Harivamsha Purana
278
अध्याय 278 / 318

Parva 3, Adhyāya 95

41 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ41 श्लोक

अध्याय 278

श्लोक 1

पौण्ड्रकेन पूर्वद्वारस्य प्राकारचयानां भेदनस्य प्रयत्नं, सात्यक्यादि यादववीराणां रक्षार्थं आगमनम्, सात्यकिना वायव्यास्त्रेन पौण्ड्रकसैनिकान् अपनयित्वा पौण्ड्रकस्य युद्धाय आह्वानं, पौण्ड्रकस्य गर्वोक्तिः निवृत्तेष्वथ सैन्येषु वृष्णिवीरेषु चैव हि ।भीतेष्वथ महाराज हतेषु युधि सर्वतः

pauṇḍrakena pūrvadvārasya prākāracayānāṃ bhedanasya prayatnaṃ, sātyakyādi yādavavīrāṇāṃ rakṣārthaṃ āgamanam, sātyakinā vāyavyāstrena pauṇḍrakasainikān apanayitvā pauṇḍrakasya yuddhāya āhvānaṃ, pauṇḍrakasya garvoktiḥ nivṛtteṣvatha sainyeṣu vṛṣṇivīreṣu caiva hi | bhīteṣvatha mahārāja hateṣu yudhi sarvataḥ

श्लोक 1–3 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय ! जब ादवोंकी सारी सेना और वृष्णिवंशी वीर युद्धमें घायल गौर भयभीत होकर सब ओरसे लौट गये, सारी मशालें ुझ गयीं और चारों ओर सन्नाटा छा गया, तब यह समझकर के वृष्णिवंशियोंकी उत्तम सेना पराजित हो गयी, महापराक्रमी ण्ड्क अपने सैनिकोंसे बोला-राजेन्द्रगण! शीघ्र ताओ और टड्डों तथा कुन्तोंसे इस पुरीको खोद डालो

अध्याय 278

श्लोक 2

दीपिकासु प्रशान्तासु निःशब्दे सति सर्वतः ।जितमित्येव यन्मत्वा वृष्णीनां बलमुत्तमम्

dīpikāsu praśāntāsu niḥśabde sati sarvataḥ | jitamityeva yanmatvā vṛṣṇīnāṃ balamuttamam

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 3

ततः पौण्ड्रो महावीर्यो बभाषे सैनिकान् स्वकान् ।शीघ्रं गच्छत राजेन्द्राष्टङ्कैः कुन्तैः पुरीमिमाम्

tataḥ pauṇḍro mahāvīryo babhāṣe sainikān svakān | śīghraṃ gacchata rājendrāṣṭaṅkaiḥ kuntaiḥ purīmimām

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 4

कुठारैः कुन्तलैश्चैव पाषाणैः सर्वतोदिशम् ।कर्षणस्थैः सुपाषाणैः सर्वतो यात भूमिपाः

kuṭhāraiḥ kuntalaiścaiva pāṣāṇaiḥ sarvatodiśam | karṣaṇasthaiḥ supāṣāṇaiḥ sarvato yāta bhūmipāḥ

हिन्दी अर्थ

भूमिपालो ! कुठार, कुन्तल (हल), पाषाण था पत्थर फेंकनेवाले यन्त्रोंपर रखे गये बड़े-बड़े प्रस्तर- ब्रण्ड लेकर इस पुरीके चारों ओर चले जाओ

अध्याय 278

श्लोक 5

भिद्यन्तां प्राकारचयाः प्रासादाश्च समन्ततः ।गृह्यन्तां कन्यकाः सर्वा दास्यश्चैव समन्ततः

bhidyantāṃ prākāracayāḥ prāsādāśca samantataḥ | gṛhyantāṃ kanyakāḥ sarvā dāsyaścaiva samantataḥ

हिन्दी अर्थ

इस पुरीके परकोटे विदीर्ण कर डालो, महलोंको भी सब ओरसे गिरा दो, समस्त यादव-कन्याओं और रासियोंको भी अपने अधिकारमें कर लो

अध्याय 278

श्लोक 6

गृह्यन्तां वसुमुख्यानि धनानि सुबहून्यथ ।ते तथेति महात्मानो राजानः सर्व एव तु

gṛhyantāṃ vasumukhyāni dhanāni subahūnyatha | te tatheti mahātmāno rājānaḥ sarva eva tu

श्लोक 6–7 का हिन्दी अर्थ

मुख्य- मुख्य रत्र और बहुत-सी धनराशियोंको लूट लो।' तब बहुत अच्छा ' कहकर वे सभी महामनस्वी नरेश पौण्ड्रककी भाज्ञासे कुठारोंद्वारा सब ओरसे पुरीके परकोटोंको तथा पब ओर मनुष्योंके समुदायसे भरे हुए महलोंको छिन्न- भन्न करने लगे

अध्याय 278

श्लोक 7

कुठारैः सर्वतश्चैव चिच्छिदुः पौण्ड्रकाज्ञया ।प्राकारांश्चैव सर्वत्र प्रासादान् नरसञ्चयान्

kuṭhāraiḥ sarvataścaiva cicchiduḥ pauṇḍrakājñayā | prākārāṃścaiva sarvatra prāsādān narasañcayān

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 8

अथ तत्र महाशब्दः प्रादुरासीत् समन्ततः ।टङ्केषु पात्यमानेषु प्राकारेषु महाबलैः

atha tatra mahāśabdaḥ prādurāsīt samantataḥ | ṭaṅkeṣu pātyamāneṣu prākāreṣu mahābalaiḥ

हिन्दी अर्थ

उन महाबली वीरोंद्वारा जब रकोटोंपर टड्ढ गिराये जाने लगे, उस समय चारों ओर बड़ा भारी शब्द होने लगा

अध्याय 278

श्लोक 9

पूर्वद्वारे महाराज भिन्नाः प्राकारसञ्चयाः ।श्रुत्वा शब्दं महाघोरं सात्यकिः क्रोधमूर्च्छितः

pūrvadvāre mahārāja bhinnāḥ prākārasañcayāḥ | śrutvā śabdaṃ mahāghoraṃ sātyakiḥ krodhamūrcchitaḥ

हिन्दी अर्थ

महाराज! पूर्वद्वारपर जो हुत-से परकोटे थे, वे प्राय: विदीर्ण कर दिये गये। रकोटोंके गिराये जानेका महाभयंकर शब्द सुनकर सात्यकि कोधसे मूर््छित हो गये

अध्याय 278

श्लोक 10

मयि सर्वं समारोप्य केशवो यादवेश्वरः ।गतः कैलासशिखरं द्रष्टुं शङ्करमव्ययम्

mayi sarvaṃ samāropya keśavo yādaveśvaraḥ | gataḥ kailāsaśikharaṃ draṣṭuṃ śaṅkaramavyayam

श्लोक 10–12 का हिन्दी अर्थ

उन्होंने सोचा—' यदुनाथ केशव इस पुरीकी रक्षाका सारा भार मुझपर ही रखकर भविनाशी भगवान्‌ शंकरका दर्शन करनेके लिये फैलासपर्वतके शिखरपर गये हैं। अत: इस समय इस गारकापुरीकी रक्षा मुझे अवश्य करनी चाहिये।' मन- री -मन ऐसा सोचकर वे तुरंत धनुष लेकर एक विशाल [वं भयंकर रथपर आरूढ़ हुए, जिसे महात्मा दारुकके त्रने सजाया था और वह स्वयं ही उसका सारथि बना था

अध्याय 278

श्लोक 11

अवश्यं हि मया रक्ष्या पुरी द्वारवती त्वियम् ।इति सञ्चिन्त्य मनसा धनुरादाय सत्वरम्

avaśyaṃ hi mayā rakṣyā purī dvāravatī tviyam | iti sañcintya manasā dhanurādāya satvaram

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 12

रथं महान्तमारुह्य दारुकस्य महात्मनः ।पुत्रेण संस्कृतं घोरं यन्ता च स्वयमेव हि

rathaṃ mahāntamāruhya dārukasya mahātmanaḥ | putreṇa saṃskṛtaṃ ghoraṃ yantā ca svayameva hi

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 13

धनुर्महत् तदादाय शरांश्चाशीविषोपमान् ।आमुच्य कवचं घोरं शस्त्रसम्पातदुःसहम्

dhanurmahat tadādāya śarāṃścāśīviṣopamān | āmucya kavacaṃ ghoraṃ śastrasampātaduḥsaham

श्लोक 13–14 का हिन्दी अर्थ

वे वह विशाल धनुष और विषधर पर्पोंक समान भयंकर बाण लेकर शस्त्रोंका प्रहार जिसकी टंकारको कठिनतासे सह सके, ऐसे भयंकर कवचको धारण करके बाजूबंद, कुण्डल, तरकस, बाण, पनुष, गदा और खड्गसे संयुक्त हो सात्यकि भगवान्‌ रीकृष्णके वचनोंको स्मरण करते हुए युद्धके लिये चल देये

अध्याय 278

श्लोक 14

अङ्गदी कुण्डली तूणी शरी चापी गदासिमान् ।ययौ युद्धाय शैनेयः संस्मरन् कैशवं वचः

aṅgadī kuṇḍalī tūṇī śarī cāpī gadāsimān | yayau yuddhāya śaineyaḥ saṃsmaran kaiśavaṃ vacaḥ

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 15

दीपिकादीपिते देशे ययौ सात्यकिरुत्तमः ।तथैव बलदेवोऽपि रथमारुह्य भास्वरम्

dīpikādīpite deśe yayau sātyakiruttamaḥ | tathaiva baladevo'pi rathamāruhya bhāsvaram

श्लोक 15–16 का हिन्दी अर्थ

जो स्थान मशालोंसे प्रकाशित था, वहीं त्तम वीर सात्यकि गये। उसी प्रकार महापराक्रमी लदेव भी युद्ध करनेकी इच्छासे गदा और धनुष-बाण ने तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो वहाँ तीव्र गतिसे गये। नके साथके सभी सैनिक भयंकर सिंहनाद करते हुए नागे बढ़ रहे थे

अध्याय 278

श्लोक 16

गदी शरी महावीर्यः प्रायाद् रणचिकीर्षया ।सिंहनादं प्रकुर्वन्तो मुञ्चन्तो भैरवं रवम्

gadī śarī mahāvīryaḥ prāyād raṇacikīrṣayā | siṃhanādaṃ prakurvanto muñcanto bhairavaṃ ravam

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 17

उद्धवोऽपि बली साक्षाद् गजमारुह्य सत्वरम् ।मत्तं महारवं घोरं सङ्ग्रामे नीतिमत्तरः

uddhavo'pi balī sākṣād gajamāruhya satvaram | mattaṃ mahāravaṃ ghoraṃ saṅgrāme nītimattaraḥ

श्लोक 17–18 का हिन्दी अर्थ

नीतिमानोंमें श्रेष्ठ, महापराक्रमी लवान्‌ उद्धव भी उत्तम नीति और प्रीतिका अनुसंधान ररते हुए महान्‌ गर्जन करनेवाले भयंकर मतवाले हाथीपर मारूढ़ हो तुरंत ही संग्रामभूमिकी ओर चल दिये। अन्य पब चृष्णिवंशी योद्धा भी संग्रामकी लालसा लेकर वहाँ ये

अध्याय 278

श्लोक 18

ययौ नीतिं विचिन्वानः परां प्रीतिं महाबलः ।अन्ये च वृष्णयः सर्वे ययुः सङ्ग्रामलालसाः

yayau nītiṃ vicinvānaḥ parāṃ prītiṃ mahābalaḥ | anye ca vṛṣṇayaḥ sarve yayuḥ saṅgrāmalālasāḥ

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 19

रथान्गजान्समारुह्य हार्दिक्यप्रमुखास्तथा ।दीपिकाभिश्च सर्वत्र पुरोवृत्ताभिरीश्वराः

rathāngajānsamāruhya hārdikyapramukhāstathā | dīpikābhiśca sarvatra purovṛttābhirīśvarāḥ

श्लोक 19–23 का हिन्दी अर्थ

कृतवर्मा आदि प्रधान-प्रधान सामर्थ्यशाली द्धा भगवान्‌ श्रीकृष्णके वचनोंका स्मरण करके रयथें गौर हाथियों पर आरूढ़ हो सर्वत्र अपने आगे मशालोंको 'लवाकर सिंहनाद करते हुए चले। पूर्वद्वारपर आकर द्धकी इच्छावाले महाबली वृष्णिवंशी योद्धा यथायोग्य क-दूसरेसे मिलकर युद्धकी लालसासे वहाँ डट गये। जन्‌ ! मशालोंसे प्रकाशित हुए पथपर जब वह महाभयंकर बना खड़ी हो गयी, तब धनुष, बाण, तरकस और गदासे क्त हो वीरवर प्रतापी सात्यकिने वायव्यास्त्र लेकर उसके रा अपने महान्‌ बाणको संयुक्त करके उस उत्तम वं श्रेष्ठ धनुषको पूरे कानतक खींचकर वह अस्त्र शत्रुओंकी ननापर छोड़ दिया

अध्याय 278

श्लोक 20

सिंहनादं प्रकुर्वन्तः स्मरन्तः कैशवं वचः ।पूर्वद्वारं समागम्य वृष्णयो युद्धलालसाः

siṃhanādaṃ prakurvantaḥ smarantaḥ kaiśavaṃ vacaḥ | pūrvadvāraṃ samāgamya vṛṣṇayo yuddhalālasāḥ

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 21

ते समेत्य यथायोगं स्थितास्तत्र महाबलाः ।स्थिते सैन्ये महाघोरे दीपिकादीपिते पथि

te sametya yathāyogaṃ sthitāstatra mahābalāḥ | sthite sainye mahāghore dīpikādīpite pathi

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 22

शिनिर्वीरः शरी चापी गदी तूणीरवान्विभो ।वायव्यास्त्रं समादाय योजयित्वा महाशरम्

śinirvīraḥ śarī cāpī gadī tūṇīravānvibho | vāyavyāstraṃ samādāya yojayitvā mahāśaram

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 23

आकर्णं तूर्णमाकृष्य धनुःप्रवरमुत्तमम् ।मुमोच परसैन्येषु शिनिर्वीरः प्रतापवान्

ākarṇaṃ tūrṇamākṛṣya dhanuḥpravaramuttamam | mumoca parasainyeṣu śinirvīraḥ pratāpavān

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 24

वायव्यास्त्रेण ते सर्वे तत्रस्था नरसत्तमाः ।विजिता ह्यस्त्रवीर्येण यत्र तिष्ठति पौण्ड्रकः

vāyavyāstreṇa te sarve tatrasthā narasattamāḥ | vijitā hyastravīryeṇa yatra tiṣṭhati pauṇḍrakaḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ खड़े हुए शत्रुपक्षके भी श्रेष्ठ योद्धा वायव्यास्त्रसे पीड़ित हो उस अस्त्रकी किसे पराजित हो वहीं जा पहुँचे, जहाँ पौण्ड्रक खड़ा पा

अध्याय 278

श्लोक 25

तत्र गत्वा स्थिताः सर्वे निर्धूता वातरंहसा ।यत्र पूर्वं स्थिताः सर्वे विद्रुता राजसत्तमाः

tatra gatvā sthitāḥ sarve nirdhūtā vātaraṃhasā | yatra pūrvaṃ sthitāḥ sarve vidrutā rājasattamāḥ

हिन्दी अर्थ

वायुके वेगसे कम्पित हो वे सभी श्रेष्ठ नरेश गकर उसी स्थानपर जा पहुँचे, जहाँ पहले खड़े थे

अध्याय 278

श्लोक 26

तत्र स्थित्वा च शैनेयः शरमादाय सत्वरम् ।निशितं सर्पभोगाभं बभाषे सात्यकिस्तदा

tatra sthitvā ca śaineyaḥ śaramādāya satvaram | niśitaṃ sarpabhogābhaṃ babhāṣe sātyakistadā

हिन्दी अर्थ

र्वद्वारपर खड़े हुए शिनिवंशी सात्यकि तुरंत ही एक र्पाकार तीखा बाण ले बोले—

अध्याय 278

श्लोक 27

क्व इदानीं महाबुद्धिः पौण्ड्रको राजसत्तमः ।स्थितोऽस्मि व्यवसायेन शरी चापी महाबलः

kva idānīṃ mahābuddhiḥ pauṇḍrako rājasattamaḥ | sthito'smi vyavasāyena śarī cāpī mahābalaḥ

श्लोक 27–28 का हिन्दी अर्थ

राजाओंमें श्रेष्ठ रम बुद्धिमान्‌ पौण्ड्रक इस समय कहाँ है ? मैं महाबली आात्यकि धनुष-बाण लेकर उसके साथ युद्धके निश्चयसे हाँ खड़ा हूँ। यदि उस दुरात्मा नीच नरेशको मैं देख नूँगा तो बिना मारे नहीं रहूँगा। मैं भगवान्‌ श्रीकृष्णका पेवक हूँ और पौण्ड्रकका वध करनेके लिये यहाँ खड़ा ँ

अध्याय 278

श्लोक 28

यदि द्रष्टा दुरात्मानं ततो हन्ता नृपाधमम् ।भृत्योऽस्मि केशवस्याहं जिघांसुः पौण्ड्रकं स्थितः

yadi draṣṭā durātmānaṃ tato hantā nṛpādhamam | bhṛtyo'smi keśavasyāhaṃ jighāṃsuḥ pauṇḍrakaṃ sthitaḥ

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 29

छित्त्वा शिरस्तु तस्यास्य सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ।बलिं दास्यामि गृध्रेभ्यः श्वभ्यश्चैव दुरात्मनः

chittvā śirastu tasyāsya sarvakṣatrasya paśyataḥ | baliṃ dāsyāmi gṛdhrebhyaḥ śvabhyaścaiva durātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

मैं समस्त क्षत्रियोंके देखते-देखते उस रात्माका सिर काटकर गीधों और कुत्तोंको उसकी बलि रे दूँगा

अध्याय 278

श्लोक 30

को नाम ईदृशं कर्म चौरवच्च समाचरेत् ।सुप्तेषु निशि सर्वत्र यादवेषु महात्मसु

ko nāma īdṛśaṃ karma cauravacca samācaret | supteṣu niśi sarvatra yādaveṣu mahātmasu

श्लोक 30–31 का हिन्दी अर्थ

रातमें जब सर्वत्र महात्मा यादव सो रहे डों, कौन श्रेष्ठ पुरुष इस तरह चोरकी भाँति जघन्य कर्म कर सकता है ? यह बलवान्‌ राजा नहीं, सर्वथा चोर है। दि इस नीच नरेशमें शक्ति होती तो यह इस तरह चोरी करता

अध्याय 278

श्लोक 31

चौरोऽयं सर्वथा राजा न हि राजा बलान्वितः ।यदि शक्तो न कुर्याच्च चौर्यमेवं नृपाधमः

cauro'yaṃ sarvathā rājā na hi rājā balānvitaḥ | yadi śakto na kuryācca cauryamevaṃ nṛpādhamaḥ

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 32

अहोऽस्य बलिनो राज्ञश्चौरकार्यं प्रकुर्वतः ।सर्वथाऽऽगमनं तस्य न हि पश्यामि साम्प्रतम्

aho'sya balino rājñaścaurakāryaṃ prakurvataḥ | sarvathā''gamanaṃ tasya na hi paśyāmi sāmpratam

हिन्दी अर्थ

अहो! चोरका काम करनेवाले इस लवान्‌ राजाका मेरे सामने किसी तरह आगमन नहीं शी रहा है। मैं उस चोरको इस समय देख नहीं पा हा हूँ'

अध्याय 278

श्लोक 33

इत्युक्त्वा सात्यकिर्वीरः प्रजहास महाबलः ।विस्फार्य सुदृढं चापं सन्दधे कार्मुके शरम्

ityuktvā sātyakirvīraḥ prajahāsa mahābalaḥ | visphārya sudṛḍhaṃ cāpaṃ sandadhe kārmuke śaram

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर महाबली वीर सात्यकि जोर-जोरसे हँसने लगे। उन्होंने अपने सुदृढ़ धनुषको क्रानतक खींचकर उसपर बाणका संधान किया

अध्याय 278

श्लोक 34

आकर्ण्य वचनं वीरः सात्यकेस्तस्य धीमतः ।क्व नु कृष्णः क्व गोपालः कुतः सोऽथ प्रवर्तते

ākarṇya vacanaṃ vīraḥ sātyakestasya dhīmataḥ | kva nu kṛṣṇaḥ kva gopālaḥ kutaḥ so'tha pravartate

श्लोक 34–35 का हिन्दी अर्थ

बरुद्धिमान्‌ वीर सात्यकिका यह वचन सुनकर वीर पौण्ड्रक ोल उठा—' कहाँ है कृष्ण! कहाँ है वह ग्वाला? त्री और पशुकी हत्या करनेवाला कृष्ण इस समय कहाँ दे ? जो यहाँ स्वामी बनकर सेवा लेता है, वह मेरा शत्रु कहाँ है ? मेरा नाम ग्रहण करके वह अब कहाँ छिपा हुआ है ?'॥ इ

अध्याय 278

श्लोक 35

स्त्रीहन्ता पशुहन्ता च क्व च स्वामीति सेवितः ।स इदानीं क्व वर्तेत गृहीत्वा मम नाम तत्

strīhantā paśuhantā ca kva ca svāmīti sevitaḥ | sa idānīṃ kva varteta gṛhītvā mama nāma tat

अर्थ श्लोक 34 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 36

हन्ता सख्युर्महावीर्यो नरकस्य महात्मनः ।ममैव तात युद्धेऽस्मिन्हते तस्मिन्दुरात्मनि

hantā sakhyurmahāvīryo narakasya mahātmanaḥ | mamaiva tāta yuddhe'sminhate tasmindurātmani

हिन्दी अर्थ

उसने मेरे ही मित्र महात्मा नरकासुरका वध किया डे, इसीलिये वह महापराक्रमी बना फिरता है । तात! इस पुद्धमें उस दुरात्माके मारे जानेपर मेरा क्रोध शान्त होगा

अध्याय 278

श्लोक 37

गच्छ त्वं कामतो वीर योद्धुं न क्षमते भवान् ।अथवा तिष्ठ किञ्चित्तु ततो द्रष्टासि मे बलम्

gaccha tvaṃ kāmato vīra yoddhuṃ na kṣamate bhavān | athavā tiṣṭha kiñcittu tato draṣṭāsi me balam

हिन्दी अर्थ

वीर ! तुम इच्छानुसार लौट जाओ। तुममें रे साथ युद्ध करनेकी क्षमता नहीं है। अथवा थोड़ी दर ठहर जाओ, फिर स्वयं ही मेरा बल देख नोगे

अध्याय 278

श्लोक 38

शिरस्ते पातयिष्यामि शरैर्घोरैर्दुरासदैः ।हतस्य तव वीरेह भूमिः पास्यति शोणितम्

śiraste pātayiṣyāmi śarairghorairdurāsadaiḥ | hatasya tava vīreha bhūmiḥ pāsyati śoṇitam

हिन्दी अर्थ

वीर! मैं भयंकर दुर्जय बाणोंद्वारा तुम्हारा सर काट गिराऊँगा! इस रणभूमिमें मेरेद्वारा मारे जानेपर पहाँकी भूमि तुम्हारा रक्तपान करेगी

अध्याय 278

श्लोक 39

श्रोष्यते स तथा गोपो हतः सात्यकिरित्यपि ।यो गर्वस्तस्य गोपस्य सर्वदा वर्तते महान्

śroṣyate sa tathā gopo hataḥ sātyakirityapi | yo garvastasya gopasya sarvadā vartate mahān

श्लोक 39–41 का हिन्दी अर्थ

वह ग्वाला भी सुन लेगा कि सात्यकि मारा गया। यदुश्रेष्ठ ! उस ऐपको जो सदा महान्‌ गर्व बना रहता है, वह तुम्हारे परे जानेपर शीघ्र ही नष्ट हो जायगा। महामते ! मलोगोंने पहलेसे ही सुन रखा है कि वह गोप तुम्हारे पर नगरकी रक्षाका भार रखकर कैलासपर्वतपर गया दे । सात्यके ! यदि तुममें शक्ति हो तो कोई तीखा बाण ाथमें लो।' ऐसा कहकर पौण्ड्रक बाण लेकर आगे ढढ़ा और युद्धके लिये डट गया

अध्याय 278

श्लोक 40

विनश्यति स तु क्षिप्रं हते त्वयि यदूत्तम ।त्वयि रक्षां समादिश्य गोपः कैलासपर्वतम्

vinaśyati sa tu kṣipraṃ hate tvayi yadūttama | tvayi rakṣāṃ samādiśya gopaḥ kailāsaparvatam

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 278

श्लोक 41

गत इत्येवमस्माभिः श्रुतं पूर्वं महामते ।शरं गृहाण निशितं यदि शक्तोऽसि सात्यके ।इत्युक्त्वा बाणमादाय ययौ योद्धं व्यवस्थितः

gata ityevamasmābhiḥ śrutaṃ pūrvaṃ mahāmate | śaraṃ gṛhāṇa niśitaṃ yadi śakto'si sātyake | ityuktvā bāṇamādāya yayau yoddhaṃ vyavasthitaḥ

अर्थ श्लोक 39 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.