Harivamsha Purana
261
अध्याय 261 / 318

Parva 3, Adhyāya 78

26 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ26 श्लोक

अध्याय 261

श्लोक 1

भगवतः श्रीकृष्णस्य समाधिः, महान् कोलाहलं, तस्य पार्श्वे धावद्भ्यां मृगादीनां आगमनं ततः स भगवान् विष्णुर्दुर्विज्ञेयगतिः प्रभुः ।यत्र पूर्वम तपस्तप्तमात्मना यादवेश्वरः

bhagavataḥ śrīkṛṣṇasya samādhiḥ, mahān kolāhalaṃ, tasya pārśve dhāvadbhyāṃ mṛgādīnāṃ āgamanaṃ tataḥ sa bhagavān viṣṇurdurvijñeyagatiḥ prabhuḥ | yatra pūrvama tapastaptamātmanā yādaveśvaraḥ

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर जिनकी गतिका ज्ञान होना कठिन है, वे सर्वसमर्थ सर्वव्यापी भगवान्‌ यदुनाथ गड़ाजीके उत्तर तटपर उस स्थानको देखनेके लिये गये, जहाँ उन्होंने पूर्वकालमें स्वयं तप किया था। उन श्रीहरिने स्वयं ही उस साक्षातू तपोवनमें प्रवेश किया

अध्याय 261

श्लोक 2

गङ्गायाश्चोत्तरे तीरे देशं द्रष्टुमुपागतः ।स्वयमेव हरिः साक्षात् प्रविवेश तपोवनम्

gaṅgāyāścottare tīre deśaṃ draṣṭumupāgataḥ | svayameva hariḥ sākṣāt praviveśa tapovanam

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 261

श्लोक 3

प्रविश्य सुचिरं देशं ददर्श च मनोरमम् ।निषसाद ततस्तस्मिन्नाश्रमे पुण्यवर्धनः

praviśya suciraṃ deśaṃ dadarśa ca manoramam | niṣasāda tatastasminnāśrame puṇyavardhanaḥ

हिन्दी अर्थ

उसमें प्रवेश करके वे उस परम सुन्दर एवं मनोरम देशका दर्शन करने लगे। तदनन्तर पुण्यकी वृद्धि करनेवाले भगवान्‌ उस आश्रममें बैठे

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श्लोक 4

समाधौ योजयामास मनः पद्मनिभेक्षणः ।किमप्येष जगन्नाथो ध्यात्वा देवेश्वरः स्थितः

samādhau yojayāmāsa manaḥ padmanibhekṣaṇaḥ | kimapyeṣa jagannātho dhyātvā deveśvaraḥ sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

बैठनेके पश्चात्‌ उन कमलनयन श्रीकृष्णने अपने मनको समाधिमें लगाया । वे देवेश्वर जगन्नाथ किसी अनिर्वचनीय तत्त्वका चिन्तन करते हुए उस समाधिमें दृढ़तापूर्वक स्थित हो गये

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श्लोक 5

स्थिते देवगुरौ तत्र समाधौ दीपवद्धरौ ।तत्र शब्द महाघेरः प्रादुरासीत् समन्ततः

sthite devagurau tatra samādhau dīpavaddharau | tatra śabda mahāgheraḥ prādurāsīt samantataḥ

हिन्दी अर्थ

वायुशून्य स्थानमें निष्कम्पभावसे प्रज्वलित होनेवाले दीपकके समान जब वे देवगुरु श्रीहरि समाधिमें अविचलभावसे स्थित हो गये, तब वहाँ सब ओर बड़ा भयंकर शब्द प्रकट हुआ

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श्लोक 6

खाद खादत मोदेत यात यात मृगानिमान् ।प्रेषयेह पुनः सर्वान् प्रसादाच्छार्ङ्गधन्वनः

khāda khādata modeta yāta yāta mṛgānimān | preṣayeha punaḥ sarvān prasādācchārṅgadhanvanaḥ

हिन्दी अर्थ

मृर्गोंके पीछे। भगवान्‌ श्रीहरिके प्रसादसे इन सबको फिर यहाँ हाँक लाओ

अध्याय 261

श्लोक 7

एष विष्णुरयं कृष्णो हरिरीश इतोऽच्युतः ।नमोऽस्तु विष्णो देवेश स्वामिन्माधव केशव

eṣa viṣṇurayaṃ kṛṣṇo harirīśa ito'cyutaḥ | namo'stu viṣṇo deveśa svāminmādhava keśava

हिन्दी अर्थ

ये भगवान्‌ विष्णु हैं! ये श्रीकृष्ण हैं! ये हरि ईधर अच्युत इधर बैठे हैं । विष्णो ! देवेश्वर! स्वामिन्‌! केशव! आपको नमस्कार है'

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श्लोक 8

इत्यादिशब्दः सुमहानाविरासीत् तदा निशि ।ततश्च सुमहानादः सिंहानां मृगविद्विषाम्

ityādiśabdaḥ sumahānāvirāsīt tadā niśi | tataśca sumahānādaḥ siṃhānāṃ mṛgavidviṣām

हिन्दी अर्थ

इत्यादि रूपसे उस रातमें महानू कोलाहल होने लगा। तदनन्तर मृगद्रोही सिंह बड़े जोर-जोरसे दहाड़ने लगे

अध्याय 261

श्लोक 9

धावतां च शुनां राजन् मृगाननु विनर्दताम् ।मृगाणां भीतियुक्तानामृक्षाणां द्वीपिनां तथा

dhāvatāṃ ca śunāṃ rājan mṛgānanu vinardatām | mṛgāṇāṃ bhītiyuktānāmṛkṣāṇāṃ dvīpināṃ tathā

श्लोक 9–10 का हिन्दी अर्थ

राजन्‌! मृगोंके पीछे दौड़ते और भोंकते हुए कुत्तों, भयभीत मृगों, रीछों, व्याघ्रों और चिग्घाड़ते हुए हाथियोंका गर्जन चारों ओर इस प्रकार गूँजने लगा मानो प्रचण्ड वायुके वेगसे कम्पित एवं क्षुब्ध हुए महासागरका गम्भीर घोष सुनायी दे रहा हो

अध्याय 261

श्लोक 10

गजानां नदतां राजन् बृंहितं च ततस्ततः ।महावातसमुद्धूतक्षुभितस्येव वारिधेः

gajānāṃ nadatāṃ rājan bṛṃhitaṃ ca tatastataḥ | mahāvātasamuddhūtakṣubhitasyeva vāridheḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 261

श्लोक 11

नादस्त्रैलोक्यवित्रासः प्रादुरासीत्तदा निशि ।श्रुत्वा शब्दं हरिर्देवस्तादृशं तत्र धिष्ठितः

nādastrailokyavitrāsaḥ prādurāsīttadā niśi | śrutvā śabdaṃ harirdevastādṛśaṃ tatra dhiṣṭhitaḥ

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

उस समय रात्रिमें तीनों लोकोंको भयभीत करनेवाला वह महानाद प्रकट हुआ। वैसे महानू कोलाहलको सुनकर वहाँ बैठे हुए सम्पूर्ण जगत्‌के अधिपति भगवान्‌ श्रीकृष्णकी समाधि टूट गयी । वे सोचने लगे—*यह कैसा महान्‌ कोलाहल हो रहा है?

अध्याय 261

श्लोक 12

समाधिक्षोभमासाद्य विश्वस्य च जगत्पतिः ।ततः सञ्चिन्तयामास कोऽयमेष महास्वनः

samādhikṣobhamāsādya viśvasya ca jagatpatiḥ | tataḥ sañcintayāmāsa ko'yameṣa mahāsvanaḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

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श्लोक 13

कस्यायमीदृशः शब्दः स्तुतियुक्तो मम त्विति ।अहोऽस्मिन्मृगयाशब्दः शुनां सञ्चरतां वने

kasyāyamīdṛśaḥ śabdaḥ stutiyukto mama tviti | aho'sminmṛgayāśabdaḥ śunāṃ sañcaratāṃ vane

श्लोक 13–14 का हिन्दी अर्थ

यह किसका ऐसा शब्द सुनायी दिया है, जो मेरी तुतिसे युक्त है। अहो! इस वनमें दौड़ते हुए कुत्ते और आगते हुए समस्त मृगोंका यह महान्‌ कोलाहल, शिकार वरेलनेकी यह बड़ी भारी आवाज आश्चर्यकी वस्तु है। तारों ओर फैला हुआ यह कोलाहल मेरी स्तुतिसे मिश्रित चनोंद्वारा व्याप्त है'

अध्याय 261

श्लोक 14

मृगाणामथ सर्वेषां नादश्च सुमहानयम् ।व्यामिश्रस्तुतियुक्ताभिर्वाग्भिर्मम समन्ततः

mṛgāṇāmatha sarveṣāṃ nādaśca sumahānayam | vyāmiśrastutiyuktābhirvāgbhirmama samantataḥ

अर्थ श्लोक 13 के साथ

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श्लोक 15

इति सञ्चिन्त्य मनसा दिशो विप्रेक्ष्य सर्वतः ।तत आस्ते हरिस्तत्र ज्ञातुं तस्य समुद्भवम्

iti sañcintya manasā diśo viprekṣya sarvataḥ | tata āste haristatra jñātuṃ tasya samudbhavam

हिन्दी अर्थ

मन-ही-मन ऐसा सोचकर पम्पूर्ण दिशाओंकी ओर दृष्टिपात करके उस महान्‌ कोलाहलका कारण जाननेके लिये भगवान्‌ श्रीकृष्ण वहाँ प्रावधान होकर बैठे

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श्लोक 16

ततो मृगाः समाधावन् यत्र तिष्ठति केशवः ।तांश्चैवानुचरो राजन् श्वगणः समपद्यत

tato mṛgāḥ samādhāvan yatra tiṣṭhati keśavaḥ | tāṃścaivānucaro rājan śvagaṇaḥ samapadyata

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! इतनेहीमें बहुत-से युग भागते हुए उधर ही आ निकले, जहाँ भगवान्‌ ्रीकृष्ण विराजमान थे। साथ ही उनका पीछा करता हुआ कुत्तोंका झुंड भी आ पहुँचा

अध्याय 261

श्लोक 17

अथ वै दीपिका राजञ्छतशोऽथ सहस्रशः ।ततस्तमोऽपि व्यनशद् दिवेव समपद्यत

atha vai dīpikā rājañchataśo'tha sahasraśaḥ | tatastamo'pi vyanaśad diveva samapadyata

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! तदनन्तर पैकड़ों और हजारों मशालें जल उठीं, जिनसे सारा भन्धकार नष्ट हो गया और दिनके समान प्रकाश फैल [या

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श्लोक 18

ततो नु भूतसङ्घाश्च समदृश्यन्त तत्र ह ।पिशाचाश्च महाघोरा नदन्तो बहु विस्वनम्

tato nu bhūtasaṅghāśca samadṛśyanta tatra ha | piśācāśca mahāghorā nadanto bahu visvanam

श्लोक 18–19 का हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ वहाँ भूतोंके समुदाय दिखायी देये। महाभयंकर पिशाच गर्जते और भाँति-भाँतिके ब्द कर रहे थे। वे कच्चे मांस खाते और बहुत-सा रक्त ीते हुए वहाँ प्रकट हुए। उनका स्वरूप बड़ा भयंकर पा। वे सभी पिशाच विकराल मुखवाले थे

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श्लोक 19

भक्षयन्तोऽथ पिशितं पिबन्तो रुधिरं बहु ।प्रादुरासन्महाघोराः पिशाचा विकृताननाः

bhakṣayanto'tha piśitaṃ pibanto rudhiraṃ bahu | prādurāsanmahāghorāḥ piśācā vikṛtānanāḥ

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 261

श्लोक 20

हन्यमाना हता राजन् पतन्तः पतिता मृगाः ।इतश्चेतश्च धावन्तो बाणैर्विद्धा मृगा द्विपाः

hanyamānā hatā rājan patantaḥ patitā mṛgāḥ | itaścetaśca dhāvanto bāṇairviddhā mṛgā dvipāḥ

हिन्दी अर्थ

[जन्‌! कितने ही मृग उन पिशाचोंद्वारा मारे गये और परे जा रहे थे। कितने ही धराशायी हो चुके थे और हहुत-से तत्काल गिर रहे थे। बाणोंसे घायल हुए मृग और हाथी इधर-उधर भाग रहे थे

अध्याय 261

श्लोक 21

ततो मृगसहस्राणि समुदीर्णानि भारत ।यत्रासौ तिष्ठते देवस्तत्र याता निरन्तरम्

tato mṛgasahasrāṇi samudīrṇāni bhārata | yatrāsau tiṣṭhate devastatra yātā nirantaram

श्लोक 21–24 का हिन्दी अर्थ

भारत! त्पश्चात्‌ जहाँ भगवान्‌ श्रीकृष्ण विराज रहे थे, वहाँ पहस्त्रों मृग लगातार भागते चले आये और देवेधर रीकृष्णको घेरकर खड़े हो गये । यह बात हमारे सुनने- ं आयी है। थोड़ी ही देरमें बहुत-सी विकृत आकारवाली विकराल पिशाचियाँ भी वहाँ आ पहुँचीं, जहाँ भगवान्‌ केशव विराजमान थे। वे सब-की-सब पुत्रवती थीं, नके दर्शनमात्रसे दूसरोंके रोंगटे खड़े हो जाते थे। जिन्द्र ! इसी प्रकार कुत्तोंका समुदाय भी वहाँ आकर धर-उधर विचरने लगा। तत्पश्चात्‌ उन मृगोंद्वारा घिरे ुए ले विष्णुस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्ण उन सबको वहाँ भाया देख महान्‌ आश्चर्यमें पड़कर उन सबकी ओर खखने लगे

अध्याय 261

श्लोक 22

अन्तरीकृत्य देवेशं स्थितानीत्यनुशुश्रुम ।पिशाच्यो विकृताकाराः कराला रोमहर्षणाः

antarīkṛtya deveśaṃ sthitānītyanuśuśruma | piśācyo vikṛtākārāḥ karālā romaharṣaṇāḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 261

श्लोक 23

पुत्रवत्यः समापेतुर्यत्र तिष्ठति केशवः ।श्वगणस्तत्र राजेन्द्र चरत्येवं ततस्ततः

putravatyaḥ samāpeturyatra tiṣṭhati keśavaḥ | śvagaṇastatra rājendra caratyevaṃ tatastataḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 261

श्लोक 24

ततः स भगवान् विष्णुः सर्वमालोक्य वेष्टितः ।विस्मयं परमं गत्वा पश्यन्नास्ते स्म केशवः

tataḥ sa bhagavān viṣṇuḥ sarvamālokya veṣṭitaḥ | vismayaṃ paramaṃ gatvā paśyannāste sma keśavaḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 261

श्लोक 25

कस्यैष विस्तृतो नादः कस्य वायं जनोऽपतत् ।को नु मां स्तौति भक्त्या वै भविष्ये प्रीतिमानहम्

kasyaiṣa vistṛto nādaḥ kasya vāyaṃ jano'patat | ko nu māṃ stauti bhaktyā vai bhaviṣye prītimānaham

हिन्दी अर्थ

तमो वे सोचने लगे-'यह किसका महान्‌ कोलाहल फैला हुआ है, अथवा यह किसका जन-समुदाय यहाँ आ पहुँचा है ? कौन भक्तिभावसे मेरी स्तुति करता है? जिसके ऊपर मैं प्रसन्न होऊँगा

अध्याय 261

श्लोक 26

कस्य मुक्तिः समायाता प्रीते मयि सुदुर्लभा ।इति सञ्चिन्त्य भगवानास्ते प्राकृतवद्धरिः

kasya muktiḥ samāyātā prīte mayi sudurlabhā | iti sañcintya bhagavānāste prākṛtavaddhariḥ

हिन्दी अर्थ

आज मेरे प्रसन्न होनेपर किसको परम दुर्लभ मुक्ति प्राप्त होना चाहती है।' इस प्रकार भगवान्‌ श्रीहरि साधारण मनुष्यके समान सोच-विचार करते हुए वहाँ बैठे रहे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.