात्यकिस्तु रथं विद्ध्वा दशभिः सायकैस्तथा ।ध्वजं चिच्छेद भल्लेन वासुदेवस्य वृष्णिपः

rathopasthe papātāśu niḥśvasannurago yathā | kṛtyaṃ cāpi na jānāti kevalaṃ niṣasāda ha || 24||| sātyakistu rathaṃ viddhvā daśabhiḥ sāyakaistathā | dhvajaṃ ciccheda bhallena vāsudevasya vṛṣṇipaḥ

हिन्दी अर्थ

इधर वृष्णिवंशके पालक वीर सात्यकिने दस बाणोंसे रथको छिन्न-भिन्न करके एक भल्लसे वासुदेवकी ध्वजा काट डाली

अध्याय 279

श्लोक 26

हयांश्च चतुरो हत्वा बाणैः सारथिमेव च ।युयुधानोऽथ राजेन्द्र पौण्ड्रकस्य च पश्यतः

hayāṃśca caturo hatvā bāṇaiḥ sārathimeva ca | yuyudhāno'tha rājendra pauṇḍrakasya ca paśyataḥ

श्लोक 26–27 का हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! इसके बाद सात्यकिने पौण्ड्कके देखते-देखते बाणोंद्वारा उसके चारों घोड़ों और सारथिको घायल करके सारथिके सिरको धड़से अलग करके रथसे नीचे गिरा दिया। रथकी ग्रन्थियोंको काट डाला, पौण्ड्रकके घोड़े भी प्राणहीन हो गये

अध्याय 279

श्लोक 27

सारथेश्च शिरः कायादहरत् स रथात् तदा ।रथग्रन्थिं च चिच्छेद हयाश्च व्यसवोऽभवन्

sāratheśca śiraḥ kāyādaharat sa rathāt tadā | rathagranthiṃ ca ciccheda hayāśca vyasavo'bhavan

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 279

श्लोक 28

चक्रं च तिलशः कृत्वा बाणैर्दशभिरञ्जसा ।जहास विपुलं राजन् वासुदेवं महाबलः

cakraṃ ca tilaśaḥ kṛtvā bāṇairdaśabhirañjasā | jahāsa vipulaṃ rājan vāsudevaṃ mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर दस बाणोंसे अनायास ही रथके पहियोंको तिल-तिल करके काट डाला। राजन्‌! यह सब करके महाबली सात्यकि वासुदेवपर जोर- जोरसे हँसने लगे

अध्याय 279

श्लोक 29

ततः परं महत्प्रायं सात्यकिर्वृष्णिनन्दनः ।शब्दं कृत्वा बली साक्षात् सर्वक्षत्रस्य पश्यतः

tataḥ paraṃ mahatprāyaṃ sātyakirvṛṣṇinandanaḥ | śabdaṃ kṛtvā balī sākṣāt sarvakṣatrasya paśyataḥ

श्लोक 29–34 का हिन्दी अर्थ

इसके बाद वृष्णिनन्दन बलवान्‌ वीर सात्यकिने जोर-जोरसे सिंहनाद करके सम्पूर्ण क्षत्रियोंक देखते-देखते सत्तर बाण मारकर मिथ्या वासुदेवको तुरंत पीड़ित कर दिया। वे बाण रिड्ियोंके समान सब ओरसे उसपर पड़ने लगे। सिरपर, अगल- बगलमें, पीठपर और सामनेसे उन बाणोंकी चोट खाता हुआ वह केवल धैर्यके सहारे प्याससे पीड़ित पुरुषकी भाँति बाणोंसे बिंधा हुआ खड़ा रहा। जैसे उदार पुरुष निर्धन हो जाय और किसीको कुछ दे न सके, इसी प्रकार पौण्ड्रक प्रतीकारशून्य होकर वहाँ चुपचाप खड़ा रहा। इसके बाद बलवान्‌ एवं प्रतापी वीर वासुदेवने कुपित हो अर्धचन्द्र लेकर युद्धस्थलमें सात्यकिको घायल कर दिया। उस समय वासुदेव क्रोधसे उद्दी-सा हो रहा था। उसने अपने सामने आते हुए सात्यकिको सात बाणोंसे बींध डाला । उसके द्वारा घायल किये गये सात्यकिने पाँच शीघ्रगामी बाणोंद्वारा पौण्ड्रकके धनुषको काट डाला और बड़े जोरसे सिंहनाद किया

अध्याय 279

श्लोक 30

शरैः सप्ततिसङ्ख्याकैरर्दयामास सत्वरम् ।ते शराः शलभाकारा निपेतुः सर्वशस्तदा

śaraiḥ saptatisaṅkhyākairardayāmāsa satvaram | te śarāḥ śalabhākārā nipetuḥ sarvaśastadā

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 279

श्लोक 31

शिरस्तः पार्श्वतश्चैव पृष्ठतः पुरतस्तथा ।केवलं धैर्यनिचयस्तृषार्तः शरवान् यथा

śirastaḥ pārśvataścaiva pṛṣṭhataḥ puratastathā | kevalaṃ dhairyanicayastṛṣārtaḥ śaravān yathā

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 279

श्लोक 32

यथा मनस्वी रिक्तश्च तथा तिष्ठति पौण्ड्रकः ।ततश्चुक्रोध बलवान् वासुदेवः प्रतापवान्

yathā manasvī riktaśca tathā tiṣṭhati pauṇḍrakaḥ | tataścukrodha balavān vāsudevaḥ pratāpavān

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 279

श्लोक 33

अर्धचन्द्रं समादाय विव्याध युधि सात्यकिम् ।विद्ध्वा सप्तभिरायान्तं क्रोधेन प्रस्फुरन्निव

ardhacandraṃ samādāya vivyādha yudhi sātyakim | viddhvā saptabhirāyāntaṃ krodhena prasphuranniva

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 279

श्लोक 34

विद्धोऽथ सात्यकिस्तेन शरैः पञ्चभिराशुगैः ।चापं चिच्छेद पौण्ड्रस्य सिंहनादं व्यनीनदत्

viddho'tha sātyakistena śaraiḥ pañcabhirāśugaiḥ | cāpaṃ ciccheda pauṇḍrasya siṃhanādaṃ vyanīnadat

अर्थ श्लोक 29 के साथ

अध्याय 279

श्लोक 35

वासुदेवो गदां गृह्य भ्रामयित्वा पदात्पदम् ।त्वरितं पातयामास सात्यकेर्वक्षसि प्रभो

vāsudevo gadāṃ gṛhya bhrāmayitvā padātpadam | tvaritaṃ pātayāmāsa sātyakervakṣasi prabho

हिन्दी अर्थ

प्रभो! तब वासुदेवने गदा हाथमें लेकर उसे पग-पगपर घुमाते हुए तुरंत सात्यकिकी छातीपर दे मारा

अध्याय 279

श्लोक 36

सव्येन तां समाकृष्य करेण यदुनन्दनः ।शरं प्रगृह्य विव्याध सात्यकिर्युधि पौण्ड्रकम्

savyena tāṃ samākṛṣya kareṇa yadunandanaḥ | śaraṃ pragṛhya vivyādha sātyakiryudhi pauṇḍrakam

हिन्दी अर्थ

यदुनन्दन सात्यकिने उस गदाको बायें हाथसे खींचकर एक बाण हाथमें ले उसके द्वारा पौण्ड्कको युद्धमें घायल कर दिया

अध्याय 279

श्लोक 37

तमन्तरे गृहीत्वाशु वासुदेवः प्रतापवान् ।शक्तिभिर्दशभिश्चैव सात्यकिं निजघान ह

tamantare gṛhītvāśu vāsudevaḥ pratāpavān | śaktibhirdaśabhiścaiva sātyakiṃ nijaghāna ha

हिन्दी अर्थ

इसी बीचमें प्रतापी वासुदेवने सात्यकिको लक्ष्य करके शीघ्र ही दस शक्तियोंद्वारा प्रहार किया

अध्याय 279

श्लोक 38

ताभिर्विद्धो रणे वीरः सात्यकिः सत्यसङ्गरः ।अपास्य धनुरन्यत् तद् धनुरादाय सत्वरम् ।आजघान तदा वीरो वृष्णीनामग्रणीर्नृप

tābhirviddho raṇe vīraḥ sātyakiḥ satyasaṅgaraḥ | apāsya dhanuranyat tad dhanurādāya satvaram | ājaghāna tadā vīro vṛṣṇīnāmagraṇīrnṛpa

हिन्दी अर्थ

राजनू! उन शक्तियोंसे बिंधे हुए सत्यप्रतिज्ञ वीर सात्यकिने उस धनुषको फेंककर तुरंत दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और उसके द्वारा वृष्णिवंशके उस अग्रणी वीरने उस समय शत्रुओंको घायल करना आरम्भ किया

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.