Harivamsha Purana
280
अध्याय 280 / 318

Parva 3, Adhyāya 97

26 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ26 श्लोक

अध्याय 280

श्लोक 1

सात्यकेः पौण्ड्रकस्य सार्द्धं युद्धं ततः क्रुद्धो गदापाणिः सात्यकिर्वृष्णिनन्दनः ।वासुदेवं जघानाशु गदया तीक्ष्णया नृप

sātyakeḥ pauṇḍrakasya sārddhaṃ yuddhaṃ tataḥ kruddho gadāpāṇiḥ sātyakirvṛṣṇinandanaḥ | vāsudevaṃ jaghānāśu gadayā tīkṣṇayā nṛpa

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्‌! तदनन्तर वृष्णिकुलको आनन्दित करनेवाले सात्यकिने कुपित हो गदा हाथमें ले ली और उस दुःसह गदासे शीघ्र ही वासुदेवपर आघात किया

अध्याय 280

श्लोक 2

सात्यकिं वासुदेवस्तु गदयाभ्यहनद् बली ।तावुद्यतगदौ वीरौ शुशुभाते सुदारुणौ

sātyakiṃ vāsudevastu gadayābhyahanad balī | tāvudyatagadau vīrau śuśubhāte sudāruṇau

श्लोक 2–4 का हिन्दी अर्थ

इसी तरह बलवान्‌ वीर वासुदेवने भी सात्यकिपर गदासे प्रहार किया। गदा उठाये वे दोनों अत्यन्त भयंकर वीर वनमें एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले दो बलाभिमानी सिंहोंके समान शोभा पा रहे थे। तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए सात्यकिने बायें पैंतरेका आश्रय लिया और वासुदेवने दाहिने पैंतरेका। उसने पात्यकिकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी। साथ ही तीर सात्यकिने भी उसकी दोनों भुजाओंके मध्यभाग (वक्ष:स्थल) -में गदासे आघात किया

अध्याय 280

श्लोक 3

दृप्तौ वने यथा सिंहौ परस्परवधैषिणौ ।ततः स सात्यकिः क्रुद्धः सव्यं मण्डलमागमत्

dṛptau vane yathā siṃhau parasparavadhaiṣiṇau | tataḥ sa sātyakiḥ kruddhaḥ savyaṃ maṇḍalamāgamat

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 280

श्लोक 4

दक्षिणं वासुदेवस्तु तं जघान स्तनान्तरे ।युयुधानोऽथ वीरस्तु बाह्वोर्मध्यमताडयत्

dakṣiṇaṃ vāsudevastu taṃ jaghāna stanāntare | yuyudhāno'tha vīrastu bāhvormadhyamatāḍayat

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 280

श्लोक 5

दृढं स ताडितो वीरो जानुभ्यामपतद् भुवि ।तत उत्थाय वीरस्तु ललाटेऽभ्यहनद् गदाम्

dṛḍhaṃ sa tāḍito vīro jānubhyāmapatad bhuvi | tata utthāya vīrastu lalāṭe'bhyahanad gadām

श्लोक 5–6 का हिन्दी अर्थ

उस गदाकी गहरी चोट खाकर वीर वासुदेव घुटनोंके बल गिर पड़ा। फिर उठकर उस वीरने सात्यकिके ललाटपर गदा मारी। सात्यकि भी कुछ पीड़ित हो बैठे रह गये, फिर तुरंत उठकर वीर सात्यकिने पौण्ड्रदेशके उस श्रेष्ठ योद्धा वासुदेवपर गदासे चोट की

अध्याय 280

श्लोक 6

विषण्णः किञ्चिदास्थाय तत उत्थाय सत्वरम् ।गदयाभ्यहनद् वीरः सात्यकिः पौण्ड्रसत्तमम्

viṣaṇṇaḥ kiñcidāsthāya tata utthāya satvaram | gadayābhyahanad vīraḥ sātyakiḥ pauṇḍrasattamam

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 280

श्लोक 7

वासुदेवो बली वीरः साक्षान्मृत्युरिवापरः ।जघान गदया वृष्णिं निर्दहन्निव चक्षुषा

vāsudevo balī vīraḥ sākṣānmṛtyurivāparaḥ | jaghāna gadayā vṛṣṇiṃ nirdahanniva cakṣuṣā

हिन्दी अर्थ

वीर वासुदेव बड़ा बलवान्‌ था। वह साक्षात्‌ दूसरे मृत्युके समान प्रतीत होता था। वह सात्यकिकी ओर इस तरह देख रहा था, मानो अपने नेत्रोंसे उन्हें दग्ध कर डालेगा। उसने गदासे सात्यकिपर चोट की

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श्लोक 8

स तया ताडितो वृष्णिर्गदया बाहुमुक्तया ।आलम्ब्य भूमिं सहसा मृत्योरङ्कगतो यथा

sa tayā tāḍito vṛṣṇirgadayā bāhumuktayā | ālambya bhūmiṃ sahasā mṛtyoraṅkagato yathā

हिन्दी अर्थ

उसकी भुजाओंद्वारा छोड़ी गयी उस गदासे आहत हो. सात्यकिने सहसा धरतीका सहारा ले लिया, मानो वह मृत्युके अड्में पहुँच गये हों

अध्याय 280

श्लोक 9

संज्ञां पुनः समालम्ब्य पाणिभ्यां दृढमेव च ।गदां तस्य महाराज गृहीत्वा प्रग्रहेण ह

saṃjñāṃ punaḥ samālambya pāṇibhyāṃ dṛḍhameva ca | gadāṃ tasya mahārāja gṛhītvā pragraheṇa ha

श्लोक 9–10 का हिन्दी अर्थ

महाराज! फिर होशमें आकर उन्होंने शत्रुकी चलायी हुई गदाको उछलकर दोनों हाथोंसे दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और काले लोहेकी बनी हुई उस सुन्दर एवं बड़ी भारी गदाके सहसा दो टुकड़े करके उसे दूर फेंक दिया। इसके बाद वीर सात्यकिने बड़े जोरसे सिंहनाद किया

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श्लोक 10

द्विधा कृत्वा महागुर्वीं गदां कालायसीं शुभाम् ।उत्सृज्य सहसा वीरः सिंहनादं व्यनीनदत्

dvidhā kṛtvā mahāgurvīṃ gadāṃ kālāyasīṃ śubhām | utsṛjya sahasā vīraḥ siṃhanādaṃ vyanīnadat

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 280

श्लोक 11

तत उत्सृज्य राजा तु वासुदेवो महाबलः ।सव्येन सात्यकिं गृह्य दक्षिणेन करेण ह

tata utsṛjya rājā tu vāsudevo mahābalaḥ | savyena sātyakiṃ gṛhya dakṣiṇena kareṇa ha

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! तब महाबली एवं प्रतापी राजा वासुदेवने उस गदाको त्यागकर सात्यकिको बायें हाथसे पकड़ लिया और दाहिने हाथसे बड़ी भयंकर मुट्ठी बाँधकर सात्यकिके दोनों स्तनोंके बीचमें प्रहार किया

अध्याय 280

श्लोक 12

मुष्टिं कृत्वा महाघोरां वासुदेवः प्रतापवान् ।ताडयामास मध्ये तु स्तनयोः सात्यकेर्नृप

muṣṭiṃ kṛtvā mahāghorāṃ vāsudevaḥ pratāpavān | tāḍayāmāsa madhye tu stanayoḥ sātyakernṛpa

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 280

श्लोक 13

शैनेयो वृष्णिवीरस्तु गदामुत्सृज्य सत्वरम् ।तलेनाभ्यहनद् वीरो वासुदेवं रणाजिरे

śaineyo vṛṣṇivīrastu gadāmutsṛjya satvaram | talenābhyahanad vīro vāsudevaṃ raṇājire

हिन्दी अर्थ

तब वृष्णिवीर सात्यकिने भी तुरंत अपनी गदा नीचे डाल दी और समराडणमें वासुदेवको एक तमाचा जड़ दिया

अध्याय 280

श्लोक 14

तलेन वासुदेवोऽपि सात्यकिं सत्यसङ्गरम् ।तयोरेवं महाघोरं तलयुद्धं प्रवर्तत

talena vāsudevo'pi sātyakiṃ satyasaṅgaram | tayorevaṃ mahāghoraṃ talayuddhaṃ pravartata

हिन्दी अर्थ

फिर वासुदेवने भी सत्यप्रतिज्ञ सात्यकिको थप्पड़से मारा। इस प्रकार उन दोनोंमें बड़ा भयंकर थप्पड़ोंका युद्ध आरम्भ हो गया

अध्याय 280

श्लोक 15

जानुभ्यां मुष्टिभिश्चैव बाहुभ्यां शिरसा तदा ।उरसोरः समाहत्य जानुभ्यां जानुनी तथा

jānubhyāṃ muṣṭibhiścaiva bāhubhyāṃ śirasā tadā | urasoraḥ samāhatya jānubhyāṃ jānunī tathā

श्लोक 15–18 का हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! घुटनोंसे, मुक्कोंसे, भुजाओंसे और मस्तकसे भी उस समय उनमें युद्ध होने लगा। वे छातीसे छातीपर, घुटनोंसे घुटनोंपर और हाथोंसे हाथोंपर आघात करते हुए युद्ध करते थे। जैसे वनमें दो निकटवर्ती तालवृश्षोंके टकरानेका शब्द होता है, उसी प्रकार उन दोनोंके युद्धमें बड़ी भारी आवाज हो रही थी। उस नीरव एवं निस्तब्ध निशामें समराद्णमें वे दोनों प्रख्यात वीर महाबली पौण्ड्रक और सात्यकि अपना-अपना शस्त्र त्यागकर विशाल अखाड़ेमें उतरे हुए दो सुप्रसिद्ध पहलवानोंकी भाँति युद्ध कर रहे थे

अध्याय 280

श्लोक 16

कराभ्यां करमाहत्य तौ युद्धं सम्प्रचक्रतुः ।तालयोस्तत्र राजेन्द्र वृक्षयोः सन्निकर्षयोः

karābhyāṃ karamāhatya tau yuddhaṃ sampracakratuḥ | tālayostatra rājendra vṛkṣayoḥ sannikarṣayoḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 280

श्लोक 17

वने यथा निरुत्पन्नस्तथैवाभून्महास्वनः ।तावाजौ प्रथितौ वीरावुभौ पौण्ड्रकसात्यकी

vane yathā nirutpannastathaivābhūnmahāsvanaḥ | tāvājau prathitau vīrāvubhau pauṇḍrakasātyakī

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 280

श्लोक 18

निशि स्तिमितमूकायां शस्त्रं त्यक्त्वा महाबलौ ।युयुधाते महारङ्गे मल्लौ द्वाविव विश्रुतौ

niśi stimitamūkāyāṃ śastraṃ tyaktvā mahābalau | yuyudhāte mahāraṅge mallau dvāviva viśrutau

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 280

श्लोक 19

उभे सेने महाराज्ञोः संशयं जग्मतुस्तदा ।किं नु स्यात् सात्यकिर्वीरो हतस्तेन भविष्यति

ubhe sene mahārājñoḥ saṃśayaṃ jagmatustadā | kiṃ nu syāt sātyakirvīro hatastena bhaviṣyati

श्लोक 19–21 का हिन्दी अर्थ

महाराज उग्रसेन और पौण्ड्रक दोनोंकी सेनाएँ उस समय संशयमें पड़ गयी थीं कि “क्या वीर सात्यकि वासुदेवके द्वारा मारे जायेँगे अथवा वासुदेव ही उस महात्माके द्वारा मार डाला जायगा। आज वे दोनों महावीर एक-दूसरेका वध करनेकी इच्छासे युद्ध करते हुए निश्चय ही स्वर्गलोकको चले जायँगे, अन्यथा ये दोनों दृढ़ निश्चयवाले वीर युद्धसे विरत नहीं होंगे

अध्याय 280

श्लोक 20

आहोस्विद् वासुदेवस्तु हतस्तेन महात्मना ।अद्य वै तौ महावीरौ परस्परवधैषिणौ

āhosvid vāsudevastu hatastena mahātmanā | adya vai tau mahāvīrau parasparavadhaiṣiṇau

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 280

श्लोक 21

युध्यमानौ महावीरौ तदा स्वर्गं गमिष्यतः ।अन्यथा नोपरम्येतां युद्धाद् वीरौ सुनिश्चितौ

yudhyamānau mahāvīrau tadā svargaṃ gamiṣyataḥ | anyathā noparamyetāṃ yuddhād vīrau suniścitau

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 280

श्लोक 22

अहो वीर्यमहो धैर्यमेतयोर्बलशालिनोः ।एतौ महाबलौ लोके एतौ प्रकृतिसत्तमौ

aho vīryamaho dhairyametayorbalaśālinoḥ | etau mahābalau loke etau prakṛtisattamau

श्लोक 22–23 का हिन्दी अर्थ

अहो ! इन बलशाली वीरोंका धैर्य और पराक्रम अद्भुत है। ये ही दोनों इस जगत्‌में महाबली हैं और ये ही स्वभावत: श्रेष्ठ पुरुष हैं । देवताओं और असुरोंमें भी कभी ऐसा महाभयंकर युद्ध नहीं हुआ था। ऐसा संग्राम न तो कभी सुना गया था और न कभी देखनेमें आया था'

अध्याय 280

श्लोक 23

नैवं युद्धं महाघोरमासीद् देवासुरेष्वपि ।न श्रुतो न च वा दृष्टः सङ्ग्रामोऽयं कदाचन

naivaṃ yuddhaṃ mahāghoramāsīd devāsureṣvapi | na śruto na ca vā dṛṣṭaḥ saṅgrāmo'yaṃ kadācana

अर्थ श्लोक 22 के साथ

अध्याय 280

श्लोक 24

एते वै सैनिका ब्रूयुः सेनयोरुभयोरपि ।रात्रौ निशीथे मेघौघे दृष्ट्वा युद्धं सुदारुणम्

ete vai sainikā brūyuḥ senayorubhayorapi | rātrau niśīthe meghaughe dṛṣṭvā yuddhaṃ sudāruṇam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार दोनों सेनाओंके सैनिक मेघोंकी घटासे घिरे हुए रत्रिके निशीथकालमें उस भयंकर युद्धको देखकर उपर्युक्त बातें कहते थे

अध्याय 280

श्लोक 25

अथ तौ बाहुभिर्वीरौ सनिपेततुरञ्जसा ।दशभिर्मुष्टिभिर्जघ्ने सात्यकिः पौण्ड्रकं तदा

atha tau bāhubhirvīrau sanipetaturañjasā | daśabhirmuṣṭibhirjaghne sātyakiḥ pauṇḍrakaṃ tadā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वे दोनों वीर अनायास ही परस्पर बाहुयुद्ध करने लगे। उस समय पात्यकिने पौण्ड्कको दस मुक्के मारे

अध्याय 280

श्लोक 26

पञ्चभिः सात्यकिं पौण्ड्रः समाजघ्ने महाबलः ।तयोश्चटचटाशब्दो ब्रह्माण्डक्षोभणो महान् ।प्रादुरासीत् तु सर्वत्र सर्वान् विस्मापयन्निव

pañcabhiḥ sātyakiṃ pauṇḍraḥ samājaghne mahābalaḥ | tayoścaṭacaṭāśabdo brahmāṇḍakṣobhaṇo mahān | prādurāsīt tu sarvatra sarvān vismāpayanniva

हिन्दी अर्थ

महाबली पौण्ड्रकने सात्यकिको पाँच मुक्के मारे। उन दोनोंके पुक्कोंका महानू चट-चट शब्द समूचे ब्रह्माण्डको क्षुब्ध किये देता था। वह शब्द सबको विस्मयमें डालता दुआ सा सर्वत्र प्रकट होता (सुनायी पड़ता) था

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.