अध्याय 277
श्लोक 1
यादववीरेभिः पौण्ड्रकस्य सैन्यस्य एवं एकलव्येन यादवसैन्यस्य संहारं ततश्च यादवाः सर्वे दृष्ट्वा सैनिकसञ्चयम् ।रात्रौ व व्यसनं प्राप्तं महाशस्त्रसमाकुलम्
yādavavīrebhiḥ pauṇḍrakasya sainyasya evaṃ ekalavyena yādavasainyasya saṃhāraṃ tataśca yādavāḥ sarve dṛṣṭvā sainikasañcayam | rātrau va vyasanaṃ prāptaṃ mahāśastrasamākulam
श्लोक 1–4 का हिन्दी अर्थ
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर मस्त यादवोंने देखा कि शत्रुसैनिकोंका बड़ा भारी माव हो रहा है। वे सब-के-सब महान् अस्त्र- प्त्रोंसे सम्पन्न हैं और प्रचण्ड वायुसे उमड़े हुए नयकालके समुद्रकी भाँति दिखायी देते हैं। विशेषत: त्रके समय यह महान् संकट प्रात हुआ है। यह वर और सोचकर वे समस्त यादव युद्धकी लालसासे स्त्र-शस्त्र लेकर कमर कसकर तैयार हो गये। उन भी शस्त्रयोधी यादवोंने अपने हाथोंमें मशालें ले रखी । सात्यकि, बलभद्र, हार्दिक्य (कृतवर्मा), निशठ, म॒बुद्धिमान् उद्धव, महाबली उग्रसेन तथा अन्य ब् यादववीर कवच बाँधने लगे