Harivamsha Purana
264
अध्याय 264 / 318

Parva 3, Adhyāya 81

21 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ21 श्लोक

अध्याय 264

श्लोक 1

पिशाचेन समाधिअवस्थायां विष्णोः साक्षात्कारं ततः स भगवान् विष्णुः पिशाचं दृष्टवांस्तदा ।चिन्तयत्त स्वमात्मानं शुद्धबुद्धिसमन्वितम्

piśācena samādhiavasthāyāṃ viṣṇoḥ sākṣātkāraṃ tataḥ sa bhagavān viṣṇuḥ piśācaṃ dṛṣṭavāṃstadā | cintayatta svamātmānaṃ śuddhabuddhisamanvitam

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर उन भगवान्‌ विष्णु ( श्रीकृष्ण )-ने उस समय उस पिशाचकी ओर देखा, जो अपने आत्मस्वरूप श्रीहरिका ही चिन्तन कर रहा था। वह शुद्ध बुद्धिसे सम्पन्न था

अध्याय 264

श्लोक 2

आत्मन्यवस्थितं साक्षात् पठन्तं प्रणवं सकृत् ।प्रार्थयन्तं स्वमात्मानमेकान्ते नियतं हरिः

ātmanyavasthitaṃ sākṣāt paṭhantaṃ praṇavaṃ sakṛt | prārthayantaṃ svamātmānamekānte niyataṃ hariḥ

हिन्दी अर्थ

वह हृदयकमलमें स्थित हो साक्षात्‌ प्रणवका प्रत्येक नाम या मन्त्रके साथ एक बार उच्चारण करता था और अपने आत्मस्वरूप विष्णुसे ही अभीष्ट मनोरथके लिये प्रार्थना करता था। इस प्रकार एकान्तमें नियमपूर्वक ध्यान लगाये घण्टाकर्णको श्रीहरिने देखा

अध्याय 264

श्लोक 3

अचिन्तयज्जगन्नाथः कारणं पुण्यसञ्चये ।ध्यात्वा तु सुचिरं विष्णुः कारणं पुण्यकर्मणः

acintayajjagannāthaḥ kāraṇaṃ puṇyasañcaye | dhyātvā tu suciraṃ viṣṇuḥ kāraṇaṃ puṇyakarmaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय उन जगदीश्वर श्रीहरिने सोचा कि इसके पुण्यसंचयमें क्या कारण है। उसके पुण्यकर्मके कारणके विषयमें चिरकालतक चिन्तन करके वे इस निश्चयपर पहुँचे

अध्याय 264

श्लोक 4

धनदस्योपदेशेन पठन् सुबहुशः क्षितौ ।वासुदेवेति कृष्णेति माधवेति च मां सदा

dhanadasyopadeśena paṭhan subahuśaḥ kṣitau | vāsudeveti kṛṣṇeti mādhaveti ca māṃ sadā

हिन्दी अर्थ

यह कुबेरके उपदेशसे पुथ्वीपर अनेक बार वासुदेव, कृष्ण, माधव इत्यादि नाम ले-लेकर निरन्तर मेरा कीर्तन करता रहा है

अध्याय 264

श्लोक 5

जनार्दन हरे विष्णो भूतभावनभावन ।नराकार जगन्नाथ नारायण परायण

janārdana hare viṣṇo bhūtabhāvanabhāvana | narākāra jagannātha nārāyaṇa parāyaṇa

श्लोक 5–6 का हिन्दी अर्थ

जनार्दन! हरे! विष्णो! भूतभावनभावन! नराकार ! जगन्नाथ! नारायण! परायण! इत्यादि नामोंद्वारा नित्य दिन-रात मुझे ही पुकारता रहा है। सोते, जागते, खड़े होते, खाते-पीते, चलते-फिरते और बोलते समय मेरे ही नामोंका कीर्तन करता आया है

अध्याय 264

श्लोक 6

इति मां नामभिर्नित्यं पठत्येव दिवानिशम् ।स्वपञ्जाग्रंस्तथा तिष्ठन्भुञ्जन्गच्छंस्तथा वदन्

iti māṃ nāmabhirnityaṃ paṭhatyeva divāniśam | svapañjāgraṃstathā tiṣṭhanbhuñjangacchaṃstathā vadan

अर्थ श्लोक 5 के साथ

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श्लोक 7

भक्षयन् मांसपिटकं पिबञ्च्छोणितमेव वा ।बाधमानश्च सुचिरं हत्वा चापि मृगान् बहून्

bhakṣayan māṃsapiṭakaṃ pibañcchoṇitameva vā | bādhamānaśca suciraṃ hatvā cāpi mṛgān bahūn

श्लोक 7–10 का हिन्दी अर्थ

पिटारी- की-पिटारी मांस खाते अथवा खून पीते समय भी यह मेरे नामोंकी रट लगाता रहा है। चिरकालतक प्राणियोंको कष्ट देकर और बहुत-से मृगोंका वध करके भी उनके हनन और भोजनके समय, जाग्रतू और स्वप्र- अवस्थाओंमें तथा सभी कार्योमें यह मुझ वासुदेवको ही कर्ता मानता आया है। इसके इस घोर कर्मके परिपाक (विनाश)-का यह समय प्राप्त हुआ है। ऐसा निश्चय करके वे जगन्नाथ उसपर बहुत प्रसन्न हुए। राजन्‌! तदनन्तर जगदीश्वर श्रीहरिनि उस अनन्यभक्त पिशाचको भी उसके शुद्ध अन्तःकरणमें अपने स्वरूपका दर्शन कराया

अध्याय 264

श्लोक 8

हनने भोजने चैष जाग्रत्स्वप्ने तथैव च ।सर्वेष्वपि च कार्येषु कर्ताहमिति मन्यते

hanane bhojane caiṣa jāgratsvapne tathaiva ca | sarveṣvapi ca kāryeṣu kartāhamiti manyate

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 264

श्लोक 9

एतस्य कर्मणः पाक एष घोरस्य कर्मणः ।निश्चित्यैवं जगन्नाथः प्रीतस्तस्य बभूव ह

etasya karmaṇaḥ pāka eṣa ghorasya karmaṇaḥ | niścityaivaṃ jagannāthaḥ prītastasya babhūva ha

अर्थ श्लोक 7 के साथ

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श्लोक 10

अदर्शयत् स्वमात्मानमनन्यस्य जगत्पतिः ।शुद्धेऽन्तःकरणे तस्य पिशाचस्यापि भूमिप

adarśayat svamātmānamananyasya jagatpatiḥ | śuddhe'ntaḥkaraṇe tasya piśācasyāpi bhūmipa

अर्थ श्लोक 7 के साथ

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श्लोक 11

स च घोरः पिशाचोऽपि ददर्शात्मनि केशवम् ।पीतकौशेयवसनं पद्माक्षं श्यामलं हरिम्

sa ca ghoraḥ piśāco'pi dadarśātmani keśavam | pītakauśeyavasanaṃ padmākṣaṃ śyāmalaṃ harim

हिन्दी अर्थ

उस भयड्र पिंशाचने भी अपने अन्त:करणमें रेशमी पीताम्बरधारी, कमलनयन, श्यामसुन्दर पापहारी केशवका दर्शन किया

अध्याय 264

श्लोक 12

शङ्खिनं चक्रिणं विष्णुं स्रग्विणं गदिनं विभुम् ।किरीटिनं कौस्तुभिनं श्रीवत्साच्छादितोरसम्

śaṅkhinaṃ cakriṇaṃ viṣṇuṃ sragviṇaṃ gadinaṃ vibhum | kirīṭinaṃ kaustubhinaṃ śrīvatsācchāditorasam

हिन्दी अर्थ

वे भगवान्‌ विष्णु हाथोंमें शड्, चक्र और गदा लिये हुए थे। उनके गलेमें वनमाला, मस्तकपर किरीट और वक्ष:स्थलपर कौस्तुभमणिकी शोभा हो रही थी। उनका हत्प्रदेश श्रीवत्सकी आभासे आच्छादित हो रहा था

अध्याय 264

श्लोक 13

नीलमेघनिभं कान्तं गरुडस्थं प्रभञ्जनम् ।चतुर्भुजं शुभगिरं निश्चलं सर्वगं शिवम्

nīlameghanibhaṃ kāntaṃ garuḍasthaṃ prabhañjanam | caturbhujaṃ śubhagiraṃ niścalaṃ sarvagaṃ śivam

हिन्दी अर्थ

वे नीलवर्णके मेघकी भाँति कमनीय काम्ति धारण करते थे। गरुड़की पीठपर विराजमान थे और भवभयभज्जन करनेवाले थे। उनके चार भुजाएँ शोभा पाती थीं। उनकी वाणी मज़लमयी थी । वे सर्वव्यापी कल्याणस्वरूप प्रभु निश्चलभावसे खड़े थे

अध्याय 264

श्लोक 14

अनादिनिधनं नित्यं मायाविनममायिनम् ।सत्ययुक्तं सदा शुद्धं बुद्धिगम्यं सदामलम्

anādinidhanaṃ nityaṃ māyāvinamamāyinam | satyayuktaṃ sadā śuddhaṃ buddhigamyaṃ sadāmalam

हिन्दी अर्थ

उनका न कहीं आदि है न अन्त। वे नित्य मायावी (मायापति) हैं। उनपर किसीकी माया नहीं चलती है। वे सत्ययुक्त, सदा शुद्ध, बुद्धिगम्य तथा नित्य निर्मल हैं

अध्याय 264

श्लोक 15

मनस्येवं जगन्नाथं दृष्ट्वा विष्णुमनेकधा ।अनुन्मील्यैव नयने कृतार्थोऽस्मीत्यमन्यत

manasyevaṃ jagannāthaṃ dṛṣṭvā viṣṇumanekadhā | anunmīlyaiva nayane kṛtārtho'smītyamanyata

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार हदयके भीतर प्रकट हुए जगदीश्वर विष्णुका बारम्बार दर्शन करके आँख खोले बिना ही अपने-आपको कृतार्थ मानने लगा

अध्याय 264

श्लोक 16

अथ दृष्टो हरिर्विष्णुः साक्षात् सर्वत्रगः शुभः ।प्रसन्नो हि हरिर्मह्यं तेनाहं दृष्टवान् हरिम्

atha dṛṣṭo harirviṣṇuḥ sākṣāt sarvatragaḥ śubhaḥ | prasanno hi harirmahyaṃ tenāhaṃ dṛṣṭavān harim

हिन्दी अर्थ

अहो! अब सर्वव्यापी, शुभस्वरूप, साक्षात्‌ भगवान्‌ विष्णु हरिने मुझे दर्शन दिया है, निश्चय ही वे श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हैं; इसीसे मैं उनका दर्शन पा सका हूँ

अध्याय 264

श्लोक 17

सिद्धं मे जन्मनः कृत्यं किमतः कृत्यमस्ति मे ।ग्रन्थयो मम निर्भिन्ना वश्यान्येवेन्द्रियाणि मे

siddhaṃ me janmanaḥ kṛtyaṃ kimataḥ kṛtyamasti me | granthayo mama nirbhinnā vaśyānyevendriyāṇi me

हिन्दी अर्थ

मेरे जन्मका प्रयोजन सिद्ध हो गया, इससे बढ़कर मेरे लिये अब और कौन- से कर्तव्य शेष हैं। मेरी अज्ञानमयी गाठें खुल गयीं और इन्द्रियाँ भी वशमें हो ही गयीं

अध्याय 264

श्लोक 18

प्रायेण जितमित्येव मनो मन्ये स्मृते हरौ ।एषणाश्च निरस्ता मे प्रसन्नोऽहं तथाभवम्

prāyeṇa jitamityeva mano manye smṛte harau | eṣaṇāśca nirastā me prasanno'haṃ tathābhavam

हिन्दी अर्थ

पी 5ध्याय: श्२ढ४९ श्रीहरिका स्मरण होनेपर मैं ऐसा मानता हूँ कि प्राय: मेरा मन जीत लिया गया। मेरी त्रिविध एषणाएँ (लोकैषणा, वित्तैषणा और पुत्रैषणा) दूर हो गयीं और मैं पूर्ण प्रसन्न हो गया

अध्याय 264

श्लोक 19

एतेभ्योऽपि पिशाचेभ्यो निर्मुक्तः साम्प्रतं तथा ।योऽसौ ममानुजः साक्षात्स च भक्तस्तथा हरौ

etebhyo'pi piśācebhyo nirmuktaḥ sāmprataṃ tathā | yo'sau mamānujaḥ sākṣātsa ca bhaktastathā harau

श्लोक 19–21 का हिन्दी अर्थ

अब इन पिशाचोंसे भी सम्बन्ध छूट गया। वह जो मेरा सगा छोटा भाई है, वह भी भगवान्‌ विष्णुका भक्त है; अत: समयानुसार पुक्त होकर वह भी विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेगा। ऐसा सोचकर उसने आँतोंका पाश काट डाला और क्रमश: प्राणोंको उन्मुक्त करके सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखकर शरीरको सुगम करके उसके भीतर पुखपूर्वक प्रविष्ठ हुआ

अध्याय 264

श्लोक 20

कालेन चैव निर्मुक्तो विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात् ।इत्येवं चिन्तयित्वा स आन्त्रपाशं विभिद्य च

kālena caiva nirmukto viṣṇoḥ sāyujyamāpnuyāt | ityevaṃ cintayitvā sa āntrapāśaṃ vibhidya ca

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 264

श्लोक 21

क्रमेण प्राणानुन्मुच्य विलोक्य च दिशस्तथा ।शरीरं सुगमं कृत्वा प्राविशत् स सुखेन ह

krameṇa prāṇānunmucya vilokya ca diśastathā | śarīraṃ sugamaṃ kṛtvā prāviśat sa sukhena ha

अर्थ श्लोक 19 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

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आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.