Harivamsha Purana
263
अध्याय 263 / 318

Parva 3, Adhyāya 80

89 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ89 श्लोक

अध्याय 263

श्लोक 1

घण्टाकर्णेन भगवतः श्रीकृष्णेन च अन्योन्यं परिचयदानं, घण्टाकर्णेन भगवतः विष्णोः स्तवनं समाधिलाभं च ।ततः स भगवान् विष्णुः पिशाचौ मांसभक्षकौ ।ददर्शाथ महाघोरौ दीपिकाधारिणौ हरिः

ghaṇṭākarṇena bhagavataḥ śrīkṛṣṇena ca anyonyaṃ paricayadānaṃ, ghaṇṭākarṇena bhagavataḥ viṣṇoḥ stavanaṃ samādhilābhaṃ ca | tataḥ sa bhagavān viṣṇuḥ piśācau māṃsabhakṣakau | dadarśātha mahāghorau dīpikādhāriṇau hariḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर उन भगवान्‌ श्रीकृष्णने उन दोनों महाभयंकर मांसभक्षी पिशाचोंकी ओर देखा, जो हाथमें विशाल मशाल लिये वहाँ आये हुए थे

अध्याय 263

श्लोक 2

विलोकयाञ्चक्रतुस्तौ पिशाचौ देवकीसुतम् ।स्थितं सुखासने विष्णुं दृष्ट्वा लोकेश्वरेश्वरम्

vilokayāñcakratustau piśācau devakīsutam | sthitaṃ sukhāsane viṣṇuṃ dṛṣṭvā lokeśvareśvaram

श्लोक 2–3 का हिन्दी अर्थ

उन दोनों पिशाचोंने भी सुखपूर्वक आसनपर बैठे हुए लोकेश्वरोंके भी ईधर देवकीनन्दन श्रीकृष्णको देखा। उन्हें देखकर वे दोनों पिशाच उन केशवके निकट गये और उन्हें अपने बीचमें करके उनसे इस प्रकार बोले—

अध्याय 263

श्लोक 3

तौ च गत्वा समुद्देशं पिशाचौ केशवस्य ह ।ततस्तावूचतुर्विष्णुमन्तरीकृत्य केशवम्

tau ca gatvā samuddeśaṃ piśācau keśavasya ha | tatastāvūcaturviṣṇumantarīkṛtya keśavam

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 4

कौ भवान् कस्य वा मर्त्य कुतश्चागम्यते त्वया ।किमर्थमिह सम्प्राप्तो वने घोरे मृगाकुले

kau bhavān kasya vā martya kutaścāgamyate tvayā | kimarthamiha samprāpto vane ghore mṛgākule

हिन्दी अर्थ

मानवप्रवर! आप कौन हैं ? किसके पुत्र हैं ? कहाँसे आपका यहाँ शुभागमन हुआ है? वन्यपशुओंसे भरे हुए इस घोर वनमें आप किसलिये आये हैं ?

अध्याय 263

श्लोक 5

निर्मनुष्ये द्वीपिवृते पिशाचगणसेविते ।श्वापदैः सेव्यमाने च विपिने व्याघ्रसङ्कुले

nirmanuṣye dvīpivṛte piśācagaṇasevite | śvāpadaiḥ sevyamāne ca vipine vyāghrasaṅkule

हिन्दी अर्थ

यह वन मनुष्योंसे रहित, चीतोंसे आवृत, पिशाचोंसे सेवित, हिंसक जन्तुओंका निवासस्थान तथा व्याध्रोंसे भरा हुआ है (इसमें आप क्यों आये 2?)

अध्याय 263

श्लोक 6

सुकुमारोऽनवद्याङ्गः साक्षाद् विष्णुरिवापरः ।पद्मपत्रेक्षणः श्यामः पद्माभः श्रीपतिः स्वयम्

sukumāro'navadyāṅgaḥ sākṣād viṣṇurivāparaḥ | padmapatrekṣaṇaḥ śyāmaḥ padmābhaḥ śrīpatiḥ svayam

हिन्दी अर्थ

आप बड़े सुकुमार प्रतीत होते हैं। आपका प्रत्येक अड् अनिन्‍्द्य सौन्दर्यसे सम्पन्न है । आप साक्षात्‌ दूसरे विष्णुके समान जान पड़ते हैं । आपके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके सदृश सुन्दर एवं विशाल हैं। आपकी अज्कान्ति श्याम है। आप नीलकमलके समान प्रकाशित होते हैं और साक्षात्‌ श्रीपति-से प्रतीत होते हैं

अध्याय 263

श्लोक 7

अस्मत्प्रीतिकरः साक्षात् प्राप्तो विष्णुरिवापरः ।देवो वा यदि वा यक्षो गन्धर्वः किन्नरोऽपि वा

asmatprītikaraḥ sākṣāt prāpto viṣṇurivāparaḥ | devo vā yadi vā yakṣo gandharvaḥ kinnaro'pi vā

श्लोक 7–8 का हिन्दी अर्थ

मानो हमें प्रसन्नता प्रदान करनेवाले साक्षात्‌ भगवान्‌ विष्णु दूसरा रूप धारण करके आपके रूपमें यहाँ पधारे हैं। आप देवता हैं या यक्ष, गन्धर्व हैं या किन्नर? इन्द्र हैं या कुबेर ? अथवा यम हैं या वरुण ? जो इस भयंकर वनमें मनको ध्यानस्थ- सा करके अकेले बैठे हैं

अध्याय 263

श्लोक 8

इन्द्रो वा धनदो वापि यमोऽथ वरुणोऽपि वा ।एकाकी विपिने घोरे ध्यानार्पितमना इव

indro vā dhanado vāpi yamo'tha varuṇo'pi vā | ekākī vipine ghore dhyānārpitamanā iva

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 9

ब्रूहि मर्त्य यथातत्त्वं ज्ञातुमिच्छामि मानद ।एवं पृष्टः पिशाचाभ्यामाह विष्णुरुरुक्रमः

brūhi martya yathātattvaṃ jñātumicchāmi mānada | evaṃ pṛṣṭaḥ piśācābhyāmāha viṣṇururukramaḥ

श्लोक 9–10 का हिन्दी अर्थ

दूसरोंको मान देनेवाले मानव! आप ठीक-ठीक बताइये, मैं यथार्धरूपसे आपका परिचय जानना चाहता हूँ।' उन दोनों पिशाचोंके इस प्रकार पूछनेपर महान्‌ डगवाले भगवान्‌ विष्णु बोले—"मैं क्षत्रिय हूँ। प्राकृत मनुष्य मुझे ऐसा ही कहते और जानते हैं । यदुकुलमें उत्पन्न हुआ हूँ, इसीलिये क्षत्रियोचित कर्मका अनुष्ठान करता हूँ

अध्याय 263

श्लोक 10

क्षत्रियोऽस्मीति मामाहुर्मानुष्याः प्रकृतिस्थिताः ।यदुवंशे समुत्पन्नः क्षात्रं वृत्तमनुष्ठितः

kṣatriyo'smīti māmāhurmānuṣyāḥ prakṛtisthitāḥ | yaduvaṃśe samutpannaḥ kṣātraṃ vṛttamanuṣṭhitaḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 11

लोकानामथ पातास्मि शास्ता दुष्टस्य सर्वदा ।कैलासं गन्तुकामोऽस्मि द्रष्टुं देवमुमापतिम्

lokānāmatha pātāsmi śāstā duṣṭasya sarvadā | kailāsaṃ gantukāmo'smi draṣṭuṃ devamumāpatim

हिन्दी अर्थ

मैं तीनों लोकोंका पालक तथा सदा ही दुष्षोपर शासन करनेवाला हूँ। इस समय भगवान्‌ उमापति देवका दर्शन करनेके लिये कैलासपर्वतपर जाना चाहता हूँ'

अध्याय 263

श्लोक 12

इत्येवं मम वृत्तान्तः कथ्यतां कौ युवामिति ।युवामिह समायातौ किमर्थं ब्राह्मणाश्रमम्

ityevaṃ mama vṛttāntaḥ kathyatāṃ kau yuvāmiti | yuvāmiha samāyātau kimarthaṃ brāhmaṇāśramam

हिन्दी अर्थ

दोनों कौन हो? यह तो ब्राह्मणका आश्रम है, यहाँ तुम किस लिये आये हो?

अध्याय 263

श्लोक 13

एषा हि महती पुण्या नानाविप्रनिषेविता ।बदरीयं समाख्याता न क्षुद्रैराश्रिता क्वचित्

eṣā hi mahatī puṇyā nānāvipraniṣevitā | badarīyaṃ samākhyātā na kṣudrairāśritā kvacit

श्लोक 13–14 का हिन्दी अर्थ

यह महान्‌ पुण्यमय स्थान है, इसे बदरी कहते हैं। बहुत-से ब्राह्मण यहाँ वास करते हैं, क्षुद्र स्वभाववाले दुष्टोने कभी इस भूमिमें स्थान नहीं पाया है। सिद्ध पुरुषोंने सदा इसका सेवन किया है, तपस्यामें लगे हुए तपस्वी यहाँ सब ओर निवास करते हैं। यहाँ आजकी तरह झुंड-के-झुंड कुत्ते कभी नहीं देखे गये और न कभी मांसभक्षी पिशाचोंका ही दर्शन हुआ

अध्याय 263

श्लोक 14

तपस्विभिस्तपोयुक्तैर्जुष्टा सिद्धनिषेविता ।श्वगणा नात्र दृश्यन्ते पिशाचा मांसभोजनाः

tapasvibhistapoyuktairjuṣṭā siddhaniṣevitā | śvagaṇā nātra dṛśyante piśācā māṃsabhojanāḥ

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 15

न हन्तव्या मृगाश्चात्र मृगया नात्र वर्तते ।न तु क्षुद्रैः प्रवेष्टव्या न कृतघ्नैर्न नास्तिकैः

na hantavyā mṛgāścātra mṛgayā nātra vartate | na tu kṣudraiḥ praveṣṭavyā na kṛtaghnairna nāstikaiḥ

हिन्दी अर्थ

यहाँ मृगोंको नहीं मारना चाहिये, क्योंकि यहाँ कभी मृगया नहीं होती है। जो क्षुद्रस्वभाववाले कृतप्न और नास्तिक मनुष्य हैं, उन्हें इस तीर्थमें कदापि प्रवेश नहीं करना चाहिये

अध्याय 263

श्लोक 16

अहमस्य तु देशस्य रक्षिता नात्र संशयः ।व्यतिक्रमो यदि भवेत्तस्य शास्तास्मि यत्नतः

ahamasya tu deśasya rakṣitā nātra saṃśayaḥ | vyatikramo yadi bhavettasya śāstāsmi yatnataḥ

हिन्दी अर्थ

मैं इस देशका रक्षक हूँ, इसमें संशय नहीं है। यदि किसीके द्वारा मेरी आज्ञाका उल्लट्टन हुआ तो मैं यत्रपूर्वक उसका शासन करूँगा

अध्याय 263

श्लोक 17

कौ भवन्तौ क्व नु युवां कस्येयं महती चमूः ।नातः परं प्रवेष्टव्यमृषयस्त्वत्र संस्थिताः

kau bhavantau kva nu yuvāṃ kasyeyaṃ mahatī camūḥ | nātaḥ paraṃ praveṣṭavyamṛṣayastvatra saṃsthitāḥ

श्लोक 17–20 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार पूछे जानेपर उन दोनों पिशाचोंने उनके प्रश्रका उत्तर देना आरम्भ किया। उन दोनोंमेंसे एक पिशाच बड़ा भयंकर और विशाल भुजाओंसे युक्त था। उसके हदयमें जैसी बात थी, उसीकों वहाँ सुनाने लगा

अध्याय 263

श्लोक 18

विघ्नस्तत्र प्रवर्तेत तपःसु च तपस्विनाम् ।इहैव स्थीयतां तावद् वक्तव्यं च ततः सुखम्

vighnastatra pravarteta tapaḥsu ca tapasvinām | ihaiva sthīyatāṃ tāvad vaktavyaṃ ca tataḥ sukham

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 19

अन्यथाहं निषेद्धा स्यां बलाद्वाक्यैस्तथैव च ।एवं पृष्टौ पिशाचौ तु वक्तुमेवोपचक्रतुः

anyathāhaṃ niṣeddhā syāṃ balādvākyaistathaiva ca | evaṃ pṛṣṭau piśācau tu vaktumevopacakratuḥ

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 20

तयोरेको महाघोरः पिशाचो दीर्घबाहुकः ।उवाच वचनं तत्र यथा हृदि समर्पितम्

tayoreko mahāghoraḥ piśāco dīrghabāhukaḥ | uvāca vacanaṃ tatra yathā hṛdi samarpitam

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 21

श्रूयतामभिधास्यामि समातितमना भव ।नमस्कृत्य जगन्नाथं हरिं कृष्णं जगत्पतिम्

śrūyatāmabhidhāsyāmi samātitamanā bhava | namaskṛtya jagannāthaṃ hariṃ kṛṣṇaṃ jagatpatim

श्लोक 21–22 का हिन्दी अर्थ

पिशाच बोला—अच्छा! बताता हूँ, सुनिये और अपने चित्तको एकाग्र कर लीजिये। मैं पहले आदिदेव, अजनमा, सर्वश्रेष्ठ, निष्पाप, पवित्र, पापहारी, जगदी श्र, विश्वपालक, सच्चिदानन्दस्वरूप. भगवान्‌ विष्णुको नमस्कार करके अपना सारा वृतान्त आपको ठीक- ठीक बताऊँगा, यदि आप सुनना चाहते हों तो सुनिये

अध्याय 263

श्लोक 22

आदिदेवमजं विष्णुं वरेण्यमनघं शुचिम् ।वक्ष्यामि सकलं यद्वत्तथा शृणु यदीच्छसि

ādidevamajaṃ viṣṇuṃ vareṇyamanaghaṃ śucim | vakṣyāmi sakalaṃ yadvattathā śṛṇu yadīcchasi

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 23

घण्टाकर्णोऽस्मि नाम्नाहं पिशाचो घोरदर्शनः ।मांसादो विकृतो घोरः साक्षान्मृत्युरिवापरः

ghaṇṭākarṇo'smi nāmnāhaṃ piśāco ghoradarśanaḥ | māṃsādo vikṛto ghoraḥ sākṣānmṛtyurivāparaḥ

हिन्दी अर्थ

मैं घण्टाकर्ण नामसे प्रसिद्ध पिशाच हूँ, मेरी दृष्टि बड़ी भयंकर है। मैं मांसभक्षी, विकृताज़, घोर तथा साक्षातू दूसरे कालके समान प्राणियोंका हिंसक हूँ

अध्याय 263

श्लोक 24

धनदस्यानुगन्ताहं साक्षाद् रुद्रसखस्य च ।ममायमनुजः साक्षादन्तकस्यान्तको ह्ययम्

dhanadasyānugantāhaṃ sākṣād rudrasakhasya ca | mamāyamanujaḥ sākṣādantakasyāntako hyayam

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ शड्डरके सखा साक्षात्‌ कुबेरका मैं अनुचर हूँ। यह मेरा सगा छोटा भाई है, जो कालका भी काल है

अध्याय 263

श्लोक 25

मृगयेयं सुमहती विष्णोः पूजार्थमित्युत ।ममेयं वर्तते सेना श्वगणोऽपि ममैव तु

mṛgayeyaṃ sumahatī viṣṇoḥ pūjārthamityuta | mameyaṃ vartate senā śvagaṇo'pi mamaiva tu

हिन्दी अर्थ

यह जो बड़ा भारी शिकार खेला जा रहा है, इसका द्देशय है भगवान्‌ विष्णुकी पूजा। यह सेना मेरी है पर यह कुत्तोंको झुंड भी मेरा ही है

अध्याय 263

श्लोक 26

आगतोऽहं महाशैलात् कैलासाद् भूतसेवितात् ।अहं पिशाचवेषेण संविष्टः पापकर्मकृत्

āgato'haṃ mahāśailāt kailāsād bhūtasevitāt | ahaṃ piśācaveṣeṇa saṃviṣṭaḥ pāpakarmakṛt

हिन्दी अर्थ

मैं भूतोंसे मेवित महापर्वत कैलाससे यहाँ आया हूँ, पिशाचवेषसे घरा हुआ पापकर्मी हूँ

अध्याय 263

श्लोक 27

सततं दूषयन् विष्णुं घण्टामाबध्य कर्णयोः ।मम न प्रविशेन्नाम विष्णोरिति विचिन्तयन्

satataṃ dūṣayan viṣṇuṃ ghaṇṭāmābadhya karṇayoḥ | mama na praviśennāma viṣṇoriti vicintayan

हिन्दी अर्थ

पहले मैं सदा विष्णुकी नन्दा करता था और कानोंमें घण्टा बाँधकर घूमता था के कहीं मेरे इन कर्णकुहरोंमें विष्णुका नाम न प्रविष्ठ हो जाय, मुझे सदा इसीकी चिन्ता बनी रहती थी

अध्याय 263

श्लोक 28

अहं कैलासनिलयमासाद्य वृषभध्वजम् ।आराध्य तं महादेवमस्तुवं सततं शिवम्

ahaṃ kailāsanilayamāsādya vṛṣabhadhvajam | ārādhya taṃ mahādevamastuvaṃ satataṃ śivam

हिन्दी अर्थ

[क दिन कैलासवासी भगवान्‌ शड्टरके पास पहुँचकर ने महादेव शिवकी आराधना की और तभीसे मैं नरन्तर उनके स्तवनमें लगा रहा

अध्याय 263

श्लोक 29

ततः प्रसन्नो मामाह वृणीष्वेति वरं हरः ।ततो मुक्तिर्मया तत्र प्रार्थिता देवसन्निधौ

tataḥ prasanno māmāha vṛṇīṣveti varaṃ haraḥ | tato muktirmayā tatra prārthitā devasannidhau

हिन्दी अर्थ

इससे प्रसन्न हो भगवान्‌ शड्रने मुझसे कहा-“' तुम कोई वर माँगो।' ब॒ मैंने महादेवजीके समीप मुक्तिके लिये प्रार्थना की

अध्याय 263

श्लोक 30

मुक्तिं प्रार्थयमानं मां पुनराह त्रिलोचनः ।मुक्तिप्रदाता सर्वेषां विष्णुरेव न संशयः

muktiṃ prārthayamānaṃ māṃ punarāha trilocanaḥ | muktipradātā sarveṣāṃ viṣṇureva na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

मुक्तिके लिये प्रार्थना करते देख भगवान्‌ त्रलोचन फिर मुझसे बोले-'सबके लिये मुक्ति प्रदान करनेवाले तो केवल भगवान्‌ विष्णु ही हैं। इसमें संशय हीं है

अध्याय 263

श्लोक 31

तस्माद् गत्वा च बदरीं तत्राराध्य जनार्दनम् ।मुक्तिं प्राप्नुहि गोविन्दान्नरनारायणाश्रमे

tasmād gatvā ca badarīṃ tatrārādhya janārdanam | muktiṃ prāpnuhi govindānnaranārāyaṇāśrame

हिन्दी अर्थ

अत: तुम बदरीतीर्थमें जाकर वहाँ नर- गरायणके आश्रममें श्रीजनार्दनकी आराधना करके उन्हीं ऐविन्ददेवसे मोक्ष प्राप्त करो'

अध्याय 263

श्लोक 32

इत्युक्तो देवदेवेन शूलिना ज्ञातवानहम् ।तमेव परमं मत्वा गोविन्दं गरुडध्वजम्

ityukto devadevena śūlinā jñātavānaham | tameva paramaṃ matvā govindaṃ garuḍadhvajam

श्लोक 32–36 का हिन्दी अर्थ

देवाधिदेव शूलधारी शिवके ऐसा कहनेपर मैंने गरुडध्वज गोविन्दके महत्त्वको पमझा और उन्हींको सबसे श्रेष्ठ मानकर उनसे अपनी पुक्तिके लिये प्रार्थना करनेके उद्देश्यसे मैं इस देशमें भाया हूँ। यदि तुम्हें कौतूहल हो तो मेरे दूसरे कार्यको भी सुनो। पश्चिम समुद्रके तटपर द्वारवती नामसे प्रसिद्ध एक पुरी है, जिसमें यदु एवं वृष्णिवंशके लोग रहते हैं । त्रह पुरी समुद्रकी लहरोंसे व्याप्त है। उसीमें इस समय पुरुषोत्तम भगवान्‌ श्रीहरि निवास करते हैं। मर्त्य! नोकहितके लिये द्वारकापुरीमें निवास करनेवाले उन भगवानूका दर्शन करनेके उद्देश्यसे हम इन अनुचरोंके पाथ इस समय निकले हैं। आज हमें साक्षात्‌ सर्वेश्वर श्रीविष्णुका दर्शन करना है

अध्याय 263

श्लोक 33

तस्मात् प्रार्थयमानः सन्मुक्तिं देशममुं गतः ।अन्यच्च शृणु मे कार्यं यदि कौतूहलं तव

tasmāt prārthayamānaḥ sanmuktiṃ deśamamuṃ gataḥ | anyacca śṛṇu me kāryaṃ yadi kautūhalaṃ tava

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 34

पुरी द्वारवती नाम पश्चिमस्योदधेस्तटे ।यदुवृष्णिसमाकीर्णां सागरोर्मिसमाकुलाम्

purī dvāravatī nāma paścimasyodadhestaṭe | yaduvṛṣṇisamākīrṇāṃ sāgarormisamākulām

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 35

अध्यास्ते स हरिर्विष्णुस्तां पुरीं पुरुषोत्तमः ।द्रष्टुं लोकहितार्थाय वसन्तं द्वारकापुरे

adhyāste sa harirviṣṇustāṃ purīṃ puruṣottamaḥ | draṣṭuṃ lokahitārthāya vasantaṃ dvārakāpure

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 36

निर्गतः साम्प्रतं मर्त्यं वयमेतैः सहानुगैः ।विष्णुः सर्वेश्वरः साक्षाद्द्रष्टव्योऽस्माभिरद्यवै

nirgataḥ sāmprataṃ martyaṃ vayametaiḥ sahānugaiḥ | viṣṇuḥ sarveśvaraḥ sākṣāddraṣṭavyo'smābhiradyavai

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 37

लोकानां प्रभवः पाता कर्ता हर्ता जगत्पतिः ।आदिः स हि समस्तस्य प्रभवः कारणं हरिः

lokānāṃ prabhavaḥ pātā kartā hartā jagatpatiḥ | ādiḥ sa hi samastasya prabhavaḥ kāraṇaṃ hariḥ

हिन्दी अर्थ

वे श्रीहरि ही सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्तिकि कारण, पालक, कर्ता, हर्ता, जगदीश्वर, सबके आदिपुरुष, उद्मस्थान और बीज हैं

अध्याय 263

श्लोक 38

कर्ता समस्तस्य हरिः पुरातनः प्रभुः प्रभूणामपि यः सदात्मकः ।तमादिदेवं वरदं वरेण्यं द्रष्टुं हरिं सम्प्रति संयताः स्मः

kartā samastasya hariḥ purātanaḥ prabhuḥ prabhūṇāmapi yaḥ sadātmakaḥ | tamādidevaṃ varadaṃ vareṇyaṃ draṣṭuṃ hariṃ samprati saṃyatāḥ smaḥ

हिन्दी अर्थ

जो श्रीहरि समस्त जगत्‌के कर्ता, पुराणपुरुष, प्रभुओंके भी प्रभु और सत्स्वरूप हैं, उन आदिदेव, रदायक एवं वरेण्य भगवान्‌ विष्णुका दर्शन करनेके लिये इस समय हम सब लोग उद्यत हैं

अध्याय 263

श्लोक 39

यस्य प्रसादाज्जगदेवमासीत् सप्राणिगन्धर्वमद्वोरगौघम् ।देवं जगद्योनिमजं जनार्दनं द्रष्टुं हरिं सम्प्रति संयताः स्मः

yasya prasādājjagadevamāsīt saprāṇigandharvamadvoragaugham | devaṃ jagadyonimajaṃ janārdanaṃ draṣṭuṃ hariṃ samprati saṃyatāḥ smaḥ

हिन्दी अर्थ

श्र जिनके कृपा-प्रसादसे प्राणियों, गन्धर्वों और बड़े- बड़े नागोंके समुदायसे युक्त यह जगत्‌ इस रूपमें प्रकट हुआ था, उन जगत्‌की उत्पत्तिके कारणभूत अजन्मा देव जनार्दन हरिका दर्शन करनेके लिये इस समय हम सब लोग उद्यत हैं

अध्याय 263

श्लोक 40

यस्योदराद् विश्वमिदं प्रभूतं लयं च तस्मिन् समुपैति कल्पे ।तस्यैव साक्षाद् वशवर्ति विश्वं द्रक्ष्याम देवं पुरुषोत्तमं हरिम्

yasyodarād viśvamidaṃ prabhūtaṃ layaṃ ca tasmin samupaiti kalpe | tasyaiva sākṣād vaśavarti viśvaṃ drakṣyāma devaṃ puruṣottamaṃ harim

हिन्दी अर्थ

कल्पके आरम्भमें जिनके उदरसे यह विश्व प्रकट होता है और कल्पके अन्तमें पुनः उसीमें लीन हो जाता है। स्थितिकालमें भी यह सारा विश्व जिन साक्षात्‌ श्रीहरिकि ही अधीन रहता है, उन पुरुषोत्तमदेव श्रीहरिका हम दर्शन करेंगे

अध्याय 263

श्लोक 41

स्रष्टा च योऽसौ सकलस्य देवः पाता च हर्ता च हरिः स एव ।द्रक्ष्याम नित्यं भुवनेश्वरं हरिं पुराणमाद्यं प्रभविष्णुमव्ययम्

sraṣṭā ca yo'sau sakalasya devaḥ pātā ca hartā ca hariḥ sa eva | drakṣyāma nityaṃ bhuvaneśvaraṃ hariṃ purāṇamādyaṃ prabhaviṣṇumavyayam

हिन्दी अर्थ

जो विष्णुदेव इस सम्पूर्ण जगत्‌के ख्रष्टा हैं तथा जो श्रीहरि ही इसका पालन और संहार करनेवाले भी हैं, उन आदिपुरुष, पुरातन देवता, प्रभावशाली, अविनाशी, नित्यस्वरूप, भुवनेश्वर श्रीहरिका हम नित्य दर्शन करेंगे

अध्याय 263

श्लोक 42

अजस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता भुवश्च कर्ता हरिरेक एव ।तं योगिनो योगविशुद्धबुद्धिं लभेम तेनैव मतिः समाकुला

ajasya kartā bhuvanasya goptā bhuvaśca kartā harireka eva | taṃ yogino yogaviśuddhabuddhiṃ labhema tenaiva matiḥ samākulā

हिन्दी अर्थ

वे एकमात्र श्रीहरि ही अजन्मा ब्रह्माजीके भी उत्पादक, जगत्‌के रक्षक और भूतलके निर्माता हैं । योगसे विशुद्ध बुद्धिवाले उन परमेश्वरको हमलोग ध्यान-योगकी साधना करके प्राप्त करेंगे । हमारी चित्तवृत्ति उन्हींसे व्याप्त है

अध्याय 263

श्लोक 43

निगीर्य विश्वं सकलं जगत्पतिः शेते शिशुत्वं समवाप्य साक्षात् ।वटस्य पत्रे जगतां निवासः पादौ च विक्षिप्य करौ विधुन्वन्

nigīrya viśvaṃ sakalaṃ jagatpatiḥ śete śiśutvaṃ samavāpya sākṣāt | vaṭasya patre jagatāṃ nivāsaḥ pādau ca vikṣipya karau vidhunvan

हिन्दी अर्थ

जगत्‌के पालक और तीनों लोकोंके निवासस्थान श्रीहरि प्रलयकालमें सम्पूर्ण विश्वको अपने भीतर निगलकर साक्षात्‌ शिशुभावको प्राप्त हो अक्षयवटके पत्रपर दोनों पैर फेंकते और हाथ हिलाते हुए शयन करते हैं

अध्याय 263

श्लोक 44

यस्योदरे देवमुनिः पुरातनो ददर्श लोकानखिलान् स मायया ।प्रविश्य विश्वं सकलं यथावद् बहिर्यथाभूतमभूदिदं महत्

yasyodare devamuniḥ purātano dadarśa lokānakhilān sa māyayā | praviśya viśvaṃ sakalaṃ yathāvad bahiryathābhūtamabhūdidaṃ mahat

हिन्दी अर्थ

जिनके उदरमें प्रवेश करके पुरातन देवर्षि मार्कण्डेयमुनिने उन्हींकी मायासे इन सम्पूर्ण लोकोंका दर्शन किया था। उस समय वहाँ यह सारा महान्‌ विश्व यथावत्‌ रूपसे उसी प्रकार स्थित था, जैसा कि पहले उनके उदरसे बाहर अनुभवमें आया था॥ '

अध्याय 263

श्लोक 45

निगीर्य विश्वं जगदादिकाले शेते महात्मा जलधेर्जलौघे ।देव्या श्रिया चामरलोलहस्तया निषेव्यमाणः पुरुषोत्तमस्तदा

nigīrya viśvaṃ jagadādikāle śete mahātmā jaladherjalaughe | devyā śriyā cāmaralolahastayā niṣevyamāṇaḥ puruṣottamastadā

हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें इस सम्पूर्ण जगतूको अपने भीतर लीन करके वे महात्मा पुरुषोत्तम एकार्णवके जलप्रवाहमें शयन करते थे और देवी लक्ष्मी हाथसे चँवर डुलाती हुई उनकी सेवा कर रही थीं

अध्याय 263

श्लोक 46

नाभेश्च यस्याविरभूत् सपत्रं पद्मं महत्काञ्चनसप्रभं प्रभोः ।जन्मास्पदं लोकगुरोर्यदासीद्विस्तारि पद्मं जगदादिसृष्टौ

nābheśca yasyāvirabhūt sapatraṃ padmaṃ mahatkāñcanasaprabhaṃ prabhoḥ | janmāspadaṃ lokaguroryadāsīdvistāri padmaṃ jagadādisṛṣṭau

हिन्दी अर्थ

जगत्‌की सृष्टिके प्रारम्भकालमें जिन भगवान्‌की नाभिसे सुवर्णके समान कान्तिमानू एक विशाल कमल प्रकट हुआ, जो अपने दलोंके साथ सुशोभित होता था। वह विस्तृत कमल ही लोकगुरु ब्रह्माजीका जन्मस्थान था

अध्याय 263

श्लोक 47

दधार यो भूतपतिर्महान्महीं दंष्ट्राग्रसंस्थापितरूढमूलाम् ।नादं महामेघ इवादिकाले कुर्वन् वराहो मुनिगीतमूर्तिः

dadhāra yo bhūtapatirmahānmahīṃ daṃṣṭrāgrasaṃsthāpitarūḍhamūlām | nādaṃ mahāmegha ivādikāle kurvan varāho munigītamūrtiḥ

श्लोक 47–48 का हिन्दी अर्थ

जिन महान्‌ भूतनाथ विष्णुने आदिकालमें मुनियोंद्वारा प्रशंसित विग्रहवाले वराहरूप होकर महान्‌ मेघके समान गर्जना करते हुए अपनी दाढ़के अग्रभागपर पृथ्वीके मूल भागको स्थापित करके उसे जलसे ऊपर उठाया था, जो पुराण-पुरुषोत्तम प्रभु श्रीहरि समस्त जगत्‌के कर्ता, साक्षी, यज्रूप एवं यज्ञके अधिपति हैं और समस्त जगत्‌का पालन करते हैं, उन्हीं परमेश्वरका दर्शन करनेके लिये हम उद्यत हुए हैं

अध्याय 263

श्लोक 48

हरिः पुराणः पुरुषोत्तमः प्रभुः कर्ता समस्तस्य समस्तसाक्षी ।यज्ञात्मको यज्ञपतिर्जगत्पतिर्द्रष्टुं तमीशं वयमुद्यताः स्मः

hariḥ purāṇaḥ puruṣottamaḥ prabhuḥ kartā samastasya samastasākṣī | yajñātmako yajñapatirjagatpatirdraṣṭuṃ tamīśaṃ vayamudyatāḥ smaḥ

अर्थ श्लोक 47 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 49

केचिद् बहुत्वेन वदन्ति देवमेकात्मना केचिदिमं पुराणम् ।वेदान्तसंस्थापितसत्त्वयुक्तं द्रष्टुं तमीशं वयमुद्यताः स्मः

kecid bahutvena vadanti devamekātmanā kecidimaṃ purāṇam | vedāntasaṃsthāpitasattvayuktaṃ draṣṭuṃ tamīśaṃ vayamudyatāḥ smaḥ

हिन्दी अर्थ

कोई आराधक उन विष्णुदेवका इन्द्र आदि अनेक देवताओंके रूपमें वर्णन करते हैं और कोई उपासक इन पुराण-पुरुषका एक रूपमें ही चिन्तन करते हैं। वेदान्तशास्त्रमें प्रतिपादित विशुद्ध अद्वैत सत्तासे युक्त उन परमेश्वरका दर्शन करनेके लिये हमलोग उद्यत हुए हैं

अध्याय 263

श्लोक 50

अनेकमेके बहुधा वदन्ति श्रुतिस्मृतिन्यायनिविष्टचित्ताः ।आहुर्यमात्मानमजं पुराविदो द्रष्टुं तमीशं वयमुद्यताः स्मः

anekameke bahudhā vadanti śrutismṛtinyāyaniviṣṭacittāḥ | āhuryamātmānamajaṃ purāvido draṣṭuṃ tamīśaṃ vayamudyatāḥ smaḥ

हिन्दी अर्थ

एक श्रेणीके विद्वान्‌ श्रुति-स्मृति और न्यायमें अपने चित्तको लगाये रखकर जिन परमेश्वरका अनेक रूपोंमें अनेक प्रकारसे वर्णन करते हैं तथा पुराणवेत्ता पुरुष जिन्हें सबका आत्मा और अजन्मा बताते हैं, उन्हीं सर्वेश्वरका दर्शन करनेके लिये हम उद्यत हुए हैं

अध्याय 263

श्लोक 51

यं प्राहुरीड्यं वरदं वरेण्यमेकान्ततत्त्वं मुनयः पुरातनाः ।यं सर्वगं देवमजं जनार्दनं द्रष्टुं हरिं सम्प्रति संयताः स्मः

yaṃ prāhurīḍyaṃ varadaṃ vareṇyamekāntatattvaṃ munayaḥ purātanāḥ | yaṃ sarvagaṃ devamajaṃ janārdanaṃ draṣṭuṃ hariṃ samprati saṃyatāḥ smaḥ

हिन्दी अर्थ

जिन्हें प्राचीन मुनि स्तुति 'करनेके योग्य, वरदायक, वरेण्य और परमतत्त्वरूप बताते हैं। साथ ही जिन्हें सर्वव्यापी और अजन्मा कहते हैं, उन्हीं जनार्दनदेव श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये हमलोग इस समय उद्यत हुए हैं

अध्याय 263

श्लोक 52

यस्मिन् विश्वमिदं प्रोतमादिकाले जगत्पतौ ।तं द्रष्टुमभिसंवृत्ताः किं नु वक्ष्याम साम्प्रतम्

yasmin viśvamidaṃ protamādikāle jagatpatau | taṃ draṣṭumabhisaṃvṛttāḥ kiṃ nu vakṣyāma sāmpratam

हिन्दी अर्थ

आदिकालमें जिन सूत्रस्वरूप जगदीश्वरमें यह सम्पूर्ण जगत्‌ मनकेकी भाँति पिरोया गया था, उन्हीं भगवान्‌ विष्णुका दर्शन करनेके लिये हम उद्यत हुए हैं। अब इस समय और क्या कहें ?

अध्याय 263

श्लोक 53

गच्छामो वयमन्यत्र गच्छ त्वं काममन्यतः ।नियमोऽप्यस्ति नो मर्त्य यथेष्टं गच्छ साम्प्रतम्

gacchāmo vayamanyatra gaccha tvaṃ kāmamanyataḥ | niyamo'pyasti no martya yatheṣṭaṃ gaccha sāmpratam

श्लोक 53–58 का हिन्दी अर्थ

मर्त्य! अब हम अन्यत्र जाते हैं। तुम भी इच्छानुसार और कहीं जा सकते हो। हमारे नित्य नियमका भी समय आ गया है; क्योंकि आधी रात हो गयी, अत: इस समय तुम इच्छानुसार जहाँ चाहो, चले जाओ। इस विषयमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। ऐसा कहकर उस विकराल मुखवाले घोररूपधारी विचक्षण पिशाचने उसी समतल प्रदेशमें बहुत-सा रक्त पीकर इच्छानुसार मांस-राशिका भक्षण किया। तत्पश्चात्‌ जलका आचमन करके वहीं पार्धभागमें अपनी साधनसामग्री रख दी और अँतड़ियोंका महाभयंकर विशाल पाश भी वहीं बगलमें डाल दिया। इसके बाद कुशयुक्त आसन बिछाकर उसकी शुद्धिके लिये जल छिड़का और अपने सभी कुत्तोंको बड़े प्रयलसे दूर हटाया। तमो5ध्याय: + १२४५ तदनन्तर सुखासनपर बैठकर वह कुत्तापालक पिशाच समाधिके लिये यत्र करने लगा। उस समय वह भयानक पिशाच एकचित्त हो भक्तवत्सल भगवान्‌ केशवको नमस्कार करके इस मन्त्रमय स्तोत्रका पाठ करने लगा—

अध्याय 263

श्लोक 54

रात्रिमध्यमनुप्राप्तं नात्र कार्या विचारणा ।इत्युक्त्वा घोररूपोऽसौ पिशाचो विकृताननः

rātrimadhyamanuprāptaṃ nātra kāryā vicāraṇā | ityuktvā ghorarūpo'sau piśāco vikṛtānanaḥ

अर्थ श्लोक 53 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 55

तस्मिन्नेव समे देशे पीत्वा च रुधिरं बहु ।भक्षयित्वा यथाकामं मांसराशिं विचक्षणः

tasminneva same deśe pītvā ca rudhiraṃ bahu | bhakṣayitvā yathākāmaṃ māṃsarāśiṃ vicakṣaṇaḥ

अर्थ श्लोक 53 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 56

अपः संस्पृश्य तत्रैव पार्श्वे संस्थाप्य साधनम् ।अन्त्रपाशं महाघोरं संस्थाप्य विपुलं महत्

apaḥ saṃspṛśya tatraiva pārśve saṃsthāpya sādhanam | antrapāśaṃ mahāghoraṃ saṃsthāpya vipulaṃ mahat

अर्थ श्लोक 53 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 57

आसनं कुशसंयुक्तं कृत्वा चाभ्युक्ष्य वारिणा ।उत्सार्य श्वगणान् सर्वान् यत्नेन महता तदा

āsanaṃ kuśasaṃyuktaṃ kṛtvā cābhyukṣya vāriṇā | utsārya śvagaṇān sarvān yatnena mahatā tadā

अर्थ श्लोक 53 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 58

सुखासनं समास्थाय समाधौ यतते श्वपः ।एकचित्तस्तदा भूत्वा नमस्कृत्य च केशवम् ।इमं मन्त्रं पठन् घोरः पिशाचो भक्तवत्सलम्

sukhāsanaṃ samāsthāya samādhau yatate śvapaḥ | ekacittastadā bhūtvā namaskṛtya ca keśavam | imaṃ mantraṃ paṭhan ghoraḥ piśāco bhaktavatsalam

अर्थ श्लोक 53 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 59

नमो भगवते तस्मै वासुदेवाय चक्रिणे ।नमस्ते गदिने तुभ्यं वासुदेवाय धीमते

namo bhagavate tasmai vāsudevāya cakriṇe | namaste gadine tubhyaṃ vāsudevāya dhīmate

हिन्दी अर्थ

उन चक्रधारी भगवान्‌ वासुदेवको नमस्कार है, सबके भीतर निवास करनेवाले देवता आप बुद्धिमान्‌ गदाधरकों नमस्कार है

अध्याय 263

श्लोक 60

ॐ नमो नारायणाय विष्णवे प्रभविष्णवे ।मम भूयान्मनःशुद्धिः कीर्तनात् तव केशव

oṃ namo nārāyaṇāya viṣṇave prabhaviṣṇave | mama bhūyānmanaḥśuddhiḥ kīrtanāt tava keśava

हिन्दी अर्थ

प्रभावशाली, सर्वव्यापी, सच्चिदानन्दघन नारायणदेवको नमस्कार है। केशव! आपके कीर्तनसे मेरे मनकी शुद्धि हो जाय

अध्याय 263

श्लोक 61

जन्मेदमीदृशं घोरं मा भून्मम दुरासदम् ।देवदूतो भविष्यामि स्मरणात् तव गोपते

janmedamīdṛśaṃ ghoraṃ mā bhūnmama durāsadam | devadūto bhaviṣyāmi smaraṇāt tava gopate

हिन्दी अर्थ

इन्द्रियोंकि नियन्ता नारायण! अब पुन: मुझे ऐसा दु:खप्रद भयड्र जन्म न प्राप्त हो। मैं आपके स्मरणसे देवदूत हो जाऊँ

अध्याय 263

श्लोक 62

तव चक्रप्रहारेण कायो नश्यतु मामकः ।मम भूयो भवो मा भूदेषा मे प्रार्थना विभो

tava cakraprahāreṇa kāyo naśyatu māmakaḥ | mama bhūyo bhavo mā bhūdeṣā me prārthanā vibho

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! आपके चक्रके प्रहारसे मेरा यह शरीर नष्ट हो जाय और फिर मुझे यह संसारबन्धन प्राप्त न हो, यही मेरी प्रार्थना है

अध्याय 263

श्लोक 63

अर्थिनां कल्पवृक्षोऽसि दाता सर्वस्य सर्वदा ।यत्र यत्र भवेज्जन्म तत्र तत्र भवान् हृदि

arthināṃ kalpavṛkṣo'si dātā sarvasya sarvadā | yatra yatra bhavejjanma tatra tatra bhavān hṛdi

श्लोक 63–68 का हिन्दी अर्थ

आप याचकोंके लिये कल्पवृक्ष हैं । सदा सबके दाता हैं। देवेश्वर! जहाँ-जहाँ मेरा जन्म हो, वहाँ-वहाँ आप मेरे हृदयमें विराजमान रहें । यह मेरी दूसरी प्रार्थना है । देव ! आपको नमस्कार है! देव! आपको नमस्कार है!! इस प्रकार मेरी प्रार्थना सदा निर्विश्न चलती रहे । देव ! आपको सदा ही मेरा नमस्कार है। जब मेरा मरणकाल उपस्थित हो, उस समय मेरी स्मरणशक्तिमें भ्रम न उत्पन्न हो (मैं उस समय भी आपका ही स्मरण करता रहूँ) । देव! प्रतिदिन और प्रतिक्षण मेरा चित्त आपमें ही स्थिर रहे। आप मुझे ऐसी ही प्रेरणा देते रहें । आपके चित्तमें कभी ऐसा भाव न आये कि 'यह क्रूर है, पिशाच है। इसपर क्या दया हो सकती है ?' प्रभो! देव ! आप तो ऐसा ही विचार करें कि ' यह बेचारा मेरा सेवक है।' भगवन्‌! प्रभो! आपको नमस्कार है। आप ऐसी कृपा करें, जिससे मेरे द्वारा दूसरोंको पीड़ा न पहुँचे तथा अब मेरी इन्द्रियाँ विषयोंमें न फँसें

अध्याय 263

श्लोक 64

वर्ततां मम देवेश प्रार्थनैषा ममापरा ।नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं भवत्वेवं सदा मम

vartatāṃ mama deveśa prārthanaiṣā mamāparā | namastubhyaṃ namastubhyaṃ bhavatvevaṃ sadā mama

अर्थ श्लोक 63 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 65

निर्विघ्ना प्रार्थना देव नमस्तेऽस्तु सदा मम ।यदा मे मरणं भूयात्तदा मा भूत्स्मृतिभ्रमः

nirvighnā prārthanā deva namaste'stu sadā mama | yadā me maraṇaṃ bhūyāttadā mā bhūtsmṛtibhramaḥ

अर्थ श्लोक 63 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 66

दिने दिने क्षणं चित्तं त्वयि संस्थं भवत्विति ।एवं प्रेरय मां देव मा भूत् ते चित्तमीदृशम्

dine dine kṣaṇaṃ cittaṃ tvayi saṃsthaṃ bhavatviti | evaṃ preraya māṃ deva mā bhūt te cittamīdṛśam

अर्थ श्लोक 63 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 67

नृशंसोऽयं पिशाचोऽयं दयास्मिन् का भवेदिति ।एवं चिन्तय मां देव भृत्यो मह्यमिति प्रभो

nṛśaṃso'yaṃ piśāco'yaṃ dayāsmin kā bhavediti | evaṃ cintaya māṃ deva bhṛtyo mahyamiti prabho

अर्थ श्लोक 63 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 68

परपीडा न मत्तोऽस्तु नमस्ते भगवन् प्रभो ।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु मा भूवन्साम्प्रतं हि मे

parapīḍā na matto'stu namaste bhagavan prabho | indriyāṇīndriyārtheṣu mā bhūvansāmprataṃ hi me

अर्थ श्लोक 63 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 69

अन्तकाले ममाप्येवं प्रसादात् तव केशव ।पृथिवी यातु मे घ्राणं रसनां यातु मे पयः

antakāle mamāpyevaṃ prasādāt tava keśava | pṛthivī yātu me ghrāṇaṃ rasanāṃ yātu me payaḥ

श्लोक 69–70 का हिन्दी अर्थ

केशव! अन्तकालमें आपकी कृपासे मेरी भी ऐसी स्थिति हो-पृथिवी मेरी घ्राणेन्द्रियको ग्रहण करे, जल मेरी रसनेन्द्रियको अपना ले, सूर्य मेरी नेत्रेन्द्रियिको तथा वायु मेरी त्वचा अपनेमें संयुक्त कर ले। इसी तरह आकाश भी मेरी श्रवणेन्द्रियको अपनेमें मिला ले तथा प्राण (चन्द्रमा) मेरे मनसे संयुक्त हो

अध्याय 263

श्लोक 70

सूर्यश्च यातु मे चक्षुः स्पर्शं यातु च मारुतः ।श्रोत्रमाकाशमप्येतु मनः प्राणं च गच्छतु

sūryaśca yātu me cakṣuḥ sparśaṃ yātu ca mārutaḥ | śrotramākāśamapyetu manaḥ prāṇaṃ ca gacchatu

अर्थ श्लोक 69 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 71

जलं मां रक्षतां नित्यं पृथिवी रक्षतां हरे ।सूर्यो मां रक्षतां विष्णो नमस्ते सूर्यतेजसे

jalaṃ māṃ rakṣatāṃ nityaṃ pṛthivī rakṣatāṃ hare | sūryo māṃ rakṣatāṃ viṣṇo namaste sūryatejase

हिन्दी अर्थ

हरे! जल सदा मेरी रक्षा करे। पृथिवी भी रक्षा करे। विष्णो! सूर्यदेव मेरी रक्षा करें। आप सूर्यके समान तेजस्वी हैं, आपको नमस्कार है

अध्याय 263

श्लोक 72

वायुर्मां रक्षतां दुःखादाकाशं च जनार्दन ।न मनः सर्वगं देव रक्षतां विषयान्तरे

vāyurmāṃ rakṣatāṃ duḥkhādākāśaṃ ca janārdana | na manaḥ sarvagaṃ deva rakṣatāṃ viṣayāntare

हिन्दी अर्थ

जनार्दन! वायु और आकाश दुःखसे मेरी रक्षा करें। देव! सर्वस्वरूप परमात्माके चिन्तनमें लगा हुआ मेरा मन विषय और भेद-बुद्धिकी रक्षा न करे (अर्थात्‌) वह न तो विषयपरायण हो, न भेद-बुद्धिको ही अपनाये

अध्याय 263

श्लोक 73

मनो विपर्यये घोरे पुरुषान् हन्ति नित्यशः ।पापेषु योजयेत् पुंसः परपीडात्मकेषु च

mano viparyaye ghore puruṣān hanti nityaśaḥ | pāpeṣu yojayet puṃsaḥ parapīḍātmakeṣu ca

हिन्दी अर्थ

इसके विपरीत यदि मन घोर विपर्यय (विषय- सेवन आदिं)-में फँस जाय तो वह पुरुषोंका नाश कर डालता है। दूसरोंके पीडनरूप पापोंमें फँसा देता है

अध्याय 263

श्लोक 74

मनस्तद् रक्षतां देव भूयो भूयो जनार्दन ।मा भून्मनसि कालुष्यं मनो मे निर्मलं भवेत्

manastad rakṣatāṃ deva bhūyo bhūyo janārdana | mā bhūnmanasi kāluṣyaṃ mano me nirmalaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

देव जनार्दन! आप मेरे उस मनकी बारम्बार रक्षा करें, मेरे मनमें मलिनता न रहे, मेरा मन निर्मल हो जाय

अध्याय 263

श्लोक 75

कलुषं तस्य यच्चित्तं नरके पातयत्यमुम् ।बाह्यानि निर्मलान्येवमिन्द्रियाणि भवन्त्युत

kaluṣaṃ tasya yaccittaṃ narake pātayatyamum | bāhyāni nirmalānyevamindriyāṇi bhavantyuta

श्लोक 75–77 का हिन्दी अर्थ

क्योंकि जीवका जो मलिन चित्त है, वह उसे नरकमें गिराता है। मनके शुद्ध होनेसे बाह्य इन्द्रियाँ भी निर्मल हो जाती हैं और यदि मन मलिन हो तो वे इन्द्रियाँ भी मलिन होनेके कारण इस जगत्‌में कोई सत्कार्य नहीं कर सकतीं। केशव! जो मनुष्य अपने अपवित्र मनको मुद्टीमें किये बिना केवल अड्डोंका बाहरसे प्रक्षालन करता है, उसे क्या लाभ होगा? उसका केवल बाहरसे शुद्धिके लिये आग्रह व्यर्थ ही है

अध्याय 263

श्लोक 76

न तानि कार्यवन्तीह मनश्चेत्कलुषं भवेत् ।नाङ्गानां मुष्टिनामेध्यं गृहीत्वा यो व्यवस्थितः

na tāni kāryavantīha manaścetkaluṣaṃ bhavet | nāṅgānāṃ muṣṭināmedhyaṃ gṛhītvā yo vyavasthitaḥ

अर्थ श्लोक 75 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 77

बहिः प्रक्षालनं कुर्वन् किं भवेत् तस्य केशव ।व्यर्थो हि केवलं तस्य प्रग्रहो बाह्यगोचरः

bahiḥ prakṣālanaṃ kurvan kiṃ bhavet tasya keśava | vyartho hi kevalaṃ tasya pragraho bāhyagocaraḥ

अर्थ श्लोक 75 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 78

तस्मात् सर्वप्रयत्नेन चित्तं रक्ष जनार्दन ।वलवानिन्द्रियग्रामो वारयैनं जनार्दन

tasmāt sarvaprayatnena cittaṃ rakṣa janārdana | valavānindriyagrāmo vārayainaṃ janārdana

हिन्दी अर्थ

अत: जनार्दन! सम्पूर्ण प्रयत्नद्वारा आप मेरे चित्तकी रक्षा कीजिये। जीवोंकी याचना पूर्ण करनेवाले देव! इन्द्रियोंका समूह बड़ा बलवान्‌ है, इसे रोकिये

अध्याय 263

श्लोक 79

परीवादाज्जगन्नाथ वाचं रक्ष दुरुद्वहाम् ।परद्रव्यान्मनो रक्ष परदाराज्जनार्दन ।सर्वत्र मे दया भूयात् प्रसादात् तव केशव

parīvādājjagannātha vācaṃ rakṣa durudvahām | paradravyānmano rakṣa paradārājjanārdana | sarvatra me dayā bhūyāt prasādāt tava keśava

हिन्दी अर्थ

जगन्नाथ! मेरी दुर्वह वाणीको आप परनिन्दासे बचाइये । जनार्दन ! मेरे मनको पराये धन और परायी स्त्रीसे दूर रखिये। केशव! आपकी कृपासे मेरे मनमें सब प्राणियोंके प्रति दया हो

अध्याय 263

श्लोक 80

त्वय्येव भक्तिरचला भूयाद् भूतेषु मे दया ।बहुनात्र किमुक्तेन शृणुष्वेदं वचो मम

tvayyeva bhaktiracalā bhūyād bhūteṣu me dayā | bahunātra kimuktena śṛṇuṣvedaṃ vaco mama

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! आपमें ही मेरी अविचल भक्ति हो और समस्त प्राणियोंके प्रति दया हो। इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ? मेरी यह एक ही बात सुन लीजिये

अध्याय 263

श्लोक 81

सुखे दुःखे च रागे च भोजने गमने तथा ।जाग्रत्स्वप्नेषु सर्वत्र त्वय्येव रमतां मनः

sukhe duḥkhe ca rāge ca bhojane gamane tathā | jāgratsvapneṣu sarvatra tvayyeva ramatāṃ manaḥ

श्लोक 81–84 का हिन्दी अर्थ

देवदेवेश्वर ! जनार्दन! सुखमें, दुः:खमें, राग और भोजनमें, चलने- फिरनेमें तथा जाग्रत्‌ और स्वप्र-अवस्थाओंमें सर्वत्र आपमें ही मेरा मन रमण करे, आपको नमस्कार है।' इस तरह बोलता हुआ वह अत्यन्त भयड्भर पिशाच, जो केवल जातिसे निम्नकोटिका था, हदयसे नहीं, समाधिस्थ हो गया। वह महान्‌ भगवदूभक्त था। वह मांसभक्षी पिशाच अपने शरीरको अँतड़ियोंके सुदृढ़ पाशसे बाँधकर निश्चलचित्तके द्वारा सुखपूर्वक संयतभावसे बैठ गया और जगत्‌की उत्पत्तिक कारणभूत, पीताम्बरधारी, मज़्लकारी, सर्वव्यापी श्रीहरिका ध्यान करने लगा

अध्याय 263

श्लोक 82

मामकं देवदेवेश नमस्तेऽस्तु जनार्दन ।इति ब्रुवन् घोरतमो जात्या हीनो न चित्ततः

māmakaṃ devadeveśa namaste'stu janārdana | iti bruvan ghoratamo jātyā hīno na cittataḥ

अर्थ श्लोक 81 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 83

पिशाचो भगवद्भक्तः समाधिं समपद्यत ।दृढं बद्ध्वाऽऽत्मनः कायमान्त्रपाशेन मांसपः

piśāco bhagavadbhaktaḥ samādhiṃ samapadyata | dṛḍhaṃ baddhvā''tmanaḥ kāyamāntrapāśena māṃsapaḥ

अर्थ श्लोक 81 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 84

निश्चलेनैव मनसा सुखमास्ते स्म संयतः ।ध्यायन्हरिं जगद्योनिं विष्णुं पीताम्बरं शिवम्

niścalenaiva manasā sukhamāste sma saṃyataḥ | dhyāyanhariṃ jagadyoniṃ viṣṇuṃ pītāmbaraṃ śivam

अर्थ श्लोक 81 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 85

मुकुन्दमादिपुरुषमेकाकारमनामयम् ।नित्यं शुद्धं ज्ञानगम्यं कारणं सर्वदेहिनाम्

mukundamādipuruṣamekākāramanāmayam | nityaṃ śuddhaṃ jñānagamyaṃ kāraṇaṃ sarvadehinām

हिन्दी अर्थ

जो नित्य, शुद्ध, ज्ञानगम्य, समस्त देहधारियोंके कारण भूत, रोग-शोकसे रहित, एकाकार ( अद्वितीय) और आदिपुरुष हैं, उन मुकुन्ददेवका चिन्तन करने लगा

अध्याय 263

श्लोक 86

नासिकाग्रं समालोक्य पठन् ब्रह्म सनातनम् ।निर्वातस्थो यथा दीपः प्रोच्चरन् प्रणतः सदा

nāsikāgraṃ samālokya paṭhan brahma sanātanam | nirvātastho yathā dīpaḥ proccaran praṇataḥ sadā

हिन्दी अर्थ

मो$ध्याय: + १२४७ नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाये सनातन ब्रह्मस्वरूप प्रणवका जप करते हुए, वायुशून्य प्रदेशमें जलनेवाले दीपककी भाँति अविचलभावसे स्थित हो, वह निरन्तर प्रणाम एवं मन्त्रपाठ करने लगा

अध्याय 263

श्लोक 87

प्रणवं वाचकं मत्वा वाच्यं ब्रह्मेति निश्चितः ।एकाग्रं सततं कृत्वा चित्तं विष्णौ समर्पितम्

praṇavaṃ vācakaṃ matvā vācyaṃ brahmeti niścitaḥ | ekāgraṃ satataṃ kṛtvā cittaṃ viṣṇau samarpitam

श्लोक 87–89 का हिन्दी अर्थ

प्रणवको वाचक मानकर और परब्रह्म परमात्माको उसका वाच्यार्थ निश्चित करके उसने अपने चित्तको निरन्तर एकाग्र रखते हुए उसे भगवान्‌ विष्णुमें समर्पित कर दिया। उस विकल्परहित चित्तको हृदयकमलके भीतर दृढ़तापूर्वक स्थापित कर दिया। शुभ दलोंसे युक्त उस हृदयकमलके आसनपर जगदीश्वर श्रीहरिको प्रतिष्ठित करके वह महायोगी, महान्‌ मांसभक्षी पिशाच वहाँ सुखपूर्वक बैठा रहा तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन रूपोंमें विराजमान सनातन विष्णुका स्मरण करता रहा

अध्याय 263

श्लोक 88

विकल्परहितं चित्तं हृदि मध्ये न्यवेशयत् ।पुण्डरीके शुभदले समावेश्य जगत्पतिम्

vikalparahitaṃ cittaṃ hṛdi madhye nyaveśayat | puṇḍarīke śubhadale samāveśya jagatpatim

अर्थ श्लोक 87 के साथ

अध्याय 263

श्लोक 89

आस्ते सुखं महायोगी पिशिताशस्तदा महान् ।त्रिधामानं जपंस्तत्र स्मरन् विष्णुं सनातनम्

āste sukhaṃ mahāyogī piśitāśastadā mahān | tridhāmānaṃ japaṃstatra smaran viṣṇuṃ sanātanam

अर्थ श्लोक 87 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.