Harivamsha Purana
262
अध्याय 262 / 318

Parva 3, Adhyāya 79

29 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ29 श्लोक

अध्याय 262

श्लोक 1

भगवतः श्रीकृष्णस्य पार्श्वे पिशाचद्वयानां आगमनं तेषामनु महाघोरौ पिशाचौ विकृताननौ ।प्रांशू पिङ्गलरोमाणौ दीर्घजिह्वौ महाहनू

bhagavataḥ śrīkṛṣṇasya pārśve piśācadvayānāṃ āgamanaṃ teṣāmanu mahāghorau piśācau vikṛtānanau | prāṃśū piṅgalaromāṇau dīrghajihvau mahāhanū

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन सबके पश्चात्‌ दो महाभयंकर पिशाच वहाँ आये, जिनके मुख बड़े विकराल थे। वे दोनों ही ऊँचे कदके थे। उनके रोएँ पिड्लवर्णके थे। उनकी जिह्वाएँ बड़ी-बड़ी थीं और ठोड़ी बहुत चौड़ी थी

अध्याय 262

श्लोक 2

लम्बकेशौ विरूपाक्षौ ही ही हा हेति वादिनौ ।खादन्तौ मांसपिटकं पिबन्तौ रुधिरं बहु

lambakeśau virūpākṣau hī hī hā heti vādinau | khādantau māṃsapiṭakaṃ pibantau rudhiraṃ bahu

हिन्दी अर्थ

उन दोनोंके केश लम्बे और नेत्र भयंकर थे। वे *हा-हा, ही-ही' करते हुए बात करते थे और मांसकी पिटारीरूप शवका भक्षण करते तथा बहुत-सा रक्त पीते थे

अध्याय 262

श्लोक 3

अन्त्रवेष्टितसर्वाङ्गौ दीर्घौ कृशकृतोदरौ ।लम्बमानमहाप्रान्तशूलप्रोतशिरोधरौ

antraveṣṭitasarvāṅgau dīrghau kṛśakṛtodarau | lambamānamahāprāntaśūlaprotaśirodharau

हिन्दी अर्थ

उनके सारे आग़ोंमें दूसरे प्राणियोंकी आँतें लिपटी हुई थीं। वे विशालकाय थे; किंतु उनके पेट सटे हुए थे। वे लम्बे और फैले हुए शूलोंमें पिरोये हुए नरमुण्ड धारण किये हुए थे

अध्याय 262

श्लोक 4

कर्षन्तौ शवयूथानि बाहुभ्यां तत्र तत्र ह ।हसन्तौ विविधं हासं स्वजातिसदृशं नृप

karṣantau śavayūthāni bāhubhyāṃ tatra tatra ha | hasantau vividhaṃ hāsaṃ svajātisadṛśaṃ nṛpa

श्लोक 4–8 का हिन्दी अर्थ

और भुजाओंद्वारा जहाँ-तहाँसे झुंड-के-झुंड मुर्दे खींचे ला रहे थे। नरेश्वर! वे दोनों पिशाच अपनी जातिके अनुरूप नाना प्रकारसे अट्टहास करते और भाँति-भाँतिके प्रकृत वचन बोलते थे। अपनी जाँघों और पैरोंकी टक्करसे वे बड़े-बड़े वृक्षोंको भी हिला देते थे, जबड़े चाटते और दाँत कटकटाते थे। उनका सारा शरीर हड्डियों और स्नायुजालसे व्याप्त था; नस-नाड़ियाँ रस्सीकी भाँति सर्वत्र फैली दिखायी देती थीं। वे दोनों निरन्तर ' कृष्ण ! कृष्ण ! माधव !' इत्यादि नामोंका कीर्तन करते थे। वे कहते थे—' हमें भगवान्‌ विष्णुका दर्शन कब होगा? वे इस समय कहाँ होंगे ? हमारे स्वामी श्रीहरिका निवासस्थान कहाँ है ? हम किस तरह उनके दर्शनका प्रयत्न करें ? इस तपोवनमें देवेध्वर श्रीहरि कहाँ होंगे ?'

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श्लोक 5

वदन्तौ बहुरूपाणि वचांसि प्राकृतानि च ।कम्पयन्तौ महावृक्षानूरुपादप्रघट्टनैः

vadantau bahurūpāṇi vacāṃsi prākṛtāni ca | kampayantau mahāvṛkṣānūrupādapraghaṭṭanaiḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 6

सृक्किणीं लेलिहन्तौ च दन्तान्कटकटायिनौ ।अस्थिस्नायुसमाकीर्णौ धमनीरज्जुसन्ततौ

sṛkkiṇīṃ lelihantau ca dantānkaṭakaṭāyinau | asthisnāyusamākīrṇau dhamanīrajjusantatau

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 7

वदन्तौ कृष्ण कृष्णेति माधवेति च सन्ततम् ।कदा नु द्रक्ष्यते विष्णुः स इदानीं क्व तिष्ठति

vadantau kṛṣṇa kṛṣṇeti mādhaveti ca santatam | kadā nu drakṣyate viṣṇuḥ sa idānīṃ kva tiṣṭhati

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 8

स्वामिनः कुत्र वसतिः कुतो द्रष्टुं यतामहे ।अत्र वा कुत्र देवेशः कुतो नु स्थास्यते हरिः

svāminaḥ kutra vasatiḥ kuto draṣṭuṃ yatāmahe | atra vā kutra deveśaḥ kuto nu sthāsyate hariḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 9

कुतः पद्मपलाशाक्षः साक्षादिन्द्रानुजो हरिः ।यमाहुः पुण्डरीकाक्षं ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः

kutaḥ padmapalāśākṣaḥ sākṣādindrānujo hariḥ | yamāhuḥ puṇḍarīkākṣaṃ brahma brahmavido janāḥ

श्लोक 9–13 का हिन्दी अर्थ

जो साक्षात्‌ इन्द्रके छोटे भाई हैं तथा जिनके नेत्र प्रफु्ल कमलदलके समान विशाल हैं, वे श्रीहरि कहाँ मिलेंगे ? जिन्हें भक्तजन पुण्डरीकाक्ष (कमलनयन) कहते हैं और ब्रह्मज्ञानी पुरुष ब्रह्म कहते हैं, उन्हीं अजन्मा एवं सर्वव्यापी परम पुरुषका दर्शन करनेके लिये हम उद्यत हुए हैं। प्रलयकालमें ये तीनों लोक जिन जगदीश्ररमें प्रवेश कर जाते हैं, उन अजनमा विश्वस्रष्टा श्रीहरिका हम इस समय कैसे दर्शन करेंगे। जो समस्त प्राणियोंके निवासस्थान हैं, ये सम्पूर्ण लोक जिनका ही विस्तार (या विराट्रूप) है, उन्हीं सर्वेश्वर देव श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये इस समय हमलोग प्रयत्रशील हैं। सम्पूर्ण जन्तु जिससे द्वेष रखते हैं, जो जगत्‌में सबसे अधिक भयंकर अवस्था है, वही यह पिशाचयोनि न जाने हमें कैसे प्राप्त हुई ? और किस प्रकार बलपूर्वक हमारे भीतर प्रविष्ट हो गयी । यह मनुष्य और हड्डियोंको खानेके कारण कलुषित और सबको भय प्रदान करनेवाली है

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श्लोक 10

तमजं पुरुषं विष्णुं द्रष्टुमभ्युद्यता वयम् ।अन्तकाले जगन्नाथं प्रविवेश जगत्त्रयम्

tamajaṃ puruṣaṃ viṣṇuṃ draṣṭumabhyudyatā vayam | antakāle jagannāthaṃ praviveśa jagattrayam

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 11

तमजं विश्वकर्तारं कुतो द्रक्ष्याम साम्प्रतम् ।यस्य विस्तार एवैष लोकः प्राणिनिवासिनः

tamajaṃ viśvakartāraṃ kuto drakṣyāma sāmpratam | yasya vistāra evaiṣa lokaḥ prāṇinivāsinaḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 12

तं द्रष्टुं देवमीशानं यतामः साम्प्रतं हरिम् ।दशा घोरतमा लोके विद्विष्टा सर्वजन्तुभिः

taṃ draṣṭuṃ devamīśānaṃ yatāmaḥ sāmprataṃ harim | daśā ghoratamā loke vidviṣṭā sarvajantubhiḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 13

पैशाचीयं समुत्पन्ना कथं नौ प्राविशद्बलात् ।नरमांसास्थिकलुषा सर्वभीतिप्रदायिनी

paiśācīyaṃ samutpannā kathaṃ nau prāviśadbalāt | naramāṃsāsthikaluṣā sarvabhītipradāyinī

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 14

अहो नौ दुष्कृतं कर्म प्राक्तने कर्मसञ्चये ।अत्रैव महती प्रीतिर्वर्तते सर्वदा तथा

aho nau duṣkṛtaṃ karma prāktane karmasañcaye | atraiva mahatī prītirvartate sarvadā tathā

हिन्दी अर्थ

अहो! हम दोनोंके पूर्वजन्मकी कर्मराशिमें केवल दुष्कर्मका ही संचय हुआ था, जिससे हमें यह कलड्ित योनि प्राप्त हुई तो भी हमें इसीमें सदा परम प्रसन्नता बनी रहती . है

अध्याय 262

श्लोक 15

यावन्नौ दुष्कृतं कर्म तावत्स्थास्यति तादृशी ।दशा सा सर्वविद्विष्टा प्राणिपीडनकारिणी

yāvannau duṣkṛtaṃ karma tāvatsthāsyati tādṛśī | daśā sā sarvavidviṣṭā prāṇipīḍanakāriṇī

हिन्दी अर्थ

जबतक हम दोनोंका दुष्कर्म शेष है, तबतक हमारी उन कर्मोके अनुरूप ही यह पिशाचावस्था बनी रहेगी, जिससे समस्त प्राणी द्वेष रखते हैं तथा जो दूसरे जीवोंको केवल पीड़ा देनेवाली ही होती है

अध्याय 262

श्लोक 16

सर्वथा दुष्कृतं कर्म बहुभिर्जन्मसञ्चयैः ।तथा हि तत्फलं घोरमद्यापि न निवर्तते

sarvathā duṣkṛtaṃ karma bahubhirjanmasañcayaiḥ | tathā hi tatphalaṃ ghoramadyāpi na nivartate

हिन्दी अर्थ

निश्चय ही हमलोगोंने बहुत-से जन्मोंमें केवल पापकर्मोका ही संचय किया है, तभी तो उसका घोर फल आजतक भी निवृत्त नहीं हुआ है

अध्याय 262

श्लोक 17

यताः स्म प्राणिनो हन्तुं श्वगणैः सह साम्प्रतम् ।तथा हि प्राणिनो लोके बाल्यमादौ समास्थिताः

yatāḥ sma prāṇino hantuṃ śvagaṇaiḥ saha sāmpratam | tathā hi prāṇino loke bālyamādau samāsthitāḥ

श्लोक 17–19 का हिन्दी अर्थ

हम इस समय भी झुंड- के-झुंड कुत्ते साथ लिये प्राणियोंका वध करनेपर तुले हुए हैं। जगत्‌के प्राणी पहले बाल्यावस्थामें स्थित होते हैं, उस समय उनका चित्त अज्ञानसे आवृत होता है। इस कारण वे कर्तव्य और अकर्तव्यको नहीं जानते हैं। तदनन्तर जब वे युवावस्थामें प्रवेश करते हैं, उस समय विषयोंके आकर्षणसे उनकी बुद्धि भ्रान्त हो जाती है। साथ ही उनके पास विषयोंका संग्रह भी बढ़ जाता है। अत: विषयोंमें रचे-पचे रहकर वे कभी अपने कल्याणके लिये यत्र नहीं करते। जिनका चित्त विषयोंसे आविष्ट हो जाता है, वे मनुष्य यह नहीं समझ पाते कि कल्याणकारी कर्म क्या है ?'

अध्याय 262

श्लोक 18

अज्ञानावृतचित्ताश्च कृत्याकृत्यं न जानते ।तथा यौवनिनो भ्रान्ता विषयैर्बहुलीकृताः

ajñānāvṛtacittāśca kṛtyākṛtyaṃ na jānate | tathā yauvanino bhrāntā viṣayairbahulīkṛtāḥ

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 262

श्लोक 19

यतन्ते श्रेयसे नैव ततो विषयसंस्थिताः ।विषयाविष्टचित्ता हि मनुष्या न विजानते

yatante śreyase naiva tato viṣayasaṃsthitāḥ | viṣayāviṣṭacittā hi manuṣyā na vijānate

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 262

श्लोक 20

तथा च वृद्धभावे तु व्याधिभिर्बहुभिर्वृताः ।ज्वरादिभिर्महाघोरैर्नानादुःखविधायिभिः

tathā ca vṛddhabhāve tu vyādhibhirbahubhirvṛtāḥ | jvarādibhirmahāghorairnānāduḥkhavidhāyibhiḥ

हिन्दी अर्थ

तितमो 5ध्याय: + श्२३९ “तत्पश्चात्‌ जब वृद्धावस्था आती है, तब वे बहुत- सी व्याधियोंद्वारा घिर जाते हैं। नाना प्रकारके दुःख देनेवाले भयंकर ज्वर आदि रोग उन्हें धर दबाते हैं। फिर | इधर-उधर भटकनेवाली इन्द्रियोंक वशीभूत होकर वे अपने कल्याणके लिये यत्र नहीं कर पाते

अध्याय 262

श्लोक 21

यतन्ते न हि वै श्रेयो विनष्टेन्द्रियगोचराः ।ततो मृता गर्भवासे वसन्ति सततं नराः

yatante na hi vai śreyo vinaṣṭendriyagocarāḥ | tato mṛtā garbhavāse vasanti satataṃ narāḥ

श्लोक 21–27 का हिन्दी अर्थ

वे सोचते हैं कि 'मैं इस नरेशका वध करके इससे यह धन हर लूँगा, इस धनको चुराकर घर ले जाऊँगा और उसे उपभोगमें लाऊँगा। यह शान्त और दुर्बल है और मैं बलवान्‌ हूँ। मैं इसे डाँट-फटकारकर इसका धन हर लूँगा।' इन्हीं चिन्ताओंमें व्यग्र हुए मूर्ख मनुष्य दूसरे प्राणियोंको पीड़ा देनेका प्रयलर करते रहते हैं

अध्याय 262

श्लोक 22

विण्मूत्रकलिले घोरे दुःखैर्बहुभिराचिताः ।च्यवन्ते तु ततो घोराद्गर्भात्संसारमण्डले

viṇmūtrakalile ghore duḥkhairbahubhirācitāḥ | cyavante tu tato ghorādgarbhātsaṃsāramaṇḍale

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 262

श्लोक 23

परस्परं विहिंसन्तः कुर्वन्तः कर्मसञ्चयम् ।महत्येवं सदा घोरे संसारे दुःखसङ्कुले

parasparaṃ vihiṃsantaḥ kurvantaḥ karmasañcayam | mahatyevaṃ sadā ghore saṃsāre duḥkhasaṅkule

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 262

श्लोक 24

पापानि बहुरूपाणि कुर्वतेऽज्ञानतस्तदा ।संसारस्यैष महिमा विस्तृतः सर्वजन्तुषु

pāpāni bahurūpāṇi kurvate'jñānatastadā | saṃsārasyaiṣa mahimā vistṛtaḥ sarvajantuṣu

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 262

श्लोक 25

अच्छेद्यः शस्त्रसम्पातैरुपायैर्बहुभिः सदा ।एतस्मान्न निवर्तन्ते मर्त्याः प्राकृतबुद्धयः

acchedyaḥ śastrasampātairupāyairbahubhiḥ sadā | etasmānna nivartante martyāḥ prākṛtabuddhayaḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 262

श्लोक 26

इमं हत्वा मनुष्येन्द्रमिदमस्माद्धराम्यहम् ।चोरयित्वा धनमिदं हरिष्याम्याददाम्यहम्

imaṃ hatvā manuṣyendramidamasmāddharāmyaham | corayitvā dhanamidaṃ hariṣyāmyādadāmyaham

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 262

श्लोक 27

निर्भर्त्स्यैनमिमं शान्तं हरिष्यामि धनं बली ।इत्यादिव्याकुला मूर्खा यतन्ते प्राणिपीडनम्

nirbhartsyainamimaṃ śāntaṃ hariṣyāmi dhanaṃ balī | ityādivyākulā mūrkhā yatante prāṇipīḍanam

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 262

श्लोक 28

अस्यैव दुःखमूलस्य संसारस्य सदा हरिः ।भेषजं सर्वथा देवः शङ्खचक्रगदाधरः ।आदिदेवः पुराणात्मा आत्मा ब्रह्मविदां सदा

asyaiva duḥkhamūlasya saṃsārasya sadā hariḥ | bheṣajaṃ sarvathā devaḥ śaṅkhacakragadādharaḥ | ādidevaḥ purāṇātmā ātmā brahmavidāṃ sadā

हिन्दी अर्थ

दुःखके मूल-कारण इस संसाररूपी रोगको सदाके लिये सब प्रकारसे मिटानेके निमित्त एकमात्र उत्तम ओषधि श्गु, चक्र और गदा धारण करनेवाले, आदिदेव, पुराणपुरुष तथा ब्रह्मवेत्ताओंके आत्मा भगवान्‌ श्रीहरि ही हैं

अध्याय 262

श्लोक 29

ते वयं सर्वयत्नेन द्रक्ष्यामः सर्वथा हरिम् ।इत्थं पिशाचौ भाषन्तौ प्रादुरास्तां हरेः पुरः

te vayaṃ sarvayatnena drakṣyāmaḥ sarvathā harim | itthaṃ piśācau bhāṣantau prādurāstāṃ hareḥ puraḥ

हिन्दी अर्थ

अत: हमलोग सर्वथा सम्पूर्ण प्रयल करके श्रीहरिका दर्शन करेंगे।' इस प्रकारकी बातें करते हुए वे दोनों पिशाच भगवान्‌ श्रीकृष्णके सामने प्रकट हुए

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.